Friday, January 22, 2016

जुगलबंदी: लीलाधर जगूड़ी की लम्बी कविता "बलदेव खटिक" एवं वीरेन डंगवाल की बहुचर्चित कविता "रामसिंह' को साथ-साथ पढ़ते हुए - पृथ्वीराज सिंह



पृथ्वीराज सिंह को सोशल मीडिया पर मैंने कविता पर उनकी कुछ सधी हुई टिप्पणियों से जाना। कविता की उनकी पढ़त और समझ अब एक रचनात्मक आकार ले रही है। वे कविताओं पर लम्बी प्रतिक्रियाएं लिख रहे हैं। अनुनाद के लिए उन्होंने हिंदी की दो महत्वपूर्ण लम्बी कविताओं 'बलदेव खटीक' और 'रामसिंह' पर साझी और तुलनात्मक प्रतिक्रिया लेख के रूप में उपलब्ध कराई है। अनुनाद पृथ्वीराज सिंह का स्वागत करता है और इस लेख के लिए शुक्रिया कहता है।

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जुगलबंदी
 
दोनों कविताओं का कालखंड लगभग एक है सत्तर का दशक जब आजादी का जश्न विभाजन के दंगों में बदल चुका था और युद्धों की गाथाओं में जुड चुकी थी, चायना का युद्ध और भारतीय लोकतंत्र में आपातकाल की राजनीति।एक अजब दौर था जहाँ समीकरण बन रहे थे और नारे बदल रहे थे। इन दोनों कविताओं में उस समय को कहने की बैचैनी दिखती है।

दोनों ही कवि पहाड के हस्ताक्षर हैं, दोनों कविताओं के परिवेश एकदम अलग हैं लेकिन चरित्र समान हैं। रामसिंह पहाड़ के गांव का फौजी है तो बलदेव खटिक मैदान के गांव से पुलिस में है।

पहाड़ होते थे अच्छे मौक़े के मुताबिक़
कत्थई-सफ़ेद-हरे में बदले हुए
पानी की तरह साफ़
ख़ुशी होती थी
तुम कण्टोप पहन कर चाय पीते थे पीतल के चमकदार गिलास में
घड़े में, गड़ी हुई दौलत की तरह रख्खा गुड़ होता था (रामसिंह )

राह कठिन है समस्याएं खुद विकट लेकिन फिर भी 'रामसिंह' में पहाड की सम्पन्नता है, शान्ति है। वहीं इसके एकदम उलट स्थिति है बलदेव खटिक-

रात; चिथडा खाती गाय के जबड़े में
धीरे-धीरे गायब हो रही थी" ( बलदेव खटिक )

बलदेव खटिक में कथ्य है, आप इसे एक कहानी के रूप में भी गढ़ सकते हैं जिसमें माँ का अहम किरदार है, भावुकता क्षणिक आवेश की तरह है।

(लेकिन सिपाही की माँ
जेब में मुड़े तार पर छटपटा रही थी )
जब तीसरे दिन छुट्टी पर
वह अपने गांव पहुंचा तो उसकी मां
सुई की नोक पर
अभी झड़ पड़नेवाली
पानी की बूंद की तरह इन्तज़ार कर रही थी। ( बलदेव खटिक )

तुम्हारा बाप
मरा करता था लाम पर अंगरेज़ बहादुर की ख़िदमत करता
माँ सारी रात रोती घूमती थी
भोर में जाती चार मील पानी भरने ( रामसिंह )

माँ रामसिंह के केन्द्र में भी है लेकिन कथा के रूप में नहीं है पहाड़  के समानार्थी है स्मृति के रूप में।

एक सी स्थिति में बलदेव खटिक एक कहानी-कविता है, इसलिए भी है कि जहां उसमें स्थिति एवं परिस्थिति के विरोध में स्वर ही नहीं जद्दोजहद भी दिखाती है। इसके उलट रामसिंह में कवि का आह्वान दिखाता है, इसमें प्रश्न ज्यादा हैंयह विशुद्ध कविता है।

तुम किसकी चौकसी करते हो रामसिंह ?
तुम बन्दूक़ के घोड़े पर रखी किसकी ऊँगली हो ?
किसका उठा हाथ ? ( रामसिंह )

क्योंकि ऐसे मौके पर
जो जिसके पास है
उसका उपयोग जरूरी हो जाता है
इसलिए कुत्ते भौंक रहे थे ( बलदेव खटिक )

तन्त्र एक तरफ देश के नाम पर, तो दूसरी ओर सेवा के नाम पर दोनों का उपभोग कर रहा है। यह एक ही समय की दो अलग अलग घटनाएं हैं, एक सीमा में है एक देश के अंदर।

वो माहिर लोग हैं रामसिंह
वे हत्या को भी कला में बदल देते हैं। ( रामसिंह )

दीवान बैठा है
रोज़नामचे पर हाथ रखे हुए
जैसे वह शहर की पीठ हो ( बलदेव खटिक )

बलदेव खटिक एक विरोध में उठता स्वर है, पहल है, उग्र आंदोलन की आहट है जो शायद तात्कालिक परिस्थिति में एक समाधान की तरह प्रतीत होता है।

कि देश में कुछ लोग
पेट से ही पागल होकर आ रहे हैं
लेकिन वे जब फायर करेंगे
तो यह तय है कि इस बार कौवे नहीं मरेंगे। ( बलदेव खटिक )

यह समाधान रामसिंह के पास नहीं है वह तो मात्र संबोधित किया जा रहा है। परिस्थिति उसे उकसा नहीं रही है, वस्तुतः थिति बता रही है।

वे तुम्हें गौरव देते हैं और इस सबके बदले
तुमसे तुम्हारे निर्दोष हाथ और घास काटती हुई
लडकियों से बचपन में सीखे गये गीत ले लेते हैं

सचमुच वे बहुत माहिर हैं रामसिंह
और तुम्हारी याददाश्त वाकई बहुत बढ़िया है । ( रामसिंह )

व्यवस्था जिसमें चलती है, जिस तरह से शासकीय कार्य हो रहा है वह ढर्रा एक खाई है जिसके एक छोर में तन्त्र है दूसरे में जनता।खाई जोड़ती नहीं है,  तोड़ती भर है।मूल अधिकारों के आढ़े व्यक्तिगत स्वार्थ महत्वपूर्ण है। यही खाई रेखांकित है बलदेव खटिक में-

किस कलम से करूँ ?
चाँदी की कलम से करूँ ? सोने की कलम से करूँ ?
कि लकड़ी की कलम से करूँ ?
मार खाया हुआ आदमी रिरियाता है
कि कानून की कलम से करो
कानून की कलम लकड़ी की होती है
दीवान कहता है- कल आना  ( बलदेव खटिक )

यह सब रामसिंह में भी है लेकिन यहां व्यवस्था आढ़े नहीं आ रही आपका भरपूर उपयोग कर रही है, अपने स्वार्थ के लिए। यहां मूल अधिकारों का हनन नहीं हो रहा बल्कि मोहरा बनाया जा रहा है ।

यह पुतला है रामसिंह, बदमाश पुतला
इसे गोली मार दो, इसे संगीन भोंक दो
इसके बाद वह तुम्हें आदमी के सामने खड़ा करते हैं
ये पुतले हैं रामसिंह,  बदमाश पुतले ( रामसिंह )

बलदेव खटिक कविता की रचना अवधि का जिक्र नहीं है लेकिन यह संग्रह "बची हुई पृथ्वी" का पहला संस्करण सन 1977 में राजकमल से प्रकाशित हुआ हैस्वयं कविता अपने भीतर वर्ष 1974 की राजनीति का जिक्र करती है। इससे लगता है कि यह एक कालखंड की रचना है, दस्तावेज है।
रामसिंह की रचना का वर्ष स्पष्ट रूप से 1978 अंकित है जो बलदेव खटिक से एक साल बाद की है। रामसिंह एक कविता के रूप में  अंगरेजों का सिपाही है या खुद ड्यूटी बजाता बलदेव खटिक है, या उसकी अगली नस्ल के आगे खडा सिपाही। एक कालखंड को समझा जा सकता है लेकिन रामसिंह हर कालखंड में खड़ा व्यवस्था का मजबूत सिपाही है। उसका आह्वान जरूरी है।

आँख मूँदने से पहले याद करो रामसिंह और चलो
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3 comments:

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