Sunday, July 26, 2015

संजय कुमार शांडिल्य की कविताएं



हमें कविताओं से क्या मिलता है

कोई जीडीपी में बढ़त दर्ज करता है तो कैसे करता है
जबकि हम कविता से बर्फ़ीली सर्दियों में जुराबों का
काम लेना चाहते हैं
लकड़ियों और भेड़ों से भोजन मिलता है हमें कविताओं से क्या मिलता है


सरसों का तेल, नमक और तोरयी से एक शाम की मितली रुकती है
पाँच आदमी जीप की एक सीट पर बैठकर बस्ती से शहर आते हैं
दो रुपये की हींग से रसोई महकने लगती है
पंसारी की दुकान में जीवन के सामान मिलते हैं , कविताओं के पास क्या है


थोड़े से जुलाब से कब्ज़ और सुअर की चर्बी से ज़ुकाम ठीक होता है
एक अध्धे से थकान मिट जाती है
दो-चार गालियों से गुस्सा बाहर हो जाता है
खिड़की से हवा मिल जाती है कुएँ से पानी मिल जाता है
महाजन से बीमारी में कर्जे काश्तकार से खाने भर ज़मीन मिल जाती है
क्या मिलता है कविताओं से ?


जीवन से इतनी कम उम्मीद रखने वाले लोगों ,
मैं भी यही पूछता हूँ कविताओं में
कि आखिर इनसे हमें क्या मिल सकता है

इन क़ब्रों में
थोड़ी सी और जगह के लिए कविता है
थोड़ी सी और हवा के लिए कविता है
थोड़े से अधिक जीवन के लिए कविता है

हमें यह मालूम है कि धूप बहुत कड़ी है
और जूतों से आराम मिलता है हमें कविताओं से कुछ नहीं मिलता ।

***  

शहद एक शहतूत का पेड़ है

मुट्ठी भर रेत को छूकर उसने कहा कि
यह प्यार हो सकता है जो नहीं हुआ


गठरी भर कपास के लिए
एक बियाबाँ में हम दौड़ते रहे
जिनपर दुनिया का सबसे मीठा प्रेम
जो नहीं खिल सका पुष्पित हो सकता था

मुट्ठी भर रेत और गठरी भर कपास के लिए
हमने मौसमों की हत्याएँ की

वह घड़ा मिट्टी से बनता था जिसे हमने धातुओं
से बनाना चाहा
हम दोनों इसी नदी में डूबे जो तैरने के लिए
सबसे आसान थी


मैं और तुम जानते तो थे कि मधुमक्खियाँ
शहद जहाँ इकट्ठा करतीं हैं वहाँ वह शहद बनता नहीं
बात उस ज्ञान का था जिसमें वह प्रेम-नगर उजाड़ हुआ
बसने के नियम वही होते जो उजड़ने के होते हैं
यह किसका गुनाह था जिसमें हमने जीवन का
हर पाठ गलत पढ़ा
शहद हर उस जगह था जहाँ एक शहतूत का पेड़ है ।

***  

आकाश से गिरी हुई रात

इस छिपकली की जीभ पर
एक पतंगे के ख़ून का ताज़ा गीत है

मकान वायलिन की तरह
बजता है
इस मकड़ी के जाले के आसपास

उदासियाँ फर्श पर पसरी हुई
कथरी है
खून और इसकी ठंडक में रेंगती हुई
चींटियाँ


बाहर कारोबार की तरह
गिरी हुई रात है
आकाश से

तालाब एक उल्टी हुई पॉलीथिन है
रौशनी छिटक रही है क़ब्रगाहों से
चार सू चमकता हुआ अँधेरा है

इस चार सू चमकते हुए अँधेरे में
जुआघर हैं, शराबख़ाने हैं

छोटे-छोटे ताबूत बना रहा है
बढ़ई
बूढ़े पछीट रहे हैं पुरानी सदियाँ ।

***

इन छुट्टियों में

इन छुट्टियों में आधे-आधे लोग
अपने गाँव लौटे हैं

आधे रह गए हैं उसी जगह
जहाँ ग्यारह महीने रहते हैं
उन ग्यारह महीनों में
कुछ बाल्टियों के पेंदों में
छोटे सुराख़ बड़े सुराखों
में बदल जाते हैं


उन ग्यारह महीनों में
चाय की उन प्यालियों में
कुछ और गहरी दरारें
बनती है
जिन पर यारों का प्यार
छनता है


बच्चे ग्यारह महीने बड़े होकर
सचमुच बड़े दिखने लगते हैं
बूढ़ी होती पेशानी पर
कुछ और गहरी रेखाएं
कुछ और गहरी रेखाओं में
जमा होती है ग्यारह महीने में


इस एक महीने में
कोई आधा आदमी
कितना पूरा हो सकता है
कि ग्यारह महीने बाद
अगली छुट्टियों में
आधे-आधे लोग फिर
गाँव लौट पाएं ।

***

उस बच्चे की मुस्कुराहट में उसकी माँ झाँकती है

सातवें आसमान पर कोई खिड़की है
जो उसके ओठों पर खुलती है

उसकी हँसी उसकी माँ से मिलती है
मैं उसे उसकी माँ की तस्वीरों से मिला कर
देखता हूँ

उसकी माँ जो नहीं है कहीं
वह हर उन जगहों में काँपती है
जहाँ वह हवा की तरह बहती थी
वैसे उसके होने का कहीं निशान नहीं है
जाने वह कैसे इस दुनिया में रहती थी

वह जब थी लगता नहीं था कि वह
नहीं रहेगी
अपनी बेटी को जन्म देते हुए
उसे लगा कि इस दुनिया में
इतनी ही जगह खाली है

तीन साल की उसकी बेटी
खुश-फैल रह सके
पृथ्वी पर
उतनी जगह
उसकी समझ इस समय की
आलोचना है

माँ का नहीं होना
अक्सर उसकी उम्र में
उसे महसूस नहीं होता है
वह अँगूठा मुँह में लेकर
सो जाती है

उसकी माँ वैसे तो अब
इस घर में हर जगह काँपती है
खासकर उस बच्चे की
मासूम मुस्कुराहट में
उसकी माँ झाँकती है ।

***

पिघलते ध्रुवों की पृथ्वी

पगडंडियों पर पाँव हैं और धड़ नहीं है
यह खूब कुदरती है ,सारी चहलकदमियाँ सहज

कुछ दूरी पर फैले हुए खेत हैं


धूपछांही सी फसलें
जड़ें नहीं हैं किसी भी पौधे में
हवा उन्हें हिलाती है कभी-कभी


बूढ़े सहज हैं मृत्यु की प्रतीक्षा करते हुए
स्त्रियाँ सहज हैं श्रृंगार की जरूरतों के बिना

हाथ एक गर्दिश करती हुई मछली है
कंधे जीवनरहित सिर को
पहाड़ सा धारण किए हुए


साँस लेने की मशीन भर नाक जीवित है


पूरे चेहरे के विजन में अकेला जागता हुआ
यह सब सहज है जीवन में
सिर्फ़ पेट दिखाई पड़ता है
चीजों को एक साथ जोड़ता


आँखें सबसे पहले अलग हुईं
सहजता से
दुर्घटनाओं के बाद सिर्फ़ विलाप के
लिए खुलती हैं

पृथ्वी पर खुली हुई आँखों के
सिर्फ़ बर्फ़ीले ध्रुव हैं
जो लगातार पिघल रहे हैं ।

***

1 comment:

  1. कवितायेँ रोमांच नहीं बल्कि सिहरन पैदा करती हैं.... और जब सिहरन पैदा होती है तो आदमी सोचने को विवश होता है... और जब सोचता है तो कुछ न कुछ हल भी निकालता है... बधाई कवि महोदय को कि वो सफल हुए... साथ ही अनुनाद का भी आभार कि उसने उपलब्ध करायी कवितायेँ...

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