Thursday, June 2, 2016

स्वरांगी साने की कुछ कविताएँ



कविता के इलाक़े में नई आवाज़ों के सिलसिले हैं। उसी सिलसिले से स्वरांगी साने की ये कविताएं। इन कविताओं को छापते हुए अनुनाद ने कवि से परिचय भेजने को कहा था और जो परिचय हमें प्राप्त हुआ है, उसके अनुसार स्वरांगी बहुत पहले से लिख-छप रही हैं, लेकिन मैंने अब तक कुछ ब्लॉग्स पर ही उन्हें पढ़ा है, यह मेरी पढ़त की सीमा है। स्वरांगी साने का अनुनाद पर स्वागत है।

तस्वीर कवि की फेसबुक वाॅल से

समुद्र
 (1)
समुद्र में एक बारगी 
वो उतरी 
तो उबर ही नहीं पाई समुद्र से।                                                        
(2)
किसी मछली को देखा है 
तट पर तड़पते हुए ?
मैं वो मछली हूँ
जिससे लहरें किनारा कर गई हैं।
(3)
समुद्र में इतना खारापन कहाँ से आया?
मैंने एक बार
एक मीठी नदी को
समुद्र में रोते देखा था।

(4)
समुद्र में दिखता है केवल पानी
समुद्र अपनी उकताहट 
फैलाता जाता है दूर तक।

(5) 
बहुत गहरा होता है न समुद्र
उसकी थाह पा ही नहीं सकते
चाह कर भी।

(6)
हर लहर में समाया है समुद्र
पर इसलिए
हर लहर समुद्र नहीं कहलाती।
मैं भी हूँ बस एक लहर
तुमसे मिलने वाली 
अनगिनत लहरों जैसी
पर
उनमें मैं कहाँ हूँ समुद्र !
(7)
आह समुद्र!
मैंने तुम्हें साफ़ नीला देखा है
हरा भी
और गहरा काला भी।
मैंने तुमसे सूरज को निकलते 
और तुममें चाँद को तैरते देखा है।
सीपियों को खोजा है
मैंने तुममें 
और पैरों के नीचे से 
खिसकते जाना है।
पर मैंने अब तक
कहाँ देखा तुम्हें
 पूरा का पूरा समुद्र।

(8) 
जिस दिन मैंने माँगे मोती
तुमने कह दिया
उसके लिए मुझे
समुद्र होना होगा।
मैं पिघलती चली गई
फिर भी मैं रही पानी ही
नहीं बन पाई 
तुम-सा समुद्र।

(9) 
इतने ज्वार
इतने भाटे
चाँद के बढ़ने-घटने से।
समुद्र और चाँद के खेल को
बोझिल हो डोलती है चट्टान
जिस पर हर बार कुछ नए निशान बन जाते हैं।
(10)
एक शंख को 
कान में लगाकर 
सुनी थी मैंने समुद्र की आवाज़।
पर मैं 
यह नहीं कह सकती साफ़-साफ़
कि वो समुद्र की ही आवाज़ थी।
कुछ ऐसा ही अस्पष्ट कह रहे थे तुम।
(11)
कितना भी पकड़ो रेत को
छूट ही जाती है।
महीन कण रह जाते हैं हाथ से चिपके
अब इन्हें क्या कहें
रेतया चमकीली रेत।

(12)
रेत के किले बनाना
या रेत पर नाम लिखना
समुद्र के लिए दोनों बातें समान हैं।
वो सब बहा ले जाता है 
अपने साथ।
दूर चला जाता है 
ऐसे ही एक दिन
उम्मीद का जहाज़।
****



सा
     
सलाम साब सलाम !
उठते हुए सलाम !!
बैठते हुए सलाम !!!
सलाम आपको
सौ-सौ बार सलाम !!!!

आप एक काम करें तो वो हो
मनों टन का बोझ
हम मनों टन बोझ भी ढोएँ तो
मान लें उसे पंखुरी जितना वज़न

आपकी थकान जायज़
हमारा पसीना भी नाजायज़
बैठ-बैठकर
ऊँघ-ऊँघकर                       
आप कुछ न करते भी थक जाते हैं
मुआ कोई पानी का गिलास तो देना
इतना चिल्लाने में थक जाते हैं
आपके हिसाब से
हम इतना-सा काम करेंगे
तो घिस नहीं जाएँगे

हम क्यों घिसेंगे
हम मोटी खाल
आप सुकुमार
आप की आँखों में हमारे लिए
घृणा-तिरस्कार
जिससे आप का आँख तक खोल पाना दुश्वार
ओहकितनी थकान !

हमें दिल पर पत्थर रखकर सो जाना
और
रात भर की नींद मिली
आपके इस उपकार तले
भोर-तड़के उठ जाना
आपके लिए चाय की गरम प्याली ले खड़े हो जाना

आपका खाना मतलब पूरी थाली
हमारे लिए खुरचन बची हो तो वह भी भली
आप सोएँगे दोपहर भी चादर तान
आपके लिए हमें रहना चाय लेकर तैनात
उसके लिए उठना भी आपके लिए जी का जंजाल

चाय के साथ आपको ज़रूरी बिस्कुट चार
हमारे लिए चाय की चुस्की लेना भी महापाप
आप पवित्र आत्मा
आपका जन्म हमारा करने को उद्धार
हमारा जन्म
पाप गलने तक का इंतज़ार।

आपका हमारे लिए इतना कष्ट उठाना
हमें दुत्कारना
गालियाँ देना सब स्वीकार

आप महान्
आपको सलाम !
सौ-सौ बार सलाम !!
सलाम साब सलाम !!!
---

जन्मदिन

उसके जन्म की कोई तारीख़ नहीं

एक पल है जन्म लेने का
दूसरा पल मृत्यु का।

उसके बाद तो सारी कहानी देह की है

देह की इच्छाएँ हैं
पीड़ाएँ हैं
देह के सपने हैं
उसी के रतजगे हैं
देह के भोग हैं
उसी के कर्म हैं
पाप-पाप जैसा जो कुछ है
वह सब उसका है
देह की यातना है
विलाप है

मन तो केवल
उसके सुख-दु:ख का गवाह है

देह को मारा जाना था
देह को ही मरना था
पर मन मरा था
जिस पल जन्मा था
उसके अगले पल ही मरा था
और मन मरता ही जा रहा था
-----

पटाक्षेप

पहाड़ी का अंतिम छोर
वह खड़ी है
उसके बाद गहरी खाई है
पाताल तक जाती हुई।

तुम उसके आगे आकर खड़े नहीं हो सकते
नहीं, इतनी जगह ही नहीं है
वहाँ उस किनारे पर

पर तुम होते तो
तुम्हारी छाती पर सिर रख रो देती
शांत हो लेती
फिर खुद कूद पड़ती खाई में
तुम पर कोई आरोप नहीं मढ़ती

तुम नहीं खड़े हो सकते थे उसके आगे
पर पीछे ही खींच लेते
तुम जो कहते हो साँस रोकना मतलब मर जाना है
तुम कभी किसी को नहीं रोकते

फिर भी तुम
अपनी साँस रोके खड़े रहे
जहाँ थे वहीं बने रहे

वह मुहाने पर खड़ी है
खाई में कूदना है
और
अब और कोई विकल्प नहीं है।

स्वरांगी साने
पूर्व वरिष्ठ उप संपादक, लोकमत समाचार,पुणे
  • जन्म ग्वालियर मेंशिक्षा इंदौर में और कार्यक्षेत्र पुणे
शिक्षाः
  • एम. ए. (कथक) (स्वर्णपदक विजेता) देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से
  • बी.ए. (अंग्रेज़ी साहित्य) प्रथम श्रेणी 
  • विशेष योग्यता (Distinction) के साथ कथक विशारद (Distinction), अखिल भारतीय गंधर्व महाविद्यालय मंडल, मिरज (मुंबई)
  • डिप्लोमा इन बिज़नेस इंग्लिशदेवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर
  • सदस्य, इंटरनैशनल डांस काउंसिल- CID / यूनेस्को
  • इंटरनैशनल डांस डायरेक्टरी में नाम सम्मिलित
पत्रकारिता के क्षेत्र में उपलब्धियाँ
  • राज्य स्तर का सर्वोत्तम गोपीकृष्ण गुप्ता रिपोर्टिंग पुरस्कार, 2004
  • उस्ताद अलाउद्दीन खान संगीत अकादेमी द्वारा खजुराहो नृत्य समारोह, 2004 में रिपोर्टिंग के लिए आमंत्रित
  • मध्य प्रदेश कला परिषद द्वारा आयोजित मांडु उत्सव -2003 का दैनिक भास्कर के लिए कवरेज
नृत्य, नाटक, रेडियो और टीवी
  • सन् 1992 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा आयोजित नाट्य शिविर में निर्धारित आयुसीमा से कम होने के बावज़ूद चयन.
  • 1995-96 के दौरान अंतर विश्वविद्यालयीन वाद विवाद प्रतियोगिता मॆ भाग लिया.
  • इंदौर कलैक्टरेट द्वारा आयोजित साक्षरता अभियान, सन् 1991 में जत्था कलाकार के रूप में भाग लिया.
  • इंदौर आकाशवाणी द्वारा प्रसारित “उस लड़की का नाम क्या है” रूपक के लिए सन् 1989 भारतीय परिवार कल्याण विभाग द्वारा प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया. उसमें लड़की की भूमिका का निर्वाह.
  • पुणे आकाशवाणी के लिए महाराष्ट्र की आषाढ़ी वारी पर कवि दिलीप चित्रे के वृत्त चित्र का सन् 2007 में अंग्रेजी से हिंदी रूपांतरण किया जिसे आकाशवाणी का अखिल भारतीय स्तर का प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ.
  • इंदौर दूरदर्शन पर समाचार वाचक (News reader) के रूप में भी कार्य किया.
कार्यक्षेत्र : नृत्य, कवितापत्रकारिता, संचालन, अभिनयसाहित्य-संस्कृति-कला समीक्षाआकाशवाणी पर वार्ता और काव्यपाठ
प्रकाशित कृति : 
  • काव्य संग्रह “शहर की छोटी-सी छत पर” 2002 में मध्य प्रदेश साहित्य परिषद, भोपाल द्वारा स्वीकृत अनुदान से प्रकाशित और म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के कार्यक्रम में म.प्र. के महामहिम राज्यपाल द्वारा सम्मानित.
  • पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशितः कादंबिनीइंडिया टु़डे (स्त्री), नवनीत, साक्षात्कारभोरकल के लिएआकंठजनसत्ता (सबरंग)शेषवर्तमान साहित्य,समावर्तन के रेखांकित स्तंभ में, कलासमय, मंतव्य-3, वेबदुनिया, अहा ज़िंदगी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ-लेख प्रकाशित
  • मराठी दिवाली अंक 2015- ‘उद्याचा मराठवाड़ा’ में हिंदी कविता का मराठी अनुवाद प्रकाशित
  • साथ ही वैबदुनिया ने यू ट्यूब पर मेरी कविताओं को सर्वप्रथम श्रव्य-दृश्यात्मक माध्यम से प्रस्तुत किया.  
  • asuvidha.blogspot.com/,jankipul.blogspot.com/,kritya.blogspot.com/, swaymsidha.blogspot.com/, shabdankan.blogspot.com आदि में कविताएँ पोस्ट
कार्यानुभव :                                           
इंदौर से प्रकाशित साप्ताहिक पत्र प्रभातकिरण’ में स्तंभलेखन, औरंगाबाद से प्रकाशित पत्र लोकमत समाचार’ में रिपोर्टर, इंदौर से प्रकाशित दैनिक भास्कर में कला समीक्षकनगर रिपोर्टर, पुणे से प्रकाशित आज का आनंद में सहायक संपादक और पुणे के लोकमत समाचार में वरिष्ठ उप संपादक के रूप में कार्य किया.
अंतिम कार्यकाल :  
लोकमत समाचार,पुणे में वरिष्ठ उप संपादक के रूप में 3 जून 2012 - 31 मई 2015 तक.
संप्रति :  
  • CDAC, पुणे के लिए अब तक ग्यारह फिल्मों यथा- तीन मराठी फिल्में – देवुल, एक कप चहा, पाली ते संबुरान, चार कन्नड़ फिल्में कुर्मावतार, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित डॉ. के. शिवराम कारंथ के उपन्यास पर आधारित बेट्टदा जीवा- पहाड़ी इंसान, मौनी एवं स्टंबल,तीन बांग्ला फिल्म निशब्द, जानला एवं सांझबातिर रूपकथा और एक असमी फिल्म – कोयाद के अंग्रेजी सबटाइटल का हिंदी अनुवाद . साथ ही तीन फिल्मों के सब टाइटल्स का वेलिडेशन-नाबार (पंजाबी),शिवेरी (मराठी) और माहुलबनी सेरंग (बांग्ला).
  • CDAC, पुणे के लिए- डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर स्मारक संग्रहालय में रखे जाने वाले छायाचित्रों के अंग्रेजी कैप्शन का हिंदी अनुवाद का कार्य।
  • भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान( इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी- आईआईटीएम) और जलवायु परिवर्तन अनुसंधान केंद्र (सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज रिसर्च सेंटर-सीसीसीआर), पुणे के वैज्ञानिक डॉ. मिलिंद मुजुमदार के लिए वैज्ञानिक पर्चों का अनुवाद।
  • मूषक एप्प के लिए सेवाएँ प्रदत्त.
मोबाइलः +91 9850804068 / ई-मेल : swaraangisane@gmail.com
-2/504, अटरिया होम्स, आर. के. पुरम् के निकट, रोड नं. 13, टिंगरे नगर, मुंजबा वस्ती के पासधानोरी, पुणे-411015
                                                                                         



               



3 comments:

  1. बहुत सुन्दर कविताएँ

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 5 जून 2016 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

    ReplyDelete
  3. जो मैंने लक्ष्य किया है, कथित मुख्यधारा की कविताएँ शिल्प के स्तर पर तब ही अच्छी कही जाती हैं जब उनमें अमूर्तता का घटाटोप हो एवं रचना में अन्तर्हित शब्दों के पाठक मनचाहे अर्थ गह सकते हों! ऐसी शिल्प प्रविधि में अटने वाली रचना का कोई निश्चित अथवा एकरेखकीय अर्थान्वय अथवा भाव नहीं लिया जा सकता।

    कवि (कवयित्री) की पहली कविता 'समुद्र' एवं चौथी व अंतिम कविता 'घटाटोप' को मैं ऐसे ही देखता हूँ! खासकर 'समुद्र' की खंडवार निबद्ध अमूर्त भाव छवियाँ इस बिना पर देखते ही बनती हैं।

    मैं 'आसमां में तबीयत से पत्थर' उछालने और 'सारे जहाँ से अच्छा' को भी किसी दूसरे स्तर पर अमूर्तन की रचना ही मानता हूँ जहाँ क्रमशः अनर्गल विश्वास एवं थोथे देशप्रेम का प्रलापी रचनात्मक सी अभिव्यक्तियाँ हैं!

    मेरे ख्याल से कविता की संरचना अथवा देह ऐसी हो जिसके रग रेशों की पहचान सभी भावक-पाठक एक ही दिशा में कर सके। इस बात को यदि हम रोग एवं चिकित्सक से तुलित करें तो कहूँगा कि ऐसा न हो कि एक ही तरह की जांचों के आधार पर हम किसी एक देह को डायग्नॉज करते हुए अलग अलग व्याधियाँ पाएँ! फिर तय है, गैरजरूरी चिकित्सा ही कुछ अंगों की हम कर जाएँगे, संभव है मर्ज़ पकड़ाए ही नहीं और हम चिकित्सा करते जाएँ!बड़े बड़े डाक्टरों के हाथ भी इन खतरों को सेंते मिलते हैं। हमारे एक बड़ा डाक्टर मुक्तिबोध भी हुए हैं!

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