Friday, April 17, 2020

' तिनका तिनके पास ' उपन्यास में स्त्री - सुनीता बिष्‍ट



तिनका तिनके पास उपन्यास में स्त्री
                                                                                       
                 स्त्री-विमर्श की सशक्त हस्ताक्षर, अनामिका का यह उपन्यास  2007 में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ I उपन्यास के  बारे में पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर  लिखा है – “यह उपन्यास तिनका तिनके पास मुक्ति का अर्थ टटोलने की कोशिशों से जन्मा है उनकी यह रचना  इस अहम  सवाल से जूझती है कि स्त्री की मुक्ति साल्वेशन के तर्ज पर होगी  या लिबरेशन के तर्ज पर” I1

उपन्यास का प्रारम्भ मुजफ्फरपुर के सदर अस्पताल में जज्जा-बच्चा वार्ड से होता है और छपरा–पटना  कलकत्ता, पूना, झारखंड के धनबाद से लेकर दिल्ली तथा परदेश अमरीका से होता हुआ – बिहार के वतरसपर जाकर समाप्त  होता है I इस प्रकार विविध कालो, वर्गों तथा स्तरो की महिलाओं की सामाजिक पारिवारिक स्थितियों का दस्तावेज है यह उपन्यास I लेखिका इस उपन्यास के माध्यम से दुनिया की आधी आबादी, यानि स्त्री को केंद्र में रखकर समसामायिक परिवेश में स्त्री की वस्तुस्थिति का स्पष्ट तथा बेवाक चित्र प्रस्तुत करती है I  अनामिका के शब्दों में – “अंतरराष्ट्रीय नेक्सस ........ एक पढ़ी- लिखी औरत की दुर्गति का”I2  
                 इस उपन्यास के कई आयाम है, पर इसका एक महत्वपूर्ण पक्ष वेश्या- जीवन से जुड़ा हैI इस उपन्यास की कथा मुख्यतः तीन परिवारों की है I
एक परिवार के केंद्र मे काननबाला है, जो मुजफ्फरपुर की एक प्रसिद्ध कोठेवाली ढेलाबाई की नातिन है I
                 दूसरा परिवार श्रीमती अवन्तिका कक्कड़ का है I अवन्तिका जी खुले स्वभाव की, पढ़ी –लिखी, दिखने मे अच्छी- भली और पेशे से एक सफल वकील है, पर पति  की शकभरी नजर तथा पौरुषजन्य दंभ जब उनके लिए असहनीय हो जाता है, तब वह अपने छोटे से पुत्र स्पंदन को साथ लेकर घर छोढ़कर निकल पड़ती है I इन्ही का पुत्र डॉ स्पंदन कक्कड़ मनोचिकत्सक हैI
                 उपन्यास में एक और परिवार है कथा वाचिका तारा का I तारा के पिता साधु बनने का संकल्प लेकर घर से निकल जाते है I पर अपनी कामनओं को वश मे नहीं कर पाते I कायर धोके बाज पिता घर छोड़ने के बाद भी गाँव की अमराई मे में पत्नी से मिलते रहे, जिसके परिणाम स्वरूप तारा का जन्म हुआ है पर गाँव छोड़ने के उपरांत जन्मी संतान को अपनी मानने से ये इंकार करते रहे I इन्होने भी अपनी पत्नी पर शक किया इन्ही की वजह से तारा वैध होते हुए भी अवैध बन गई I
                 इन तीन परिवारों की कथाओं के साथ ही उपन्यास में कई अंतर्कथाए तथा उपकथाए चलती रहती है, परंतु सब के केंद्र का मूल स्त्री ही है I
                 नारी वही नहीं है, जो वह वास्तविक रूप में होती है या हो सकती है, बल्कि वैसी है, जैसा पुरुष समाज उसे मानता चला आया है I इस निर्धारित स्त्री – छवि का स्त्री-नियति बनते जाने से समाज मे उपजे नारी–पुरुष सम्बन्धों की अमानवीयता को रेखांकित करने का कार्य अनामिका अपने उपन्यास तिनका तिनके पास  मे करती है I इस प्रकार उपन्यास का केन्द्रीय मुद्दा है – निर्धारित स्त्री सार का प्रतिकार I  उपन्यास की प्रमुख पात्र  तारा जब कहती है, “एक अकेली स्त्री के लिये सबसे दुर्लभ क्या है ? सबसे दुर्लभ  है  पुरुष पात्र I सर्वतोमुखी प्रेम का दावा ढोकने वाले दहलोलुप प्रेमी तो तीन बुलावे तेरह आवै की तरह थोक मे राह चलते मिल जाते हैं मगर देह- निरपेक्ष कोई सच्चा दोस्त नहीं मिलता किसी अकेली स्त्री को!”3
                 तारा के ये विचार वास्तव में पितृसत्ता के उसी बुद्धिवादी दृस्टिकोण की तरफ इशारा करती है, जो एक स्त्री का अस्तित्व केवल उपभोग के आधार पर ही तय करता है I इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था मे स्त्री मात्र वस्तु है, साधन है I वह यौन इच्छाओं की पूर्ति का साधन, नौकर अथवा बच्चा पैदा करने की मशीन मात्र है I
                 उपन्यास की पात्र तारा, अवन्तिका, काननबाला, शीरीन तथा उपन्यास मे आई अन्य स्त्रियां रिस्तों मे छिपी खास तरह की एक पुरुष मानसिकता से दो- चार होती है  इन स्त्रियों पर वे सारे अपराध होते हैं जो एक सामान्य गृहस्थिन पर होते है I कननबाला वैसे तो डॉ0 अंसारी की पत्नी थी, लेकिन शीरिक के शब्दो मे “अम्मा दरसर अब्बू का बक्सिंग बेग थी I वही नौकरी मे व्यवसता के कारण जब अवन्तिका का जी घर 9 बजे के बाद पहुंची तो वह पति द्वारा  पीटी गई पति ने बाप की गाली देकर कहा –
                 जा अपने यारों के पास ही चली जा” I4इस घटना से आहात हो कर जब अवन्तिका जी अपने भाई को, जो विश्व fo|ky; में दर्शन के प्रोफ़ेसर अध्यक्ष है, को फोन करके कहती है की “भैया, मैं ठीक नहीं हूँ .....,” भैया ने महात्मा बुद्ध की अमर पंक्तिया उद्धत की- “हिम्मत नहीं हारो ... तुमसे बड़ा सवाल स्पंदन का है ! तुम्हें दूसरा पति-प्रेम मिल जाएगा, उसे दूसरा पिता कहा मिलेगा?”5
                 यहाँ पर भाई अंततः बहन के लिए भाई के रूप मे उपस्थित न होकर एक पुरुष के रूप मे उपस्थित हुआ है, अर्थात एक स्त्री माँ है, पत्नी है, किन्तु वह मानव नहीं है, क्यों कि हमारे पितृसत्तात्मक बुद्धि वाद ने स्त्री का जो सारतत्व निर्मित कर रखा है उसमें  स्त्री का मानव होने का भाव लगभग गायब है| शायद यह सभी स्त्रियों के परिवारों की खानदानी भाषा है I
                 समस्या का दूसरा पहलू जो यह उपन्यास उठाता है, वह यह है कि स्त्री के साथ होने वाले अमानवीय करण मे पुरुष के साथ स्त्री वर्ग का भी सक्रिय सहभागिता रही है| इस प्रकार अब यहां पर समस्या केवल पुरुष बनाम स्त्री के बीच की नहीं, अपितु स्त्री–बनाम स्त्री की रूप मे भी उपास्थि होता है| लेखिका अपने विचारो को उपन्यास की एक पात्र अवन्तिका के माध्यम से वयक्त कर रही है जो तारा से कर रही है-
“एक तरफ की कॉल-गर्ल हर औरत होती है ब्याहता गृहस्थिन   भी – कॉल-गर्ल को तो यह छूट भी होती होगी कि हर काल पर वह प्रस्तुत न हो, पर गृहस्थिन   कि क्या मजाल ! अजब होता है वह दृश्य जब पिटी हुई पत्नी को समझा बुझाकर या पकड़-धकड़ कर माएं या  सांसे वापस पति-परमेश्वर के कमरे में भेजती है कि पति  को बिना माफी मांगे ही माफ करे ...... क्या बीतती है पत्नी के मन पर?” 6
                 पितृसत्ता को वैधता प्रदान करने मे पुरुषों के समान ही स्त्रियां  भी बराबर कि शरीक रही हैI  इसे ही पितृसत्ता कि वास्तविक miyfC/k कहेंगे जहां स्त्री ही स्त्री के  विरोध मे खड़ी हो जाती है I
उपन्यास की अवन्तिका कहती है –“डिवाईड एंड रुल के तहत जैसे अंग्रेज़ हिन्दू –मुस्लिम को लड़वाते थे I ऐसी निर्मितियों मैं पितृसत्ता भाभी नन्द और सास–बहू को लड़वा देती है| खुद औरत बन जाती है औरत की  दुश्मन – पितृसत्ता के सवाक धूत–अवधूत I”7
         इस उपन्यास के मधायम से अनामिका परिवार मैं स्त्रियो की सार्थक भूमिका की जरूरत पर बल देती हैI  स्त्री को जागरूक बनाने के लिए स्त्री को शिक्षित करना आवश्यक है I शिक्षित होगी तो उसके जीवन की  आधी समस्या का निवारण हो जाएगा| तभी स्त्री अपने शोषण की प्रक्रिया को समझ पाएगी, अत्याचारियों की पहचान कर पाएगी, अपने अधिकारों के प्रति सचेत रह सकेगी, और उनके लिए लड़ सकेगीI ठेला बाई ने धंधे वाली होकर भी शिक्षा के महत्व को समझा I तभी तो अपनी बेटी को अक्षर-ज्ञान करवाने पर तुली रही I देखा जाय तो उपन्यास मे शिक्षा के महत्व को उन्ही  स्त्रियों द्वारो अधिक समझा गया जो समाज का सर्वाधिक तिरस्कृत एव उपेक्षित वर्ग है I
                 इस उपन्यास मे तारा कॉल  गर्ल के आंतरिक जीवन को रूपायित करती है I तारा के पास एक कॉल गर्ल के रूप मे अनुभवों का विशाल भंडार हैI इस पेशे मैं उसके तरह–तरह के लोगो से सामना होता हैI इन लोगों मे कुछ तो बिल्कुल निरपेक्ष है,’ कुछ थोड़े कोमल, कुछ अपनी कुंठा  मे अमानवीयता की सीमा तक क्रूर है इनमे से कुछ  तारा के पिता की उम्र के  व्यक्ति भी थे, जिसमें   से कुछ मे वात्सल्य भी था और कुछ काफी कम उम्र के भी थे, लेकिन एक बात सबमे कॉमन थी, वह यह है की इनमें से किसी ने भी उसे व्यक्ति नहीं समझाI उसे उसके नाम से बुलाने की जरूरत महसूस नहीं की, तारा के विचार है- “मैं बस ऊर्जा बोर्ड हूँ और तरह–तरह की आत्माएं मुझ पर उतरती हैI….. एक ही राहत थी के एक घंटे से ज्यादा किसी  का साथ ढ़ोना नहीं पढ़ता था जैसे कि अफेयर में  या  शादी मे कभी-कभी या अक्सर ढ़ोना होता है”8
                 तारा शिक्षित है, व्यक्तित्व-संपन्न है  और यही वजह है की देह के धंधे मे उतरने के बावजूद उसकी मानवीयता या नैतिकता बोध समपाप्त नहीं होता|                    तारा आधुनिक है, इसलिए इस पेशे से जुड़े  होने के बावजूद उसके  अंदर कोई ग्लानि–बोध का भाव नहीं हैI एक तटस्थ निर्लिप्तता  से वह अपना काम करती हैI पाश्चात्य परिवेश मे तारा का यह काम उसकी सामाजिक–अवहेलना  का कारण  भी नहीं बनता हैI वह कॉलगर्ल   के साथ-साथ  विभिन्न संस्थाओ  मे लेक्चर देने का कार्य भी करती है- तारा प्रबुद्ध महिला होने के नाते सामाजिक उत्तरदायित्व का भी पालन करती हैI अनामिका जानती है इस देहवादी भोगवादी स्थितियों  का समाज पर बुरा असर पढ़ सकता है| इसलिय वे  तारा के माध्यम से अपने विचार व्यक्त  करती है –मेरी देह मेरी पूँजी, इस तर्क में जो चाहिए, अपनी देह का करूँ, लेकिन इतना ध्यान रखना होगा की मेरी जगाई हुई, प्यास किसी  निर्दोष के  खून से नहीं बुझे”9   तारा का दृढ़ निश्चय है कि  – “ कोई भी कृत्य  , जो बहनापे के खिलाफ हो कभी नहीं करना मुझेI”10
                 अनामिका जी स्त्रियों मे  हक व अधिकारों की बात करती है पर वह परिवार से विहीन स्त्री विमर्श की कल्पना कही नहीं करती I देखा जाए तो बिना पुरुष के स्त्री विमर्श अधूरा ही हैI एक सुंदर समाज के निर्माण में दोनों का संयोग जरूरी है I
                 अनामिका का मानना है – “दोष समाज की पूर्वगृहयुक्त बनावट का है, किसी एक व्यक्ति का नहीं, बदलनी तो पूरी फिजा होगीI” 11
                 इस फिजा को बदलने मे पहल नई पीढ़ी के पुरुष कर रहे है| उपन्यास में  इनका प्रतिनिधित्व साहिल, डॉ0 स्पंदन कक्कड़ और खालिद कर रहे हैI ये एक खास वर्ग के पढ़े–लिखे, ईमानदार और संवेदनशील पात्र हैI ये तारा और शीरीन के साथ सामाजिक पुनर्निर्माण के कार्यक्रम मे अपना सहयोग प्रदान करते हैं I

संदर्भ सूची
(1) अनामिका, तिनका तिनके पास, पुस्‍तक के आवरण पृष्ठ से, वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2008
(2) वही, पृ0 -167
(3)  वही, पृ0 -62
(4) वही, पृ0 -58
(5) वही,
(6) वही, पृ0 -64
(7) वही, पृ0 -75
(8) वही, पृ0 -173
(9) वही, पृ0 -176
(10) वही,
(11) वही, पृ0 -165
 - सुनीता बिष्ट
(शोधार्थी- डी0एस0 बी परिसर नैनीताल)

                                             

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