Friday, July 17, 2015

चन्द्र गुरूङ्ग की कविताएं



अनुनाद पर पहले कभी अनिल कार्की के अनुवादों के सहारे नेपाली कविता छपी थी। एक बड़े अंतराल के बाद अब चन्द्र गुरूङ्ग की कविताएं यहां लगा सकने का अवसर मिल रहा है। मूल से अनुवाद स्वयं कवि ने किए हैं। हिंदी के लहजे में ढालने की दिक्कत जहां थी, वहां मैंने भी कुछ नामालूम से बदलाव किए हैं।  इतना भर कहूंगा कि ये बहुत स्पष्ट आशयों की कविताएं हैं, जहां कथ्य पहाड़ के अपने असल जीवन संघर्षों से आता है, वह बात-बात पर बिम्बों में नहीं बदल जाता है। हाल में बरबाद हो चुकी नेपाल की धरा, सिर्फ़ भूकम्प से नहीं, दूसरी कई वजहों से बरबाद हुई है। कर्मठ लोगों के उस मुलुक से मुझे ऐसी हर बरबादी का पता और कारण बताती कविताओं की भी उम्मीद है। कविता दुखती रग प‍कड़ती है, इसलिए यह उम्मीद मैंने पकड़ी है। यों नेपाली-गोरखाली उत्तराखंड के लिए बहुत परिचित अपनी-सी ही भाषा है। हम सभी किसी हद तक इस भाषा को समझते हैं। 

यहां कवि से परिचय का निमित्त फेसबुक भर है। इस किंचित परिचय के बीच चन्द्र गुरूङ्ग पहली बार अनुनाद पर हैं, उनका स्वागत और आभार।





***
ठंड का मौसम


बहुत ठंड है
माईनस डिग्री मे ठंड पडा है सब कुछ ।

जुलुस में जाने वाले पैर जूतों के अन्दर सोये पडे़ हैं
विरोध में उठने वाले हाथ जेबों में घुसे पडे़ हैं
ढके हैं मफलर से
नारा चिल्लाने वाले मुख ।

बहुत ठंड है
दिमाग की न्यूरोन गली में बर्फ़ीली हवा चल रही है
मन के तालाब में विचार की लहर जम गई है
विश्वास ठिठुराया हुआ है
रोगशय्या पर पडे हैं उमंग, जोश और उत्साह ।

बहुत ठंड है
ठंड ने चेतना के कान बन्द कर दिये हैं
ठंड ने विवेक की आँखों को ढक दिये हैं
ठंड में मौन है शब्दों का कोलाहल ।

उलझन की धुन्ध फैली है सब चीजों पर
मन का प्रदेश निष्क्रियता के बर्फ़ से ढकी है
आशा के पेड निर्जन खडे़ हैं
शान्त है प्रतिरोधी आवाज़ ।

बहुत ठंड है
मन का आवेग मुरझाया हुआ है
नल में पानी की तरह नसों में खून ठंडी बह रही है
पाइप में बर्फ की तरह दिलों मे आक्रोश ठंडे पड गये हैं
थमी है समय निस्तेज ।

और,
इस ठंडी मौसम में
एक तानाशाह के भद्दे से होँठ पर
खिली है कुटिल मुस्कान ।
***

कवि और कविता

कविता-
अंधेरा चेहरा
सूजी आँखें
शुष्क होंठ
और उदास आवाज़ लिये
मेरी दहलीज पर खड़ी है ।

मुझे कविता के शुष्क होंठों पर  
मुस्कान बनाने का मन हुआ

मुझमें सूजी आँखों को चूमने की इच्छा जागी ।
अन्धेरे चेहरे पर
उड़ाने का मन हुआ ख़ुशी के जुगनू ।

मैं निकला
कविता के लिए ख़ुशी ढूँढने ।

मैं ने कविता को
मुस्कुराता हुआ निश्छल बच्चा दिखाया
नहीं उतरी वह मुस्कान कविता के होंठों पर ।

आसमान से झरती रिमझिम वर्षा दिखायी
नहीं धुली कविता की उदासी ।

क्षितिज में हँसता हुआ इन्द्रधनुष दिखाया
नहीं फैला उसका रंग कविता के चेहरे पर  

पेड़ पर खिलते फूल दिखाये
खेत में उछलते मेमने दिखाये ।

अभी भी बेचैन बनी रही कविता...

वापसी में
रास्ते में एक बुढ़िया मिली
अंधेरा चेहरा
सूजी आँखें
शुष्क होंठ
और उदास आवाज़ ।

बुढ़िया के आँसू पोँछ्ने
झुर्रीदार गाल पर हाथ फेरा ही था मैंने
अचानक
कविता के चेहरे पर खिल उठा
उजियाला !
***

बूढ़ा पहाड़

हमेशा
शान्त
विचारमग्न
एकाग्र ।
लगता है तक रहा है कल्पना का आकाश
तैर रहा है विचारों के समुद्र में
वह बूढ़ा पहाड़ ।

कान की सुनसान गुफा के इर्दगिर्द 
पंक्षी मीठी मीठी चहचहाहट भरते हैं
हवा अपने आदिम गीत गुनगुनाती नज़दीक से उड़ती है
काँधों से उछलती,
कूदती
फिसलपट्टी खेलती हैं नदियाँ ।

बादल आँखें ढकने चुपचाप आते हैं
रास्ता रोकने के ग़ुस्से में
मारता है ज़ोरदार लात आँधी-तूफ़ान छाती पर
गालों में चूँटी भरकर
भागती है चंचल हवा ।

बिजली तेज प्रहार करती है
काँधे की पहाड़ियों पर धूप दावानल सी सुलगती है
भीगता हुआ चुपचाप
सही है हर वर्षा ।

युगों से
उमंग के वसंत में
अभाव के शिशिर में
पोषते हुये कविता की कोपलें हृदय के कोनों में
जिया है किसी कवि के जैसे
वह बूढ़ा पहाड़ ।
***

माँ 

गोदी में
उछलते
खेलते
नाचते
गाते 
भागी हुई चंचल नदियां
जब बरसात बन कर वापस आती हैं 
मस्कुराता है धरती का चेहरा
फूल की तरह ।

मैं
जब दूर देश से घर लौटता हूँ
दमक उठता है
मेरी माँ का चेहरा ।
***

अहंकार

अहं का काला सूरज
सिर के उपर चढ़ता है ।
चढ़ कर सिर पर
धीरे धीरे सघन बनता है, फैलता है ।
फिर क्रमशः
घटाता है इंसान की उँचाई ।
***

ईश्वर की हत्या

वह
साधारण और नेक इंसान था ।

सबसे पहले
उसकी प्रेमपूर्ण स्पर्शयुक्त उँगलियाँ छीन ली गई
उसके परोपकारी हाथ तोड़ दिये गए ।
उसके बाद
निर्दोष चेहरे को क्षतविक्षत बनाया गया
सत्यमार्गी पैर तोड दिये गये
मृदुभाषी जीभ निकाल दी गई
और, दबा दी गयी मधुर बोली ।
आखिर में
चिथड़े कर दिया उसका दिल ।

आज सुबह,
अखबार बेचने वाला पिदकू लडका
चिल्लाता फिर रहा है
ईश्वर की हत्या !
ईश्वर की हत्या !!
ईश्वर की हत्या !!!
***

बाबा का चेहरा

बाबा के चेहरे के आकाश में
दो आँखें चाँद-तारों-सी चमकती हैं ।
बाबा के होंठ मुद्रणयन्त्र जैसे
मेरे गालों पर आत्मीय चुम्बन छापते हैं
और, बाबा की नाक
खड़ी है बनकर इज़्जत का पहाड़ ।

बाबा के चेहरे पर  
उतार-चढाव के पहाड़ों को लांघते
उड़ती रहती हैं आत्मविश्वास की पतंगें ।
बाबा के गालों की ढलानों में
आपत-विपत के आँधी-तूफ़ान को झेलते
खिलती रहती हैं मुस्कान ।

नयी सुबह के आगमन के साथ
जालझेल की दुनिया झेलने
एक बोझ नये दिन की उठाने, निकलते हैं बाबा ।
शाम को
ख़ुशियों की पोटली उठाये
दुःख की लकीरों को छुपाये
आ पहुँचते हैं, उजला करते घर-आँगन ।

बाबा की
संसार पढ़ने वाली आँखें छोटी हैं
आत्मसम्मान का झण्डा उठाये खडी नाक दबी सी है
सुख-दुःख के आँसू जहां फिसलन का खेल खेलते रहे वे गाल झुर्रीदार हैं अब
मुस्कुराहट लैफ्टराईट करते होंठों पर दरार पड गयी हैं
झुलस गया है मंगोल चेहरा ।

मुझे अच्छा लगता है
बहुत अच्छा लगता है
जब लोग सुनाते हैं
तेरा चेहरा, बिल्कुल तुम्हारे बाबा का चेहरा ।
***

2 comments:

  1. महत्वपूर्ण है ये कविता। ये दौर ये ठंड। ऐसे में बदलाव की प्रक्रिया में बस ये अलाव जलता रहे।
    भाषा में कविता का शिल्प बनाये रखा।इसके लिए आपको भी बधाई हो।

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  2. चन्द्र जी की चार कवितायें पूर्व में पढ़ी थी ...आज पुनः उनको पढ़ना अच्छा लगा क्यूंकि वे अच्छी कवितायें है जिन्हें बार बार पढना अच्छा लगता है| विचारों पर ठण्ड का अतिक्रमण भी हो सकता है इसका सुन्दर वर्णन है "ठण्ड का मौसम" पहाड़ पर ठण्ड की मार झेलने का एक सत्य ... बहुत अच्छी लगी यह रचना| माँ , ईश्वर की ह्त्या, बाबा का चेहरा मर्मस्पर्शी रचनाएं है ... चन्द्र जी को बधाई अनुनाद को धन्यवाद इन्हें पाठकों के बीच साझा करने के लिए

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