Wednesday, December 28, 2022

जिन सड़कों से गुजरता हूं - शंकरानंद की कविताएं

शंकरानंद समकालीन हिन्‍दी कविता के सम्‍मानित और सुपरिचित रहवासी हैं। उनकी ये कविताएं समाज और राजनीति में इधर बहुप्रसारित सूचीबद्ध प्रकाश के बीच अवस्थित नागरिक जीवन की द्वाभा की कविताएं हैं। कवि का अनुनाद पर स्‍वागत है।  

 

     सूची का काम     

 

नाम गिनाना अब एक कला है
बनती हुई सूचियां
दरअसल हमले की एक तैयारी होती है
जो इससे बाहर हैं
वे अभिशप्त हैं

उनका होना एक खतरे जैसा है

जितनी सूचियां बन रही हैं
उतने में बंट गए हैं स्वप्न
अब हर लड़ाई खुद की है
हर वार खुद झेलना है

ये योजना बनाने जैसा ही है
उनका बनना दिखता है
लेकिन बनने के बाद
जैसे अधिकांश योजनाएं

दम तोड़ देती हैं
वैसे ही ये सूची धुंधली पड़ जाती है
इसके कागज कुतर जाता है समय

इसके बावजूद

व्यवस्था सूची बनवाती है
सरकार के पास हर सूची उपलब्ध है
वह फाइल में दबी हुई है

फिर धीरे धीरे वह खिसकते हुए
कूड़ेदान तक पहुंच जाती है

एक दिन उसके बोझ को

कम करने के लिए
उसमें तीली लगा दी जाती है।

 

     चमकती दोपहर में     

जिन सड़कों से गुजरता हूं
उसके पास के घरों की आवाजें
छन कर बाहर आती हैं
जबकि उनके बाहर आने पर पाबंदी है

हवा के साथ आती है
एक मामूली सी चीख
जो किसी स्त्री कीहै

उंगलियों का कटना और
खून का बहना
यह रोज की बात है

आग में जलते हुए तवे पर

हाथ की छाप से
रोटी के स्वाद पर

कोई फर्क नहीं पड़ता
फटे को सिलने की
एक कोशिश में

बीत जाते हैं दिन
सूई की नोंक चुभती है तो
आह तक नहीं निकलती

कितना कुछ है जो

सिर्फ इसलिए बाकी है कि
इसे एक स्त्री को ही पूरा करना है

जब तक वह पूरा नहीं कर लेगी
कुछ नया काम निकल आएगा और
बढ़ जाएगी उसकी बेचैनी थोड़ी और

चमकती दोपहर मेंएक स्त्री की चीख
स्थाई भाव की तरह है
जिसका होना रोज के धूप जितनी

मामूली बात है

 

इसपर कोई बहस नहीं होती!

 

     बुलडोजर के बीच     

जिन घरों को बनाने में महीनों लग गए
न जाने कितने मौसम की बाधा आई

बारिश की चोट में

माथा भीगा अनगिनत बार
धूप से चेहरे का रंग बदल गया
रोम रोम में धूल की गंध बस गई
मिट्टी की चमक पड़ती रही देह पर रोज
तब जाकर पूरा हुआ एक घर

एक एक ईंट को जमा करना
तिनके जमा करने जितना ही

कठिन काम है


लेकिन चिड़िया

अपने तिनके नहीं नोचती
वह तो उसकी मरम्मत करती है
कुछ बिगड़ जाने के बाद

अभी आ रही है
उसी बने घर के टूटने की आवाज
जिस ईंट को मुश्किल से जोड़ा गया
अब उसे तोड़ा जा रहा लगातार

बहुत चीख निकलती है इस तरह
जरूर किसी की सांस

टूट रही है ईंट के साथ।

 

      एक कलम     

 

पिता की कलम को देखता हूं तो
वह मुझसे

पिता के होने का पता पूछती है


वह खाली पड़ी है

पिछले कई सालों से
मुझमें इतनी हिम्मत नहीं कि
उसे थाम सकूं अपनी उंगलियों से

मुझे नहीं लगता कि

वह कलम मेरा साथ देगी
वह लिखेगी या

लिखने से इंकार कर देगी
नहीं कह सकता मैं
लेकिन देखती है वह अपलक
जैसे स्त्री राह देखती है

दरवाजा खोल कर
जो गया उसके लौटने की आशा में

अक्सर यही होता है कि

चीजें तकपहचानती हैं

मनुष्य के होने की छाप
वह छाप नहीं मिलती तो
शोक में वे चीजें

धीरे धीरे टूट जाती हैं

जैसे अपने पक्षी के

लौटने की चाह में ही
कोई घोंसला जिंदा रहता है

कई महीनों तक और
नहीं लौटने के शोक में
वह धीरे-धीरे उजड़ जाता है।

 

     विभाजन के बाद     

 

गिनने के लिए

बहुत कुछ है हिस्से में
लेकिन उनका होना और नहीं होना
दोनों एक जैसा है

घर की दीवारें सुंदर हैं
उनकी चमक बहुत गहरी है
मुश्किल यह है कि

वह अकेलेपन को नहीं बांट सकती

कागज है और रंग भी
लेकिन रंग भरने की

लालसा ही खत्म हो गई
यह सन्नाटा रंग के बिना

बहुत भयानक लगता है
जिद अंततः बहुत भारी पड़ती है
हर चीज को बांटना
अलग अलग कर संभालना

अपने अपने हिस्से
बहुत कुछ खत्म कर देता है

विभाजन के बाद
दो लोग एक दूसरे को देखना नहीं चाहते
उनकी भाषा नीचे की ओर

जाती हुई दिखती है
वे उस तरह भी नहीं रहना चाहते
जैसे रेल में एक सीट पर
अगल बगल बैठते हैं दो अजनबी

कोई गांठ पड़ जाती है प्यार में
काई जम जाती है भरोसे पर
कुछ काम नहीं आता एक दिन

 

वैभव के बीचचीजें होती हैं

उनके बीचजीता हुआ मनुष्य
एक दिन बहुत अकेला पड़ जाता है

ये अकेलापन उसे घुन की तरह खाता है।

***

संपर्क-क्रांति भवन,कृष्णा नगर,खगरिया-८५१२०४

मोबाइल-८९८६९३३०४९


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