Wednesday, March 28, 2018

गैरसैंण - अमित श्रीवास्तव की नई कविता

यह पहाड़ पर बुझी हुई लालटेन की तरह टंगी एक जगह है, जो राज्य स्थापना के बाद से ही बाट जोह रही है कि उसे जलाया जाए। उत्तराखंड जैसे किसी भी राज्य में उन सभी ताक़तों का होना स्वाभाविक ही है, जो चाहती हैं कि ये लालटेन बुझी ही रहे। उसके होने में कोई हर्ज़ नहीं, वह रहे और उसमें कभी-कभी धुआं भी उठे कि लगे उसे जलाना तो चाहते हैं। अमित श्रीवास्तव ने इस पूरी धूर्तता की तफ़्तीश अपनी कविता में की है। अनुनाद कवि को इस हस्तक्षेप के लिए शुक्रिया कहता है।
गैरसैंण एक शब्द है...


पानी की बची हुई बूंद को छाल की शिराओं में सँजोकर हरा होना सीखा था
इसने खिलना सीखा था
अब जब नाखून के पोर लाल हो उठे थे
किसने देखा कि इसके हाथों में निचुड़े हुए बुरांश के फूल हैं

हथेली की गर्म सांस से चिपके
फूल, किसी आश्वासन के संलग्नक बन जाते हैं अपनी उतराई में
कुछ हवा के साथ बहते दूर किसी चमकीले शहर के पैरों पर गिरते हैं
कुछ बीमार पत्तों से उतर जाते हैं बेस्वाद
इसकी आंखों में उतर आता है
पत्थरों का गहरा सलेटीपन

किसने देखा कि इसके हाथों में दरातियाँ हैं
चेहरे पर वक्त की बेशर्म  लिखावट
इसने गर्म दस्तानों से बाहर कर लिए हैं हाथ
दस्ताने फट चुके हैं
हाथ कट चुके हैं
चेहरे पर अबूझ सांवलापन है अब

किसने देखा कि इसने खीजकर खोल दीं अपनी हथेलियां
इसके हाथों में दूसरों के थमाए पर्चे थे
पर्चों पर लिखी थीं अद्भुद कविताएं मगर
कविताओं की वक्र पीठ पर खुदा हुआ नाम इसका नहीं था

बंजर वायदे से उठ जाता है दिन
धूसर आपत्तियों सा रात ढल जाता है 
खाली तकती रह जाती हैं छः की छः सुबहें भरोसे की बिसात पर
किसने देखा कि चौसर के ठीक बीच में गिरे पासे सा ये और
इससे खेलने वाले समान दूरियों पर हैं
देखने वालों के
जीतने वाले हारे हुए दीखते हैं
इस लिए हैरान हैं हारे हुए लोग

किसने देखा कि माथे पर तमाम सलवटें
इसके होने और न होने के बीच द्वंद सी उठतीं
एक बवंडर उठाने को अभिशप्त पसीने की बूंदों के साथ नीचे गिरकर
सपाट रह जाती हैं

किसने देखा कि इसके ढले हुए कन्धों पर
एक ही गांठ में नत्थी हैं
कुछ मुस्कुराटें
कुछ कराहें
और एक सोची समझी उदासीनता

अब तक तो इसे खिल जाना चाहिए था
अब तक तो इसे चुना जाना चाहिए था
अब तक तो इसे बिछ जाना चाहिए था रेशमी रूमालों में
अब तक तो रूखे-मलमली काली गिरहों में इसे बिंध जाना चाहिए था चौफुंला की थाप सा
या इसे भी पंक्ति को ही दिया जाना चाहिए था
किसने देखा कि अब तक तो इसे मिल जाना चाहिए था कोई न कोई रंग

भाषा कोष में उर्दू के क़रीब
किसी उथले मैदान के गर्भ में 
कुछ मठ बनाए जाएंगे
टूटेंगे कुछ गढ़
कुछ ज़मीनों पर चढ़ेंगे आसमानी रंग
इसके खाली पेट को उलटकर ओढ़ लिया जाएगा कई बेशर्म पीठों पर
बदले जाएंगे नाम वारिसान के
इसकी छातियों पर दगे होंगे चकत्ते
सफेद नीले और ख़ाकी
रस निकलने तक
इसके होने को चुभलाया जाएगा
अब तो शायद थूकने से पहले ही ये देखा जाएगा कि इसके नाखून के पोर लाल हो उठे थे
और ये कि

...
गैरसैंण एक शब्द है राज कोष का !

Sunday, February 4, 2018

उत्तम वाग्गेयकार कुमार गंधर्व : रवि जोशी



                         पंडित  शाङ्ग॔देव द्वारा वर्णित उत्तम वाग्गेयकार के रूप में
                                              पंडित कुमार गन्धर्व का स्थान ”


१३ वीं शताब्दी में  पं शाङ्ग॔देव  द्वारा रचित संगीत रत्नाकर ग्रंथ, भारतीय संगीत के इतिहास को जानने- समझाने  की एक महत्त्वपूर्ण एतिहासिक कड़ी है। प्रसिद्ध इतिहासकार श्री उमेश जोशी के अनुसार, “पं शाङ्ग॔देव  का समय १२१० से १२४७ ई० के मध्य का माना जाता है। यह देवगिरी (दौलताबाद) के यादववंशीय राजा के दरबारी संगीतज्ञ थे”।
संगीत रत्नाकर ग्रंथ को कर्नाटकी एवं हिन्दुस्तानी संगीत के विद्वान संगीत का आधार ग्रंथ मानते आए है। पं शाङ्ग॔देव कृत संगीत रत्नाकर में नाद, श्रुति, स्वर, ग्राम,मूर्च्छना, जाति इत्यादि का विवेचन भलीं प्रकार दिया गया है। संगीत रत्नाकर में गायन, वादन तथा नृत्य तीनों का वृहद् वर्णन किया गया है। संगीत रत्नाकर में ७ अध्याय हैं यहीं कारण है की इसे “सप्ताध्यायी” भी कहा जाता है।
संगीत रत्नाकर के सात अध्याय इस प्रकार हैं –
(1) स्वराध्याय  (2) रागाविवेकाध्याय  (3) प्रकीर्णाध्याय  (4) प्रबंधाध्याय
(5) तालाध्याय  (6) वाद्याध्याय  (7) नर्तनाध्याय
संगीतरत्नाकर के तीसरे अध्याय अर्थात प्रकीर्णाध्याय में वाग्गेयकार के लक्षण, गीत के गुण दोष, गायक वादक  के गुण दोष तथा स्थायी इत्यादि का वर्णन प्राप्त होता है। “वाक्” “गेय” “कार” इन तीनों रूपों  के सामंजस्य से वाग्गेयकार दिग्दर्शित होता है। “वाक्” का अर्थ है वाणी, वाक्य, कथन इत्यादि । “गेय” के अर्थ में गीत अथवा गए जाने वाला काव्य तथा ताल शब्द के नियमों के साथ शब्दोच्चार करना इत्यादि भाव लिए जा सकते हैं । अंत में “कार” शब्द कर्ता का अर्थ प्रकट करता है । इस प्रकार पद रचना तथा स्वर रचना को आकार देने वाला वाग्गेयकार कहलाता है । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि वाक् अर्थात् भाषा साहित्य तथा गेय अर्थात् स्वर विशेष इन दोनों पक्षों में सिद्ध रचनाकार को शास्त्रों में वाग्गेयकार की संज्ञा दी गयी है । वाक् को “मातु” तथा गेय को “धातु” कहते है । जो वाक् और गेय दोनों की रचना करता वह वाग्गेयकार कहलाता है ।
संगीत रत्नाकर में वाग्गेयकार की परिभाषा इस प्रकार उल्लेखित है –
“ वाङ्मातुरुच्यते गेयं धातुरित्यभिधीयते ।
  वाचं गेयं च कुरुते यः स वाग्गेयकारकः” (1)
अर्थात जो वाक् अर्थात मातु और गेय अर्थात धातु का कर्ता है अर्थात जो पद्य – रचना और स्वर रचना का ज्ञाता है वह वाग्गेयकार है । इस प्रकार उपरोक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि  वाग्गेयकार कोधातुएवंमातुअर्थात् पद रचना व स्वर रचना का ज्ञान होना नितांत आवश्यक है ।
संगीत रत्नाकर में वाग्गेयकार के तीन वर्गों का उल्लेख किया गया है – (1) उत्तम वाग्गेयकार, (2) माध्यम वाग्गेयकार (3) अधम वाग्गेयकार ।
संगीत रत्नाकर में उत्तम वाग्गेयकार के लक्षण इस प्रकार वर्णित किए गए हैं –

“शब्दानुशासनज्ञानमभिधानप्रवीणता ।   छन्दः प्रभेदवेदित्वमलंकारेषु कौशलम् (२)
रसाभावपरिज्ञानं  देशस्थितिषु चातुरी । अशेषभाषाविज्ञानं कलाशात्रेशु कौशलं  (३)
तूर्यत्रितययुयु  ह्रद्यशारीरशालीता ।           लयतालकलाज्ञानं विवेकोऽनेकाकुषु (४)
प्रभूतप्रतिभोद् भेदभाक्त्वं सुभगगेयता । देशीरागेष्वभीज्ञत्वं  वाक्पतुत्वं सभाजये (५)
रागद्वेषपरित्यागःसाद्र॔त्वमुचितज्ञता । अनुच्छिष्टोक्तिनिर्बन्धो नूतनधातुविनिर्मितिः (६)
परचित्त्परिज्ञानं प्रबंधेषु प्रगल्भता ।               द्रुतगीतविनिर्माणं पदांतरविदग्धता  (७)
त्रिस्थानगमकप्रैढ़िर्विविधालाप्तिनैपुण्म् ।   अवधानं गुणैर्रे भिर्वरो वाग्गेयकारकः  (८)

भावार्थ : उत्तम वाग्गेयकार में निम्नलिखित गुण होने चाहिए

1- शब्दानुशासनज्ञान : व्याकरणशास्त्रज्ञान ।
2- अभिधानप्रवीणता : अमरकोषादि ग्रंथों का ज्ञान ।
3- छंद:प्रभेदवेदित्व : सभी प्रकार के छंदों का ज्ञान ।
4- अलंकारकौशल : साहित्यशास्त्र में वर्णित उपमादिक सभी अलंकारों का ज्ञान ।
5- रसभावपरिज्ञान : उसी शास्त्र में वर्णित किए हुए श्रृंगारिक रसों तथा विभावादिक भावों का
उत्तम ज्ञान ।
6- देशस्थितिज्ञान : विभिन्न प्रदेशों के रीति रिवाजों का ज्ञान ।
7- अशेषभाषाज्ञान : देश की सभी भाषाओं का ज्ञान ।
8- कलाशास्त्रकौशल : संगीतादि शास्त्रों में प्रवीणता ।
9- तूर्यत्रितयचातुर्य : गीत, वाद्य, तथा नृत्य तीनों विधाओं में चातुर्य ।
10- ह्रद्यशारीरशालीता : ह्रद्य अर्थात् मनोहर शरीर जिसे प्राप्त हुआ हो, अर्थात् अधिक श्रम न
करते हुए जिसे राग की अभिव्यक्ति ( प्रदर्शन ) सरलता से करनी आती है उसे उत्तम शरीर
प्राप्त हुआ है ऐसा कहा जाता है ।शरीरयह पारिभाषिक शब्द है ।
11- लयतालकलाज्ञान : लय, ताल, तथा तालाध्याय में वर्णित कलाओं का ज्ञान ।
12- अनेककाकुज्ञान : भिन्नभिन्न स्वर भेदों का ज्ञान ।काकुयह भी पारिभाषिक शब्द
है ।
13- प्रभूतप्रतिभोद् भेदभाक्त्व : अलौकिक बुद्धि ( नएनए प्रकार जिसे सूझते है, ऐसी प्रज्ञा
अथवा बुद्धि )
14- सुभगगेयता: सुखद गायन करने की शक्ति ।
15- देशीरागज्ञान: देशी रागों का ज्ञान ।
16- वाक् पटुत्व: सभा में विजय पाने योग्य वाक् चातुर्य ।
17- रागद्वेषपरित्याग :रागद्वेष का आभाव ।
18- साद्र॔त्व : सरसता ।
19- उचितज्ञता : किस स्थान पर क्या उचित होगा, इसका ज्ञान ।
20- अनुच्छिष्टोक्तिनिर्बन्ध : स्वतन्त्र रचना करने की क्षमता ।
21- नूतनधातुविनिर्मितिज्ञान : नईनई स्वररचना करने का ज्ञान ।
22- परचित्तपरिज्ञान : दूसरों के मन का भाव जानने की शक्ति ।
23- प्रबंधप्रगल्भता : प्रबंधों का उत्तम ज्ञान ।
24- द्रुतगीतविनिर्माण : शीघ्र कविता करनें की क्षमता ।
25- पदांतरविदग्धता : भिन्नभिन्न गीतों की छाया का अनुकरण करने का सामर्थ्य ।
26- त्रिस्थानगमकप्रैढ़िर्विविधालाप्तिनैपुण : तीनों सप्तकों में गमक लेने की शक्ति ।
27- आलप्तिनैपुण : रागालप्ति तथा रूपकालप्ति का ज्ञान ।
28- अवधान : चित्त की एकाग्रता ।

पं शाङ्ग॔देव के मतानुसार उपरोक्त समस्त गुण जिसमें विद्यमान हों, उसे उत्तम वाग्गेयकार कहते हैं , इसी प्रकार मध्यम एवं अधम वाग्गेयकार का वर्णन संगीत रत्नाकर में निम्नवत् है :

विदधानोऽधिकं धातुं मातुंमदस्तु मधयमः ।
धातुमातुविदप्रौढ़ः प्रबंधेष्वपि मध्यमः॥
रम्यमातुविनिर्माताऽप्यधमो मंदधातुकृत् ॥
अर्थात् जो धातु को विशेष रूप से धारण करता हुआ मातु में मंद हो वह मध्यम कोटि का वाग्गेयकार है तथा जोधातुएवंमातुदोनों का जानकार हो परन्तु विविध प्रकार के प्रबंधों की रचना में अप्रौढ़ हो वह भी मधयम श्रेणी के वाग्गेयकार की श्रेणी में आता है ।
इसी प्रकार मनोहारीमातुका निर्माता होने पर भी मंदधातुकी रचना करने वाला अधम श्रेणी का वाग्गेयकार है ।
पं शाङ्ग॔देव द्वारा वर्णित उत्तम वाग्गेयकार के गुण मध्य काल में प्रचलित प्रबंध गान विधा से सम्बंधित
थे । मध्य काल से लेकर आधुनिक काल तक भारतीय शास्त्रीय संगीत में अनेकानेक परिवर्तन हुए जिसके फलस्वरूप आधुनिक काल के किसी भी वाग्गेयकार के समस्त 28 गुणों का होना बहुत कठिन जान पड़ता है ।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में वाग्गेयकारों की एक समृद्ध परंपरा रही है । इसी परंपरा में एक नाम पं कुमार गंधर्व का भी है जिन्होंने अपनी मोहक रचनाओं से भारतीय शास्त्रीय संगीत की अमूल्य निधि में अधिकाधिक वृद्धि की । एक कलाकार के रूप में पं कुमार गंधर्व का स्थान शीर्षस्थ गायकों की श्रेणी में आता है । पं कुमार गंधर्व एक सफ़ल कलाकार तो थे ही साथ ही साथ उनके भीतर नवीन रचना करने की भी अद्भुत क्षमता थी । वे एक उत्कृष्ट रचनाकार भी थे अर्थात वे एक उत्तम श्रेणी के वाग्गेयकार भी थे ।

मई 1956 में पं कुमार गन्धर्व  की स्वरचित बंदिशों का संकलन “अनूपरागविलास” प्रकाशित हुआ जिसमें नए व पुराने रागों की कुल 136 बंदिशों का संग्रह है । कालांतर में जुलाई 1993 को अनूपरागाविलास के दूसरे भाग का भी प्रकाशन हुआ जिसमें नए व पुराने रागों में कुल 111 बंदिशों का संकलन है । अपनी रचनाओं में कुमार जी ने “शोक” उपनाम का प्रयोग किया है । कुमार जी के संकलन के विषय में श्री वामन हरी देशपांडे अपनी पुस्तक “ रसास्वाद ” में लिखते है “ पंडित भातखंडे आदि संग्राहकों ने इतना प्रचंड कार्य किया है फिर भी उनके ग्रंथों में पहले के संगीतज्ञों द्वारा बांधी गयी असली बंदिशें कितनी है , स्वराकारों द्वारा रची गई स्वरावली की सच्चाई पं भातखंडे तक पहुँचते-पहुँचते किस मात्रा में बची रही बंदिशों के पाठ में कितने अपभ्रंश घुस आए है , आदि महत्वपूर्ण प्रश्न अनिर्णीत ही रह जाते है । मतलब यह कि सौ दो सौ वर्षों में उस ज़माने की नवनिर्मित बंदिशों के स्वरूप में आमूलाग्र परिवर्तन हो गया ऎसी भी सम्भावनाएँ हैं । कुमार जी के प्रस्तुत संग्रह के बारे में इस प्रकार के किसी भी संदेह की गुंजाइश नहीं है । उनका सारा सृजन उनका है । उसे लिपिबद्ध उन्होंने स्वयं किया है और स्वरावलीयाँ भी उन्हीं की उपज है , इसलिए उसमें भ्रष्टाचार की सम्भावनाएँ है ही नहीं , वह बिलकुल तारोताज़ा है ” ।

उत्तम वाग्गेयकार के रूप में पंडित कुमार गन्धर्व की समीक्षा निम्नलिखित मुख्य बिन्दुओं के आधार पर की जा सकती है :
सर्वप्रथम पं शाङ्ग॔देव द्वारा वर्णित वाग्गेयकार के प्रथम चार गुणों यथा – शब्दानुशासनज्ञान,अभिधानप्रवीणता, छंद:प्रभेदवेदित्व, तथा अलंकारकौशल का कुमार जी को पूर्ण ज्ञान था । ये वह गुण हैं जिनके आभाव में कोई भी रचनाकार उत्तम रचना नहीं कर सकता । इस प्रकार कहा जा सकता है कि कुमार जी का “ धातु ” पक्ष बहुत सबल था 

अशेषभाषाज्ञान : बाल्यावस्था से विभिन्न परिवेशों में रहने के फलस्वरूप पं कुमार गन्धर्व अनेक भाषाओँ के संसर्ग में आए । अपने गुरु प्रोफ़. देवधर जी के पास मुंबई आने के पश्चात अपनी मातृभाषा कन्नड़ के अतिरिक्त मराठी भाषा से भी वे परिचित हुए . देवास आने के बाद श्री चिंचालकर आदि मित्रों के सहयोग से हिंदी भाषा का भी समुचित ज्ञान कुमार जी को प्राप्त हुआ . श्री राहुल बारपुते तथा श्री श्याम परमार जैसे मित्रों के माध्यम से “मालवी” के रूप में एक नयी बोली से उनका परिचय हुआ .मालवी को समझने की प्रिक्रिया में इन मित्रों ने अवधी, ब्रजभाषा, तथा खड़ी बोली से भी कुमार जी को अवगत करा दिया . इस प्रकार कहा जा सकता है कि अपनी मातृभाषा कन्नड़ के अतिरिक्त मराठी, हिंदी, अवधी, ब्रजभाषा, तथा खड़ी बोली से तो कुमार जी परिचित थे ही, साथ ही साथ स्वयं के पास पुरानी बंदिशों का विपुल संग्रह होने के फलस्वरूप पंजाबी, राजस्थानी,तथा उर्दू भाषा के ज्ञान से भी वे अछूते नहीं रहे . उदाहरणस्वरूप पंजाबी भाषा में उनकी यह रचना पं कुमार गन्धर्व के अशेषभाषाज्ञान को दर्शाती है –

राग मुल्तानी, ताल त्रिताल, लय द्रुत
                          स्थाई
मियां तुसी वेखले दुनियांदा  अजब तमासा देखा ॥
                         अंतरा
समझ समझ कर मन में रसिया  जा दिन पी पूछेंगे पूछेंगे लेखा ॥

वाक् पटुत्व : पं कुमार गन्धर्व भारतीय शास्त्रीय संगीत में सर्वाधिक विवादास्पक संगीतकार के रूप में जाने जाते रहे । आपके नए-नए प्रयोगों ने सदैव आलोचकों का ध्यान आपकी ओर खींचा । परन्तु आपने  अपने प्रयोगों की तर्कसंगत व्याख्या कर आलोचोकों को मौन कर दिया । इस संबंध में वसन्त पोतदार अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि “ वे ( पं कुमार गन्धर्व ) कहते पुराने राग, प्राचीन शास्त्र एकदम उत्तम था, निर्दोष था । फिर आधुनिक गवैयों ने उसे क्यूँ बिगाड़ दिया ? उसमें दोष पैदा कर उसे भ्रष्ट क्यूँ किया ? जिस तरह मैने प्रत्येक राग का विशुद्ध मूल खोजने का प्रयास किया है, उस पर पुनर्विचार किया है, वैसा और किसी नें क्यूँ नही किया ? आज इन सब गायकों से जवाब तलब करने वाला कोई नहीं है, पर कल करेंगे । तब उनकी मुश्किल हो जायेगी यार” !  
या फिर कहते “ पिछले पचपन सालों से मैं बिलासखनी तोड़ी गा रहा हूँ वह भी मेरे साथ बड़ता ही गया ना । वह भी तो पचपन साल का हुआ । सीनियर हुआ उसका अदब भी तो मुझें रखना ही चाहिए” ।

रसभावपरिज्ञान : कुमार जी को रागों के रस एवं भावों का उत्तम ज्ञान था । इनकी बन्दिशों की पुस्तक अनूपरागविलास भाग एक तथा दो में हमें विभिन्न रसों एवं भावों से युक्त रचनाएँ देखने को मिलती है । आपने श्रृंगार, भक्ति, तथा वात्सल्य रस का बहुत सुन्दर प्रयोग अपनी रचनाओं में किया है । उदाहरण्स्वरूप राग कल्याण में निबद्ध यह बन्दिश माँ सरस्वती के प्रति इनकी निष्ठा तथा भक्ति भाव को दर्शाती है ।


राग कल्याण, ताल एकताल, लय मध्य
                   स्थाई
             देवो दान मोहे
      माँगत सुर भीख, दास तेहारो ॥
                  अंतरा
     तोरे बिन ग्यान दे कौन मो सो
    नेक नजर मो पर, आस तिहारो ॥

 सुभगेयता : आपकी रचनाएँ अत्यंत सरल एवं चित्ताकर्षक है । आपने “ शोक ” उपनाम से अनेक विलम्बित एवं द्रुत, खयालों, तरानों तथा ठुमरियों की रचना की है । आपकी बन्दिशें अपनी नवीन विषयवस्तु व सरल स्वरसंरचनाओं के कारण कलाकारों तथा संगीत के विद्यार्थियों दोनों को ही आकर्षित करती है ।

प्रबन्धप्रगल्भता : पं कुमार गन्धर्व को आधुनिक काल में प्रचलित सभी गीत विधाओं जैसे – ध्रुपद, धमार, ख़याल, ठुमरी, टप्पा व तराना का उत्तम ज्ञान था । यद्यपि आपकी कृति अनूपरागविलास में ध्रुपद व धमार की कोइ भी रचना देखने को नहीं मिलती परन्तु आपने गुरुमुख से अनेकानेक ध्रुपद व धमार की शिक्षा प्राप्त करी । आपके पास अनेक दुर्लभ टप्पों का संग्रह था जिन्हें आपने ग्वालियर घराने के प्रमुख गायक पं राजाभय्या पूँछवाले से सीखा था । आपके द्वारा प्रस्तुत  “ ठुमरी, टप्पा, तराना ” नामक कार्यक्रम आधुनिक प्रबंधों के संबंध में आपके वृहद ज्ञान की ओर संकेत करता है ।

उचितज्ञता : आपको राग के भाव और उसकी प्रकृति का पूर्णज्ञान था । अमुक राग का क्या भाव है, इसी के अनुसार आपने अपनी बंदिशों में शब्दों का चयन किया है । उदारणार्थ राग बिलासखानी तोड़ी जिसकी प्रकृति कारुणिक है, उसमें आपने निम्नलिखित बंदिश बाँधकर राग के भाव तथा शब्दों के साथ उचित व्यवहार किया है । -
                         राग बिलासखानी तोड़ी ( त्रिताल मध्यलय
                                                  स्थाई
                                 नयन में जल भर आए देखन तोहे
                                 काहे पिया नहीं देत दरस मोहे ।
                                                 अंतरा
                                   शोक मन छाए, याद तरसाए
                                  कैसे धरुँ धीर, देवो दरस मोहे ॥

अनुच्छिष्टोक्तिनिर्बन्ध            पंडित कुमार गंधर्व के भीतर शीघ्र रचना करने की अद्भुत क्षमता थी ।
नूतनधातुविनिर्मितिज्ञान        उनकी रचनाओं में प्रयुक्त काव्य तथा स्वरप्रयोग सर्वथा नए व ताज़े हैं ।
द्रुतगीतविनिर्माण                कुमार जी को भिन्न-भिन्न घटनाएँ  शीघ्र कविता करने को प्रेरित करती प्रभूतप्रतिभोद् भेदभाक्त्व    थीं आप एक स्वतंत्र रचनाकार थे । स्वंय शब्द रचना तथा स्वंय स्वररचना किया करते थे । आपके द्वारा प्रस्तुत विभिन्न विषयगत कार्यक्रम जैसे ( ठुमरी, टप्पा, तराना ) गीत वर्षा, गीत हेमन्त, गीत वसंत, मालवा की लोकधुनें, त्रिवेणी, तुलसी एक दर्शन, इत्यादि आपकी कल्पनाशील बुद्धि का ही परिणाम है ।
अपने पौत्र की बाल लीलाओं से तंग आकर, राग श्री में तत्काल रचित यह रचना उत्तम वागेयकार संबंधी उपरोक्त गुणों को दर्शाती है –

राग श्री, त्रिताल, द्रुत लय
            स्थाई
करन दे रे कछु लला रे
व वो परा जा रे, लेले लेवो रे ॥
            अंतरा
अंतरा - ईको उठाले आकर कोई
ये उधम करे, लेले लेवो रे ॥                                     
                                                                                                                                                                                                       लयतालकलाज्ञान       किसी भी उत्तम वाग्गेयकार को उत्कृष्ट रचना करने के लिए लय व ताल का ज्ञान
अनेककाकुज्ञान             होना आवश्यक होता है । कुमार जी की लय व ताल के भेदों  से
त्रिस्थानगमकप्रैढ़ि         पूर्णतया परिचित थे, आपने  विभिन्न तालों में अपनी बंदिशों को बाँधा
                                   है । कुमार जी को “काकु” का पूर्ण ज्ञान था . आप अपने गायन में भी “काकु” का बहुत उपयोग करते थे । यहीं कारण है कि आपकी रचनायें अत्यंत भावप्रधान है । पं कुमार गंधर्व एक सिद्धस्त कलाकार थे । मन्द्र, मध्य, व तार तीनों सप्तकों पर आपका समान अधिकार था । तीनों ही सप्तकों में आपकी आवाज़ बिना किसी कष्ट के गमक लेने में सक्षम थी ।
लय व ताल के महत्व को कुमार जी ने  बन्दिश के माध्यम से इस प्रकार समझाया है -

राग भीमपलासी, ताल एकताल, लय विलम्बित
          स्थाई
नाद सो जानूरे सुरगानी
महाकठन ये बिस्तार धरम है ॥
          अंतरा
अंतरा - सुरत देखाए जब ये नाद-लय
करो रे आघात सह लो
तब ताल सुर बन सार, धरम है ॥

अर्थात – नाद अथवा शब्द का सच्चा आनन्द उसे ही प्राप्त हो सकता है जिसे सच्चे स्वर का ज्ञान मिला है सच्चे स्वर के साथ राग का विस्तार करना बहुत कठिन कार्य है । जब नाद और स्वर एकाकार हो जाते है उसी क्षण वहाँ पर आघात कर उस आघात को अपने भीतर सहन करना पड़ता है तभी ताल, सुर सभी  एकाकार हो पाते है । 

रागद्वेषपरित्याग   पं कुमार गंधर्व अत्यंत सरल स्वभाव के व्यक्ति थे । आपके मन में किसी भी कलाकार
सार्द्रत्व                के प्रति रागद्वेष की भावना नहीं थी । अपने समकालीन कलाकारों तथा वाग्गेयकारों अवधान               के साथ आपके बहुत आत्मीय संबंध थे । समकालीन दिग्गज कलाकारों विशेष रूप
                           से पं भीमसेन जोशी जी के साथ कुमार जी की बहुत घनिष्ठता थी ।  इस संबंध में वसन्त पोतदार अपनी पुस्तक में लिखतें है – “ दोनों की मातृभाषा कानड़ी उम्र में सिर्फ़ दो साल का फ़ासला । दोनों के संबंध स्नेहपूर्ण । दोनों एक ही सम्मेलन में गानेवाले हों तो “ हम एक दूसरे के तानपुरे मिला देते थे । इति भीमसेन ------हमारा नित्य का मेलजोल तो नहीं था पर मिलने का एक भी मौका हम नहीं गँवाते थे । एक बार जालंधर से मोटर द्वारा पूना लौटते वक्त मैं देवास गया । साथ था ग़ुलाम रसूल ( तबलची ) शाम होने को थी । उसे बहुत आनंद हुआ । फ़ौरन उसने मुझे गाने के लिए बैठाया । मैनें घन्टाभर मारवा गाया । हम दोनों ही थें । ऐसा मारवा गाया कि वह बहुत खुश हुआ । उसने टेप भी किया है, आप सुनिए कभी । फिर हमने एक साथ गाया । बहुत प्रेम था मुझ पर मेरे खिलाफ़ किसी को बोलने नहीं देता था”।
पंडित राँतंजनकर एवं पंडित जगन्नाथ बुआ पुरोहित जैसे सिद्धहस्त वाग्गेयकार अपनी बंदिशें कुमार जी के पास भेजते थे तथा कुमार जी बहुत सम्मानपूर्वक उन रचनाओं को अपने कार्यक्रमों में प्रस्तुत किया करते थे । आपके देवास स्थित घर पर समय-समय पर विभिन्न कलाकारों का आना-जाना लगा रहता था  .

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि पंडित कुमार गंधर्व के भीतर पं शाङ्ग॔देव द्वारा वर्णित उत्तम वाग्गेयकार के अधिकाधिक गुणों का समन्वय था । वे एक महान कलाकार होने के साथ-साथ एक उच्चकोटि के वाग्गेयकार भी थे । कुमार जी की अनेकों ऐसी बंदिशें है जिन्हें युवा पीढ़ी के गायक आज भी अपने गायन में सम्मिलित करते है । पं कुमार गंधर्व की बंदिशों की विविधता पर प्रकाश डालते हुए  उनकी पुस्तक अनूपरागविलास की भूमिका में श्री वामन हरि देशपांडे लिखते है – “अलग-अलग घराने के गायकों को इस संग्रह में ऐसी बंदिशें मिलेंगी कि उन्हें लगेगा कि गोया ये बंदिशें ख़ास हमारे लिए ही बनाई गई है। मिसाल के लिए राग कामोद में “ऐसन कैसन” बंदिश ग्वालियर घराने वालों को अपने घराने की प्रतीत होगी तो किराना गायकों को लगेगा कि बसन्त में निबद्ध “सपने में मिलती” उन्हीं के लिए है ।
इसी प्रकार जयपुर गायकों को जँचेगा कि गौरी बसन्त की बंदिश “आज पेरीले” ख़ास तौर पर उनके लिए ही है । मतलब यह कि इस संग्रह में, विभिन्न घराने के गायक विशेषकर हमारे लिए ही की गई अनेक बंदिशें पायेंगे”।

 
सन्दर्भ ग्रन्थ :
1-     क्रमिक पुस्तक मालिका भाग (4)  1999, प्रकाशक संगीत कार्यालय हाथरस उत्तर प्रदेश
2-     कुमार गन्धर्व 1993 अनूप राग विलास भाग प्रथम तथा द्वितीय , मौज  प्रिंटिंग ब्यूरो मुंबई
3-     कोल्हापुरे पंढरीनाथ 2004, गानयोगी कुमार गन्धर्व , राजहंस प्रकाशन पुणे
4-     देशपांडे वामान हरि , रसास्वाद , 1975, मध्यप्रदेश हिंदी ग्रन्थ अकादमी
5-     पोतदार वसंत 2004 कुमार गन्धर्व , मेधा बुक्स नई दिल्ली
6-     वाजपेयी अशोक 1995, कुमार गन्धर्व , राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली
  



-रवि जोशी
संगीत विभाग, डी एस बी परिसर
कुमाऊं विश्वविद्यालय
नैनीताल











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