Thursday, November 26, 2015

अंधेरी कविताएं - अशोक कुमार पांडेय



यहां दी जा रही कविताओं को 'अंधेरी कविताएं' ख़ुद कवि ने कहा है। अंधेरे के बारे में गाया जाएगा का संकल्प धरे कवि का हक़ बनता है कि वह ऐसा कहे। तनाव, अवसाद और आक्रोश में अतिशय होते जाते बिम्ब ऊंचे सुरों को छू लेने का यत्न करते हैं। अंधेरे में टटोलते हाथ एक दिन आग के जलाने के स्त्रोत भी खोज ही निकालेंगे। अशोक को शुक्रिया कि उसने इधर दूसरी बार अपनी नई कविताएं अनुनाद को दी हैं।
*** 
तस्वीर:सीरिया के बेघर - अशोक की ही फेसबुक फोटो गैलरी से
 
जो है वह यही है

कुहरे में डूबी सड़क के उस पार नहीं है कोई पेड़
उस पेड़ पर कोई पत्ती नहीं उस पत्ती में क्लोरोफिल नहीं ज़रा सा भी
उसकी छत पर कोई सूरज नहीं, उस सूरज में एक भी किरण नहीं
उसकी कोख में कोई रौशनी नहीं, उस रौशनी में कोई दृश्य नहीं उस दृश्य में नहीं कोई और
ब्लैक होल है इस कुहराये क्षितिज के उस पार और इस पार मैं हूँ


थकन के पार कुछ नहीं पैरों के पास
बैठो तो यह भरोसा भी नहीं कि वह पत्थर की बेंच है या कोई मृग मरीचिका
आश्वस्ति भीग भीग जाती है थकन और आराम के बीच
एक आवाज़ कहती है लौट जाओ और रास्ते लील जाती है सारे
धीमी पुकार अट्टहास में बदलती हुई अट्टहास विलाप में टूटता
बढ़े हुए हाथ तैरते हैं हवा में मुस्कुराते हुए कहते हैं चयन है यह तुम्हारा
उम्मीदें रौशनी थीं चिता की अब यह जो राख है स्वप्नों की है इसे स्मृतियों की नदी में कर दो प्रवाहित
अस्थियाँ कविताओं सी रख लो अपने पास जब कम होगा दुःख तब रखेंगी ज़िंदा ये

कँटीली झाड़ियों के बीच जाने चल रहा हूँ कि लौट रहा हूँ
एक क्षण तनती हैं मुट्ठियाँ तो दूसरे क्षण चीख़ पड़ता हूँ
कोई काँटा है जाने कि किसी फूल के दबने की चीख़ जो मुझमें खो गई है
भयंकर शोर आवाज़ों की कोई रणभूमि हो जैसे और मैं ख़ामोशियों की तलाश में चलता हूँ मुसलसल
साँसे टूटती हैं, लय तो खैर बनी ही नहीं वर्षों से, हाथ झाड़ियों के बीच बनाते रास्ता टकराते कुहरे से और लौट आते अपनी जगह
ख़ाली है वह जगह और मुट्ठियाँ बाँध लेतीं ख़ालीपन को एक आवाज़ भरती जाती ख़ाली जगहों में
तुम उसे नारा कहते हो

धीरज के उस पार प्रतीक्षा है एक अधीर चलने के पहले कोई पता नहीं दिया तुमने ठहरने से पहले कोई आश्वासन नहीं प्रतीक्षा के पहाड़ के उस ओर कोई गाँव नहीं न इस ओर कोई छाँव. मैं वह नहीं जो चला था वह भी नहीं जिसने एन दुपहरी रुक कर देखा था क्षण भर सूरज को न वह जो राह पूछता आया झाड़ियों से. कोई और होगा वह जो शिखर से उतरते हुए अनुपस्थित गाँव की राह पूछेगा और कोई और होगा वह यह सुनने के बाद कि जो है बस यही है.
***


कितने क़दमों के बाद गलने लगेगी देह?

एक तारा टूटता है और घाव धरती की देह पर होता है पैबस्त
सपनों के टूटने के घाव अदेखे से बहते रहते हैं धमनियों में
उपेक्षाएँ हृदय के कहीं बहुत भीतर पलती रहतीं असाध्य विषाणुओं सी
जीवन किसी अंत की प्रतीक्षा के बिना भी बढ़ता रहता उस ओर

          आखिरी सिगरेट की आग पहुँच रही उँगलियों तक
          नींद की आखिरी संभावना दम तोड़ती एश ट्रे में
          डाक्टर की पर्ची सुलगती है धुएँ में बिखरती जाती उम्र
          यह चयन है मेरा
मेरे आखिरी बयान में कोई संज्ञा नहीं होगी
सर्वनाम भी नहीं.

भीड़ है न्यायालय में
न्यायधीश अभी अभी मंदिर चला गया है
ज़िरह जारी है पुरज़ोर
मुझे मारे जाने के अलग अलग वजूहात बताते वक़ीलों के मुंह से फेन आ रही है
उसमें ताज़े खून की बास है
मुझे तुम्हारे कम हीमोग्लोबीन की याद आती है
जोर से दबाकर देखता हूँ अपने नाखून अब भी गुलाबी हैं वे जरा जरा
भीड़ है बहुत और तमाम जाने पहचाने चेहरे
अख़बारों में किस्से गुनाहों के मेरे
और चैनलों पर बहस लाइव कि फाँसी बेहतर हो या उम्रक़ैद
मैं तुम्हारी आँखों में उन बहसों के कांटे उतरते देखता हूँ
किसी ने अभी अभी कहा है तुम्हें चाय बनाने को
एक तजवीज़ चाय में ज़हर देने की सुझाई गयी है
मैं सोचता हूँ कहीं उसमें दूध न डाल दें कमबख्त.

          बधाइयों की एक पूरी जमात उतर आई है आँगन में
          किसी ने कहा “तुम ही हो सकते थे यह, मैं सदा से जानता था”
          मुझे उसकी गालियाँ याद आईं
          एक ने कहा सदा से चाहता रहा हूँ तुम्हें बस कहा नहीं कि बिगड़ न जाओ
          मुझे उसके श्राप याद आये
          इतना प्रेम कि मुझे उपेक्षाओं की याद आने लगी है अब
          कहाँ हो तुम

पैरों में जूते नहीं ढंग के ठण्ड का कोई इंतजाम नहीं
और पहाड़ है कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेता
साँसें पैरों से तेज़ चलती हुईं सूरज चाँद सा दिखता मुस्कुराता
न कहीं शिखर दीखता है कोई न लौटने की कोई राह
जितने क़दम चलो उतने क़दम दूर होता जाता सफ़र
कोई आवाज़ नहीं, कोई दृश्य नहीं जैसे धरती हो गयी हो अचानक तिरछी
और सारे दृश्य तलहटी में जा छिपे हों
तुम थक गयी होगी न
कब तक चलोगी आँखों के सहारे
एक छोटी सी गाय रास्ता दिखाती चलती जाती है निःशंक
शाम का इंतज़ार करें जब वह लौटेगी?
यह क्यूं कहा तुमने – कोई रास्ता नहीं लौटने का न कोई वज़ह चलने की
कितने क़दमों के बाद गलने लगेगी देह?

          नब्ज़ थामे मुस्कुराता है डाक्टर - तुम नहीं बदलोगे
          पूछता हूँ कितना है वक़्त तो हँसता है वह वक़्त नहीं आया अभी
          बीमारी न हुई गोया सपने हुए दीखते हैं पर आते नहीं कभी क़रीब
          अपने विराट एकान्तिक अंधकार में देखते हुए तुम्हें जैसे माचिस की लौ को
          एक शब्द आकर ठहरता है जबान पर फिर दांतों के बीच ठहर जाता है
          भूख कहता हूँ तो अंतड़ियों में उतर जाता है
प्यास कहने पर गले में रेंगता है आहिस्ता
चुप होता हूँ अंत में
तो आँखों में प्रतीक्षा बन कर ठहर जाता है.

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4 comments:

  1. अशोक जी की सुन्दर रचना प्रस्तुतीकरण के लिए आभार!

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  2. गहरी कविताएँ ...
    बहुत धन्यवाद भाई जी !!
    - कमल जीत चाैधरी .

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  3. अद्भुत व बेहतरीन अभिव्यक्ति, मर्मस्पर्शी कविताएँ जो अंतरात्मा को झंझोड़ते हुए सोचने पर विवश कर देती है। अल्लाह करे ज़ोर-ऐक़लम और ज़ियादा।

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  4. बहुत सुन्दर

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