Wednesday, July 22, 2020

जो संताप इन दिनों में भोगा है - शचीन्‍द्र आर्य की कविताऍं

  कवि का कथन  

जिन्हें भी अपनी कविताएँ कह रहा हूँ, वह मेरे भीतर से बाहर और बाहर से भीतर आने की प्रक्रिया का विस्तार है। जो कोई भी कुछ कहना चाहता होगा या कह पाता होगा, उसके पास रचने के क्रम में यह ऐसे ही घटित होगा। विषय भी यहीं इसी दुनिया में बिखरे हुए हैं । किस पर लिखना चाहेंगे ? धूप, बारिश, तिलचिट्टे, मेज, कुर्सी, दरवाजा, प्रेम, ईर्ष्या, कुंठा या आसमान, बादल, दलदल ? किस पर ? मेरे लिए जो मेरे विषय हुए वह शहर, गाँव और परिवार से शुरू हुए । मुझे कभी समझ नहीं आया, इससे बेहतर शुरुवात मेरे लिए और क्या हो सकती थी।  

यहाँ मेरा होना आत्मकेंद्रित लग सकता है पर यह ऐसा है नहीं । जिस तरह यह समय एक व्यक्ति को अलग-थलग कर सबसे कमजोर इकाई मानता है, उसमें यह कविताएं एक कमजोर वक्तव्य तो नहीं पर इस समय का स्पंदन ज़रूर हैं । हम जान ही नहीं पाते हैं, सामने वाला व्यक्ति कैसा महसूस कर रहा है । मैं बस यही सामने वाला व्यक्ति बनने के लिए आपके सामने आ गया हूँ । हो सकता है, यह आपके लिए कभी किसी तरह की कोई असुविधा बन जाये, तब भी बिना दिखे कुछ-कुछ कहना चाहता हूँ । असुविधा से सब बचना चाहते हैं, आप भी बच सकते हैं । विकल्प आपका अपना होगा। उस वक़्त जब आप मुझे नहीं पढ़ रहे होंगे, तब भी मैं, आने वाले कई सालों तक लगातार कहीं किसी कमरे में बैठा कुछ लिखने की कोशिश कर रहा होऊंगा ।  

अंतिम बात यही कहना चाहूँगा के इन कविताओं को उस तीसरे क्षण वाले कवि और लेखक से बचाकर लिखने और उसकी छाया से दूर लाने के सिलसिले में इतना ज़्यादा वक़्त बीत जाएगा, यह मुझे भी नहीं पता था ।


1. सुखी आदमी

मेरे मन में हमेशा से एक सुखी आदमी की धुँधली सी तस्वीर रही है ।
कभी वह पिता के चेहरे से मिल जाती, कभी उसमें कोई शक्ल नहीं होती,
बस नाक, मुंह, कान और होंठ होते ।

उस तस्वीर मिल जाने और उसके खो जाने के बावजूद
पहला सवाल यही था, यह सुख क्या है ?

हम सब अपने लिए अलग-अलग सुखों की कल्पना करते हैं ।
कभी लगता, अपनी कल्पना में सब अकेले होकर सुख ढूँढ़ लेते होंगे ।

यह नींद सबका एकांत और सुख रच सकती थी,
जिसकी संभावना अब बेकार लगती है ।

मैं तो बस ऐसे ही ख़याल में खोया किसी खाली कमरे में
मेज़ के सामने तिरछा बैठे हुए
वक़्त और मेहनत लगाकर लिखी गयी किताबों को पढ़ लेना चाहता हूँ ।

उन्हें न भी पढ़ पाया, तब भी इसके बाद ही बता पाऊँगा,
जिसे अपना एकांत कह रहा था, वहाँ कितना सुखी था !
**

2. दुःख

पीछे से दिखाई दी सफ़ेद बालों वाली खोपड़ी ।
झुकी गर्दन । चीकट से कॉलर ।
पसीना ठंड में उस तरह लकीर बनकर नहीं बहता ।
किसी नमकीन झील की तरह जम जाता है गर्दन पर ।

उन खिचड़ी हो गए बालों की तरह खिचड़ी रही होगी उसकी ज़िंदगी ।
बेतरतीब । बेस्वाद । पसीने का नमक भी नहीं होगा उसमें जीभ के लिए ।

कंधों पर घास के सूखे तिनके थे,
एक बोट थी, एक फुनगा था ।
दुःख वहीं कहीं छिपा बैठा था । दूर से रुई-सा हल्का दिखने वाला ।

पास से वह दुःख ही था,
तिल के दाने जितना । उसी में सब पीड़ा थी ।
कभी दुख में सुख के इंतज़ार का दुख था ।
दुःख ही उसकी धमनियों में ख़ून बनकर खोई हुई चींटी की तरह रेंगता होगा ।

सामने से देखने पर वह आईना-सा लगता ।
जो भी उसकी तरफ़ देखता, मुतमईन हो जाता ।
आहिस्ते से बुदबुदाता
- मैं नहीं हूँ ।

पर उन्हें पता था,
वही फुनगी,
वही बोट,
वही खिचड़ी बाल उनकी तस्वीर में भी हूबहू वैसे ही थे 
गर्दन पर पसीने की लकीर की तरह ।  
**

3. पुल होना

वह पुल एक शांत पुल था
किसी नदी के ऊपर नहीं । दो इमारतों के बीच हवा में टंगा हुआ-सा ।
उसका जाना, उन नदियों के ऊपर बने पुलों से पानी का रुक जाना था ।
वहाँ उमड़ते-घुमड़ते मौसम का ठहर जाना था ।
यह दोनों इमारतों के बीच एक संवाद की असंभव संभावना बना रहा ।

पुल मानवता के इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धि रही होगी ।
इसने सैकड़ों पहाड़ियों के उतार-चढ़ाव नदी-नालों की
दूरियों को समेटकर दूर दिखने वाली जगहों को कितने पास लाकर खड़ा कर दिया ।

पहाड़ इतने निकट आकर कितने प्रसन्न हुए होंगे ।
सदियों से चुपचाप, थककर खड़े ऊबते रहे । अब वह इस एकांत को भर सकते थे ।
सुख-दुख के साथी बनकर जीने का मतलब
उन्होंने पहली बार पुल के आने के बाद महसूस किया होगा ।
महसूस किया होगा, कितनी बातें उनके अंदर अनकही रह गयी हैं ।
वह उनके अंदर दिल तक उतरने वाली सीढ़ी बनकर आया ।

एक हिसाब से यह हमसे उम्र में बड़ा रहा होगा । हम जब नहीं थे, तब यह था ।
वह हमारी नींद में ही जाता रहा और हमें पता नहीं चल पाया ।
शायद यह उसके चुपचाप चले जाने की कोई चाल रही होगी ।
कि जब तक हम जागते, वह पूरा चला जाता ।

अचानक आँख खुली । बाहर आया । देखा । वह आधा जा चुका था ।

वह रोके से भी नहीं रुकता । उसने किसी को बताया नहीं कि वह जा रहा है ।
उसने अपने जाने के ठीक पहले की शाम, अलविदा भी कहने नहीं दिया ।
वह उस ढलती शाम के अँधेरे में
एक अधेड़ बूढ़े मेहमान की हैसियत ओढ़कर चुपचाप चलता गया
और हमारी आँखों के सामने हमेशा के लिए ओझल हो गया ।

यह सब बातें यहाँ इसलिए भी लिखे दे रहा हूँ क्योंकि यह कोई ऐतिहासिक पुल नहीं था ।
इसे इस किताब के अलावे किसी किताब में जगह नहीं मिलने वाली ।
फ़िर सारा इतिहास तो इसी जगह के छिकाए जाने, थोड़ा सरक जाने के बीच है ।
**

4. अतीत में पीछे लौटते हुए

कभी अपने चारों तरफ देख कर लगता है,
ऐसा वक़्त भी आएगा, जब इन दिनों को पलट कर रख दूंगा ।

किसी ऐसी जगह पहुँचकर इन थके हुए, हार से गए दिनों में
अपनी अकड़ गयी पीठ पर उग आई असफलता की बेल को कुछ और कह पाऊँगा ।
मैं भी इन अतिरेक भरे पलों में सूखते गले के भीतर संगीत की झंकारों से भर जाऊंगा ।

इन सब हारी हुई लड़ाइयों के इतिहास को या तो एक दिन इतिहास से गायब कर दूंगा
या कह दूंगा, कभी हारा ही नहीं था ।

पर अगले पल ख़याल आता,
जो संताप इन दिनों में भोगा है, जो दुख मवाद की तरह अंदर रिसा है
उनमें इन स्मृतियों, अनुभवों, आघातों से ख़ुद को कैसे अलग कर पाऊँगा ?

कैसे इस ज़िंदगी के अलक्षित दिनों को गायब कर पाऊँगा ?
इनमें भटकने और आहिस्ते-आहिस्ते चलते हुए जो जीवन समझ आया,
उसे कैसे भूल पाऊँगा ?

यही सब सोच ठहर जाता हूँ ।

जो ऐसा कर पाते हैं,
वह बहुत अलग लोग होंगे । मुझमें यह साहस नहीं है ।

मुझे नहीं बदलना इतिहास । अतीत में पीछे लौटते हुए मुझे कुछ भी नहीं बदलना ।
**

5. धागे

गर्मी की दुपहरों में जब कभी
एक चींटा दूसरे चींटे को खींच कर ले जाते हुए दिखता है,
तब लगता है, उनमें बची रह गयी हैं कुछ नमी ।
कुछ स्मृतियाँ । कुछ स्वप्न । 

उनमें बची रह गयी हैं, एक साथ चलने
और उसमें खो जाने पर भी वापस लौट आने की संभावना ।

उनमें बचे रहते हैं धागे । कुछ कमजोर और कुछ मजबूत । 
वही रचते हैं, पीछे वापस लौटा ले जाने वाली लीक ।

सोचता हूँ,
मेरे पास भी बचे रहते कुछ ऐसे धागे, ऐसे रास्ते
जहाँ भीतर लौटते चींटे की तरह मैं भी लौट पता ।  
**

6. अनुवादक

मैंने भी कुछ किताबों के अनुवाद किए,
जिन पर कहीं मेरा नाम नहीं हैं ।
हर बार उनसे मेहनताना लेने के बदले नाम छोड़ता गया ।

उस वक़्त उन रुपयों से बिन पैसे वाले दिन टालना
और अपना नाम छोड़ना, कुछ अजीब नहीं लगा ।

सोचा,
ठीक है । सब ऐसा करते होंगे ।

लेकिन अब, जबकि उन दिनों से बहुत दूर
यहाँ इस जगह बैठा हूँ, लगता है,
उन गलतियों को भी अनुवाद में जगह देते हुए मैंने कुछ ठीक नहीं किया ।

अब महसूस होता है,
नाम सिर्फ़ पहचान के लिए ज़रूरी नहीं है
वहाँ रही गयी कमियों, अस्पष्ट वाक्य संरचनाओं, गलत नुक्तों,
अशुद्ध कारक चिन्हों के लिए ज़िम्मेदार व्यक्ति का नाम होना ज़रूरी था ।

**


  परिचय  
जन्म- ०९ जनवरी, १९८५
दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी में स्नातकोत्तर करने के पश्चात इसी विश्वविद्यालय से बीएड और एमएड ।
पूर्व में कुछ कविताएँ ‘हंस’, ‘वागर्थ’ और ‘पहल’ तथा समकालीन भारतीय साहित्य में प्रकाशित । हंस में डायरी के कुछ अंश तथा एक कहानी चुप घर का प्रकाशन ।   
मेल आई डी- shachinderkidaak@gmail.com


4 comments:

  1. बेहतरीन कविताएं।

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  2. बहुत ही सुन्दर। एक लेखक कवि सृजनकार व्यक्ति को विषय ढूंढने की आवश्यकता कभी नहीं पड़ती । प्रतिभा कहीं भी छलक सकती है उभर सकती है । लेखनी के माध्यम से हम अपने जीवन और अपने आस पास कुछ भी गठित होता है उन्हें सरल शब्दों में अपने भाव के साथ लिख सकते है । बहुत खूब 💐💐🙏👌👏

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  3. बहुत ही सुन्दर। एक लेखक कवि सृजनकार व्यक्ति को विषय ढूंढने की आवश्यकता कभी नहीं पड़ती । प्रतिभा कहीं भी छलक सकती है उभर सकती है । लेखनी के माध्यम से हम अपने जीवन और अपने आस पास कुछ भी गठित होता है उन्हें सरल शब्दों में अपने भाव के साथ लिख सकते है । बहुत खूब 💐💐🙏👌👏

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  4. बहुत बढ़िया

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