Wednesday, August 19, 2020

सभी जाएँगे मुझको भूल : विष्णु खरे की कविता पर विशाल श्रीवास्तव का लेख



विष्‍णु खरे हिन्‍दी कविता के इलाक़े में हुई बहुत बड़ी हलचल का नाम है। कितनी ही उथलपुथल उनके नाम दर्ज़ हैं। विवादों में बदलते हुए संवाद और विवादों के बहाने किसी संवाद को जन्‍म देने की दुर्बोध-सी एक आकांक्षा उनके चेहरे पर सदा दिखाई देती रही। सही-ग़लत को बहुत स्‍पष्‍ट कहने वाले वे दुर्लभ वरिष्‍ठ कवि थे। उनके जाने से कविता और उस पर चलने वाली बहसों में बौद्धिक तीक्ष्‍णता निश्चित ही बहुत कम हो गई है। युवा कवि विशाल श्रीवास्‍तव ने इधर उस दुर्जेय मेधा की कविता को समझने-समझाने के सिलसिले में एक शानदार हस्‍तक्षेप किया है। विशाल का यह लेख इलाहाबाद से निकलने वाली महत्‍वपूर्ण पत्रिका अनहद में प्रकाशित हुआ है। इस लेख के लिए अनुनाद लेखक और अनहद के सम्‍पादक संतोष चतुर्वेदी का आभारी है। 
      एक असम्भव शिल्प से मूर्त होता प्रतिसंसार     

मेरी चिता पर नहीं होंगे किसी के
अश्रु, स्मृति में चढ़ाए फूल
बाद दो दिन के दिखावे के, रोने के,
सभी जाएँगे मुझको भूल
क्या हुआ जो सिरफिरा इक मर गया?
जगत के आनन्द में कम क्या कर गया।

(विष्णु खरे की ‘मौत और उसके बाद’ शीर्षक कविता से, जिसे उनकी पहली कविता भी कहा जाता है)

कुछ लोगों को याद करते समय दिक्कत यह होती है कि उन्हें उनके विविध और एकसमान रूप से सफल आयामों में से किस सन्दर्भ में याद किया जाय। विष्णु खरे कवि, पत्रकार, सम्पादक, आलोचक, संगीतप्रेमी, फिल्म समीक्षक, अनुवादक जैसे विविध रूपों में हिन्दी की दुनिया को समृद्ध कर रहे थे। इन सभी क्षेत्रों में जो उन्होंने किया वह वैसा ही या उसके आस-पास भी कर पाना अन्य किसी के लिए सम्भव नहीं है।

उनके कविरूप की बात करें तो वे हिन्दी कविता में जिस काव्यभाषा को लेकर आए, वह एकदम अनोखी थी। जैसा कि बार-बार आसानी से उनकी काव्यभाषा के बारे में कह दिया जा रहा है ‘गद्यात्मकता’, वह महज उतना भर नहीं है। गद्य को कविता में ऐसे बरतना कि वह न सिर्फ बहुत महीन बातों को कायदे से रेखांकित भी करे बल्कि अपनी शक्ति से एक उदात्त करुणा का सृजन भी सम्भव बनाए, यह उनकी भाषा की वास्तविक विशेषता है। वे कई बार अपनी कविताओं की दुरूहता से चुनौती देते से लगते हैं, उनके भारी-भरकम शब्द किसी गरजते हुए बादल की तरह अपने मन्द्र स्वर में कविता में दाखिल होते हैं, किन्तु कविता में उनका प्रभाव अनूठा है। वे ऐसी कविताएँ नहीं लिखते थे न ऐसी कविताओं के कायल ही थे, जिनको पढ़ते या सुनते ही तुरन्त आह या वाह जैसा कुछ सम्भव हो सके। उनकी कविताएँ अपने विवरणों में, अपने विस्तार में, अपनी दुरूह सी प्रतीत होती हुई विशिष्ट सहजता में विचलित करने वाली, बेचैन करने वाली कविताएँ हैं।

अगर किसी एक ओर से उनके वृहत काव्यसंसार में प्रवेश की कोशिश की जाय तो उनकी कविताओं में मिथकों के अभूतपूर्व इस्तेमाल से शुरुआत की जा सकती है। वे अपनी एक कविता में ही लिखते हैं कहीं से भी उठाओ महाभारत को/मस्तिष्क सैकड़ों टुकड़े करने वाले कथन दिखायी देते हैं। उन्हें याद करते हुए अशोक वाजपेयी ने भी लिखा है कि हालांकि उनकी छवि विद्वान् की नहीं रही, किन्तु विष्णु इतिहास, पुराण आदि के गहन अध्येता थे. उन्होंने महाभारत या मुगलकालीन इतिहास से जो प्रसंग चुने हैं अपनी कविता में, वे हिंदी तो क्या भारतीय कविता में उनसे पहले प्रायः अछूते रहे।  अशोक वाजपेयी का यह कथन विष्णु खरे द्वारा मिथकों पर केन्द्रित विभिन्न कविताओं के उदाहरणों से पुष्ट होता है। वे परम्परा और संस्कृति के एक गम्भीर अध्येता थे, यही कारण है कि मिथकों का ऐसा शक्तिपूर्ण और सार्थक उपयोग वे अपनी कविता के मुहावरे में कर पाये। उदाहरण के लिए ‘वृन्दावन की विधवाएँ’ शीर्षक कविता में वे लिखते हैं:

वृन्दावन की पहली विधवाएँ
तब स्वीकार कर चुकी होंगी अपने वैधव्य को
अपनी मृत्यु और कृष्ण के परमधाम गमन को
किन्तु उन्होंने फिर कहा होगा हाँ हमने कल ही देखा था
कृष्ण को कालिन्दी के तट पर काम्यवन में’।

अब इस कविता में वृन्दावन और कृष्ण के मिथक का बखूबी इस्तेमाल करते हुए वे समकालीन समाज में वैधव्य के जीवन का मिथकीय परम्परा से ऐसा मार्मिक जुड़ाव सम्भव करते हैं, जिससे समय का खुरदरा यथार्थ अपनी सम्पूर्णता में प्रतिबिम्बित होता है। महाभारत उनके प्रिय विषयों में रहा है, भारतीय परम्परा की अन्य कथाओं को उतना प्रयोग उन्होंने नहीं किया है, इसका कारण यह है कि वे जीवन की जिस जटिलता, चरित्रों की जिन सीमाओं और मानवीय कमज़ोरियों के जिन रूपों के प्रति आकर्षित थे, उनका असीम विस्तार महाभारत की कथा में उपलब्ध है। उनके संग्रह ‘काल और अवधि के दरमियान’ में संकलित एक कविता ‘अग्निरथोवाच’ जो अर्जुन के अग्निरथ की ओर से लिखी गयी है, महाभारत का युद्ध, जो कृष्ण की वाणी में धर्मयुद्ध के रूप में संज्ञायित किया गया था, के वास्तविक और कड़वे यथार्थ को उद्घाटित करती है:

क्या क्या नहीं किया क्षेत्रज्ञ ने क्षेत्र में
भाइयों और स्वजनों के बीच रण हुआ सो हुआ
बूढ़ों को मारा गया गुरु हत्याएँ हुईं
दबे स्वरों में झूठ बोले गये कुश पर सब कुछ त्याग बैठे आसीनों को छला गया
जिसने शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की उसने चक्र उठाया
भुजाएँ काटी गयीं नर रक्त पिया गया
रथ से उतरे विपदाग्रस्त विनयी महारथी का शिरोच्छेद हुआ
जाँघ पर गदायुद्ध में किया गया प्रहार
मरे हुए वीरों के मस्तक पर पैर रगड़े गये
नपुंसकों तक का वध हुआ।

यह कविता केवल महाभारत के युद्ध में रणक्षेत्र में हए अधर्म तक सीमित नहीं रहती बल्कि युद्ध की विभीषिका के प्रभावों को भी वर्णित करती है। न केवल वृद्धों, बच्चों और स्त्रियों की दुरवस्था के बारे में ही यह कविता बात करती है, बल्कि साथ ही समाज का वह साधारण श्रमिक वर्ग भी इसकी चिंता के दायरे में आता है, जो युद्ध के कारण भुखमरी का शिकार है। एक लोकप्रिय मिथक के प्रचलित और स्थापित पाठ को चुनौती देती हुई यह कविता युद्ध की अप्रासंगिकता और उसके पक्ष में बोले जाने वाले झूठ को बेनकाब करती है। महाभारत के ही एक प्रसंग पर उनकी कविता अंततः उनके संग्रह पाठांतर में संकलित है, जो युधिष्ठिर और शरशय्या पर लेटे भीष्म के संवाद पर केन्द्रित है। सम्राट युधिष्ठिर दान-धर्म के विषय में जानने के लिए भीष्म के सम्मुख हैं और भीष्म कहते हैं:

राजा के राज्य और उसकी लक्ष्मी का
सताये हुए दरिद्र विनाश कर देते हैं
पापी है वह नरेश जो भूख से बिलखते बच्चों के सामने
स्वादिष्ट भोजन करता हो
जहाँ विद्वान और दूसरे जन भूख से कष्ट पाते हों
वह भूपति भ्रूणहत्या और उससे बड़े पापों का भागी होगा
और धिक्कार है उसके जीवन को

यह कविता यहीं रुकती नहीं बल्कि अन्यायी राजा को पागल और बीमार कुत्ते की तरह जनता द्वारा मार डालने के परामर्श तक जाती है। कवि अंतिम पंक्तियों में भीष्म द्वारा बताये इस समाधान को आज भी प्रामाणिक और अपरिहार्य मानता है। कविता में महाभारत के अनुशासन पर्व से श्लोक-पंक्तियों को भी उद्धृत किया गया है, जो शिल्प का एक अभिनव प्रयोग है। परम्परा से प्राप्त अर्थ को समकालीन राजनीति के मुहावरे में सिद्ध करने की ओर यह कविता बढ़ती है, यह विष्णु खरे की विशेषता है और काव्यात्मक उपलब्धि भी कि वे कितने अपूर्व कौशल से मिथकों की सीवन बारीकी से उधेड़ते हैं और उसकी छिपी हुई परतों को खोलकर हमारे सामने रख देते हैं। यह वे इतने निर्मम तरीके से करते हैं कि परम्पराओं की महानता की स्वीकृति का अभ्यस्त साधारण पाठक का मन विचलित हो जाता है लेकिन इस नये पाठ से संघर्ष करने और अपनी राह खोजने के लिए विवश भी होता है।

विष्णु खरे की कविताओं का एक अन्य आयाम उनकी कई कविताओं में मुक्तिबोधीय फैंटेसी का विस्तार है। मुक्तिबोध के बारे में यह कहा जाता है कि वे जीवन भर एक ही कविता लिखते रहे, एक कविता में जो छूट जाता था उसे दूसरी कविता में सिरे से पकड़ने की उनकी कोशिश लगातार चलती रही। कई आलोचक इसीलिए मुक्तिबोध को अधूरी कविताओं का कवि भी कहा करते हैं। विष्णु खरे अपने काव्यशिल्प में मुक्तिबोध से इस मामले में अलहदा हैं कि वे मुक्तिबोध की तरह अपनी कविताओं में सत्य का पीछा तो करते हैं, लेकिन उनकी तरह लय का साहचर्य थामे नहीं रहते। यही कारण है, कि उनकी कविताओं में एक मुश्किल गद्यात्मकता है। ब्यौरों के बारे में उनके भीतर एक दुर्निवार आकर्षण रहा है, इतना कि अंधेरे के बारे में लिखते हुए भी वे उस अंधकार के महीन विवरणों को पूरे कौशल के साथ दर्ज़ करते हैं। सृष्टि के तमस को वे उसके शुद्धतम रूप में पर्यवेक्षित करते हुए वर्णित करते हैं। इस वर्णन में जबरन कोई आशा की किरण बनाये रखने की जिद नहीं है, जो है उसका भयानक और वीभत्स स्वीकार करने में एक कवि के रूप में विष्णु खरे कोई परहेज नहीं करते। उदहारण के लिए उनकी एक कविता अंधी घाटी जो उनके संग्रह पिछला बाकी में संकलित है, से यह उद्धरण देखा जा सकता है:

जब वे सूर्य की बातें करते तो ऊपर अंगुलियां उठायी जातीं
टोलियाँ बनतीं और दबे स्वरों में मंत्रणा होती
किंतु सयानों का रुख बदला
और अब वे कहते हैं कि अंधी घाटी ही हमारा प्रारब्घ है
उजियाला नामक कोई वस्तु ही नहीं है और यदि है भी
तो वह हमारे लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

अंधेरे के बारे में ही बात करती हुई विष्णु खरे की एक और कविता है तरमीम, जो उनके कविता संग्रह पाठांतर में संकलित है। यह कविता अंधरे को थोड़ा सकारात्मक तरीके से देखने की अपेक्षाकृत नयी बात कहती है। इस कविता में कवि बताता है कि किस तरह लगातार अंधेरे की उपेक्षा हुई है और उसके महत्व को दरकिनार किया गया है, यह कहते हुए कि: अंधेरा न होता या सिर्फ वही होता/तो शायद उजाले की ज़रूरत न पड़ती। कवि बताता है कि किस तरह प्रकाश के आने से अंधकार खत्म नहीं होता बल्कि उससे भी तीव्र गति से कहीं और चला जाता है या पुराना प्रकाश रुग्ण होकर नया अंधकार बन जाता है। यहाँ कवि की मुराद यह है कि अंधेरे को उसके असीम विस्तार के बाद भी मूल विषय न समझने की भूल संसार द्वारा की जाती रही है, इसलिए अंधकार को पूरी सत्ता दी जानी चाहिए:

प्रकाश के खिलाफ मेरे पास कुछ भी नहीं है
उसकी और उसके इस्तेमाल की गति
जैसी है वैसी रहे बढ़ सके तो और अच्छा
मेरा तुच्छ प्रस्ताव इतना सा है
कि अंधकार की जो अवमानना भरी उपेक्षा हुई है
उसे सुधार कर
उसे एक सम्पूर्ण सत्ता और विषय का दर्जा दिया जाए
यह मिटे न मिटे बाद की बात है

विष्णु खरे के काव्यसंसार की बुनावट में एक अहम हिस्सा दृश्यात्मकता का है। यह दृश्य हमारे ठीक आस-पास के हैं, वे बिल्कुल कल्पित नहीं है बल्कि उन्हें यदि अतियथार्थ की उपज कहा जाए तो अनुचित न होगा। बाज दफा यह सच्चाई बेहद नंगी, बेलौस और ज़रूरत से ज़्यादा रूखी भी नज़र आने लगती है। सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि इस दृश्यात्मकता में मौजूद कड़वे सत्य को देखता हुआ कवि विस्मित नहीं होता बल्कि उन दृश्यों को हमारे जीवन के संवेदनात्मक पक्ष से सम्बद्ध करने का प्रयास करता है। पहले यदि दृश्यात्मकता को केन्द्र में रखें तो उदाहरण के लिए और अन्य कविताएँ संग्रह में संकलित उनकी एक कविता है कल्पनातीत, जिसमें वे घास के मैदान में बकरियों के रेवड़ पर फड़फड़ाती तितलियों के दृश्य को ऐरावत को उठाये गरुड़ के बिम्ब के समानांतर देखते हैं। यह एक बेहद साधारण दृश्य है, लेकिन पीली तितलियों और बकरियों के माध्यम से जीवन में एक ऐसी कल्पनात्मकता का स्वप्न कवि रचता है, जो हिन्दी कविता में अपूर्व है:

पता नहीं कल सुबह मैं उठूँगा और ये रेवड़
यहाँ से गुजरेगा या नहीं
क्या बकरियों के आने के सपने देखती होंगी घास में सोयी तितलियाँ
जिस पर कल भी ओस होगी
प्रातः नभ होगा नीला शंख जैसा कि
सूरज को उतना ही ललछौंहा उगने को मिले
क्या आम की डगालों से पत्ते कल भी झरेंगे।

विष्णु खरे ने क्रिकेट के खेल पर कई कविताएँ लिखी हैं, उनमें से एक है कवर ड्राइव जो उनके संग्रह सब की आवाज के पर्दे में में संकलित है। यह कविता विष्णु खरे की कविता में मौजूद दृश्यात्मकता के तत्व का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। जिस तरह कवि क्रिकेट के एक शॉट का वर्णन करता है, उसकी बारीकियों को बताता है, उसके कलात्मक सौन्दर्य की चर्चा करता है और साथ ही खेल में उसकी सम्पूर्णता को स्थापित करता है, वह अद्भुत है। कवि के लिए यह सिर्फ़ एक शॉट नहीं रह जाता, बल्कि जीवन में एक कलात्मक सम्पूर्णता के विस्तार के रूप में अनुभव करता रहता है, इस अपूर्णता की कमी उसे भीतर ही भीतर मथती रहती है, तब भी जब वह अधेड़ हो चुका है और अब क्रिकेट का खेल उसके लिए किसी प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं रह गया है:

क्या रखा है सिद्ध करने में
कि जब भी उतरोगे ठीक-ठाक खेल ही लोगे
फिर भी किशोरों के रविवारी प्रैक्टिस मैच देखने रुके रहते हो
तटस्थ दिलचस्पी दिखाते हुए कि उनमें से कोई कहे किसी दिन
आइए अंकल खेलिए
और तुमसे अब भी एकाध बार पॉइंट का वह स्ट्रोक मुमकिन हो
जिसे तुम अब तक कल्पना और सपनों में
मुकम्मिल करते रहना नहीं छोड़ते नामालूम क्यों

विष्णु खरे ने साम्प्रदायिकता और अन्य वैश्विक त्रासदियों को बहुत गहराई से देखा है और यह हैरत में डालने वाली बात नहीं है कि वे इन विभीषिकाओं से उत्पन्न शोक की अभिव्यक्ति के मार्मिक प्रतीकों के रूप में शिशुओं को चुनते हैं। गुजरात दंगों पर केन्द्रित उनकी कविता शिविर में शिशु और आंतकवादग्रस्त सीरिया की शरणार्थी समस्या के प्रतीक रूप में आलैन कविता एक वृहत वृत्तान्त रचती हुई प्रतीत होती हैं। इनमें से एक कविता दंगों से झुलसते समय में शिविर में पैदा हुए कुछ शिशुओं के माध्यम से जीवन की मुस्कुराहट को बचा लेने की कवि की इच्छा का बयान करती है तो दूसरी कविता में बेहतर जीवन की तलाश में शरण के लिए निकले परिवार के एक बहुत छोटे बच्चे के मृत शरीर को देखकर पैदा हुई संवेदना का आख्यान रचती है। काल और अवधि के दरमियान संग्रह में संकलित शिविर में शिशु कविता साम्प्रदायिक दंगों के तात्कालिक कारणों में नहीं जाती, वह राजनीतिक षड्यंत्रों की पड़ताल भी नहीं करती, बल्कि समकालीन विषमताओं में मनुष्यता के प्रतीक के रूप में शरणार्थी कैम्प में पैदा हुए शिशुओं की मुस्कुराहट को एक अनूठे बिम्ब के रूप में रचती है। यहाँ महत्वपूर्ण है कि विवरणों के बीच विडम्बना को कवि कैसे विन्यस्त करता है, कैसे यह कविता दंगों के ब्यौरों में न जाते हुए भी उस अमानुषिकता का एक सघन चित्र हमारे सामने रखती है, कैसे हम इस कविता को पढ़ते हुए मनुष्य होने के व्यर्थताबोध से भर उठते है, कवि कहता भी है:

इस देश मे उन तस्वीरों की किल्लत कभी नहीं होगी
जो तुम्हारा कलेजा चाक कर दें
शर्मिंदा और ज़र्द कर दें तुम्हें
तुम्हारे सोचने कहने महसूस करने की व्यर्थता का अहसास दिलाती रहें
लेकिन फिलहाल तुम्हारे सामने ये पन्द्रह मुस्कराते बच्चे हैं
जिनका एक दाँत अभी आया नहीं है

आलैन कविता विष्णु खरे के संग्रह और अन्य कविताएँ में संकलित है। इस बेहद मार्मिक कविता की नैरेटर मृत शिशु की मृतक माँ है जो उसके मृत भाई गालिब का हाथ पकड़कर उसे जगाने आई है। समुद्र किनारे मिले इस मृत शिशु का फोटोग्राफ पूरी दुनिया में मशहूर हुआ था, आधुनिक सभ्यता की विडम्बनाओं के एक गहरे दृश्य रूपक की तरह इस फोटोग्राफ को देखा गया। यह कविता एक नयी दुनिया की तलाश में एक परिवार की प्रसन्नतापूर्ण यात्रा से प्रारम्भ होती है, तो आगे चलकर एक त्रासदी में बदल गयी। आधुनिक जीवन के बड़े सत्यों में से एक है विस्थापन, जिसकी कोशिश में यह परिवार मृत्यु के आगोश में समा जाता है। इस कविता को पढ़ते हुए असगर वजाहत की कहानी शाहआलम कैम्प की रूहें याद आती है, जिसमें यतीम बच्चों को इन्तजार रहता है रात का कि उनके माँ बाप की रूहें उनके सिर पर हाथ फेरने आयेंगी। यह कविता भी बिना किसी बड़े राजनीतिक बयान के मार्मिकता का बड़ा प्रतीक गढ़ने में समर्थ होती है। एक मृत माँ का अपने छोटे से बच्चे को यह सम्बोधन हमारी सभ्यता के यथार्थ पर एक तमाचा जड़ता है। माँ का इस दुनिया से दूर चलने का आह्वान जैसे उनके पूर्व निर्धारित विस्थापन का एक नया और अप्रत्याशित आयाम है, जिसके आधार में केवल हताशा है, दुख है और इस दुनिया से एक विरक्ति का स्वर भी:

        चल अब उठ छोड़ रेत के इस बिछौने को
छोड़ इन लहरों की लोरियों और थपकियों को
नहीं तो शाम को वह तुझे अपनी आगोश में ले जाएँगी
मिलें तो मिलने दे फूफी और बाबा को रोते हुए कहीं बहुत दूर
अपन तीनों तो यहीं साथ हैं न
छोड़ दे ख्वाब नये अजनबी दोस्तों और नामालूम किनारों के
देख गालिब मेरा दायाँ हाथ थामे हुए है तू यह दूसरा थाम
उठ हमें उनींदी हैरत और खुशी से पहचान
हम दोनों को लगाने दे गले से तुझे
आ तेरे जूतों से रेत निकाल दूँ
चाहे तो देख ले एक बार पलटकर इस साहिल उस दूर जाते उफक को
जहाँ हम फिर नहीं लौटेंगे
चल हमारा इन्तजार कर रहा है अब इसी खाक का दामन

मध्यवर्ग का शहरी जीवन विष्णु खरे की कविता का एक महत्वपूर्ण तत्व है। वे आज़ादी के बाद उपजते हुए एक ऐसे मध्यवर्ग की पैदाइश थे, जो छोटे कस्बों में अपने उस तरह और वहाँ होने की चुनौतियों से जूझ रहे थे। मध्यवर्ग के जीवन का अत्यन्त सान्द्र चित्रण विष्णु खरे की कविताओं में है, जहाँ वे अपनी पूरी कलात्मकता से अभाव का तैलचित्र मद्धिम यथार्थ के रंगों से चित्रित करते हुए दिखते हैं। दृश्यों की व्यंजकता में एक अनूठा धीमापन जो कभी शाम की धीमी हवा सा रुक-रुक कर आगे बढ़ता है तो अचानक कभी किसी खास दिशा का रुख कर लेता है। यदि यह कहा जाये कि विष्णु खरे भारतीय कस्बाई मध्यवर्गीय जीवन के धूसर सौन्दर्य के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं, तो कदाचित यह गलत नहीं होगा। समकालीन कविता में कस्बाई जीवन का चित्रण करने वाले बहुत से कवि हैं, लेकिन जिस तरह विष्णु खरे ने इस विशेष जीवन की हरकतों, वातावरण और सपनों को छुआ है, वह अनूठी अभिव्यक्ति का परिचायक है। वे इस जीवन को दूर से देखते हुए बेहद आहिस्ते से इसे स्पर्श करते हैं, जैसे ताप में डूबे मरीज़ की नब्ज़ पर किसी हकीम का ठण्डा हाथ या किसी कोने में रखे सितार को किसी कच्ची उम्र के किशोर द्वारा छू-भर दिया जाना हो। ये कविताएँ उतनी ही ध्वनि करती हैं जितना अस्पताल में दूर से आती हुई कोई बीप हो, इनमें इतना ही रंग है जो प्रयोगशाला में कोई रसायनज्ञ किसी आदर्श टाइट्रेशन में कभी-कभी पा लेता है। लापरवाही की लरज़ से बुनी हुई दिखती इन कविताओं में अर्थ और ध्वनि का जो संतुलन और संयोजन है, वह भले अनायास हो लेकिन एक रूखे दिखते हुए गद्य की काव्यात्मक सम्भावनाओं का विस्तार इन्हीं तात्विकताओं के माध्यम से सम्भव होता है। इस मिजाज़ की कुछ कविताओं को देखना हो तो शुरुआत पिछला बाकी संग्रह में संकलित एक कविता गर्मियों की शाम से की जा सकती है। इस कविता में गर्मियों की एक शाम में किशोरवय के कुछ लड़के-लड़कियाँ घूमने निकले हैं, पूरी कविता कस्बे के दृश्यों से भरी है, इसमें सन्दर्भित समय में इन तरुणों की झिझक है, कस्बाई सौन्दर्य है, उनके स्वप्न हैं और पूरी कविता पर छाता हुआ अमूर्त यथार्थ भी है। इन सब चीज़ों से मिलकर किशोर मन के भीतर उपजती हलचलें हैं और उनका प्रतिपक्ष रचती हुई एक खामोश उदासी, जिसका प्रतीक कविता में ‘साइकिल की खिन्न घण्टी’ के रूप में आता हैः

        अब सब हो गये हैं बहुत खामोश उसके कहे से
अलग-अलग सोच में पड़े हुए और धुँधला सा कुछ देखते हुए
और वह अपने संकोच में डूबा हुआ विशेषतः लड़कियों की ओर देखते झिझकता
टार्च जलाने लायक अँधेरा हो चुका है एक पीला हिलता डुलता वृत्त अब
उनके सामने है जिसकी दिशा में वे चले जा रहे हैं वापस
एक साथ लेकिन हर एक कुछ अलग-अलग
एकाध साइकिल की खिन्न घण्टी पर रास्ता देते हुए

इस मिजाज की बहुत-सी कविताएँ विष्णु खरे के पास हैं, जिनमें से कुछ कस्बाई माहौल में मध्यवर्ग के पारिवारिक जीवन के बारे में भी हैं। कभी-कभी यह अंदाज़़ा लगाना भी मुश्किल हो जाता है कि लगभग दुरूह से लगते गद्य में कविता को सम्भव करने वाला कवि पारिवारिक सम्बन्धों को लेकर इतनी नरम कविताएँ भी लिख सकता है। एक कवि के रूप में इस दुर्जेय से दिखते गद्य के पीछे विष्णु खरे का जो हृदय है, वह किसी शिला से रिसते जल-प्रवाह की तरह है। बिना किसी लिजलिजेपन के सम्बन्धों को लेकर बिल्कुल अलहदा लहजे में जो भावात्मक कविताएँ विष्णु खरे ने सम्भव की हैं, उनका आस्वाद अपूर्व है। सब की आवाज़ के पर्दे में संग्रह में संकलित कविता चौथे भाई के बारे में ऐसी ही एक कविता है, जो कवि के उस मृत भाई के बारे में है, जिसकी मृत्यु जन्म के थोड़े समय के बाद ही हो गयी थी। कवि ने इस अनुपस्थित और अदृश्य स्मृति को अनोखे तरीके से देखा और बरता है। वह इस याद को दुनिया के असंख्य शिशुओं के धरती पर आगमन से सम्बद्ध करते हुए इसे चेतना के दूसरे ही स्तर पर ले जाते हैं:

        मैं जब जीवित या मृत शिशुओं को देखता हूँ
तो कभी-कभी मुझे तुम्हारी याद आती है
जो फिर एक विडम्बनापूर्ण प्रयोग है
क्योंकि जो देखा ही नहीं गया उसकी स्मृति कैसी
फिर भी ज्ञात से अज्ञात को पहचानने की कोशिश में
मैं जानना चाहता हूँ कि क्या दो साल के मुझे
तब तुम्हें कभी छूने भी दिया गया था
और क्या मैने तुमसे कुछ कहा था और तुम हँसे थे

विष्णु खरे की कविताओं का एक बेहद ज़रूरी आयाम कला, संगीत और फिल्म है। इन विधाओं के वे सुधी मर्मज्ञ थे, वैश्विक स्तर के संगीत, फिल्म और कला से न केवल उनका अंतरंग परिचय था, बल्कि वे उनकी बारीकियों को भी भली भाँति समझते थे। संगीत पर आधारित कविताओं को यदि चुनना हो तो उनकी दो कविताओं ‘उम्मीद’ और ‘प्रवाह’ की चर्चा ज़रूर की जानी चाहिए। ‘उम्मीद’ कविता में वे यूरोपीय शास्त्रीय संगीत के विख्यात कम्पोजर्स से एक अनूठी संरचना की फरमाईश की ख्वाहिश का जिक्र करते हैं जो परस्पर एक दूसरे रूपों की अपूर्णताओं को दूर कर बनायी गयी हों। वे इस कविता में बेटहोफ़न, हाइडन, मोत्सार्ट के सिम्फनी, कोंचेर्तो और ओपेरा का उल्लेख करते हैं और यह भी कि उनमें उन्हें क्या कमी अखरती है। अलग-अलग सांगीतिक रूपों के समन्वय को एक असम्भव स्वप्न कवि के मन में है, जिसकी उम्मीद में यह कविता लिखी गयी है:

        महान प्रतिभाओं के पूर्वग्रहों से चकित और हतप्रभ
        तकनीकी ज्ञान से वंचित
        किंतु संगीत और स्वरों के अंतहीन प्रकारों और विस्तार से कुछ परिचित
और उन्हें अर्पित
मैं तब अपने मन में गढ़ता और सुनता रहता
शब्दों और ध्वनियों की एक संरचना इस उम्मीद में
कि शायद एक दिन कोई सचमुच रचे उसे
और कोई नाम दे

संगीत पर ही केन्द्रित एक दूसरी कविता है ‘प्रवाह’ जो पहली कविता से बिल्कुल अलग तरह की कविता है। यह कविता संगीत के आस्वाद और उस प्रक्रिया में पैदा होने वाली नीरवता व अँधियारे से होने वाले श्रुति-कायान्तरण तथा श्रोताओं के प्रवाह में बदलते हुए सुर होने की तरलता को काव्यात्मक रूप में अभिव्यक्त करता है। कवि ने संगीत के इस अनुभव और उससे उपजने वाली तन्द्रा को मृत्यु नहीं बल्कि कई मनोलोकों में पुनर्जन्म के रूप में देखा है। कलाओं में इस तरह डूबना और उसके आस्वाद के अपूर्व स्तर को स्पर्श करना कवि की विशेषता है। कई बार विविध कलारूपों के बारे में उनकी कविताएँ कभी न सुने गये पारिभाषिक शब्दों और विवरणों के साथ सामने आती हैं। ऐसे समय लगता है कि कवि एक पूरी सभ्यता को कलात्मक रूप से शिक्षित करना चाहता है, सामान्य पाठक के स्तर से ऊपर उठती हुई ये कविताएँ कभी-कभी तो अपनी विद्वत्ता से धौंस जमाती हुई सी प्रतीत होती हैं, तो कई बार एक चुनौती सी देती हुई, कविता के पाठक को अद्यतन होने की चुनौती सी देती हुई:

        सब लौटेंगे वही बनने के लिए जो वे इससे पहले थे
        लेकिन ठीक वैसे नहीं
उन्होंने जान लिया है
कि क्या होता है एक प्रवाह में बदलते बहते हुए सुर होना
और अब भले ही वे अलग हो गये हों
और अब सब थोड़े-थोड़े बज गूँज या संचालित हो रहे हैं एक-दूसरे में
वे लीन हो रहे थे परस्पर लेकिन वह मृत्यु न थी
एक तरह का सतत पुनर्जन्म था जीते-जी
एक साथ कई रूपों मनोलोकों में

उक्त कविताओं के अतिरिक्त भी विष्णु खरे का काव्यसंसार बहुत विस्तृत है। उनके सात काव्यसंग्रहों में विविध विषयों पर लिखी गयीं कविताएँ इस काव्यसंसार को समृद्ध करती हैं। इस आलेख में उनकी कई चर्चित कविताओं को, जिनपर कई बार बात हो चुकी है, को छोड़कर नयी और अनछुई कविताओं पर बात रखने का प्रयास किया गया है। फिर भी, यदि उनकी कुछ विशेष कविताओं का नामोल्लेख करना हो तो ‘लालटेन जलाना’, ‘दिल्ली में अपना एक फ्लैट’, ‘नेहरू गांधी परिवार से मेरे रिश्ते’, ‘बच्चा’, ‘विदा’, ‘मौत और उसके बाद’, ‘लड़कियों के बाप’, ‘वृन्दावन की विधवाएँ’, ‘लौटना’ जैसी तमाम कविताएँ हैं, जो अपेक्षित रूप से चर्चित भी रही हैं और विभिन्न आलोचकों द्वारा उनकी अपना विश्लेषण भी जहाँ-तहाँ उल्लिखित किया गया है। कविता के विषयों का चुनाव उनकी एक अनूठी विशेषता रही है, मुझे नहीं याद आता कि हिन्दी में ‘एबेण्डेण्ड’ जैसी कोई कविता होगी, या फिर ‘जो टेम्पो में घर बदलते हैं’ या ‘जा और हम्मामबादगर्द की ख़बर ला’ जैसी कविता। वे महानगरीय जीवन के विद्रूप को जिस कोण से देखते थे, वह दृष्टि किसी और के पास नहीं है। उनकी वैश्विकता और जीवन के हर सम्भव रंग का स्पर्श उनकी कविता में स्पष्ट दिखाई देता है, संसार में विन्यस्त क्रूरताओं, दुरभिसंधियों के साथ-साथ फिर चाहे वह सिनेमा हो, संगीत हो, कला हो या फिर क्रिकेट जैसा खेल ही क्यों न हो, उनकी कविता में जगह पाता है।

याद आता है कि एक बार नामवर जी ने कहा था कि ज़रूरी है एक भी ऐसे आलोचक का होना जिसके भीतर अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा कहने का साहस हो। समकालीन हिन्दी आलोचना में यह साहस केवल विष्णु जी के अन्दर था, और इस हद तक था कि अपनी अधिक प्रशंसा से भी वे कई बार नाराज़ हो जाते थे। आपसी बातचीत में वे खुद को प्रायः ‘खराब कवि’ कहते पाये जाते थे, ‘निज कवित्त केहि लाग न नीका’ के इस दौर में ऐसे व्यक्ति का होना एक दुर्लभ सम्भाव्यता थी। इतना ही नहीं, यदि वे काव्य-प्रतिभा पर मुग्ध हो सकते थे, नये से नये कवि की अच्छी कविता पर पूर्वाग्रह की हद तक प्रसन्न हो सकते थे, तो प्रतिभाहीनता और भाषा या तथ्य सम्बन्धी भूलों पर बेहद तल्ख़ी के साथ नाराज़ भी हो सकते थे। विष्णु जी हिन्दी समेत कई भाषाओं के मर्मज्ञ थे, मैंने कविता सहित आलोचना, सम्पादन या फिर साधारण वार्तालाप या संवाद में भी उन्हें भाषा के प्रति बेहद सजग पाया है। वे भाषा सम्बन्धी असावधानी या भूलों को माफ़ कर देने वाले लेखकों में से नहीं थे। उनकी वैचारिक समझ भी एकदम साफ थी और उनके राजनैतिक विचारों में यह साफगोई साफ़ झलकती थी। फासिज़्म के उभार और उससे उपजे सांस्कृतिक संकट की सटीक पहचान उनके यहाँ थी। अपने प्रदीर्घ लेखकीय जीवन के तमाम झंझावातों में भी वे वैचारिक विचलन से बचे रहे। आज उनके जाने के बाद (बल्कि थोड़ा पहले से ही) उन तमाम कवियों को देखता हूँ, जिन्हें विष्णु जी ने प्रतिष्ठित किया और आज वे पाला बदल रहे हैं, अपनी प्रतिबद्धता से बहुत तेजी से समझौता कर रहे हैं, तो लगता है कि उनका हिन्दी साहित्य में बने रहना कितना ज़रूरी था, उनकी नाराज़गी कितनी अपरिहार्य थी। वे कभी-भी किसी को भी डाँट सकते थे, फटकार सकते थे, उसे जाहिल या काहिल सिद्ध कर सकते थे और यही कारण था कि वे निरंतर विवादों में भी रहते थे। हिन्दी कविता के ठहरे हुए पानी में वे गाहे-बेगाहे पत्थर फेंकते ही रहते थे, अफसोस है कि उनके जाने के बाद यह पानी अब शान्त हो गया है, उसकी हलचल ख़त्म हो गयी है। 

- विशाल श्रीवास्तव
5/2/70, साहबगंज, फैजाबाद (उ.प्र.)
सम्पर्क 9415468684, 8318774668

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