Sunday, October 13, 2019

आत्‍मकथा - शिरीष कुमार मौर्य



आत्मकथा -1



मुझे आत्‍मकथा लिखनी थी
पर लिखते हुए चली आती थीं
न जाने कितनी कथाएं
न जाने कितने लोगों से जुड़ी
और मैं नियम तोड़ बैठता था



लिखने से पहले आईने में अपना चेहरा देखता था
तो याद आते थे पुरखों के चेहरे प्रेम और अवसाद से भरे
मेरे चेहरे पर प्रेम कम था या अवसाद
मैं नहीं जानता
पर मेरी तमाम असफलताओं के पीछे यह भी
एक कारण था



मुझे एक धर्म दे दिया गया था
कि मैं निबाहूँगा उसे
मुझे एक ईश्‍वर दे दिया गया था
कि मैं तराशूँगा उसे



मेरे पास एक परिवार था जो अचानक किसी पल अजनबी-सा लगता था
सड़क पर एक अजनबी था जो अचानक किसी पल अपना सा लगता था



मैं दाे बार
मनोचिकित्‍सक के पास गया
और एक बार
हृदय चिकित्‍सक के



एक बार 

मुझे ले जाया गया अस्थियों के विशेषज्ञ के पास
जिसने मेरे बारे में सबसे ठोस बात
यह कही
कि मरीज़ का बुनियादी ढाँचा अब तक दुरुस्‍त है
इसे किसी बनते हुए मकान की दीवार में लगाओ
घर मज़बूत बनेगा
कभी कभी दरकेगा भी अपनी भावनाओं में
तो तुरन्‍त सम्‍भल जाएगा
भूचाल के दिनों में
घर में लगाने को
इससे अच्‍छा कोई पदार्थ ही नहीं



और इस तरह मैं किसी आत्‍मकथा में नहीं
एक घर की दीवार में रहता हूँ इन दिनों



मेरा बेटा दीवार पर कान लगाए सुनता है
तो हैरानी में बोलता है
बब्बा यह दीवार धड़कती क्‍यों है ?
क्या इसमें
किसी तरह की विद्युत चुम्‍बकीय तरंगे बहती हैं ?



मैं कहना चाहता हूं
वो मैं हूँ बेटा



और जिससे कंधा जोड़ जोड़कर कर
तू नापता रहा अपनी लम्‍बाई
वह मैं नहीं
दरअसल एक दीवार भर थी
जिसे कभी कभी
तेरी माँ पोंछ देती थी
निकाल देती थी कोनों में चिपके मकड़ियों के जाले



देह से निकली
बेघर मकड़ियों के लिए ठिकाने की तलाश में ही
तेरा पिता बाहर जाता है
यही तेरे पिता की नौकरी है
यही वह करता रहा है अब तक
इसी की
उसे तनख्‍़वाह मिलती है

इसी की वह कविता लिखता है
 

जिसे या तो
कुछ दीवारें सुनती हैं
या अपने ही अधबने जालों में फँसी
कुछ मकड़ियाँ
जिनका निष्कपट समर्पण
सदा उस दीवार के साथ रहा
जो कान लगाने पर
धड़कती सुनाई देती है



आत्मकथाएँ अकसर मर जाती हैं
स्वपोषित लिजलिजेपन की शर्म में दबकर कहीं
 

हमेशा ज़िंदा रहती हैं आदमी को शरण देती
वो दीवारें
जिनमें किसी ने चुपचाप
अपनी अस्थियों की शक्ति और प्रेरणा
धर दी हो

आदमी का असल जीवन आत्मकथाओं में नहीं
कथाओं में रहता है
 

और कथाएँ रहती हैं घर की किसी दीवार में

अकसर वहाँ
जहाँ आपने कभी न रखा हो उन्हें।
***



आत्मकथा - 2



कुएँ में हूक की तरह मैं
बोलता रहा



मेरे भीतर एक कुआँ था
और बाहर एक कुआँ था



लोग सब जा चुके थे
मेरे जीवन में
पुराने वक़्तों के किसी बल्ब का
फिलामेंट जल रहा था



कमरे में
मेरी ही ख़ाली कुर्सी मुझे सुन रही थी
हूक की तरह
मैं बोल रहा था



और चाहता था
जहाँ भी हो न्याय की कुर्सी
सुने
मैंने जो बोला
अपनी ही ख़ाली कुर्सी से
***




आत्मकथा - 3
(प्रिय कथाकार सुभाष पंत के लिए)



फूलों के लिए नहीं
तितलियाँ
बेचैन हैं नमक के लिए



किसी फूल पर नहीं
वे उतरती हैं मूत्रवृत्त के किनारे पर
मल की ढेरी पर



उनकी नाज़ुक वह सूँड़ धँसती है
मूत्रसिंचिंत मृदा में
मल में



सब तितलियों के रंगीन पंख देखते हैं
उनकी कोमल सुन्दरता देखते हैं



न तितलियों का वीतराग देखता है कोई
न देखता है उनकी बेचैनी



मैं उस जुगुप्सा और घृणा को भी देखता हूँ
जिसे अपने नामालूम हृदय में सहेजे
जीते हैं
संसार के ये कोमलतम
सुन्दरता प्राणी



तितलियों के रंगीन कोमल पंख वे
प्रेम के प्रतीक हैं
नमक खोजती वह सूँड़ भी
प्रेम की ही प्रतीक है



और नमक ?
नमक प्रतीक है जीवन का

नहीं,
वह जीवन है स्वयं



और वे तितलियाँ नहीं
जगह जगह
सूँड़ धँसा जो लिखती हैं आत्मकथा
हम हैं।
***


Sunday, October 6, 2019

सुबोध शुक्‍ल का 'अहैतुक' गद्य


हमारे अनूठे गद्यकार ने अपनी फेसबुक वॉल पर कुछ टुकड़े लिखे हैं, जिनके बारे में निराला के सहारे से कहूँ तो ये फूल नहीं, जीवन अविकच हैं/ये सच हैं। यहॉं जीवन ही नहीं, प्रेम भी अविकच है। व्‍याख्‍याओं ने सदा ही हिन्‍दी का सौन्‍दर्य नष्‍ट किया है, यह पाप मैं नहीं करूँगा। अनुनाद को जगाने के लिए बहुत दिनों से जिस मौसम की तलाश में था, इस गद्य को पढ़कर लगा कि ठीक वही मौसम आन खड़ा है। 




अहैतुक

1.
एक अधबनी शाम के इर्द-गिर्द किसी प्रागैतिहासिक स्पर्श सा मैं...एक अनपढ़ बारिश से लिपटी हुई किसी उनींदी कहानी सी तुम...मेरे और तुम्हारे बीच एक चाय की प्याली सा जीवन...सूर्य ओस की तरह ठहर गया है हमारी स्मृतियों की दूब पर...अब तक न सीखी गई किसी भाषा का अनुवाद है यह रात....
2.
मेरे और तुम्हारे बीच भाषा, अतृप्ति का एक और नाम है...तुम मेरी निजता फूंक मारकर बुझा देती हो, मैं तुम्हारी पुकार को मिट्टी में बदल देता हूँ और उसमें अपना उपसंहार गूंथ देता हूँ....अब जबकि तुम मेरे मौन को अलाव कहती हो मैं भी तुम्हारी प्रतीक्षा को क्षितिज कहने लगा हूँ...
3.
नदियों ने अपने प्रतिबिम्ब तुम्हें उधार दे रखे हैं और तुम हो कि स्मृतियों की रेत में श्रम की सिलवटें गिन रही हो ...इन दिनों सांसें जैसे अपना उच्चारण भूल गई हैं और प्यास अपना व्याकरण...मौसम और कुछ नहीं मेरे और तुम्हारे बीच कुछ नामुमकिन सी लापरवाहियों का प्रवास भर है...
4.
तुम्हारे साथ होना किसी गुमनाम दिनचर्या में लगभग हरा दी गई शिकायतों के साथ होना है... मैं जब तुम तक कुछ दुधमुंही हैरानियों के साथ पहुंचता हूँ तो तुम ठीक उसी समय किसी नवजात रोमांच की सीवन उधेड़ रही होती हो.. फिर मैं भाषा से पिंजड़ा बनाने में लग जाता हूँ और तुम अपने असमंजस से आकाश...
5.
किसी अधखुली दराज़ की नमी और धूल सा तुम्हारा चेहरा जैसे बीच जंगल में भोर को देख सांझ का धोखा हो जाए...मैं तुम्हारी चुप्पियों के रास्ते से अपने रक्त तक पहुँचने का असफल यत्न हर बार करता हूँ...गलती मेरी ही है मैं तुममें मूर्च्छा खोज रहा हूँ जबकि तुम यात्रा हो... मैं प्रेम को भी सीढ़ियों में बदल देता हूँ तुम दस्तक को भी दरवाज़ा बना देती हो...
6.
तुम मेरे लिए निमित्त को व्यथा कहने लगी हो... मैं एक अबूझे छल को अभिसार का नाम दे देता हूँ और तुम करवट बदल लेती हो...वक़्त हमारे बीच ऊसर हो चुकी ज़मीन पर पहली दरार की तरह है..इसके पहले कि रोशनी अपनी छाया में वापस हो जाए, मौन अपनी प्रतिहिंसा में और मृत्यु मरीचिका में, हमें एक वृक्ष का स्फुरण हो जाना चाहिए, अपनी भाषा में झूठ हो जाना चाहिए...
7.
तुम्हारी आँखें दीवट होना चाहती हैं पर दहलीज़ होकर रह गई हैं...तुम्हारी कामना, कोहरे से घिरी हुई रेत की तरह है जो मेरी मुट्ठी में ठहरती भी नहीं और अपनी चिपचिपाहट मेरी हथेली पर छोड़ भी जाती है...तुम जब-जब अपना वाचाल संकोच मेरे अनाथ समर्पण पर रखती हो, मेरी देह की ऋतु बदल जाती है....
8.
प्रेम हमारे बीच आलस्य का अभ्यास है...तुम जब से प्रतीक्षा को गंध कहने लगी हो मैंने आदत को स्वाद कहना शुरु कर दिया है...तुम्हारे हिस्से की दूरी मेरे पास वसीयत की तरह मौजूद है, मेरे हिस्से की कहानी तुम्हारे पास जायदाद की तरह...हम एक-दूसरे का अर्थहीन विकल्प हैं, हम एक दूसरे का सर्वश्रेष्ठ अभिनय हैं...
9.
हम दोनों सुखान्त की प्रस्तावना पर चरित्रों का पटाक्षेप हैं...हमारे बीच अनुरक्ति, समय की एक ज्यामितिक चेष्टा है और सुख, असाध्य उपस्थितियों का सारांश...हम एक दूसरे के स्वप्न में अपनी उम्मीदों के अपव्यय हैं...तुम जीवन के किसी वाक्य में औचक आ गया प्रश्नचिन्ह हो और मैं ठीक इसी वक़्त किस्से को ख़त्म करने की जल्दबाज़ी ....
10.
तुम्हारी साँसों की आड़ से झांकता हुआ मेरा रुंधा हुआ वसंत इतना शर्मीला भी नहीं है कि क्रीड़ा में बदल जाये और इतना दुस्साहसी भी नहीं कि आश्चर्य की शक्ल ले ले... यहाँ सामने शरणार्थी हो चुकी इन दिशाओं के बीच तुम गोधूलि सी बिखर रही हो और मैं इशारों की गवाही पर कसौटियों का बयान दर्ज़ कर रहा हूँ...
11.
तुम्हारे साथ होना अपनी अप्रासंगिकताओं पर भरोसा करना है, अपनी असफलताओं के साथ न्याय करना है.. तुम्हारा साहचर्य मेरे हर भ्रम को तृप्ति और हर दुराव को जीवेषणा में बदल देता है... मेरी उदासी तुम्हारी ज़िद तक पहुँचने का एक नक्शा है, तुम्हारा स्वीकार मेरी विफलता को महसूसने का इंतज़ाम...मैं तुम्हारा कुतर्क हूँ और तुम मेरा अंधविश्वास....
12.
तुम अपने मौन को जूठा छोड़ देती हो और मैं भाषा की केंचुल उतारता रहता हूँ ...मेरे और तुम्हारे बीच स्मृति, एक ऐसी परिभाषा है जिसको सिद्ध करने के लिए कोई दृष्टान्त मौजूद नहीं ...हम मोह की झुंझलाहट में नादानियों का रोज़गार हैं- एक दूसरे में सेंध लगाते हुए, एक दूसरे को चुराते हुए....
***  

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