Tuesday, June 2, 2015

मृत्युंजय प्रभाकर की कविताएं



मृत्युंजय प्रभाकर की नई कविताएं मुझे मिली हैं। आक्रोश, विषाद-अवसाद, द्रोह-विद्रोह की कुछ अलग अर्थच्छवियों के बीच इन कविताओं को पढ़ा मैंने। मृत्युंजय कुछ दिन पूर्व नैनीताल की ओर आए थे, हमारी मुलाकात नहीं हो पायी, फिर इन कविताओं से मुलाकात हुई और लगा कि ऐसे मिलना भी वैसे ही मिलना है। चर्चित रंगकर्मी, नाटककार और कवि मृत्युंजय प्रभाकर पहली बार अनुनाद पर छप रहे हैं, मैं अपने कवि-साथी का यहां स्वागत करता हूं और आशा करता हूं कि अनुनाद पर यह संग-साथ बना रहेगा। 
***  
दिल्ली की किसी बैठकी में कवि

ओ मेरी माँ पृथ्वी!
यह कौन सा विषाद है 
जो रह रहकर मथता है मुझे
यूँ की जैसे बारिश के बाद भी
देर तक टपकती हैं
पत्तों में उलझी बूँदें

समय ने मेरी पीठ पर
उकेर दी हैं कई लकीरें
वे आज भी शिकार की कहानियाँ
बयान करती हैं
प्रागैतिहासिक भित्तिचित्रों की तरह

एक शोर गुजरता है
चीरता हुआ मेरे अंतस को
ट्रैफिक पोस्ट से लेकर
गहन एकांत तक
हर जगह वेधता है मुझे

कुछ है, कुछ है कि मुझे
सुनाई पड़ती हैं अदृश्य आवाजें
मिटटी से उपजती है चीख
हवाएं सुनाती हैं वेदना 
मर्मान्तक पीड़ाएं लाती है आद्रता

मैं स्वपन में खुद को
हड़प्पा के चौरस्ते पर 
भागने की चेष्टा में जड़ पाता हूँ
जलते हुए मांस के लोथड़ों की बदबू
जागने पर भी पीछा नहीं छोड़तीं

मेरी नाक और आँख से 
छूटता रहता है पानी 
धुआँती रहती हैं ग्रंथ और टीकाएँ
मैं श्मशान में तब्दील 
ज्ञान के चीथड़े बटोरता हूँ

बदलते हुए समय के बीच
कहीं से भी निकल आते हैं हत्यारे
उन्हें न मेसोपोटामिया की फिक्र है
न दज़ला फरात की
न गंगा घाटी सभ्यता की

वे कहीं भी हो सकते हैं
दरअसल वे हर जगह हैं
बदले हुए नामों और चेहरों के बीच
मृत्यु गंध की तलाश में
वे निरंतर भटक रहे हैं

उनके जो चेहरे दिखते 
या दिखाए जाते हैं
उनके पीछे भी
अनगिन अक्स छुपे होते हैं
सफ़ेदपोश

मेरी माँ पृथ्वी 
ओ मेरी माँ पृथ्वी
मुझे माफ़ कर देना
मैं तुम्हें झुलसने से बचा सकूँ
इतना सक्षम आज भी नहीं हो पाया।
(01/07/2014)
***
15 अगस्त के नाम

यह एक तारीख मात्र नहीं है
बल्कि इस बात का उद्घोष है कि
हम उस स्वाधीन देश के वासी हैं
जहाँ रोज ही अपनी ही जनता को 
शाषण द्वारा भरपूर डंडा किया जाता है 

यूँ कहें तो हमारा देश
सच में लोकतंत्र की
पराकाष्ठा का नाम है
यहाँ डंडा करने और करवाने वालों को
अपनी भूमिका चुनने का पूरा हक है

पर अब इसका क्या कीजिए कि
बाबाओं और चमत्कारों के इस देश में
होनी-अनहोनी का खेल चलता ही रहता है
तभी तो कल तक डंडा करने का लोकतंत्र चुनने वाले लोग
आज सरेआम डंडा खाने को शापित लोकतंत्र में बदल दिए गए

वही डंडा जो कल को किसी कलुआ, बुधन
शनिचरी के नाम के लोकतंत्र से जुड़ा था
वह आज राजीव, संजय और सुमित्रा के लोकतंत्र से भी नत्थी हो गया था
वह भी भाषा जैसे बेहद ही मामूली मसले पर

सत्ता की मांद सच कहें तो बहुत छोटी होती है
इसमें हमेशा से एक खास वर्ग के लिए ही गुंजाईश होती है
सो जाहिर है इसमें प्रवेश की परीक्षा भी बड़ी कड़ी होती है
सबसे मक्कार, झूठे और दूसरों की लाश पर पैर रखकर आगे निकलने वालों के सर पर ही
इसके राज्याभिषेक का तिलक सजता है

उसके इर्द-गिर्द होते हैं अमीर-उमरा-दरबारी
न्याय का पलड़ा उनकी झुकाए न्यायाधीश
शाषण का बोझ उठाए अमले 
गमलों में सजे भांट
और जयकारा लगाने वाले हाथ

जाहिर सी बात है कि
यह चंद जगहें भरी जाती हैं
गुप्त से भी गुप्ततर ऐयारियों से
जिसकी पहली शर्त और सबक होती है
दूसरों को डंडा करने की लगन और प्रतिभा

इस तरह बाकियों के हिस्से के लोकतंत्र में आता है
डंडा सहने की भरपूर गुंजाईश
जिसे सहने की आदत और क्षमता
राष्ट्र नाम के तिलिस्म में छुपा होता है
जिसकी वर्षी 15 अगस्त को आती है हर साल।
(04/08/2014)
***  
 
फर्ज़ी क्रांतिकारियों के नाम!

यह कोई कविता नहीं है
बल्कि तनी हुई मुठ्ठी
और तने हुए शिश्न में
फ़र्क़ न करने वालों के नाम
एक खुला पैगाम है
मैं जानता हूँ कि क्रांति
अब उम्रदराज हो चुके मॉडलों
और रिटायर हो चुकी हीरोइन की तरह
कोई ग्लैमरस चीज़ नहीं रह गई है
फिर भी बहुतेरे हैं
जो इसके आकर्षण में
खींचे चले आते हैं
साल दर साल
गर्म और ताजे ख़ून के उबाल से भरपूर युवा
जिन्होंने अभी देखें बस हैं
अपने सपनों की उड़ान
जिन्होंने अभी नहीं नहीं टेके हैं अपने घुटने
दुनयावी जरूरतों के समक्ष
और जिनमें अभी भी दौड़ रही है
दुनिया को पहले से सुंदर
और बेहतर बनाने की ललक
वो आज भी चले आते हैं क्रांति की राह
इस बात से बेख़बर कि
उनकी ओर टकटकी लगाए
बैठे हैं कई सारे गिद्ध
दिमागी, आर्थिक और शारीरिक तौर पर
उन्हें नोच खाने को आतुर
समय की बाढ़ में
क्रांति की कतारों में
घुस आए ये गिद्ध
कई-कई तरीकों से बरगलाते हैं
दुनिया से लोहा लेने का माद्दा
रखने वाले इन युवाओं को
और क्रांति के चम्पू में
करते जाते हैं अनगिनत छेद
कई-कई शक्लों में आते हैं सामने
और डराते हैं भविष्य को
कई-कई रूपों में बिगाड़ते हैं
वर्तमान संघर्ष की लय
अगर आप पढ़ सकें
स्थानीय कैडरों के चेहरे की मुर्दनगी
और समय रहते कुछ और न कर लेने का क्षोभ
तो अपने आप भाग खड़े हों इस पथ से
इनसे बच भी गए
तो कदम-कदम पर
पार्टी के भीतर ही
लोकल से जिला कमिटी
और राज्य से सेंट्रल कमिटी तक की
उठा-पटक और दांव-पेंच में ही
खेत हो जाते हैं क्रांति के स्वप्न
एक बड़ी जमात उनकी भी है
जो बस दूसरों की आलोचनाओं से ही
अपना काम चला लेते हैं
ज़मीन पर बिना कोई आधार
आज भी सिर्फ अपने व्यक्तव्य में
दर्शाते हैं क्रांति की धार
और दिशा-भ्रमित करते हैं
इस सपनीले युवा पीढ़ी को
कई तो ऐसे भी हैं शूरमा
जो अपने शिश्न और मुठ्ठी के
तनाव का अंतर भी भूल चुके हैं
जिनके लिए क्रांति बस रात में
बोतल और शरीर का जुगाड़ है
क्रांति की लफ्फाजी से
लफ़्फाज़ियों से अगर
हासिल की जा सकती क्रांति
तो इस देश में कब की आ चुकी होती
अफ़सोस की असली कैडरों की मेहनत
जाया करने में दिन रात लगे
इन फर्ज़ी क्रांतिकारियों का भी
कुछ किया जा सकता
तब शायद हम बचा पाते
युवा सपनों और उम्मीदों को
और फहरा सकते
क्रांति के चम्पू पर एक छोटा सा पाल!
(19.8.2014)


द्रोही

पहले मैं कुलद्रोही हुआ
फिर समाज द्रोही बना
फिर मुझे धर्मद्रोही समझा गया
अब लोग मुझे राष्ट्रद्रोही कहते हैं

मैं अपने ऊपर लगे
इन सारे आरोपों को
खुले मन से स्वीकार करता हूँ
और किसी भी अभियोग के लिए तैयार हूँ

मेरी बस एक ही विनती है
कि मुझे इंसान द्रोही न समझा जाए
क्यूंकि सिर्फ इंसानियत के लिए मैंने
अपने इर्द-गिर्द के परिवेश में आवाज बुलंद की
जिसके चलते मुझे कुलद्रोही, समाजद्रोही, धर्मद्रोही और राष्ट्रद्रोही जैसे विशेषण मिले।

(09/09/2014)
***

कविता करने के लिए कतई जरूरी नहीं है कवि होना

जरूरी नहीं कि कविता लिखने के लिए आपको कवि होना पड़े
दुनिया में हर क्षण रची जा रहीं हैं अद्भुत-अनमोल कवितायेँ
ज्यादातर उनके द्वारा जो कहीं से भी शब्दों की खेती नहीं करते
जरूरी नहीं हैं शब्द या भाषा कविता रचे जाने के लिए
कविता हमेशा शब्दों-अर्थों और निहितार्थों की जुगाली मात्र नहीं है
चुपके से मेरे कान को छूकर अभी-अभी निकल गई ठंडी हवा भी कविता है मेरे लिए
रात के गहन सन्नाटे में सुदूर से आती यह मशीनी आवाज भी कविता है मेरे लिए
बिलखते हुए बच्चे के मुंह में अपना दूध थमा देने वाली माँ से बड़ी बिम्बों वाली कविता भला कैसे रची जा सकती है
रोते हुए को दिए जाने वाले कन्धों से दृढ़ कौन सी कविता पंक्तियाँ होंगी
खेत जोत अन्न उपजा रहे किसान से ज्यादा रचनात्मक कौन सी कविता है
मजदूर के श्रम से निर्मित उत्पादों से सृजनात्मक कौन सी कविता होगी
चूमे हुए होठों के कम्पन से लयात्मक कविता कैसे लिखेगा कोई
प्रेम के चूल्हे में तपकर नदी बन गए शरीर से ज्यादा नाद कहाँ से लाएगी कविता
बच्चों की तुतली मुस्कान को कौन सी ध्वनि में समेटेगी कविता
दोस्तों के सहज साहचर्य को कौन सा अलंकार विभूषित करेगा
गुण और रीति के किन विवरणों में आएगा पक्षियों का कलरव
प्रकृति और अर्थ के किन सन्दर्भों से उत्पन्न होगा बहते हुए नदी की कलकल
कृतज्ञता को ज्ञापित करने में सफल होंगे कौन से सम्प्रेषण 
आखों में उतर आए भावों से अधिक मार्मिक शब्द कहाँ से गढ़े जाएंगे
ढोल और पैर के थिरकने की जुगलबंदी संयुक्ताक्षरों में कहाँ सिमटेंगे
इसीलिए कहता हूँ जरूरी नहीं कविता करने के लिए कवि होना
बिना कवि हुए अन्य कई रूपों में रची जा सकती है कविता 

(14/10/2014)
***

 
अभिव्यक्ति

उस रात फिर
मेरे सीने पर
आंसुओं से पिघलते
कोलतार रख दिए थे तुमने
उस रात फिर
सुलग गई थी
मेरी अंतरात्मा
बाहर सब सर्द था
ज़माने को गुजरता
देखते हुए भी
अपने ऊपर से
पर भीतर में
फिर धधक उठे थे लावे
तुमने फिर मथ दिया था
मेरे अंतर्मन को
अंधे-गहरे कुएं सा
फूटा था मैं
जिसका सोता
कहीं नहीं पहुंचा था
जरूरी नहीं
हर दृश्य को मिले
पारखी नजर
जरूरी नहीं
हर गूंजन को
श्रवण हो हासिल
जरूरी नहीं
हर क्रंदन को
दिलासा मिले
जरूरी नहीं
हर फूल सूखने से पहले
अपना जीवन पा सके
कुछ चीज़ें
बेमतलब
बेतरतीब
भी होती हैं
मेरी तरह
जरूरी नहीं कि
कवि ढूंढ ही ले
सही शब्द
जरूरत के वक़्त
यह भी जरूरी नहीं
छलक ही जाए
सही रंग
कैनवस पर
जरूरी नहीं कि
हर सुर
गले को जीवन दे दे
जरूरी नहीं सब कुछ
अभिव्यक्त किया जाना
मुर्दा कुछ नहीं बोलता
सबको झकझोर जरूर जाता है।
(26/10/2014)
*** 
 

एक सवाल जो अक्सर
उछाल देते हैं मेरी ओर
मेरे आस-पास के लोग
इतना क्यूँ लिखते हो?
अगड़म-बगड़म कुछ भी
क्यूँ जरूरी है
हर बात पर
देनी प्रतिक्रिया
करना अभिव्यक्त खुद को
सिवा खुद को
चिन्हित करवाने के
कातिलों, दंगाइयों, लुटेरों
और लुच्चों की आँखों में
हासिल क्या है इनका
क्या बन या बिगड़ रहा है
तुम्हारी अभिव्यक्ति से
खुद को नुकसान पहुँचाने के अलावा
क्या हासिल है इन सबका?
सही कह रहे हो दोस्त
कुछ भी तो हासिल नहीं
मेरे विरोध का किसी भी मुद्दे पर
सिवा खुद को ख़ारिज करवा लेने
और भी अलग-थलग पड़ जाने के
जबकि देखता हूँ आस-पास
रोज विचारों और आचरण में
नंगे हो गए लोगों को सरेआम
बहुत समझदार लोगों को
देखता हूँ ओढ़ते हुए चुप्पी
और खाते हुए मलाई
पर फिर भी लिखता हूँ निरंतर
क्यूंकि मैं लिखता नहीं
तो सड़ गया होता
उन फलों की तरह
जो पकने के बाद भी
इस्तेमाल में नहीं आए
लिखता नहीं तो
एक घुटी हुई चीख
बनकर रह जाता
जो और भी पीड़ादाई होता
मेरे अस्तित्व के लिए
मैं लिखता हूँ
सब कुछ
साफ़-साफ़
ताकि और नहीं कुछ तो
खुद की सफाई होती रहे
मैं लिखता हूँ
कि कम से कम दर्ज रहे
उनमें हमारा समय और समाज
जरूरी नहीं कि हर कवि लिखे
अच्छी कविता
इस बुरे समय में!
(29/10/2014)
*** 

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