Monday, January 4, 2016

वो तकनीक के साए में ज्ञान से ठगे गए उर्फ़ नब्बे के दशक के लौंडे - अमित श्रीवास्तव की नई कविता



वो तकनीक के साए में ज्ञान से ठगे गएनब्बे के दशक लौंडे शीर्षक इस कविता के कुछ रेखांकित किए जाने योग्य उद्बोधनों में से एक यह ख़ास है। कवि ने इस कविता को मुझे समर्पित करके दरअसल मेरी पूरी साहित्यपीढ़ी को चपेट में लिया है। अब युवा अलग लहज़ों में बोल रहे हैं, वे चाहते हैं कि उनका बोला हुआ सुनाई तो दे ही, चुभे भी। अमित का लहज़ा भी ऐसा ही है। नब्बे के बाद के परिदृश्य को टोहता, उसमें शामिल कवि सब कुछ तो नहीं कह सकता पर बहुत कुछ कह जाता है। नब्बे के दशक के लौंडे, जो आज अफ़सर, अध्यापक, पत्रकार, लेखक-कवि, मैनेजर, डाक्टर, इंजीनियर, नेशनल-मल्टीनेशनल से लेकर बेकार-बेरोज़गार तक सब कुछ हैं पर कुछ इस तरह

ये सपनों की परित्यक्त औलाद
इन्हें लेने कोई नहीं आया
ये परित्यक्त रहे सपनों के विनाश के बाद भी

इनकी कहानी में अधूरापन
इनके व्यक्तित्व में बौनापन
गो अभी बाकी है इनका होना
***     


नब्बे के दशक के लौंडे
(शिरीष कुमार मौर्य के लिए)

वे आने वाले कल पर विस्मृत
उनकी आँखों में इतिहास के सपने जगमग
उनकी स्मृतियों का संसार भारी
बोझ ये कई दशकों का
कई दशकों तक ढोना था उन्हें
चीखने को आज ही काफी था
उन्हें आज भर रोना था 
रोने को आज ही काफी था
आज को होना था जीवन भर

वे नमक की डली की तरह
कि बाद में पिस सकें टाटा साल्ट से महीन
वे गुड़ की भेली
कि बिखर जाए उनका होना
खिल सकें लौट कर किसी संस्कृति संवाहक की उलट बांसियों में
वे मटर की फली
पोखर में खिले सिंघाड़े की तरह बेतरतीब
आमंत्रित नहीं आयातित
उन्होंने अभी-अभी सीखी थी भेड़ चाल
बिन बुलाए आना जाना था

उनके कान फुसफुसाहट को आह्वाहन मानने वाले
आह्वाहन किसी उतुंग शिखर से
उद्योगपति की मोटीवेशनल स्पीच
खींचो, पटको, धक्का दो
आगे बढ़ो, आगे बढ़ो रौंदकर 
उन्हें उस जैसा बनना था
आगे बढ़ना था उन्हें 
उन्हें प्रतिरूप था होना
उन्हें होना था इस तरह
कि नहीं होना था 

वे भाषा के चंगुल में छटपटाते
मौन के रखवाले 
इतने वाचाल एकांत में
कि पागल होने का भ्रम होता 

रास्ता बड़ा आम था
एक लम्बी खोह थी उसके आगे
वहां रेल का कोई स्टेशन नहीं था
जहां जाना था सबको
और बस एक सीट खाली थी 
वो जाने को तैयार थे बैठे
तैयार एक भ्रामक शब्द है
वो तो बाद में जाना

एक इमारत को गिरते देखना
महज़ देखना होता
इमारत को गिरते
तो वो भी देखते रहे इमारत को ही गिरते
इमारत को गिरते देखा जिसकी नींव
इनके कल ने बुनी थी
नींव से कोई नई इमारत नहीं बनती देखी गई 
नींव में देखा गया मट्ठा पड़ते 
अब वहां एक पेड़ है
जो छाँव-फल-फूल के प्रतिपक्ष में है खड़ा
अगली इमारत के गिरने के इंतज़ार में  

ये मासिक किश्तों में ज़िम्मेदार 
नागरिक हुए सोलह अंकीय पहचान पत्रों में
इन बिटवीन उतने ही बद्तमीज

अटक जाते थे लड़की को देखकर
क़यामत तक भटक आते प्रेम में
गटकते थूक के साथ ये चुहल
कि मिल जाए गर कहीं राह में
तो जड़ देंगे एक चुम्मा उसके मसमसाते गालों पर
फिर किताबों में दबाकर फूल
भूल जाते क़यामत तक

उतने ही रुष्ट रहे माओं से
बाप से थे जितने खौफज़दा
घर से जाते बाहर अक्सर यही सोचते
कि फिर न आएँगे यहाँ लौटकर
लौट आते शाम की डाक से रंगहीन  

किले बनाते ढहाते
किरदार नहीं वो देह गढ़ने में लगे
हालात की नब्ज़ पर
मासूम थी पच्चीकारी

इन्होने नाम का महत्व जाना
पूरा नाम पूछने पर ये जानना चाहते थे पूरा महत्व
उनका नाम उनके महत्व से बड़ा 
अपने नाम में गुमनाम हुए 

वो नमकवाले की औलाद थे
वो औलाद थे पसीनेवाले की
इस तरह से वो लकड़ीवाले की औलाद भी हुए न 
वो खूनवाले की औलाद थे
वो औलाद थे थूकवाले की
इस तरह से वो ईंटवाले की औलाद भी हुए न
उनके पसीने में था सबका खून
उनके खून में कई पीढ़ियों का पसीना

उनकी आँखें उन कूल्हों पर टिकी
जिसे कहते थे समय
एक दिन... एक दिन... एक दिन
वो आहें भरते थे
छाती भर उसांस से
किस्मत से ज़्यादा
वक्त से पहले के इंतज़ार में
वो देवताओं के घरानों में गए
जहां भयावह राक्षसों ने किया तिलक उनका 
वो गए राक्षसों के डेरे पर
छोटे-छोटे देवता वहां किलकारियों में लीन
उन्हें अनदेखा करते 

आज अपने ही पसीने की गंध से घबराते
बस की पिछली सीटों पर
हड़बड़ी में टिफिन भूल जाते

ये जल्दी में हैं
समय को काट-काट कर पीते
इन्हें जीने की नहीं अब पहुँचने की जल्दी है 

खूब रंगीन पर्दों से घिरे
धंसे बड़े लाल सोंफे में
उगते पेट बुझती आँखों वाले

ये बेसमय बूढ़े होते लोग
ये बेसमय गंजे होते लोग  
ये असमय तोंदुल होते लोग
इनके सरों पर जिम्मेदारियों का तलछट
इनके उदर में अपच डकार
दिमाग़ में भारी वायु-विकार

अब बचे-खुचे से हैं
कुछ चले गए इक्कीसवीं सदी में
दशक का भान नहीं
कुछ छूट गए पिछले दशक में ही कहीं  

इनके गिटार से मेढक की सी घों घों
कोई आवाज़ नहीं बांसुरी में अब
इनकी कविता में मधुमास नहीं
गिद्ध के नोचे हुए मास की बू  
बहुत ऊंचा जाकर भी
बहुत ऊंचा सुर नहीं लगता इनसे  
रिंगटोन से बजते हैं बार-बार एक ही धुन
कुरेदने की हद तक भरी इंकार इनमें
हुन्कारियों सी हैं लगती 

जहां टीले थे जीवन में इनके  
वहां सपाट है
जहां गड्ढे थे अब वहां सपाट है
जहां सपाट था
अब भी सपाट है वो स्थान जीवन का

ये घोड़े भर थे अश्वमेघ के
राजकुमार समझना इनकी भी भूल थी
रकाब किसी के हाथ इनकी
जीन पर सवार कोई और
जोर लगाकर पिंडलियों से पीठ पर
अद्भुद निशाने लगाकर इनकी ही देह में
इन्हें टेंट पेगिंग कराता  

इनके हाथ झंडे से लैस
पीठ पर लादी गई हैं ईंटें
कीचड़ से सने हैं पैर इनके  
जिस खंडहर को उजाड़ा
हाथ उसके मलबे में धंसे हैं कुहनियों तक

वो उड़ना चाहते थे
मगर उड़ने से पहले हाँफते
पंखों में लगाकर हाथ
पिछली उड़ान फाड़ते
वो तकनीक के साए में ज्ञान से ठगे गए

ऊपर जाने की कोशिश में
उधर गए जिधर भेड़ें गई थीं सारी
खुश हो जाने की कोशिश में
अनमयस्क हुए इतने कि
हर सांस पर अपनी एक खुजली छोड़ते  

सपनों में देखे ताजमहल
अपनी मुमताज़ों के लिए
घर के पिछवाड़े मूंगफली के छिलकों के साथ
दफना दिए
एक रुक्का भेजा अपने भगवानों को सीन फ़ाइल
इन्होने पिता की फटी जेब में
माँ की सब झुर्रियां सहेज दीं
धूल, पसीने, थूक के बाज़ार में
सेल के इंतज़ार में हैं ये

अब आधी उम्र की दहलीज़ पर
निश्चित तौर पर फिर भी नहीं कह सकते
इस अनिश्चित दौर में
उस तरह ही कि जैसे
आधे परिपक्व हुए ये आधा बचपन जीने के बाद

ये आधे रस्ते पर  
पूछ रहे थे बाकी का आधा रास्ता
ये जहां पहुंचे
वहां से कहीं भी पहुँचने की
सांत्वना मिलती
रास्ता नहीं

ये सपनों की परित्यक्त औलाद
इन्हें लेने कोई नहीं आया
ये परित्यक्त रहे सपनों के विनाश के बाद भी

इनकी कहानी में अधूरापन
इनके व्यक्तित्व में बौनापन
गो अभी बाकी है इनका होना
वैसे तो चंद साँसे ही रह गईं हैं इनके पास

ये जानते थे इन्हें क्या चाहिए
नहीं जानते थे क्या नहीं चाहिए इन्हें
ये थे इतना जानते 
कि चाहने लगे ये जो जानते थे

वक्त के माथे पर चंद खरोचें डालकर
ये गढ़ रहे थे एक देश
जिसमें इन्हें हर हाल नहीं होना था  
***


4 comments:

  1. एक विचार में बंधी छाेटी छाेटी कविताअाें की बडी़ कविता!! एेसी कविताएँ समृद्ध करती हैं . सशक्त भाषा आैर भावाें के अग्रज कवि काे सलाम !!
    अनुनाद का धन्यवाद!!
    - कमल जीत चाैधरी

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  2. वेदना ,संवेदना ,भाव चाहे हो भी या न भी ,लेकिन छटपटाहट तो है ही ..जिंदा रहने की जद्दोजहद ,लाचारी ,मजबूरी ,जिसका नाम यही लौंडे गाँधी भी रखते है ,बरक़रार है .. लाजवाब है

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  3. जो तस्वीर दिखा रहें हैं उस पर शायद वाद विवाद हो सकता है लेकिन यदि किसी एक की भी मनोस्थिति का वर्णन माने तो भी बेहद शानदार तरीके से मार्मिक, संवेदनशील और (खूबसूरत)*. यदि मुझे इसका शीर्षक रखने की आजादी होती
    तो होता "मिड लाइफ क्राइसिस" :) ☺☺

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  4. वाह। क्या भाषा शब्दों का चयन। अद्भुत

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