Thursday, August 11, 2016

जम्मू कश्मीर में हिन्दी कविता और युवा कवि : एक अवलोकन - कमल जीत चौधरी / 01



युवा कवि कमल जीत चौधरी से अनुनाद का आग्रह था कि जम्मू-कश्मीर की कविता की पड़ताल करें। उन्होंने एक लम्बा लेख उपलब्ध कराया है, जिसके लिए अनुनाद कमल जीत का आभारी है।  इस लेख को एक साथ प्रस्तुत किया जाना मुमकिन नहीं है, इसलिए इसे तीन हिस्सों में छापने की योजना है। आज यह पहला हिस्सा।



अग्रज उदय प्रकाश की एक कविता मुझे बहुत प्रिय है . इसे आलेख पढ़ने के बाद भी ध्यान में रखा जाए -

आदमी मरने के बाद कुछ नहीं बोलता
आदमी मरने के बाद कुछ नहीं सोचता
कुछ न बोलने और कुछ न सोचने से
आदमी मर जाता है .


इधर के परिदृश्य में संवाद और असहमति के लिए जगह कम हुई .  हम एक दूसरे को जानना नहीं चाहते . दूसरे का दुःख हमें सालता नहीं . उसके सुख से हम दुखी होते हैं . जनतंत्र एक एक हाई टेक जाल बन गया है . कविता चूहे की तरह यह जाल कुतरने की सामर्थ्य रखती है . ऐसे में कविता की भूमिका पर बात की जानी चाहिए . मैं किसी को बड़ा या छोटा होने का प्रमाणपत्र देने की पात्रता या अधिकार नहीं रखता . मैं यहाँ कवियों की सूची नहीं बनाऊंगा .यह भ्रामक होगा और इसके अपने खतरे हैं . इस आलेख का उधेश्य जम्मू कश्मीर प्रान्त में पिछले कुछ सालों में उभरी काव्य प्रवृत्तियों से परिचय करवाना है . लिखने की जिम्मेवारी समझता हूँ . प्रवृत्तियाँ गिनाते हुए मेरा नाम या काव्य पंक्तियाँ आयें तो  इसका सरलीकरण न किया जाए . वैसे
मैं इससे बचूंगा .

हिन्दी कविता में एक स्थापित मुख्यधारा है .  मुख्यधारा से मेरा आशय इससे अलग कुछ और है . आम आदमी का साथ देती और एक प्रतिपक्ष रचने वाली हिन्दी कविता मेरी दृष्टि में मुख्यधारा है . मानवीय मूल्यों वाली इस कविता की शर्त कोई भूगोलिक हदबंदी नहीं होनी चाहिए . जिसमें रहने की अनिवार्य शर्त गुणवत्ता और ईमानदारी  है . दिल्ली के बाहर भी दिल्लियाँ हैं . इसे प्रवृत्ति की तरह देखा जाए . इस तरह सीमांतों में भी अच्छी कविता के साथ जो एक साहित्यिक सत्ता रहती है. जो एक तेज चमक होती है . इससे अछूता रहकर लिखना आसान काम नहीं है .

' यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं ,
सीस उतारी हत्थी रखे फिर पैठे घर माहिं . – कबीर

यह बात जम्मू कश्मीर की कविता पर भी लागू होती है . यहाँ भी सत्ता , पद प्रतिष्ठान और पुरस्कार लेखकों की परीक्षा लेते हैं . इस परीक्षा में कम ही लेखक सफल होते आए हैं .

युवा कवि एक भ्रामक शब्द है . प्रगतिशील होना ही युवा होना है . प्रगतिशील कविता छाया में सन ग्लासेस नहीं पहनती . प्रेम करना खूब जानती है . यह रात को रात और दिन को दिन कहना जानती है . इस शर्त के साथ हिन्दी के पास चन्द्रकांत देवताले , वीरेन डंगवाल, नरेश सक्सेना , मंगलेश डबराल , हरीश चन्द्र पाण्डेय , देवी प्रसाद मिश्र , बिष्णु नागर , अरुण कमल , राजेश जोशी , आलोकधन्वा , हुकुम ठाकुर , ज्ञानेन्द्रपति , विष्णु खरे , कुमार अम्बुज आदि चिर युवा कवि हैं . जम्मू कश्मीर में महाराज कृष्ण संतोषी , निर्मल विनोद अग्निशेखर , अशोक कुमार , रमेश मेहता , श्याम बिहारी , पवन खजुरिया , राजेश्वर भाखड़ी , शकुन्त दीपमाला , डॉ० राजकुमार शर्मा , डॉ० चंचल डोगरा , मनोज शर्मा , श्याम बिहारी आदि अग्रज कवियों को इस कसौटी पर परखना चाहिए . यह सभी कवि पचपन की उम्र पार कर चुके हैं . इस आलेख में प्रदेश में लिखी जा रही नयी सदी की कविता मेरी प्राथमिकता में रहेगी .

पिछली सदी का अंतिम दशक दक्षिणपंथी ताकतों के उभरने का है . जो आज घिनोनी राजनीति द्वारा संचित पोषित होकर अख़लाक आदि के कत्ल पर फल फूल रही हैं .इसने आम हिन्दू मुस्लिम की दुनिया को पहले से भी बुरा बना दिया है . 1990 में  कश्मीरी पण्डितों के विस्थापन और 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस को
राजनेताओं ने खुलकर भोगा . हिन्दू - मुस्लिम तुष्टिकरण शुरू हुआ . जो अबाध गति से जारी है . अफसोस यह है कि निम्न मध्यवर्ग धर्म का झुनझुना बजा रहा है . लोग  इसकी तलवार के आशिक हो गए हैं . मसलोनी और हिटलर के वंशज दुनिया को एक यातनाघर में बदल देने का उपक्रम कर रहे हैं . निजता खत्म हो गई है . हम एक नम्बर बन गए हैं . किसी भी समय हैंग या हैक  किए जा सकते हैं . हम फासीवाद के बदले हुए रूप को प्रगति समझने की भूल कर रहे हैं . ऐसे भयावह समय में सच्चा कवि , कलाकार और एक्टिविस्ट संघर्षों में लिप्त है . वह इन ताकतों के खिलाफ लिख , बोल कर लड़ रहा है.  वह समझता है कि दुनिया को सुन्दर बनाने का सपना मेहनतकशों के साथ होकर ही पूरा हो सकता है . अरुण कमल कहते हैं कि कविता अंतिम मोर्चा है जहां से मनुष्यता के लिए लड़ाई जारी रखी जा सकती है . असली कविता अभी भी चूकी नहीं है . यह बात जम्मू कश्मीर की कविता पर भी लागू होती है .

रीतिकालीन कवि दत्त को जम्मू कश्मीर का पहला हिन्दी कवि माना जाता है . लम्बे अन्तराल के बाद उनकी वीर रस परम्परा से अलग एक नया नया मोड़ आया . पण्डित नीलकंठ , जिंदा कौल , पृथ्वीनाथ पुष्प आदि ने रहस्यवाद , श्रृंगार, प्रकृति चित्रण जैसी काव्य प्रवृत्तियों से कविता को आगे बढ़ाया.

1960 के बाद डॉ० ओम प्रकाश गुप्त , देशबंधु डोगरा नूतन , डॉ० ओम गोस्वामी , पद्मा सचदेव जैसे कवि सामने आते  हैं . गुप्त को छोड़कर अन्य डोगरी में लिखने लगे . साठ से सत्तर के बीच नयी कविता के भाव बोध और शिल्प को पकड़ने का प्रयास  हुआ .  इस बीच  निर्मल विनोद और सुतीक्ष्ण कुमार आनंदम जैसे कवि छायावादी प्रवृत्तियों को जगह देते हैं . आगे चलकर डॉ० गुप्त , रमेश मेहता और सुभाष भारद्वाज की कविताओं में कमाधिक छायावादी  , प्रयोगवादी और प्रगतिवादी प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं . अग्रज कवि अशोक कुमार अपने पहले कविता संग्रह की भूमिका में लिखते हैं - ' जम्मू कश्मीर में हिन्दी कविता को छायावाद के चंगुल से छुड़ाने की दिशा में सबसे पहला प्रयास प्रोफेसर सुभाष भारद्वाज ने किया . ' १ . वे इसे ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं. यह 1980 की बात है . अशोक कुमार के संग्रह ' डूबे हुए सूरज की तलाश ' में भी नयी काव्य प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं . इसमें वे प्रयोग आग्रही हैं . इन्हीं दिनों ज्योतिश्वर पथिक भी इन्हीं प्रवृत्तियों के साथ लिख रहे थे . रमेश मेहता के ' खुले कमरे बंद द्वार ' [ 1972] , और ' तिनका तिनका घोंसला ' [1987 ] कविता संग्रह प्रकाशित हुए . वे अज्ञेय से इस कद्र प्रभावित रहे कि बरसों तक अज्ञेय व्याख्यान श्रृंखला करवाते रहे . पिछली सदी तक अधिकतर कवियों ने निराला , केदारनाथ अग्रवाल , त्रिलोचन , शमशेर बहादुर सिंह , मुक्तिबोध , बाबा नागार्जुन , धूमिल आदि की परम्परा से मात्र हिट एंड रन वाला सम्बन्ध रखा . दरअसल हिट एंड रन इनका वर्गबोध रहा .

उन्नीस सौ नब्बे के बाद एक बड़ा बदलाव आता है . कश्मीर से पण्डितों का विस्थापन हुआ . धार्मिक कट्टरता ने पण्डितों से उनके घर छीन लिए . यह एक बड़ी ट्रेजडी थी . कविता के लिए इसे टर्निंग पॉइंट कहते हुए मुझे जरा भी ख़ुशी नहीं हो रही . घर और अपनी मिट्टी छोड़ने के दर्द को भुलाया नहीं जा सकता .  विस्थापन ने कुछ यादगार कविताएँ दी . जिहाद और जीनोसाइड के खिलाफ खूब लिखा गया . देश विदेश ने इस कविता और उनके दुःख को अपना समझा . इसी दौरान महाराज कृष्ण संतोषी के ' बर्फ पर नंगे पाँव ' , ' यह समय कविता का नहीं ' और डॉ० अग्निशेखर के ' किसी भी समय ' और ' मुझसे छीन ली गयी मेरी नदी ' नामक संग्रह आए . इनका मूल स्वर विस्थापन का दर्द और स्मृतियाँ हैं. ' पुल पर गाय ' शीर्षक कविता की पंक्तियाँ देखें –

छींकती है जब भी मेरी माँ
यहाँ विस्थापन में 
उसे याद कर रही होती है गाय  ...

यहाँ एक टीस है . विस्थापित कवियों में अपनी मिट्टी और पूर्वजों के प्रति गहरा प्रेम और प्रतिबद्धता है . अग्निशेखर लिखते हैं –

मैं लड़ता रहूँगा पिता
स्मृतिलोप के खिलाफ ...
पिता , मैं साँस साँस जी रहा हूँ
गाँव अपना
तुम स्वीकार करो तर्पण .

विस्थापन की कविताएँ लल्लद्यद की नाव सी हैं .  ऐसी कविताएँ  विश्व कविता में एक स्थान रखती हैं . स्मृतियाँ इस कविता की ख़ास विशेषता रही है . डॉ ० अग्निशेखर , महाराज कृष्ण संतोषी , क्षमा कौल की कविताएँ खासकर देखी जा सकती हैं . इनसे अलग सन्दर्भों में जम्मू की मूल कविता में भी पिता , माँ, दोस्तों और कुछ छूटी हुई जगहों की स्मृतियाँ हैं .

1992 में एक बार फिर धार्मिक कट्टरता ने लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए . बाबरी मस्जिद को तोड़ा गया . करोड़ों लोगों की भावनाओं का राजनीतिकरण हुआ . आज तक हो रहा है . एक दुखी आदमी दूसरे दुखी आदमी की पीड़ा को अधिक समझ सकता है . जाने क्यों हरे दुखों वाले विस्थापित अग्रज
कवि बाबरी मस्जिद विध्वंस पर चुप रहे . वैसे किसी घटना पर नहीं लिखना कवि की अपनी आज़ादी है . मेरा निजी मत है कि जम्मू कश्मीर के सन्दर्भ में इसे नहीं उकेरने को सिर्फ कवि की आज़ादी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए .

विस्थापितों की कविताएँ अपने दुःख में मुग्ध हैं . इतनी कि अपने शरणदाता जम्मू के साथ होने वाले राजनीतिक भेदभाव को रेखांकित करने के दायित्व को भूल गई . वैसे जम्मू के मूल कवियों ने भी इस पर न के बराबर लिखा है . जम्मू और कश्मीर दो अलग अलग खित्ते हैं . इनके बीच संघर्ष और द्वन्द है . कुछ कविताएँ इस ओर ध्यान दिलाती हैं . काव्यांश देखें –

यह अलग बात है
पुराण कथाएँ सत्य हो रही हैं
स्वर्ग चतुर्दिक झण्डे गाढ़ रहा है
धरती हार रही है .    {  ' बच्चे बड़े हो रहे हैं ' - कमल जीत चौधरी  }

देश में यह वह समय है जब आम पर चिनार उग आए हैं .
{  ' सत्यापन ' - कमल जीत चौधरी  }

ऐसी कविताएँ अपवाद हैं . पर ध्यान रहे यह अपवाद की कविताएँ नहीं हैं . इसी तरह से आम कश्मीरी की पीढ़ा को व्यक्त करने वाले निदा नवाज़ भी अपवाद हैं . पर उनका साहित्य भी अपवाद का साहित्य नहीं है . जनता कहीं की भी हो कवि को उसका प्रतिनिधि होना चाहिए . प्रतिनिधि का अर्थ सिर्फ उसको अभिव्यक्त करने में नहीं है . जनता को स्वार्थान्ध राजनीति या कट्टर ताकतों के चंगुल से छुड़ाकर रास्ता दिखाना भी कवि का दायित्व है . साहित्य का एक अर्थ ' जैसा हो सकता है ' भी है . मतलब कि इसमें होने या नवनिर्माण की सम्भावना छिपी होती है . साहित्य की इस शक्ति को समझ कर आगे के रास्ते तय हों .

विस्थापित कवि जम्मू के हक़ में खड़े नहीं होते . इसे वे सांप - बिच्छुओं की धरती लिखते हैं  . एकाध जगह तवी नदी डॉ० अग्निशेखर की संवेदना ज़रूर पाती है . जबकि जम्मू के मनोज शर्मा , कल्याण , कुलविंदर मीत आदि की कविताओं में कश्मीरी शरणार्थियों की पीड़ा व्यक्त हुई . आज भी कुमार कृष्ण , योगिता यादव आदि की कविताओं में चिनार की संवेदनाएँ  व्यक्त हो रही हैं . यह नैतिकता की बात है . कश्मीर में रह रहे निदा नवाज़ की दो चार कविताओं में विस्थापित जगह पाते हैं  . कश्मीरी पण्डितों की कविताओं में वहां रह गए मुस्लिम न के बराबर जगह पाते हैं . महावीर प्रसाद द्विवेदी अपने एक निबन्ध में साहित्य को इतिहास से अधिक प्रामाणिक मानते हैं . यहाँ क्या माना जाए . क्या यह कभी इतने करीब नहीं रहे ? क्या यह कभी सहपाठी या साथी नहीं रहे ? इन्हें एक दूसरे की याद कभी नहीं आती ? क्यों ? यह कविता से परे एक राजनीतिक सवाल भी है . राष्ट्रीय पटल पर डॉ० अग्निशेखर और महाराज कृष्ण संतोषी बड़े नाम हैं . उनके हाथों जम्मू की कविता हेतु किसी बड़े संपादन या आयोजन की अपेक्षा की जा सकती थी ? यह बात जम्मू के वरिष्ठ कवियों से पूछी जा सकती है . सवाल यह भी है कि विस्थापित कवियों का कोई उत्तराधिकारी कवि क्यों नहीं है . क्या इनकी नयी पीढ़ी हिन्दी भाषा और कविता से आगे निकल चुकी है . ' फिरन में छुपाए तिरंगा ' संग्रह के बाद महाराज कृष्ण भरत कहीं दिखाई नहीं देते . वे अग्निशेखर और संतोषी के बाद की पीढ़ी के कवि रूप में सामने आए थे . फिलहाल  विस्थापन की पीढ़ा और पुनर्वास की इच्छा को व्यक्त करने वाला कोई उत्तराधिकारी कवि नहीं है . यह एक सपना मरने जैसा है . सवाल अपनी जगह हैं पर मेरी संवेदनाएं आम विस्थापितों के साथ हैं . आखिर घर तो उन्होंने छोड़े हैं –

हम थे
कभी नदी पुत्र
पर आज हम
इतिहास की कीचड़ हो गए हैं .  [ महाराज कृष्ण संतोषी की कविता कीचड़ से ]

सन 1971 में छम्ब और पाक से विस्थापित हुए लोग भी हैं . उनकी कभी चर्चा नहीं हुई . उनकी आबादी भी लाखों में है . जम्मू के छम्ब विस्थापन की उपेक्षा और कश्मीर विस्थापन के वैश्वीकरण को पकड़ने का प्रयास नहीं हुआ है विस्थापन में एक चालाक आदमी सत्ता सुख भोगता है . कृष्णपुर मनवाल हो या मुट्ठी कैंप , आम आदमी तम्बू में मरता है .  सैंतालिस के पाक रिफ्यूजी भी एक समस्या है . जो साहित्य में ही नहीं इस देश में भी अपनी जगह नही पा सके हैं . जम्मू कश्मीर में एक जगह लद्दाख भी है . रियासत के कवियों की संवेदना इसे प्राप्त नहीं हुई . इसे हिन्दी कविता में भी न के बराबर जगह मिली है . ऐसी अछूती जगहों की ओर ध्यान देना होगा . धार्मिक कट्टरता और धर्म का राजनीतिकरण  , भूमि अतिक्रमण  , प्रकृति का दोहन , मज़दूरों , किसानों , दलितों और पहाड़ी लोगों का जीवन संघर्ष यहाँ पर्याप्त रूप से अभिव्यक्त नहीं हुआ है  . यह  जम्मू की कविता की सीमा रही . आज इस सीमा का अतिक्रमण हो रहा है .

पिछले दिनों हिन्दी कवि नरेश सक्सेना से बात हो रही थी . उन्होंने कहा कि किताब नहीं कविता लक्ष्य में होनी चाहिए . इससे सहमत होना होगा . कविता लक्ष्य में होने का अर्थ संघर्ष और सुन्दर दुनिया का सपना लक्ष्य में होना है . इधर युवा रंगकर्मी राजकुमार बहरूपिया के लिखने का पता चला . वे लिखकर छुपा लेते हैं . क्यों ? ' वे कहते हैं कि इतना अच्छा लिखा जा चुका है कि क्या लिखा जाए . यह ठीक है कि खराब लेखन को पेड़ काटने से जोड़कर देखा जा सकता है . पर यहाँ अभी वह स्थिति नहीं आई है कि न लिखने के
कारण ढूँढने पड़ें . यहाँ तो हाल फिलहाल ही  बहुल रूप में चली आ रही एकपक्षीयता , एकरसता और एकालाप टूटा है . युवा कविता में सवाल प्रमुख हो रहे हैं . अब अधिकतर कवियों में भाव और विचार का अच्छा सन्तुलन है . इनके पास नयी जीवन दृष्टि , राजनीतिक स्वर , मौलिक और टकटके बिम्ब हैं . आगे के सफ़र में इन्हें परम्परा , मुहावरे और भाषा शैली को लेकर सचेत होने की आवश्यकता है .

जम्मू के सन्दर्भ में बताता चलूँ कि कविताएँ छपने के लिए बाहर न भेजना यहाँ की वृत्ति और सीमा है. पिछली सदी तक यहाँ के कवियों और बाहर के संपादकों के एक दूसरे के लिए पूर्वाग्रह भी रहे . जिसके भी कारण जम्मू की कविता बाहर कम पहचानी गई . यहाँ यह भी कहा जाता है कि कोई छपने या पुरस्कृत होने से कवि नहीं हो जाता . इस पर इतना ही कहूँगा कि न छपने या पुरस्कृत होने से भी कोई कवि नहीं हो जाता .  वैसे यूँ हिन्दी में ऐसे कवियों की कमी नहीं जिनकी कोई किताब तो नहीं , पर उन्हें पढ़ने लिखने वाले इसलिए जानते हैं क्योंकि उनका लेखन सोशल नेटवर्किंग और पत्र पत्रिकाओं में उपलब्ध होता रहता है . सोशल नेटवर्किंग पर उपलब्ध लेखन हिन्दी के लिए आश्वस्तिपरक है . इसने नए पाठक बनाए हैं . मेरा अटल विश्वास है कि कवि नहीं पाठक पैदा किए जा सकते हैं . इस बात को समझकर यहाँ के कवियों को ऐसे
मंचों का प्रयोग अधिकाधिक करना चाहिए . लिखकर अलमारी में बंद कर लेना या जम्मू के मंचों को ही संसार समझना भारी भूल होगी . 
 
1990 से लेकर 2005 तक विस्थापन की कविता प्रमुख रही . एक तरह से पूरे परिदृश्य को हाईजेक करके इस कविता ने एकाधिकार बनाए रखा . खासकर अंतिम दशक में जो भी दूसरा लिखा गया उसका महत्त्व किसी को नहीं दिखा . उसकी प्रवृत्तियाँ गौण हो गई . जबकि इन सालों में विस्थापन से इतर भी लिखा गया

नयी सदी में अरुण बजाज कृत  ' सच तो अब भी यही है ' [ 2002 ] और  कल्याण कृत ' समय के धागे ' [ 2003 ] , ने नयी भाव भूमि के कारण ध्यान खींचा . कल्याण ने खासकर लोक के श्रम सौन्दर्य और आर्थिक विषमता को अभिव्यक्त किया . हिन्दी कवि विजेंद्र ने उनके लोक सौन्दर्य को एकाध जगह रेखांकित किया . सहजता इनकी पहचान रही है . इधर वे अपने स्वभाविक मुहावरे से कुछ दूर हुए हैं . मेरा मानना है कि कविताएँ मसाला फिल्मों की तर्ज पर नहीं लिखी जानी चाहिए . अग्रज  कवि मनोज शर्मा कृत  ' बीता लौटता है ' [ 2005 ] नामक संग्रह ने सामूहिक सपनों को नए आयाम दिए . इस बीच मनोज और कुछ साथियों ने ज़मीन पर भी काम किया . पहले से लिख रहे कुंवर शक्ति सिंह , कल्याण आदि ने इसी ज़मीन पर उड़ान भरी . मनोज शर्मा द्वारा लिखे जा रहे 'फ़िलहाल' नामक साप्ताहिक स्तम्भ , संस्कृति मंच जम्मू के कार्यक्रम और नित्य शाम की बैठकों ने यहाँ की कविता को नई दिशा दी . बताता चलूँ कि वे भले पंजाब के रहने वाले हैं , पर डेढ़ दशक से अधिक समय तक उनका कार्य क्षेत्र जम्मू रहा है . उन्हें यहाँ का ही गिना जाता है . अशोक कुमार द्वारा संकलित जम्मू के प्रतिनिधि काव्य संग्रह ' तवी जहां से गुज़रती है ' [ 2010 ] का संज्ञान डॉ० नामवर सिंह ने लिया . इसकी भूमिका में अरुण कमल ने जोर देकर इस युवा कविता के राजनीतिक स्वर को रेखांकित किया . मुंबई से निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका सृजन सन्दर्भ के मनोज शर्मा द्वारा सम्पादित अप्रैल - जून 2010 के जम्मू विशेषांक ने यहाँ की युवा अभिव्यक्ति को राष्ट्रीय मंच दिया . लेखक व धरती के सम्पादक शैलेन्द्र चौहान द्वारा अभिव्यक्ति के अंक 37 जुलाई 2011  में जम्मू के पांच कवियों की विशेष प्रस्तुति भी एक खाका खींचती है . इस स्तम्भ में उन्होंने कुमार कृष्ण शर्मा , अमिता मेहता , डॉ० शाश्विता , कमल जीत चौधरी , शेख मोहम्मद कल्याण की कविताओं पर छोटी - २ टिप्पणियाँ लिखी . इस बीच महाराज कृष्ण संतोषी का ' वितस्ता का तीसरा किनारा ' [2005] , अग्निशेखर का ' जवाहर टनल ' [ 2008 ] नामक संग्रह आते हैं . इनमें विस्थापन और स्मृतियाँ के साथ साथ राजनीतिक चेतना को देखा जा सकती है . डॉ० अरुणा शर्मा का  ' पृथ्वियाँ '[ 2008 ] , श्याम बिहारी का ' मैं समुद्र ही हो सकता था .' [ 2008 ]  , कुलविन्दर मीत का ' नदी रोशनी की ' [ 2008 ] नामक संग्रह प्रकाशित हुए . इनमें क्रमश: समर्पण , व्यष्टिपरकता व राजनीतिक और क्रांति का स्वर दिखाई देता है . इसी बीच अनिला सिंह चाढ़क का कविता संग्रह ' नंगे पाँव ज़िन्दगी ' रिश्तों की संवेदना लेकर आया . जम्मू की हिन्दी कविता में लगभग 2006-07 में कुमार कृष्ण शर्मा , योगिता यादव आदि युवाओं के रूप में नया स्वर गूंजता है . प्रतिनिधि रूप में यह नए सपनों को लेकर लिखी जा रही कविता का सामने आना था . कहानीकार के रूप
में तो योगिता ज्ञानपीठ के युवा पुरस्कार से सम्मानित होकर खूब जानी ही जा रही हैं  . वे कवि रूप में भी प्रभावित करती हैं . कुमार कृष्ण अपनी बेबाक राजनीतिक कविताओं से जम्मू के साहित्यिक परिदृश्य को नए आयाम दे रहे हैं .

पिछले दो सालों में यहाँ कुछ महत्वपूर्ण कविता संग्रह आए हैं - मनोज शर्मा का ' एक ऐसे समय में ' [ २०१५ ] , निदा नवाज़ का ' बर्फ और आग ' [२०१५ ] , अशोक कुमार का ' कस्स गुमां ' [ २०१४ ] , डॉ० राजकुमार का ' खून का रंग तो है ' [ २०१४ ]  महाराज कृष्ण संतोषी का 'आत्मा की निगरानी में' [२०१५] और कमल जीत चौधरी का ' हिन्दी का नमक ' [ २०१६ ] . इन पर एक नज़र –

मनोज शर्मा एक महत्वपूर्ण कवि हैं . इनका शब्द संस्कार जनान्दोलनों के सामूहिक  सपनों से  पैदा हुआ है . यही कारण है कि वे किसी तरह के झुण्ड का झंडा लेकर नहीं चलते . भीड़ में एकांत के लिए लड़ते  हैं  . मनोज शर्मा गँवई चाल के कवि हैं . इनकी कविताई अंगूठों से धरती मापती है . जीवन संघर्ष को प्रेरित करती इनकी कविताएँ हथियार नहीं आदमी का विवेक बनती है. ग्रामीणबोध से भरी इनकी भाषा पंजाबीयत की सरदारी  ठोकती  नज़र आती है . 'ऐसे समय में ' प्रेम , स्त्री संवेदना और निराशा में डूबे आदमी की अभिव्यक्ति है . पहले संग्रह की अपेक्षा वे यहाँ कम राजनीतिक हैं , पर प्रखर उतने ही हैं . समीक्षकों की सालाना सूचियों से परे रहकर भी यह हिन्दी का महत्वपूर्ण संग्रह है .

'बर्फ और आग ' कश्मीर के जीवन अनुभव का संग्रह है . यहाँ पक्ष नहीं पीड़ा को प्रामाणिक देखना होगा . पीड़ा ही कवि का पक्ष है . जबकि यहाँ अन्य कवियों से भी  स्पष्ट राजनीतिक पक्ष की अपेक्षा है . जिससे कवि बचते रहे हैं . बचना हल नहीं है . कश्मीर के इतिहास को समझना होगा . पूर्वाग्रह छोड़ने होंगे . यहाँ दशकों से आम आदमी का अंगूठा और छाती इस्तेमाल हो रहे हैं . आम आदमी के हनन होते मानवाधिकारों पर खुलकर बात होनी चाहिए . सत्ताओं की पोल खोलनी होगी ...निदा नवाज़ पिछली सदी के अंतिम दशक में अपने पहले कविता संग्रह ' अक्षर अक्षर रक्त भरा ' [ 1997 ] से सामने आते हैं . जब पण्डितों के विस्थापन के बाद वहां हिन्दी का कोई नामलेवा नहीं रहा . निदा ने भाषा और अपने परिवेश के प्रति एक जिम्मेवारी समझते हुए हिन्दी में लिखना शुरू किया . वे इसका श्रेय भी लेते हैं . अगर वे उर्दू में लिखते तो खूब जाने तो जाते पर निश्चित ही उनके लिए दिक्कतें बढ़ जाती .  जब कश्मीर में [ पूरे देश में भी ] सड़कों और ऐतिहासिक जगहों के नाम बदले जाने के उपक्रम हो रहे हैं . जब तालिबानी फतवों को जारी किया जा रहा है . जब राजनीति सिर्फ राज करने का पर्याय बन गई है . तब वे वोट और जेहाद से उपजी पीड़ा को अपनी कविताओं में जगह देते हैं .  इनकी कविता कश्मीर की बंद गलियों , चौराहों और सड़कों की कविता है . जहाँ खून , चप्पलें , पोस्टर , नकाब , झण्डे और बन्दे आठवें रंग से पुते हैं . इस रंग की चालाकी का गिरेबां वे पकड़ नहीं पाते . वे क्रेकडाउन, हड़ताल , कर्फ्यू , आँसूगैस , गोली , पत्थर , ज़ख्म, फैले खून , उड़ते पँख , बिखरी चप्पलों , नकाब के दृश्य दिखाते हैं . इनके बिंबों , प्रतीकों और उपमाओं में  दोहराव के आक्षेप लगाए जा सकते हैं . मौलिक गढ़ने के चक्कर में वे कविताई से दूर जाते हैं . कहीं कहीं पर सम्प्रेषणीयता भंग होती है . निदा से इससे आगे की कविताई की उम्मीद है . कविता जितनी भी जीवन के लिए हो पर उसे अपनी कला में कविता ही होना चाहिए . अभी उन्हें भाषा और शब्द चयन को लेकर काम करना होगा . इस पर भी वे बहुत ज़रूरी कवि हैं . आखिर वे कश्मीर के कवि हैं . प्रतिरोध के कवि हैं .

(सुदीर्घ लेख का यह पहला हिस्सा है, आगे दो हिस्से और आने हैं)

6 comments:

  1. Shukriya anunaad!!
    Bhai Ji nisandeh yah pahli baar hai ki J&K ki kavitayi par adhaarait aalekh ko itna bada manch mila hai... Yah mera prayaasbharhai.

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  2. कमलजीत का यह लेख प्रांत के साहित्य के लिए लाभदायक सिद्ध होगा आभार

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  3. बहुत ही बढ़िया लेख जिसकी ऐसे समय में बहुत ज़रूरत थी क्योंकि यह एक लेख ही नहीं है , अपने समय का एक दस्तावेज़ है इसके लिए कमल बधाई के पात्र हैं , जिन्होने जम्मू कश्मीर में लिखी जाने वाली हिन्दी कविता और उनका समय काल दर्ज़ कर दिया जबकि ऐसा कार्य करने के लिए बहुत हिम्मत , हौसले की ज़रूरत होती है , और कमल ने यह हौसला दिखाया , कमल के हौसले और जज़्बे को सलाम

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  4. Aik lekh jo is mozu par likhi darjanon kitabon par bhaari pad sakta hai..jeete raho mere bhai..allah aankh qalam aur nazarye ki ye dhaar yun hi banaaye rakhe..aameen

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  5. sabse phlley mei annunad ka shukriya ada karti hu ki unhone iss parkar k shoadh ptrrr se parichit karvaya,,jammu kashmir ki hindi kavita aur yua kaviyo k sath sath kamal jeet jii ne jammmu kashmir ki hindi kavita aur kaviyo ki kavyagat vesishtao se parichit karvyaa ,kewel parichit hi nhi balki tmaam tarah k swaal humare smkaksh khdey kr diye,,phley kaviyo ne kin samsyao ko lekr partibdddh rhe aur kon si samsaye sshoot gai yh inka mollik shoadh h jis pr aaj tkk kisi ne bhi iss tarah khuley roop se swalo ko khdda nhi kia ,ho bhi skta h ki kiya ho linkin isss tarah se nhi,,kunki iss baat ko premchand ki kahani "pnch parmeshwar "ki ek pankti se jodkar dekhe to yh sarwtha sch h ki "biggaad k drr se imaaan ki baaat nhi ki jaatii h " aur yh peeedddh thapthpaney baley parmpra k log aksrr is tarah key alochanatmk ptroo ko prakat krnwy se dartey bhi h kunki iss tarah k pttr bhavnatmak rishto ko shayad kamjor krr de ye baat isliye kh rhi hu kunki kamal jeet ji kewel immaan ki baat ki h aur isss himmaaat k liye mei unko sadhuvaad deti hu aur umeeed bhi karti hu ki agey anney valey samey mei iss tarah ke ptrr prstut kr hume lawhanbit jarur kareynge

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