
जल, जंगल और ज़मीन का स्वर: कमल जीत चौधरी की कविता में पर्यावरणीय चेतना/बलवान सिंह
सारांश : कमल जीत चौधरी की कविताओं में जल, जंगल और ज़मीन के स्वर प्रमुख रूप से उभरते हैं, जो हमारे समय के

सारांश : कमल जीत चौधरी की कविताओं में जल, जंगल और ज़मीन के स्वर प्रमुख रूप से उभरते हैं, जो हमारे समय के

“तेरी शरण मेरे सतगुरु मेरे पूरे, मन निर्मल होये संता दूरे कर कृपा ” सुबह सवेरे ही घर के बाहर की तरफ़ बैठक के

चन्दन कुमार की कविताएं अटपटे सामाजिक बंधनों, दुर्व्यवस्थाओं और खोखलेपन से लिथड़े समाज के प्रति अन्तर्मन की छटपटाहट को व्यक्त करती हैं। उत्तरआधुनिक हो चले

बकरी चराती लड़की धूप उतर जाती है उसके कपड़ो पर ओढ़नी बनाकर ढ़क लेती है धूप से अपनी देह को वह ताकि पहाड़ों का

हिमांशु की कविताएं अपने आस-पास बिखरे लोक की भावनाओं को उसी के डिक्शन में अभिव्यक्त करती हैं, जहां कहीं ये कविताएं उस

दीप्ति कुशवाह की ये कविताएं, शोर से बहुत दूर पाठक को अपने भीतर के एकांत में ले जाती हैं। निरन्तर बाहर की उलझनों से क्लांत

कल्पना जसरोटिया की कहानी ‘देहरी’ आज के समय में भी गॉंवों में खेती-मज़दूरी से बसर करने वालों की ख़स्ता-हालत, शोषण और अंधविश्वासों की

धर्मपाल महेंद्र जैन एक ऐसा व्यक्तित्व हैं जो वतन से दूर रहकर कभी अपनी मिट्टी से दूर न हो सका, और वहाँ रहकर भी सतत

स्मृति की रेखाएँ जीवन में जितना पीछे जाती हैं एक धुंधली सी तस्वीर उभरती है, जहाँ किसी यात्रा में मैं वाहन में कोई संगीत सुन

मुझे यात्रा संस्मरण बहुत लुभाते हैं। यह, अपने भीतर के उन खाली कोनों को भरने का इलहाम देते हैं, जो भरे नहीं जा सके या
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