Tuesday, August 4, 2020

विपदाऍं नया रच कर जाती हैं - आशीष कुमार तिवारी की कविताऍं


   कवि का कथन   

कविताएँ तो मैं स्नातक से ही लिखने लगा था लेकिन सचेत रूप से लिखने का क्रम परास्नातक (2017) के बाद से शुरू हुआ। इन तीन वर्षों में बहुत कुछ देखा राजनीति में निर्लज्ज सांप्रदायिकता, तमिलनाडु-मध्यप्रदेश से पैदल दिल्ली चलकर जाने वाले किसानों का विद्रोह देखा, अभिव्यक्ति पर पाबंदी, छात्रों-नौजवानों पर ज़ुल्म, नागरिकता पर सवाल, श्रेष्ठताबोध में एक की संस्कृति को दूसरे से निम्न दिखाने की भावना....बहुत दॄश्य थे जो विचलित करते थे और करते आ रहे हैं। विपदाओं में भी राजनीति का कुत्सित रूप उभरकर आया, मूर्खता का प्रसार राष्ट्रीय विवेक की तरह किया जा रहा था। 
 
ऐसे में यदि मेरी कविताओं में राजनीति का प्रभाव अत्यधिक झलके तो इसमें मैं बुराई नहीं मानता। राजनीति ने प्रत्यक्ष रूप से हमारे जीवन को दबोच लिया है। इसलिए कविता का राजनीति से निरपेक्ष होना मानव जीवन और समाज से अन्याय होगा। कविता पर भरोसा हमें करना है। मैं अपनी अधपकी भाषा के साथ कविता लिखकर अपना विरोध दर्ज कर रहा हूँ। कला-कौशल विहीन हो सकती हैं ये कविताएँ परंतु इन परिस्थितियों में विरोध यहां मिलेगा। इन कविताओं में मेरी मिट्टी, घास-फूस और पेड़ों की पत्तियां अपनी झलक के साथ मिलेंगी। आपसे आग्रह है जरा ठहरकर इन कविताओं में झांकियेगा। 

- आशीष कुमार तिवारी


देवासुर विद्या 

असुर वे कहलाये गए
जिनके गुरुओं ने उन्हें स्वर्ग-विजेता बनने के गुर सिखाए
असुरों के गुरु को, गुरु के रूप में स्वीकार नहीं किया गया

जिनके शिष्य महाव्यसनी थे,
जिनके शिष्यों की विलासिता,
किसी असुर शिष्य की विलासिता से कम न थी
वे गुरु देव-पूजाओं में दुहराए जाते हैं

असुरों के गुरु ने उन्हें विजय-कौशल के मंत्र दिए
सृष्टि-रचयिताओं से वरदान लेने योग्य कठिन साधना, तप का दृढ़ संकल्प सिखाया
रचयिताओं को बार-बार विवश किया इच्छित वरदान देने के लिए
असुर थलचर थे,
उन्होंने आकाश में युद्ध-कलाओं से देव-शिष्यों को अनेक बार पराजित भी किया
संभव था वे उन वरदानों का सदुपयोग भी सीख जाते,
लेकिन आचार्य शुक्र जैसा प्रतिबद्ध गुरु उन्हें दुबारा न मिला

आचार्य बृहस्पति इंद्र की मूढ़ताओं से दुखी रहते थे
परंतु देव-सत्ता का त्याग वे न कर पाए
जाने किस लाचारी में वे अपनी विद्याओं का लोप होता देख रहे थे
देव-निर्मित जिस गुरुत्व-बल को तोड़कर
असुरों का स्वर्गारोहण हो रहा था उससे वे चकित थे
वे इंद्र से अपेक्षा करते थे कि वह एक नया स्वर्ग भले न बना पाए
कम-से-कम निर्मित स्वर्ग को अपने पराक्रम से बचाये रहे
जिससे उनकी विद्याओं का प्रभाव बना रहे
परंतु देवतागण दैवीय-भार से ग्रसित थे
विद्या-प्रभाव उनमें असुरों से लघुतर था

देव-गुरु की पदवी छोड़कर गुरु बृहस्पति एक प्रयोग यदि कर पाते
कि आचार्य शुक्र के साथ मिलकर एक महाअभियान
असुरों के पक्ष में करते
तो योद्धाओं का इतिहास इस महादेश में कुछ और होता
तब जो आचार्य परंपरा विरासत में मिलती,
वह
देवासुर संग्राम को न जन्म देती
बल्कि
देवासुर विद्या-संस्कृति को शिल्प देती....




मिट्टी-चोर बच्चे

किसी ने कहा कि मोहल्ले के बच्चे 
आपके प्लॉट की मिट्टी चुरा रहे
मैंने भी देखना चाहा
देखा कि छोटे-छोटे बर्तनों में बच्चे मिट्टी भरके ले जा रहे
वे उन्हें गमलों में डाल रहे थे
कुछ गमलों में तो सुंदर-सुंदर फूल भी खिले थे

कुछ पल के लिए तो लगा कि वे सारे फूल मेरे हैं
क्योंकि वे मेरे प्लॉट की मिट्टी में उगे हैं 
फिर उन बच्चों के चेहरों पर ध्यान गया
जो उन पौधों को सींचते

ये बच्चे बड़े नादान होते हैं
गमले तैयार करना वे खेल समझते हैं
उन्हें नहीं पता 
वे मिट्टी चुराकर फूल खिला रहे

जब उन गमलों में खिले फूल देखता हूँ 
तो उन फूल जैसे बच्चों के चेहरे याद आ जाते हैं

तब मन हंसकर कहता है
ले जाओ!
सारी मिट्टी चुराकर ले जाओ
सारी मिट्टी को फूल बना दो

नहीं तो ये सारी मिट्टी शहर के बोझ तले दफ़न हो जाएगी

बच्चों! जब ज़मीन पर इमारतें उतर आएं
तो उन इमारतों के सिर पर
एक गमला मिट्टी भरकर रख देना
ताकि उन्हें एहसास रहे
मिट्टी ही सत्य है
मिट्टी ही शाश्वत है।


सबसे बड़ी महामारी से लड़ती दुनिया

महामारियां सभ्यताओं के चेतने का दौर होती हैं
बीते समय की छलनाएं उसकी पायदान बनती हैं

धरती पर पहली महामारी जब भी आई होगी
वह – भूख रही होगी
भूख का स्थायी इलाज़ आज तक न मिला
न ही उचित प्रबंध

भूख को छला गया
ये महामारी धरती से मिटी नहीं
इससे होने वाली मृत्यु के आंकड़े कहीं भी दर्ज़ नहीं
किसी पोस्टमार्टम हाउस में ऐसी लाशों का परीक्षण नहीं हुआ 
यदि किया गया होता तो शायद भूख के बिलबिलाते कीड़े निकलते
कहते हैं पेट में भूख के कीड़े नहीं,
भारी-भरकम नरभक्षी चूहे होते हैं
ये चूहे अंतड़ियों को चबा जाते हैं

अब जब भी कोई नई महामारी आती है
इन चूहों का खेल शुरू हो जाता है
तय करना कठिन होता है – पहले किससे मरेंगे

दूसरी बड़ी महामारी नफरत और भेदभाव 
इसके कीड़े पेट में नहीं,
दिमाग में पनपते हैं
इस महामारी में खून सड़कों पर बहता है
हाथ,पांव, गर्दन कटे मिलते हैं
भयावहता यह कि इसमें घर-मकान,दुकान जलते हैं
औरतों की इज्जत लूटी जाती है
बच्चे अनाथ होते हैं
हंसते-खेलते परिवार तबाह हो जाते हैं
और यहीं से बात फिर भूख पर लौट आती है
इस माहौल में पीड़ित कई दिन भूखे रोते-तड़पते रहता है

कई महामारियां भटक रहीं गलियों में
अगर भूख और दिमाग की महामारी जीत ली गई होती
तो शायद हम अन्य से बेहतर ढंग से लड़ पाते

  
मूर्खता को राष्ट्रीय विवेक घोषित किया जाना चाहिए

राष्ट्र विपत्ति में हो 
तो निवासियों का विवेक उसकी पूंजी होती है
महामारियां आती हैं और मानवता को त्रस्त करती हैं
पर मूढ़ता जब दबे पांव विवेक का हरण कर ले
तो राष्ट्र की रक्षा संभव नहीं

मूर्खता महामारियों का वैधानिक सत्यापन 
राष्ट्र के माथे पर करती है
पर इससे पहले की प्रक्रिया है,
मूर्खता को राष्ट्रीय विवेक घोषित किया जाना।

ये दोहरी आपदा है मानवता पर
जब, उसके पास न राष्ट्र होगा, न विवेक।

मूर्खता शोक को हास्य में परिवर्तित करना चाहती है
मूर्खता को मूर्खता करने के लिए भी 
थोड़ा बहुत विवेक तो चाहिए ही…
वह नहीं जानती
शोक को हास्य में बदलने की कोशिश में पागलपन पैदा होता है

यह महामारी के विस्तार का सुंदर समय होता है
तल में महामारी और सतह पर मूर्खता का फेन
जो राष्ट्र इसमें फंसा, 
वहां बस पीड़ा बचेगी
मृत्यु बचेगी।

इस तरह कोई भी महामारी दोमुंही होती है। 


विपदाएं नया रच कर जाती हैं

इन दिनों अनेक दृश्य मौजूद हैं
ये दृश्य किसी को प्यारे नहीं हैं
पर सभी मजबूर हैं इन अप्रत्याशित दृश्यों की नियति से

क्या कभी आठ साल का बच्चा
आठ सौ मील की यात्रा पैदल तय करेगा..?
वो उसे ज़ाहिल भले कह लें
पर क्या गर्भवती स्त्री भरी कोख़ और खाली पेट
पैदल एक राज्य से दूसरे राज्य जा पाएगी..?
पर…
वो जाएगी और जीवट को जन्म भी देगी

कितना कुछ रच कर जाएंगी ये विपदाएं
विपदाएं अनजाने में क्षमताओं को रच जाती हैं
बाढ़ से उपजी विपदा विशाल बांधों की ओर,
सूखे की विपदा गहरे कुओं की ओर।

समुंदर उस पार के देश में जलता चूल्हा
इस पार के चूल्हे में आग भले न जला सके
पर घर जरूर जला सकता है।
जैसे विपदाएं आयीं और सब तक पहुंची
वैसे सब अपने घरों तक क्यों नहीं पहुंचे..?
विपदाओं की गति तेज है,
समाधान ठेलने पर भी न पहुंचेगा।

जब सब कुछ असंगत है
तो क्या जरूरी है कि मेरे सारे सवाल संगत ही हों..?
मन करे तो खारिज़ कर देना। 

जब दुनिया ठीक हो जाए

फूलों से लदा कोई पौधा, कोई पेड़
किसी कागज़ को रंगते रंगीन ब्रश की तरह
रंग रहा होता है
थोड़ा सा आसमान,
थोड़ी सी ज़मीन

इस रंगाई में कितना रंग खर्च होता होगा
इसका अंदाज़ा लगाना कितना मुश्किल है
ऐसे फूल किस चित्रकला शैली से बनते होंगे
कौन इनका चित्रकार है
इनकी महक किस नाम से जानी जाती होगी
ऐसा कुछ निश्चित नहीं

इंसानों की दुनिया जब हताश है
बचने-बचाने की कोशिशों में जुटी है
तब भी सूरज अपने वक्त पर उग रहा है
भोर की आहट पाकर अब भी चिड़ियों की चटकार फूट रही
मंथर गति की हवाएं अब भी सुकून दे रहीं

इन लदे भार फूलों ने अपनी महक से
दुनिया को सुगंधित करना जारी रखा है
सब मिलकर दुनिया को रंगीन और सुगंधित कर रहे हैं
उम्मीद की डोर मजबूत कर रहे सभी
फिर दुनिया डोलेगी
और इन पौधों और फूलों की भूमिका को याद रखकर
भविष्य के संकटों से इन्हें भी बचाने का प्रण लेगी

ये निभा रहे अपना दायित्व
उम्मीद है,
दुनिया ठीक हो जाये तो लोग भी निभाएं इनके साथ वफादारी।
 

देह की मिट्टी बचाने के लिए

वे जब पैदा हुए तो घर मिट्टी का बना था

मिट्टी में ही खेले
मिट्टी में ही पले-बढ़े
कभी-कभी शौक़ से मिट्टी खाई भी

उन्हें लगा कि मिट्टी ही सब कुछ है
मिट्टी के चूल्हे,
मिट्टी के बर्तन,
मिट्टी के खिलौने
और घर की दीवारें भी मिट्टी की थी

उन्हें लगा कि मिट्टी ही सब कुछ है
इसीलिए खेतों की मिट्टी से उन्हें प्यार था
पूरा परिवार चारों ऋतुओं में मिट्टी को चूमता रहता था
मिट्टी उनके लिए सब कुछ थी

जब सभ्यता ने खुद को आधुनिक घोषित कर दिया
मिट्टी का मोल मिट्टी बराबर साबित किया जाने लगा
और 
मिट्टी को मिट्टी के मोल खरीदकर
भट्टों में महंगे ईंटें बना दी गईं

उनसे मिट्टी का भरोसा छीन लिया गया
नम मिट्टी को ठोस ईंटों में बदलने का काम जारी था
ये मिट्टी के बने इंसान
अपनी मिट्टी को ईंट बनता देखकर निस्सहाय हो चुके थे

उनके पाँव तले की मिट्टी दिनोंदिन खिसक रही थी
अब वे अपने शरीर की मिट्टी को 
गलने से बचाने के लिये 
ईंट के भट्ठे में अपने पूर्वजों की मिट्टी झोंक रहे थे।
***
 
आशीष कुमार तिवारी
शोधार्थी, हिंदी विभाग
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
96969994252


4 comments:

  1. बहुत सुन्दर

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  2. खूबसूरत कविताएँ। बधाई तिवारी जी को।
    'अनुनाद' का भी शुक्रिया।

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