Friday, September 1, 2017

ब्रज श्रीवास्तव की कविताएं





प्रार्थना

बच्चे स्कूल में इस समय
कतार में खड़े हो गए हैं
गा रहे हैं प्रार्थना


जो बच्चे इस वक्त स्कूल में नहीं हैं
जरूर
किसी होटल पर धो रहे होंगे प्लेट
या मालिक की दुत्कार सुन रहे होंगे


मुमकिन है कि पास के स्कूल में चल रही
प्रार्थना की आवाज भी सुन रहे हों वे
उनको हो गयी होगी आदत
घंटी और प्रार्थना की आवाज सुनते हुए ही
चाय का गिलास देना
होटल के ग्राहकों को.


ग्राहक भी बस उपभोक्ता की तरह ही है.
जैसे कि बच्चों के माता पिता
केवल जनक हैं उनके
बाजा़र और पूंजी के शिकार हैं ये दोनों


प्रार्थनाएं लगातार गाई जा रही हैं कई जगहों पर
लगातार मंत्र गूंज रहे हैं
सबके भले के लिए प्रार्थना कर रहे हैं
कुछ भले ही लोग

बुरे लोग पहले तो
शब्दों के ही प्राण हर लेते हैं
और अपने भलेपन के नकली पौधे पर
सींचते  रहते हैं पानी


बुरे लोगों ने प्रार्थना नहीं सुनी
शब्दों में छिपे महान अर्थों को
धता बता दिया है उन्होंने
बच्चों की मासूमियत को उनकी क्रूरता ने
दबोच लिया है


स्वर और शब्द कलपते रह जाते हैं.
वातावरण में उदास संगीत बजता रह जाता है

बचपन की ही तरह
प्रार्थना की भी हत्या हो जाती है.


यह जो प्रार्थना आप सुन रहे हैं
इसमें जान नहीं बची है.
अलबत्ता बच्चों में जीवन ही नहीं
उम्मीद और उत्साह भी बचा है.

*** 
 
पत्थर मारो

उसकी मदद करते हुए मैं
ख़ुश रहा
तुम नाखुश हो जाओ


उससे गुफ्तगू की मैंने
मुझे बुरा कहो
मुझे कोस लो


उसके हक़ में आवाज उठायी
तुम शत्रु हो जाओ मेरे


उसके बारे में सोचता ही रहा
तुम मुझसे घृणा करो.


मैं उसके साथ चला
मुझे पत्थर मारो


उससे दूर हुआ आख़िर मैं
अब जश्न करो.

*** 
 
बगीचे में वृद्ध

शाम हो गई है और
वृद्ध जन
लिफ्ट से उतरकर
मल्टीफ्लेटस
के अहाते में बने बगीचे में.
बैठ गए हैं.


वे अलग अलग प्रांतों से हैं
अपनी अपनी बोलियों में बोलते हुए
बहुत मज़ेदार लग रहे हैं.


देखते हैं चारों ओर, तने ऊँचे भवन
वाहनों की चिल्लपों के बीच
अपने - अपने कस्बों की
याद कर रहे हैं


जबकि जिंदगी भर के तजु़र्बे
मुंह पर ही रखे हैं उनके
पर फ्लेट की कैद में
उनसे बतियाने को कोई नहीं है


बेटा और बहू तो
बुरी तरह व्यस्त हैं नौकरी में
इन फ्लेटों में रिश्ते नहीं
मशीनें रहती हैं


बस ये वृद्ध ही हैं यहाँ
जिन्होंने संबंधों का जीवन जिया है 
अपने ज़माने में

आहें भरते हैं ये अक्सर
अपने संवादों में
और अपने कस्बों में लौटने के सपने देखते हैं.

***

हताशा

आज फिर आना पड़ा हताशा
तुम्हैं
मुझे बहलाने के लिए


मेरे भरोसों के पांव में
चुभ गये हैं काँटे
धोखे, विहँस रहे हैं
साजिश की कामयाबी का जशन मनाते हुए वे लोग
आज ज्यादा ही पी रहे हैं.


आज फिर मेरे दावे
बिखर गए हैं जो
मैंने किये थे हमेशा ही कविता में
उनको लेकर.


कितनी चीजों से मिलकर बनी आशा
जब ओझल हो गई है
हताशा ही है
जो मेरा साथ दे रही है.

*** 

कर्फ्यू के बाद

सड़कें खुशी से झूम रही हैं
दरवाजे और खिड़कियों ने कहा सबसे स्वागत है
कर्फ्यू के बाद शहर में.


कैद से हुए पांव और वाहन
चलने लगे हैं
खुली हवा को तसल्ली हुई कि
उसका उपयोग होने लग गया
जले हुए मकानों ने कहा
अब अपने रिश्तों को न जलाना
हथियारों ने कहा
हम तो अब खुदकुशी करें तो बेहतर

परसों ही सब कुछ ऐसा था
जैसा आज है खुलापन
 

मगर अब सबके मन में कुछ बातें हैं
कुछ सवाल हैं
कुछ पछतावे और धिक्कार है कि
इक ज़रा सी बात को हम जैसे किसी ने
बर्दाश्त नहीं किया
और मजबूर किया सारी बस्ती को
कि वो बर्दाश्त करे  कर्फ्यू की कैद.

***
मोबाइल नंबर 9425034312


4 comments:

  1. बहुत सुन्दर

    ReplyDelete
  2. धन्यवाद अनुनाद

    ReplyDelete
  3. सभी कविताएं अपनी बात बड़ी सहजता से कह देती है।

    ReplyDelete

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