Friday, April 17, 2015

स्मृति एदुआर्दो गेलेआनो : यादवेन्द्र

13 अप्रैल को लैटिन अमेरिका के 74 वर्षीय विद्रोही रचनाकार पत्रकार एदुआर्दो गेलेआनो का कैंसर से निधन हो गया। भले ही उनकी कर्मभूमि उरुगुए रहा हो पर सम्राज्य्वादी शोषण के विरुद्ध उनकी बुलंद आवाज़ को पूरी दुनिया में बड़े सम्मान के साथ सुना जाता रहा है। लगभग तीस किताबों में उनका साहित्य संकलित है -- "ओपन वेन्स ऑफ़ लैटिन अमेरिका : फ़ाइव सेंचुरीज ऑफ़ द पिलेज ऑफ़ ए कॉन्टिनेंट" अमेरिका की अगुवाई में लैटिन अमेरिकी देशों के दोहन का दस्तावेज़ी सन्दर्भ ग्रन्थ माना जाता है। "मेमोरी ऑफ़ फ़ायर" तथा "सॉक्कर इन सन एंड शैडो" उनकी अन्य चर्चित किताबें हैं।रचना कर्म के लिए उनको जेल जाना पड़ा, निर्वासन झेलना पड़ा और किताबों पर प्रतिबन्ध क्या क्या नहीं झेलना पड़ा। अन्याय के प्रति अत्यंत मुखर स्वर को श्रद्धांजलि देने के लिये उनके संकलन "द बुक ऑफ़ इम्ब्रेसेज़" से उद्धृत इन  गद्य कविताओं  से ज्यादा सटीक और क्या हो सकता है।   

 
इंसानी बोली की शान में - 1  

                                

शुअर इंडियन -- जो जिबरोज़ के नाम से भी जाने  जाते हैं -- युद्ध में परास्त करने के बाद अपने दुश्मनों का सिर कलम कर देते हैं। इतना ही नहीं काट कर वे उनके सिरों को इतने कस के दबाते पिचकाते हैं कि वह आसानी से उनकी हथेलियों में समा सके …वे ऐसा कर के दुश्मन योद्धाओं के दुबारा जीवित न होने देने का इंतज़ाम कर लेते हैं। पर परास्त कर देने के बाद भी दुश्मन काबू में आ ही जाये ज़रूरी नहीं .... सो , वे उनके होंठ खूब अच्छी तरह से सिल डालते हैं ,वह भी ऐसे धागे से जो कभी सड़े गले नहीं।  

इंसानी बोली की शान में - 2 

उनके हाथ रस्सी से कस कर  बाँधे हुए थे पर उनकी उंगलियाँ अब भी थिरक रही थीं .... इधर उधर उड़ रही थीं और शब्दों को पकड़ रही थीं। उन कैदियों के सिर को लगभग छूती हुई छत  थी पर जब वे पीछे की ओर झुकते तो बाहर का कुछ हिस्सा थोड़ा थोड़ा दिखायी देता। उनको आपस में बात करने की सख़्त मनाही थी पर वे  कहाँ मानने वाले -- मौका मिलते ही हाथों की भाषा बोलते थे। पिनिओ उन्गरफेल्ड ने मुझे उँगलियों की पूरी वर्णमाला सिखायी थी -- उन्होंने भी यह भाषा जेल में ही सीखी थी ,बगैर किसी टीचर के सिखाये ……

"हम में से कईयों की लिखावट बेहद भद्दी और ख़राब होती है ....  जबकि कुछ लोग कैलीग्राफी में उस्ताद होते हैं", उन्होंने मुझसे कहा था। 
 
उरुगुवे की तानाशाही का फ़रमान था कि हर अदद इंसान अकेला दूसरों से अलग थलग रहे ……बल्कि गैर इंसान बन कर रहे -- जेल हो या बैरक .... पूरे देश में जहाँ कहीं भी रहे आपसी बातचीत पूरी तरह गैर कानूनी करार दे दी गयी थी। 

कई ऐसे कैदी थे जिन्हें ताबूत के आकार की कोठरी में दसियों साल से ऐसे रखा गया था जिस से लोहे के फाटकों और गलियारे में ड्यूटी देते पहरेदारों के पदचाप के सिवा कुछ भी सुनायी न दे।फर्नांडीज हुईदोब्रो और मॉरिसियो ऱोजेनकॉफ सालों लम्बी कैद इसलिए निभा गये क्योंकि वे दोनों अलग अलग कोठरियों में रहते हुए भी आपस में बात कर लेते थे -- अपनी अपनी दीवार को थपथपा कर। इस तरह वे अपने सपने और स्मृतियाँ साझा कर लेते थे .... अधूरे छूट गये प्रेम संबंधों की बातें कर लेते थे … वे खूब बातें करते , कभी कभी बहस तक कर लेते थे …एक दूसरे को कई बार सीने से लगा लेते थे और दूसरे ही पल गाली गलौज पर उतर आते थे....अपने विचारों ,विश्वासों ,खूबसूरती के बारे में धारणाओं ,आशंकाओं और गलतियों का आदान प्रदान भी करते थे ....यहाँ तक कि उन बातों में भी उलझ जाते थे जिनके कोई उत्तर नहीं ढूँढे जा सकते थे। 

जब जब बोलने की वास्तविक तलब उठेगी -- और बगैर बोले रहना संभव नहीं रह जायेगा -- तब किसी इंसान को बोलने से कोई रोक नहीं पायेगा। यदि मुँह बाँध दिया जायेगा तो वह हाथों की भाषा बोलेगा… या आँखों के जरिये संवाद करेगा … दीवारों में दरारें ढूँढेगा , किसी भी तरह बोलने का रास्ता निकाल ही लेगा। हमारे जैसे हर अदद इंसान के पास ज़रूर कुछ न कुछ ऐसा होता है जो वह दूसरे को कहना चाहता है .... यह बात कभी हमें खुश कर सकती है और हम इसको उत्सव जैसा मना सकते हैं … तो कभी अच्छी न लगे तो हमें बोलने वाले को माफ़ी भी देनी पड़ सकती है।   

3 comments:

  1. वाह, बहुत शानदार लेखन

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  2. आवाज दबा दी जाती हैं पर आवाजे अपने लिए रास्ते ढूंढ लेती है... युद्ध और बंदीगृहों की विकट त्रासदी का अद्भुत दस्तावेज .... एदुआर्दो को नमन . श्रद्धांजलि

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