Wednesday, August 2, 2017

प्रदीप अवस्थी की कविताएं



अनुनाद जिन युवाओं में गहरी उम्मीद देखता है, प्रदीप अवस्थी उनमें से एक हैं। यह देख पाना भी सुखद है कि वे किसी भी अतिरेक और क्लीशे (Cliche) से अलग कविताएं सिरज रहे हैं। उनमें वह अनिवार्य धैर्य है, जिसके बल पर लम्बी यात्राओं पर निकला जा सकता है। यहां छप रही कविताएं इंद्रपस्थ भारती में पहले छप चुकी हैं। 

अनुनाद पर इससे पहले पाठकों ने उन्हें पढ़ा है, वे लिंक भी हम साझा कर रहे हैं - 
1. http://www.anunad.com/2015/06/blog-post_22.html
2. http://www.anunad.com/2016/04/blog-post_19.html
 
हमारे रहस्य सिर्फ़ हमारे होते हैं

पतंग लूटने जैसा आसान होना था जीवन
गिरकर लुढ़क जाने और घुटने छिल जाने जैसा होना था संघर्ष
घुटने से फटी पेंट को रफ़ू कराने जैसे समाधान

पर यह क्या होता गया

फ़रेब कहें या कमजोरियाँ
उनकी भेंट चढ़ते गए हम
खिड़की से बाहर गर्दन निकालो तो कसाई खड़ा था एक गंड़ासा लिए
खुशियों का हर त्यौहार हमारी बलि चढ़ाता था

अखबार पढ़ना छोड़ दिया मैंने
रोज़ सुबह दरवाज़े पर खून किसे पसंद है
फिर चाय के साथ उसे पीना भी

तुम कुछ भी कर सकते थे
मुझे ख़ुद पर हंसने से नहीं रोक सकते लेकिन.

हमारे रहस्य सिर्फ़ हमारे होते हैं

हम अपने रहस्यों के साथ अकेले छूट जाते हैं
बहुत अँधेरे में खोलते हैं उनका मूँह
डर कर वापस लौट आते हैं
हमारे रहस्य सिर्फ़ हमारे नहीं होते.
***

और कोई रास्ता सुझाओ

अचानक ख़याल आया मैं बाहर था जब कहीं
वे मुझे समझा रहे थे कि यह मौका है, पैसे अच्छे मिलेंगे
कुछ नहीं सूझा, मैं दौड़ता हुआ घर आया और
अल्मारी से निकालकर तोड़ दिया तीन साल से संभालकर रखा फ़ोटो-फ्रेम
कोई दुःख नहीं हुआ, ना कोई शान्ति मिली

बात प्रेम, प्रतिशोध या नफ़रत की नहीं थी
बस उस चीज़ के वहाँ रहने का महत्व ख़त्म हो गया था

ये उदासी इतनी लम्बी चली
कि कई घरों में बच्चे पैदा होकर हँसना और बोलना सीख गये
और हम कोशिश में रहे कि खिलखिलाएँगे देखना

मुस्कुराना सिर्फ़ फेसबुक और व्हाट्सएप की स्माइली तक सीमित रह गया था.

कितना कुछ छिपाकर जीना था उनसे जिन्हें सब कुछ बताना था
रोज़ उन तक जाना और चुपचाप लौट आना था
दीपिका पादुकोने की माँ अच्छी है, पर वे कितनों को बचा पाये
कोई आता था, रसोई से रोटियाँ चुरा ले जाता था माँ बनाती थी जब

मैंने खिड़की से छुपकर जोड़े हाथ कि माँ चुप कर
मैंने सड़कों पर गिराये आँसू कि लौट आ
मैंने ख़ुद से कहा कितनी बार कि मेरे बस का नहीं

अब एक थका हुआ दिमाग़ है
इसलिए मैं बात करते करते कहीं भटक गया हूँ, क्षमा करें

दुःख बाँटना मुझे असहाय बनाता है
और कोई रास्ता सुझाओ.
***

टालने से ठीक नहीं होती बीमारियाँ

बीमारी से कैसे मरते हैं लोग
यह जाना बीते कुछ वर्षों में  
टालता रहा जब अपना इलाज
छुपाता रहा घर से कि नहीं ! नहीं ! सब ठीक है
दोस्तों को देता रहा दिलासा कि हाँ जाऊँगा अब अस्पताल ही डॉक्टर को दिखाने

टालने से ठीक नहीं होती बीमारियाँ
बड़ी होकर सामने आती हैं
यूँ ही मरते हैं दुनिया भर में लोग


कम बोलने वाला कम देखने वाला नहीं होता
ज़्यादा देखने वाला ज़रूर हो सकता है

बहुत निर्धन है इंसानी भावों और तकलीफों को समझने के मामले में
हमारे लोग

आलसी मत कह दो किसी को यूँ ही
यदि वो नहीं जुटा पा रहा शक्ति बिस्तर से उठ भर पाने की
उसके शरीर में यक़ीनन कहीं कोई विकलांगता नहीं, आप दिमाग़ का नहीं सोचते लेकिन

उदास को अकेले छोड़ना ही पड़ेगा
पर उसे कोई दो ऐसा जो मिलता रहे कभी-कभी
चिड़चिड़े को मत कह दो चिड़चिड़ा
किसी के सामने मत करो उसकी कमज़ोरियों का ज़िक्र
हर दुःख को निकलते रहने दो आँखों से

जो रोना चाहे वो रो पाये चोट लगने पर
यह नेमत ना छीनी जाये किसी से

तीन वक़्त का खाना और शांत सुंदर नींद रोज़
इससे बड़ी कोई ज़रूरत नहीं इंसान के ठीक-ठाक जीने के लिये
खाने में रोटी और तरह-तरह की सब्जियाँ और दाल ज़रूर हो.
यह बात अनुभव से कहता हूँ.

दुःख में भले कोई साथ ना हो
सुख में हो.
***

एक दुश्मन है मेरा जो मुझमें बैठा है

घर से निकलना चाहिए दिन में एक बार तो कम से कम कहते सब
जाना कहाँ चाहिए कोई नहीं बताता
किसके साथ !

फटी जेब को सिलने का कोई नुस्खा काम नहीं आता

अकेले कमरे में इंतज़ार करता है वह जो है लेकिन उसकी उपस्थिति के बारे में बात नहीं की जा सकती. बताने चलो किसी को तो समझाना पड़ता. समझाने चलो तो क्या ? सब तो सही है

एक दुश्मन है मेरा जो मुझमें बैठा है

मैं जो कह रहा हूँ आपको वही समझना चाहिए जबकि यह शुरुआत है मेरे झूठ बोलने की

अब तक मैंने किसी स्त्री के बारे में बात नहीं की क्योंकि उजाले से जोड़ा जाना चाहिए उन्हें

कुछ रहस्य हमें बचा कर रखने चाहिए
वे हमें दो हिस्सों में चीरें रोज़ थोड़ा-थोड़ा भले ही

हम बिना तकलीफ़ के रोयें
जैसे बिना किसी बात के ख़ुश रहते हैं लोग

समय बीत जाने के बाद खोलेगा अपने राज़ स्वयं.
***

अपने लिये सबसे नकारा

इस बात का अर्थ छिटक कर कहीं गिर गया
मुझ तक बस शब्द पहुँचे

उसने मुझसे पूछा था मेरी याद आयेगी ?

शब्द टकरा कर लौट जाया करते थे
और मैं आईने पर सिर मारकर देखा करता था
कहीं कोई दीवार उग आयी है क्या सिर के इर्द-गिर्द

मुझे बस इतना याद है कि किसने कब कब मेरा कितना अपमान किया

जब तुम्हारे लिये मैं दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति था
अपने लिये सबसे नकारा ,
यही एक बात गोल-गोल घूमती रही मेरे दिमाग़ में जैसे घूम रहा है पंखा  

तुम मेरे लिये रोटियाँ ख़रीदती घर वालों से छुपाकर और एक मिठाई
मैं तुम्हें पैसों में तोलकर बताता अपनी औकात

उन्होंने मुझे घर बुलाकर गालियाँ दीं
मुझे गुस्से के बजाय तरस आया उनकी बेचारगी पर
पहले से ज़्यादा नफ़रत और चुप्पी लेकर लौटा मैं

क्या हमें पानी की याद आती है जबकि हम उसके बिना जी नहीं सकते

मुझे बस अपने प्यार के लायक होना था
यही एक काम बड़ा भारी पड़ा
फिर डॉक्टर ने सिखाया.
***

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