Sunday, May 22, 2016

अशोक कुमार पाण्डेय की नई कविता



कवि मित्र अशोक को पिछले दिनों पंकज सिंह स्मृति सम्मान प्रदान किए जाने की घोषणा हुई है और कल मुझे ईमेल में ये नई कविता मिली। कवि को और मित्र को बधाई के साथ इन कविताओं के लिए शुक्रिया भी कहता हूं।


जात्रा
(एक)
उलटे साँप सी सड़क पर चींटियों सी रेंगती भीड़ में चलता कहाँ चला आया हूँ

          रुकिए – एक पेड़ कहता है जिसकी पत्तियाँ लुट चुकी हैं
                   पीले फूल जिनमें न ख़ुशबू न छाँव कोई
                   देवताओं से बहिष्कृत, मनुष्यों के सर पर गिर रहे हैं
                   कितना कम हो गया पानी धरती पर.

रुकना चलने का व्यवधान है या व्यतिक्रम लौटना तो चलने का ही विस्तार है एक उदास

          सूरज एकांत की आग में जलता चला जाता है
          एक कवि एकांत ढूंढता खिड़कियाँ बंद करता है सारी
          और फिर मोबाईल की स्क्रीन में खोजता है कविता
          कोई अपनी ही तस्वीर खींच देखता है मुग्ध
          पेड़ अपना आख़िरी फूल गिरा चिड़ियों को सुनाता है किस्से
          मैंने वह फूल तुम्हारे लिए रखा तो था जाने कहाँ गया...

जिस दरवाज़े पर लिखा है मनुष्य डरें कुत्तों से वहाँ एक बच्चा खड़ा है भीतर चली गई गेंद के बारे में सोचते

          सुनिए – रुकता नहीं कहता चला जाता है कोई
                   चलता हूँ और आवाज़ चलती है आगे आगे
                   तुमने कहा था करना प्रतीक्षा रुकना था मुझे
                   पर यह आवाज़...चलता चला जाता हूँ और तेज़
                   मोज़े पसीने से भीगे हैं कमीज़ चिपकती जाती है देह से
                   गले में कांटे उग रहे हैं कान सुन्न होते जाते आवाज़ों से
                   एकांत की आग है यह!

देह जलती है आत्मा को देखा ही किसने है आवाज़ है एक जो जलती नहीं चलती जाती है लगातार

                   यहाँ कुछ नहीं हाशिये पर जो शून्य दिखता है वह भी नहीं
                   गुज़रा हुआ जीवन है एक बेमानी भविष्य की कहाँ होती है कोई शक्ल
                   और जो है अधर में लटका उसके गिरने की प्रतीक्षा में चाँद-सूरज सब
                   रुकता हूँ वहाँ जहाँ आधे कपड़ों वाला एक बूढ़ा मरने के बाद सफ़ेद संगमरमर बन गया
                   उफ़ दाहिने हाशिये की ओर बढ़ता जाता हूँ
                   उस ओर जिधर एक दलदल है
                   गहरा दलदल
                   शान्ति
                   .

शान्तियाँ श्मशानों के कितने क़रीब होती हैं मंदिर टूटे मस्ज़िद टूटी अब श्मशानों की बारी है?
                  
                  

(दो)

पानी बहुत कम बचा है धरती पर आसमान थक गया रो रो के समन्दर पी गईं मछलियाँ

          चिड़ियों की सामूहिक आत्महत्या पर बहाने के लिए दो बूँद आँसू भी नहीं बचा
          सड़क सूखी पतझड़ में गिरी पत्तियों से लिपट रोती लगातार अश्रुहीन
          आहिस्ता रखता हूँ पाँव संभल संभल कर
          कांटे चूमते हैं पत्तियाँ धन्यवाद की मुद्रा में देखती हैं लाचार
          क़दमों के निशान दरअसल खून के निशान हैं जो बचा नहीं अब आसुओं की तरह
          आगे का रास्ता तुम्हें ख़ुद ही तय करना है...

रास्ते पहाड़ से फिसल गए पत्थर हैं मंज़िलें स्वर्ग से बहिष्कृत आदम सपने हव्वा हैं निरुपाय

          इकलौती खुली खिड़की से बढ़ता है एक हाथ जिसमें ख़ाली बर्तन है
          उसमें भरती है धूप और धूल मैं उँगलियों से एक चित्र बना देता हूँ उस पर
          बंद होती है खिड़की तो उसमें से एक सूराख झांकता है
          मुझे भीतर जाना था शायद मैं दूर निकल आया हूँ लेकिन
          यहाँ दीवार पर लिखे हैं सारे पवित्र शब्द
          जहाँ एक बच्चा खड़िया से विकेट बना रहा है
          और एक औरत गोबर लिए बैठी है कि ख़त्म हो खेल तो थापे चिपरी
          उसने आग के बारे में पूछा है मुझसे
          पानी ख़त्म हुआ है और तुम्हें आग की चिंता है?
          सब्र करो बाबू कहा उसने तो सुना कब्र में रहो बाबू
         
क़ब्रों को आग की नहीं पानी की ज़रुरत है और मुझे आग की ज़रुरत पानी तक पहुँचने के लिए


(तीन)

उदास क्यों हो देखो सब तो हँस रहे हैं मत चलो इतना थक जाओगे कुछ पी ही लो कम से कम

          उसी वक़्त समाचार देखते कह रहा था कोई
          है तो इतना पानी वाटर पार्क में आएगी होली तो देखना रंग भी होंगे
          उसी वक़्त पढ़ रहा था अखबार कोई ट्रेन का सफ़र कर रहा है पानी
          चलती कार से उछाली किसी ने बोतल तो तेज़ संगीत गूँजा उसी वक़्त
          तीन बच्चे लपक पड़े हैं बोतल पर जिसमें पानी नहीं है
          प्लास्टिक के खोखे पर जिसमें ज़रा सा नमक है
          पानी बिना मर गया जो उसकी लाश भीग रही थी बर्फ में उसी वक़्त
          साँप सीधा हो रहा है धीरे धीरे
सूरज थक गया चीखते चीखते कौन आता उसके पास?
आसमान में उदासी की कालिख छाई तो लोग निकल पड़े हैं बाहर


पहाड़ पर बर्फ़ बेचकर लौटते लोगों की बोतलों में पानी नहीं शराब है और उँगलियों में आग. 

         

         

         

Thursday, May 19, 2016

भानुराम सुकौटी का गीत-संचयन 'एक तारो दूर चलक्यो' : पृथ्वीराज सिंह



मन में 'लोक' शब्द आते ही स्मृति में भी 'तीन प्रसंग' आ जाते हैं

एक में कबूतरी देवी गा रही हैं
"भात पकैये बासमती को, भुख लागि खैल्यूला"

फिर इसी का विस्तार ठुमके लगाते 'ताऊ कव्वाल' ; 
"विराना देशमां मैं मरि ज्यूला,
रोनिया कोई छईनां"

और अब भानुराम सुकौटी के गीत की यह पंक्तियाँ
" हिमाल को डफ्या पंछी, अगास में रिट्यो"

क्या है लोक?

चुस्त दुरुस्त तामझामों के बीच अपने अमल/ भूख को महसूस करने की ठसक,

या जिसमें संवेदना शेष नहीं रह गई है उस जगह को ही विराना/ पराया कह देने की कसक,

या यह कि सुन्दर डफ्या / मोनाल पंछी पर्वतों से घिरी नदी-घाटी ऊपर आकाश की ऊंचाई से गोल गोल चक्कर लगा रहा है। यह स्वछंद, उन्मुक्त नहीं है बंधी हुई,  कसी हुई उडान है पराणि की / पंछी की या प्राण की भी कह सकते हैं।

यही तो है लोक।

हाल ही में 'पहाड़' ने अनिल कार्की द्वारा संकलित व संपादित किताब ' एक तारो दूर चलक्यो' का प्रथम संस्करण प्रकाशित किया है। यह किताब लोक गीतकार, गायक और संगीतकार स्वर्गीय श्री भानुराम सुकौटी के जीवन परिचय  एवं उनकी उपलब्ध प्रमुख रचनाओं  का एक गम्भीर व महत्वपूर्ण संकलन है। 'पहाड़' के द्वारा इसका प्रकाशन इस समर्पण की पुष्टि करता है।

एक रचनाकार के रूप में अनिल कार्की के बारे में संक्षिप्त रूप से इतना ही कहा जा सकता है कि उनकी रचनाओं में जो पहाड़ परिलक्षित होता है, वह स्मृति का नहीं है जो अतीत में लेकर जाता है। अनिल का लेखन प्रवासी नहीं है,  यह आपको प्रभावित करता है, जोडता है, और करीब लाता है अपनी दूध बोली के।

किताब के बारे में कहा जा सकता है कि यह दो हिस्सों में लिखी गई है।
प्रथम में ' एक तारो दूर चलक्यो' शीर्षक, यही किताब का नाम भी है, दलित और अन्य लोक कलाकारों की तरह ही हमेशा हाशिये में रहे भानुराम सुकौटी का जीवन वृतांत है। इसमें सामाजिक, पारिवारिक और एक कलाकार के रूप में सुकौटी का चित्रण है। शिष्यों के साथ, साथी कलाकारों के साथ,अपने दो परिवारों के साथ, नौकरी व दलित जाति के साथ भी सामंजस्य बिठाते, मान देते भानुराम सुकौटी हैं। यही दलित भानुराम सुकौटी 'पतित भानु' बनकर भी अपने हिन्दी भजनों में आता है राग और ताल के साथ।

दूसरे भाग 'हिमाल को डफ्या पंछी' में भानू राम सुकौटी का रचना पक्ष है, उनके बेहतरीन गीत हैं। झुसिया दमाई, गोपीदास, कबूतरी देवी, रीठागाडी, ताऊ कव्वाल  की जमात के कवि, गायक, संगीतकार भानुराम सुकौटी काली वार व काली पार की साझा विरासत के वाहक हैं। उनके गीतों में हिमाल की उतरती हुई बर्फ - ग्लेशियर - नदी है तो वहीं ऊंची चोटी - पेड़ - घाटी भी।यह सब एक साथ उपस्थित हैं।एक समग्र रूप में प्रकृति है, उससे जुडे हुए नाम हैं पूरी समग्रता के साथ समरस।वार - पार फाट हैं नदी के, डाणाँ - काँणा, तल्लागाडा - मल्लागाडा, धुरे हैं तो सिरे भी।

अनिल लिखते हैं कि भानुराम सुकौटी लोक के उत्सवधर्मी कवि हैं। खुद उनके रचना संसार की प्रस्तावना लिखते हुए अनिल अपनी दूध बोली का ही प्रयोग करते हैं।

'दिन ढलिक्या', भिटौलिया दिन, सबकी सब रचनाओं में सम्बन्धों की मार्मिक तारतम्यता है। भानुराम सुकौटी का यह पक्ष जो रचनाधर्मिता का पक्ष है इसमें दरिद्रता का लेशमात्र भी नहीं है। जातिगत भेदभाव नहीं है। बस नाम हैं जैसे बरूँश, न्यौली, धौला बल्द, भैंसी को परान हैं वैसे ही पंत ज्यू का सेरा। लोक के ऐसे समृद्ध शब्द हैं कि हौंस लगने लगती है।

अलग तरह की माया / लगाव और वैसी ही उदासी भी जैसा कि 'ऐगे बसन्त बहार' गीत की यह पंक्तियाँ
"काली खाइछ कालसिनि ले,  गोरी पिचास ले।
मैं त सुवा मरी जाँछू, तेरा निसास ले ।।" 
तुकबंदी सी लगने वाली यह पंक्तियाँ वास्तव में बहुत ही नाजुक ढंग से बुनी हुई उत्कृष्ट रचनाएं हैं।जो लोक की विशिष्टता भी है और समृद्धि भी।जैसे:-
"अस्कोट पानी का नौला, रूमाल भिजाया।
उदासियों मन मैरो, गीत गाई भुलाया।।
उमर काटूँ कै संग।।"
इसी गीत में अस्कोट के साथ ही दैलेख जगह का भी नाम है। यह दोनों अलग अलग देशों में बटे हुए नाम इस गीत में साझा विरासत काली वार व काली पार को समेटे हुए हैं। यह लगाव यह विराटता केवल लोक में ही संभव है।

इसी क्रम में भानुराम सुकौटी और उनकी दुसरी पत्नी शान्ति सुकोटी के गीत हैं। अनिल ने इन्हें बहुत ही मधुर माना है।

यह वाकई अलग हैं। हेव लगाने की परम्परा के विपरीत दोनों का अलग सम्बन्ध दिखता है।समाज का दलित, भजनों का पतित और लोक गीतकार भानू राम सुकौटी को जितना मैंने इस किताब के माध्यम से जाना ।उस सब को हाजिर नाजिर जानकर मैं कहूँगा कि यह रचनाएँ एकदम अलग हैं।मेरे लिए इसे एक प्रेमी युगल का वैचारिक धरातल में सहवास कहना बेहतर होगा या बेहतर होगा कि  आप स्वंय ही इन गीतों को पढकर देखें। जैसा कि ' माया ले, पाले को, यो जीबन तेरो' गीत की यह पंक्तियाँ
"सरग में बजर पड्यो, सरकारी बाग में।
ज्यू झुराया क्या हुन्यां हो,  जेहोलो भाग में।"
आह! विद्रोह की यह क्षमता, यह लड़ाकापन अलग है एकदम अलग। एक अलग दृष्टिकोण भी है समझ का जो एकतरफा सम्भव ही नहीं है, बिना शक्ति-शिव तत्व के एकसात् हुए।

इसी रचना क्रम में उनके लिखे स्थानीय देवी देवताओं के कुमाउंनी भजन हैं, फिर हिन्दी में भजन हैं। भानुराम सुकौटी ने कुमाउंनी भजनों को लोकगीत माना है अनिल ने उनके हिन्दी भजनों में नाथमत का प्रभाव। मैं अपनी समझ से इन्हें सुकौटी जी के मैदानी व पहाडी क्षेत्रों में प्रवास व सामान्य जन मानस में कलाकार की पैठ के रूप में भी देखता हूं।

एक संगीतकार के रूप में भानुराम सुकौटी अपने गीतकार का नाम डायरी में लिखना नहीं भूले। जैसा कि आम देखा गया है, परिपाटी है कि रचनाकार को गुमनाम कर पूरी रचनाएँ डकार जाना। भानुराम सुकौटी एक अलग परिपाटी के रचनाकार हैं हेव लगाने वाले नहीं उनके साथी साथ में खडे हैं बराबर कदकाठी लिये।

साधुवाद है अनिल को। उनके साथियों महेश बराल, विक्रम नेगी व उमेश पुजारी का भी जिनका सहयोग लिया व बकायदा लिखा भी। आभार है पहाड़ का प्रकाशन के लिए।

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