Friday, July 4, 2014

शेरसिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ के कविकर्म पर प्रो.चन्‍द्रकला रावत



शेरसिंह बिष्ट अनपढ़की कविताओं को पढ़ते हुए
(मेरि लटि-पटि के सन्दर्भ में)

                                                                                     
          कुमाउनी में लिखित साहित्य परम्परा अन्य कई प्रदेशों की तुलना में अभी नवीन ही कही जाएगी क्योंकि इसका प्रारम्भ उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में ही हुआ है। विलक्षण प्रतिभा संपन्न पं. लोकरत्न पंत गुमानीको इसका प्रथम कवि होने का गौरव प्राप्त है। इस परम्परा को आगे बढ़ाने में कृष्ण पाण्डे, गौर्दा, चिन्तामणि जोशी, लीलाधर जोशी, शिवदत्त सती, रामदत्त पंत, श्यामाचरण पंत आदि कई कवियों ने अपना योगदान दिया है। शेरसिंह बिष्ट अनपढ़कुमाउनी कविता के एक चर्चित और सशक्त हस्ताक्षर हैं।
          शेरसिंह बिष्ट अनपढ़की कविताएं कथ्य एवं शिल्प दोनों दृष्टियों से अपनी पूर्ववर्ती कविताओं से भिन्नता लिए हुए हैं। नित नवीनता को प्राप्त होते कुमाउनी परिवेश की यथार्थ अभिव्यक्ति, बदलते मानवीय मूल्यों से आधुनिकता बोध का अहसास दिलाती इनकी कविताएं लोकसाहित्य के अंतर्गत आने वाले गीतों, कविताओं से इसे अलग भी करती है। कविता की सरलता, सहजता व आत्मीयता पर कवि के व्यक्तित्व की पूरी-पूरी छाप भी है जो इसे लोकसाहित्य के नजदीक रखती है - जहाँ कृत्रिमता नहीं है।  दूसरे शब्दों में कहें तो अनपढ़की कविताओं में भावों की विविधता, प्रकृति की सी निरन्तरता, लोक की सरलता-सहजता, विचारों की प्रवाहमयता और अभिव्यक्ति की सहजता विद्यमान है, जो पाठक को बरबस अपनी ओर खींचती है। कविता कहने का ढंग ऐसा, मानो मजाक कर रहे हों, या तुकबन्दी कर रहे हों, मनन करने पर कथ्य की गंभीरता, उसमें निहित सच्चाई की सहज अभिव्यक्ति का अंदाज लगता है। जीवन के प्रति उनका विशिष्ट दृष्टिकोण अनेक दर्शन संबंधी कविताओं के माध्यम से अभिव्यक्त होता है। मुर्दाक बयानकविता जीवन सत्य को इस प्रकार प्रकट करती है-
                                                जनूँ कैं मैंल एक बट्या
                                                उनूँल में न्यार करूँ
जनू कैं भितेर धरौ
उनूलै मैं भ्यार धरूँ
जनूँ कैं ढक्यूणा लिजि
मैल आपुण ख्वौर फोड़ौ
निधाने घडि़ मैं कैं
उनूलै नाङौड़ करौ।1
          इतना ही नहीं वे सगे-संबंधी जो जीते जी भरपेट भोजन को तरसाते हैं, तन ढकने को पर्याप्त वस्त्र नहीं देते, मिट्टी का ढेर (मरणोपरांत) होने पर भोजन हेतु पिण्डदान व नया वस्त्र चढ़ाते हैं। यह एक सामाजिक कटु सत्य है, जो कुमाऊँ की धरती से पूरे विश्व के किसी भी कोने में चरितार्थ हो सकता है -
ज्यूँन जी कैं छाग निदी
मरी हूँ सामोउ धरौ,
माटौक थुपुड़ हौ
तब नौ लुकुड़ चड़ौ।2
          शेरसिंह बिष्ट अनपढ़की कविताएं जीवन के विविध पक्षों पर प्रकाश डालती हैं। कथ्य की विविधताओं से परिपूर्ण होने पर भी पाठकों को अनुभूति का पूरा-पूरा रसास्वादन कराती हैं। इस विविधता पर डॉ. बटरोही लिखते हैं - ‘‘जीवन के इतने विविध पक्षों को छूने पर भी वे रचनाकार की गहन संवेदना से पूरी तरह युक्त हैं और कहीं भी अनुभूति के अधूरेपन का अहसास नहीं होने देती। मानव जीवन क्षण भंगुर तो है ही उसमें नित्यप्रति घटित होने वाले सुख-दुख, हर्ष-विषाद, उतार-चढ़ाव के कोमल और कठोर दोनों चित्र अनपढ़ने अपनी कविताओं के माध्यम से बखूबी प्रस्तुत किए हैं3 यह एक सांसारिक सत्य है कि संसार में जन्म लेने वाला हर प्राणी अकेला आता है अकेला ही चला जाता है। जीवन के एक पड़ाव पर साथ देने वाला साथी अगले पड़ाव पर छूट जाता है। सृष्टि में आवागमन के चक्र के इसी नैरन्तर्य को एक स्वैण देखनऊकविता के द्वारा कवि इस प्रकार व्यक्त करता है-
को कैक् दगौड़ दिना बणबै चुल्यांण तक
कैक दिन दगाड़ रूनई वीक दिन ओछाण तक
रातैल दगौड़ दै देइ बै तिथांण तक
एक डोलि पुजूनऊँ, एक डोलि छजूनऊँ
एक ब्वौज बिसूनऊँ, एक ब्वौज उचूनऊँ
          कवि इस संसार को संसों को संसारअर्थात् संशयों का संसार कहता है, यह संशय माया की ही उपज है। मैं अरू मोर तोर तैं माया4 मैं और मेरा, तू और तेरा की भावना ही माया है, ऐसा तुलसीदास भी कहते हैं। कोई किसी का चिरसंगी नहीं यह सब कुछ जानते हुए भी मनुष्य इस मायाजाल में पड़कर संशयों में उलझा रहता है। अच्छा होता कि मनुष्य इन जंजालों को समझ पाता - इन्हीं भावों को व्यक्त करती जा चेली जा सौरासकविता की ये पंक्तियाँ-
कैक दुख कम बतूं संसों को संसार भै,
सुखिया छिन-छुट ह्वाल क्वै दुखी हजार भै
मरण तलक म्यौर-म्यौर मरि भेर यो हाड़ा माव भै
जाणनी सब क्वे दगाड़ नि ऊँन यो फिर कसि मै जाव भै?5
          कवि सुख-दुख को तराजू के दो पलड़ों की संज्ञा देता है, जो ऊपर-नीचे होते रहते हैं। सुख-दुख दोनों जीवन के महत्वपूर्ण पहलू हैं। दुख से ही सुख की कीमत पहचानी जा सकती है। पीडि़त ही पीड़ा को जान सकता है। दुख के अभाव में सुख का क्या मूल्य?
तु सुखैल जै न्हवै देली मैं सुखै में मरि रूँल
मनखियैकि धरती में द्याप्त जो बणि रूंल
यो दुनि में ऐभेर लै मैं दुनि कैं के जाणुल
जो मनखियै पीड़ छू उ पीड़ कसी पछ्याँणुल।6
          यह संसार एक रैनबसेरा है, जिसमें प्रत्येक मनुष्य एक पाहुने के समान है, फिर भी मनुष्य यहाँ मिट्टी, जमीन हथियाने की मारामारी में लगा है, इसी मारामारी में अन्ततः इसी मिट्टी में ढेर भी हो जाता है। कवि इस स्थिति को देखकर असमंजस की स्थिति में है- हँसू कि डाड़ मारूँ’ (हँसू या रोऊँ) इस शीर्षक से लिखी कविता में कवि कहते हैं - इस संसार रूपी सागर में जीवन रूपी नैया कब कहाँ झूल जाय इस रहस्य को कोई नहीं जानता, फिर क्यों मन में तृप्ति के भाव का अहसास जगाएँ क्योंकि बोझ भर चाँदी भी पास हो तो क्या? कोई साथ लेकर नहीं गया -
मरण मनकै छू याँ भान को भरि ल्हि जाँ
चानि मेले चाँदि बोकौ कान में को धरि ल्हिजाँ।7
          कवि ने जन्म-मृत्यु आत्मा-परमात्मा, जीव-जगत और माया से संबंधित दार्शनिक विचारों की अभिव्यक्ति अत्यन्त सहज भाव से मुर्दाक बयान’, ‘एक स्वैण देखनऊँ’, जा चेली जा सौरास’, हँसू कि डाड़ मारूँ’, ‘धन मेरि छाति’, ‘द्वि दिनाक ड्यारऔर मौत और मनखीकविताओं के माध्यम से की है। यह सत्य है कि मौत शाश्वत है, दूसरी ओर जीवन भी तो शाश्वत है, जहाँ एक ओर मृत्यु प्रतिपल अपना नया ग्रास ढूँढ रही है वहीं नई कोखें भी हरपल आबाद हो रही हैं। कवि कहता है - फिर भला मौत हारी या मैं (अर्थात् मनुष्य) -
तू जग सेउनै रै है, मैं जग ब्यूँजूनै रऊँ।
तू चित जगूनै रै है, मैं चित निमूनै रऊँ।
तू डोलिन ल्हिजानै रै है, मैं डालन देखीनैं रऊँ।
तू फोचिन लुटनै रै है, मैं कोखिन खेलनै रऊँ।8
          सृष्टि के प्रारम्भ से ही प्रकृति मनुष्य की संगिनी रही है। अपने सुख-दुख का प्रतिबिम्ब मनुष्य ने प्रकृति में ढूँढने का प्रयास किया, प्रकृति ने उसे कभी निराश नहीं किया। अपने विविध आयामों के साथ कवि की लेखनी के साथ जुड़ती चली गई और सहृदय को आह्लादित करती रही। कुमाऊँ के सभी कवियों ने प्रकृति के अपार सौन्दर्य को उपमानों के माध्यम से प्रस्तुत किया है। ये उपमान मानव जीवन की नियति को उद्घाटित करने में पूर्णतया सक्षम भी रहे हैं। डॉ.बटरोही लिखते हैं - ‘‘कुमाउनी कविता आरम्भ से ही अपने परिवेश के प्रति ईमानदारी से जुड़ी रही है। जीवनगत सत्यों को प्रकृति के सहज चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत करना और प्रकृति को मनुष्य की जीवन्त जिजीविषा के रूप में चित्रित करना इन कवियों की विशेषता रही है।’’9 बसंत अनपढ़की एक प्रसिद्ध कविता है, जिसमें सौन्दर्य से परिपूर्ण प्रकृति को  अत्यन्त मनोहारी, नयनाभिराम व मानवीकृत रूप में प्रस्तुत किया गया है-
मखमली उज्याव घुरी रौ
ग्यूँ - मसूरै सार
बालाड़ा गालाड़ जामि गई
पिङवा दनकार
                                                          सुरबुरी बयाव लगूँना
                                                          डान-काना बै धात
                                                          कौंई गई दिन यारो बौंई गई रात
                                                          छै रै बसंत है रै फूलों में बात।9
          इतना ही नहीं, बादल, पृथ्वी, पत्ते व रातैं भी बसंत के रंग में रंग गए हैं, प्रकृति के उद्दाम रूप का चित्रण देखिए -
बसंती बादव रनकार बरसनई बेसुध
ब्योलि जै धरती है रै रङ में निझुत
हाव में अङाव हालि बेर झ्वाड़ गानई पात
ज्यूँनि कैं अङाव हालिबेर नीन गाड़नै रात।10
ऐसी सुन्दर प्रकृति-प्रदेश, जिसके सिर पर बर्फ का मुकुट, पदतल पर पवित्र गंगा जो पार्वती के मायके का प्रान्त भी है, बांज के जंगलों के मध्य काँफल, हिसालू, किलमोड़ा आदि फल विद्यमान हैं और बुरांश का सौन्दर्य बिखरा हुआ है, किसके मन और आँखों में नहीं बसेगी-
मन में बसौ म्यौर मुलुक
आँख में रिटौ म्यौर पहाड़ा
ख्वार मुकुट ह्यूंक चमको
खुटि चमकी गंगा की धारा
पारवती को मैतुड़ा देश.....।11
          लेकिन यह प्रकृति तभी तक सुन्दर है जब तक उसका पर्यावरण स्वच्छ व सुन्दर है, फिर पहाड़ों का अस्तित्व तो पेड़ों पर ही निर्भर है। कवि पेड़ों को हीरों के हार व पत्तों को सोने की चूड़ी12 की उपमा देते हुए, इन्हें न काटने का आह्वान करता है। अपनी प्रकृति अपना देश प्राणों से बढ़कर है। वह बापू के महान व्यक्तित्व की आधारभूत विशेषताओं का उद्घाटन कर उनसे पुनः एक बार इस आजाद भारत की भूमि पर उतरने की प्रार्थना करता है। बापू का देश प्राणों से प्यारा है। जिस कुमाऊँ के लगभग अस्सी प्रतिशत रणबांकुरे देश की आन पर मर मिटते हैं, उनके लिए देश ही उनका प्राण है। इस सत्य को सुन्दर मनोभावों द्वारा देश हमौर प्राण छूकविता में इस प्रकार उकेरा गया है-
सैणि-बैग बच्चा बूढ़ा हम जालैं रूँल रे!
आपुण-आपुण बांट देश कें छजूँल रे।
जो मिटूँल तन-मन आपुण देश पर
तिरंगे महान की हम शान बैंणीजूल रे।13
          हद्द है गेकविता के माध्यम से वे देश के नवयुवकों का आह्वान करते हैं कि अपनी जवानी को यूँ ही बरबाद न कर, कमर कसकर ठोकर को भी ठोकर मारने की सामथ्र्य स्वयं में पैदा करें। जीवन में आशा का महत्वपूर्ण स्थान है। विभिन्न निजी, पारिवारिक, सामाजिक व पारस्परिक संघर्षों से जूझ रहे व्यक्ति के लिए आशा और विश्वास ही वे कारगर उपाय हैं, जिससे निराशा से मुक्ति मिल सकती है। मन की हारे हार है, मन के जीते जीतउक्ति कवि द्वारा उद्घाटित भावों को और पुष्ट करती है। हारौ-जितौ मन कि हारौ, हारी मन कैं लात मारो’- कहने वाले कवि का मानना है कि अटूट विश्वास, कड़ी मेहनत से आशान्वित व्यक्ति जिन्दगी के उतार-चढ़ावों से नहीं घबराता-
अघिल बड़नी ट्याक नि लगूँन, उकाव-हुलार ल्याख नि लगूंन।14
          समाज में घटित होने वाली हर वह घटना जो किसी न किसी रूप में मन को कचोटती है, कवि की लेखनी का विषय बनती है बखतैकि बलै’, सासु-ब्वारि, फैशन, ‘बखत बखतैकि बातआदि कविताएं हास-परिहास के लिबास में आज की ज्वलंत समस्याओं बदलते समाज, बदलते मूल्यों का चित्रण सफलतापूर्वक करती हैं। समाज में नित्यप्रति आ रहे परिवर्तनों व उसके प्रभाव को दिखाते हुए कवि सामाजिक विसंगतियों व तेजी से बढ़ रही व्यक्तिगत बुराईयों पर व्यंग्य भी करते हैं। बढ़ते फैशन, युवाओं में बढ़ती नशाखोरी, स्त्रियों के कम होते चले जाते वस्त्र, बहुओं का व्यवहार, युवा-पीढ़ी द्वारा माँ का अनादर- ये वे सामाजिक सच्चाइयां हैं जिनमें गिरते मानवीय मूल्यों की आहट साफ सुनाई दे रही है। अनपढ़की कविताएं जहाँ इन परिदृश्यों से रूबरू करवाती हैं, वहीं इनके मूल में निहित कारणों पर भी चोट करती हैं। जाड़ों  में पहाड़ में रहना अत्यन्त कष्टकर है। पहाड़ की ठंड जहां सुख-साधन सम्पन्नों के लिए महज एक परिवर्तन है वहीं अभावग्रस्त पर्वतीय जनमानस के लिए एक चुनौती है, ‘ह्यून राँडोकविता के माध्यम से यहाँ के विपन्न जीवन का चित्रण देखिए-
न्है घाघरी न्है सुरयाव
कसि काटीं हयूँन-हिङाव
टुटी घर फुटी द्वार, उसै भितेर जसै भ्यार
ख्वारन च्वीनैं पाणी धार, जाड़ के है रौ जती यार।
कसी काटीं आजै ब्याव
कसी काटीं हयूँन-हिङाव।15
पारिवारिक सम्बन्धों पर पड़ती समय की मार का उत्कृष्ट उदाहरण देखिए-
आम कूँनै नाती बुबु कै गईं फिर
च्यौल बाबक् साँक थामौल ज्वे खातिर।16
          आज की बहुओं को देख सास-ससुर, दूल्हा सभी डरे सहमे हैं। दुल्हन शीघ्र ही अलग चूल्हा कर लेती है। टूटते परिवार का चित्रण भी वास्तविक है।17ओ परूवा बौज्यूएक चर्चित गीत है, जिसमें सहज विनोद के साथ-साथ अभावग्रस्त पहाड़ी युवती की सुन्दर वस्त्र-आभूषणों आदि के प्रति ललक प्रदर्शित है। बखतैकि बलैकविता समय के सत्य को उजागर करने में पूर्णतया सक्षम है और भाई-भाई, बाप-बेटे, सास-बहू आदि के संबंधों में आ रही टूटन-गिरावट को भी रेखांकित करती है। शहर की बुराइयां गांवों-गांवों तक पहुँच गई है, जिससे आपसी सौहार्द की भावना खत्म होती जा रही है। आज का मनुष्य मुखौटा लगाए है, जो देखने पर काफी चित्ताकर्षक है किन्तु वास्तविक चेहरे की जुबान और दिल की स्थिति में विरोधाभास है, इस कथनी और करनी के अन्तर को रेखांकित करती पक्तियां द्रष्टव्य हैं-
मुख में मलाइ क्वाठ में जैहर
गौनूँ में ले पुजि गो शैहर
टिक लै कपालि लाल-पिल
दिल में देखौ मुसाँ बिल।18
          फैशन के प्रभाव को आड़डि़ मिलै भौजि नाड़डि़पंक्तियाँ विरोधाभास के साथ बखूबी प्रस्तुत करती हैं। विविध प्रकार के व्यसनों में पड़ने, मादक पदार्थों के सेवन से युवा वर्ग जवानी में ही बुढ़ापे को प्राप्त होने को विवश है।19 प्रणय जीवन का आधार है और काव्य भी इसके बिना अधूरा है। प्रेम के विविध रूप हैं। दाम्पत्य जीवन के आधार स्तम्भ प्रेम को भी  अनपढ़ने अपनी कविताओं का विषय बनाया है। मेरि लटि-पटिसंग्रह में मुख्यतः मैं कसिक रूँल, मैं कै दगै खेलूँ होलिऔर सुवैकि नरैतीन प्रेम सम्बन्धित कविताएं हैं, जो वियोग श्रृंगार रस से परिपूर्ण हैं। प्रेमी की सुआ (प्रेमिका) मायके में है, होली का अवसर है, उसे लगता है कि काश! वह पास होती तो परस्पर रूठने-मनाने का क्रम चलता, लेकिन-
होलि छी सुवा होलि गांनी
तू मैं कै मैं तु कै खानी
तू कताकै रिस्यै जानी
मैं कताकै नि बुलानी
तेरि मैते झुकि रै डोलि
मैं कै दगै खेलूँ होलि!20
          जब प्रिया दूर हो तो नराई’ (याद आना) लगना स्वाभाविक है। यह स्मृति और तीव्रतर होती चली जाती है जब चातुर्मास की झड़ी लगी हो या पूर्णिमा की रात हो और-
जब हरी चैमास ल्यूँ छौ झुँण-मुँण सौंणे की झड़ी
ˣ                  ˣ                  ˣ                  ˣ
जब ऊँनी जुन्याली राता सुर-सुर बयाव पड़ौं।
ˣ                  ˣ                  ˣ                  ˣ
जब खुलनी दिशि-घामा भुर-भुर उज्याव हुँ छौ।
पापी मन उदेख लगूँ तेरि सवा मैं याद ऐं छौ।21
          कथ्य के धरातल पर समृद्ध अनपढ़की कविताएं शिल्प की दृष्टि से भी कम नहीं है। आज शैल्पिक और भाषागत दुरूहताओं के कारण जहाँ कविता आम जन से दूर होती जा रही है, वहीं अनपढ़की कविता का शिल्प सहज व स्वाभाविक है, जिसका प्रयोग वे सामान्य बोलचाल में भी करते हैं। यह अधिक ग्रहणीय व प्रभावोत्पादक है। यद्यपि  रामकमल राय मानते हैं- ‘‘रचनाकार जिस समय रचना करता है, उस समय उसे न तो भाषा की चिन्ता होती है न भाषा के मामले में किसी चिन्ता का बोध होता है..... जो वह लिखता है और जिस भाषा में वह लिखता है, उसमें रचनात्मकता है या नहीं, इसका विचार दूसरे करते हैं और रचना हो जाने के बाद करते हैं।’’22 किन्तु इसके विपरीत अपेक्षाकृत समृद्ध भाषाओं के कवियों द्वारा भी धरती के जुड़ाव के अभाव में शिल्प की जटिलताओं का आश्रय लेने के सम्बन्ध में बटरोही लिखते हैं शेरसिंह बिष्ट अनपढ़जैसे कवि जब अपेक्षाकृत अविकसित भाषा कुमाउनी के माध्यम से अपने परिवेश के बीच जीकर अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करते हैं तो उनकी यह अभिव्यक्ति अधिक विश्वसनीय, अधिक प्रामाणिक और अधिक प्रभावशाली होती हैं क्योंकि वहाँ व्यक्तिनिष्ठ अनुभूति और वस्तुनिष्ठ अनुभूति जैसा कोई अन्तर नहीं होता’’23
          अनपढ़की कविताओं की भाषा में कुमाउनी के ठेठ विशिष्ट भाव व्यंजक शब्दों का प्रयोग देखने को मिलता है, जिनके सापेक्ष हिन्दी में कोई एक निश्चित शब्द कम ही मिलता है। जैसे- नरै, लाट, डौरि खेलण, व्यवमून, क्वाड़न, कुकैल, लठयूण, घुरीण, झुरीण आदि शब्द जब सप्रसंग आते हैं तो अत्यन्त कलात्मक चित्र उपस्थित करते हैं। कहीं-कहीं शब्दों की पुनरावृत्ति देखने को मिलती है, जिससे कविता में लयबद्धता से संगीतात्मकता तो आती ही है, भावों में और अधिक गाम्भीर्य भर जाता है। जैसे- कचकच, बट्याओ-बट्याओ, लठयाओ-लठयाओ, चड़ाओ-चड़ाओ आदि। तद्भव शब्दावली कुमाउनी की रीढ़ कही जा सकती है। डॉ. रूवाली के अनुसार कुमाउनी में तत्सम शब्दों की तुलना में तद्भव व देशज शब्दों का प्रयोग अधिक हुआ है। विदेशी शब्दों में - अकौर (अकरा), जमीन, ईमान, खबरदार, खातिर, बखत, वजीर, अचार, फकीर, जवानी, शहीद, कुर्त आदि उर्दू शब्द व फैशन, बिलौज (ब्लाउज), कोट, पैन्ट, काॅलर, बंडल, सिगरेट, मिनट, बोतव (बॉटल) गिलास, लीटर आदि अंग्रेजी शब्द पूर्णतया कुमाउनी उच्चारणानुरूप ध्वनियों के साथ प्रयुक्त हुए हैं। खिलखिलाहट, टिटाट, खितखित, फटाफट, कचकचाट, छटबटाट, फटफट आदि ध्वन्यात्मक शब्दों ने कविता में नादसौंदर्य उत्पन्न किया है। सामान्यतः चमत्कार उत्पन्न करने, सौन्दर्य वृद्धि व भावों में अधिक गहराई पैदा करने के लिए मुहावरों व कहावतों का प्रयोग काव्य में किया जाता है। अनपढ़की कविताओं में भी छाति लगूण, बलिक बाकौर, नरै लागण, हिया हॉकुरि लागण, धार मैंक दिन, लागी में लागण, कावा का गास, घरौ दि निमाण, रङ में रङण आदि कुमाउनी मुहावरों का बहुत सटीक प्रयोग हुआ है। यथास्थान लोकाक्तियों के प्रयोग से संक्षिप्त भावों की अभिव्यक्ति में भी प्रभावोत्पादकता बढ़ गई है। मैं पुआ घर, मैं-बाप तक, अघिल बड़नी ट्याक नि लगॅून, उकाव-हुलार ल्याख निलगूँन, तुम जदुकै मुख पलासो दुख उदुकै लुकनी, म्यौर छु कै आपण नै, आदि लोकाक्तियों ने कवि के अभिमत को और अधिक पुष्टि प्रदान की है। अलंकारों के यथास्थान प्रयोग से काव्य सौन्दर्य में अभिवृद्धि निश्चित है। अनपढ़की कविताओं में भी अनुप्रास की विविध छटाऐं विद्यमान हैं। उपमा (पुरूषों भाग माजी सुख-दुख ऊनैं रूँनी, तराजुक पाल छन यो तलि-मलि हुँनै रूँनि, मौ जै पाणि, ब्योलि जै धरती हरै, स्योव दियौ बोटूँ जसौ आदि), रूपक (संसार-सागर में यो नाव जाँणि काँ झुलि जैं, दिन-रातैकि सीढ़ी, धन मेरि छाति, दुख-सुख लड्डुप्याड़), उत्प्रेक्षा (जाँणि कौला च्यौल हैरो), मानवीकरण (सुख भाजना द्यो कदुक टाड़, कौंई गई दिन राँडा बौंई गई रात, मखमली उज्याव घुरी रौ ग्यूँ मसूरै सार) पुनुरूक्ति प्रकाश (जागिजा-जागिजा!! कै बेर दगौड़ निहुँन, चै-चै बेर अङाव नि हालो, जब होली हिट-हिट शेरूवा दुनि में आदि) वीप्सा (उठाओ-उठाओ, बगाऔ, लठयाओ-लठयाओ, बट्याओ-बट्याओ आदि), विरोधाभास (मरी मेंलै ज्यूँन रूँ, ज्यूँनै  न्हैं गई ज्यूँनि में), अतिश्योक्ति (आदू सेर चाङव में एक सेर भुस, एक किलो पिसी में डेढ़ किलो भुस) आदि अलंकार काव्य की शोभा को द्विगुणित करने में सफल हुए हैं। कहीं-कहीं प्रतीकात्मक भाषा (फिर को जाणूँ त्यार पुजँण है पैलि जाणि म्यौर हंस पुजि रूँ, दगौड़ नि छुटौ कै को हुलार-उकाव में) का प्रयोग भी कवि ने किया है। बिम्ब योजना में भी कवि पीछे नहीं, दृश्य, वर्ण, भाव और रस बिम्बों के संयोग ने काव्य को कलात्मकता भी प्रदान की है और नैसर्गिक निश्छलता भी।

                                                          सन्दर्भ
1- मुर्दाक बयान, मेरि लटि-पटि, पृ0 01
2- वही, पृ0 01
3- धरती के जुड़ाव की मानवीय दृष्टि (आरम्भिक पृष्ठ), मेरि लटि-पटि।
4- रामचरितमानस (बालकाण्ड), पृ0 118
5- चा चेली जा सौरास, पृ0 05
6- आस दिनै रै; पृ0 12
7- धन मेरि छाति; पृ0 10
8- मौत और मनखी; पृ0 18
9- मेरि लटि पटि; धरती के जुड़ाव की मानवीय दृष्टि (आरम्भिक पृष्ठ), मेरि लटि-पटि।
10- बसंत; पृ0 23
11- वही; पृ0 24
12- मैतुड़ देश; पृ0 25
13- बोट हरीया हीरों का हारा, पात सुनूँ का चुड़; पृ0 42
14- कमर कसौ; पृ0 43
15- ह्यून राँडो; पृ0 51
16- आम कूँनै; पृ0 56
17- डोलि बै हुलरनै है गई, सासु है बेर लै ठुल, दुरगूणाँक दुसार दिन बै रड़ै ल्हिगे चुल; ब्योलियाँक लछण; पृ0 58
18- बखतैकि बलै; पृ0 61
19- लठयूड़ जा च्याल पोत्याई जै है रई, भरपूर जवानी में जोत्याई जा रैई; फैंशन पृ0 64
20- मैं कै दगै खेलूँ होलि; पृ053
21- सुवैकि नरै; पृ0 53
22- सृजन और संघर्ष; पृ0 86
23- मेरि लटि-पटि धरती के जुड़ाव की मानवीय दृष्टि, मेरि लटि-पटि।
***
डॉ. चन्द्रकला रावत : डी.एस.बी. परिसर, नैनीताल कुमाऊं विश्‍वविद्यालय के हिंदी विभाग में लोक साहित्‍य के आचार्य पद पर कार्यरत। कुमाऊंनी भाषा एवं साहित्‍य पर विशेष कार्य। भाषा सर्वेक्षण के क्षेत्र में सक्रिय।  
                                                                                     

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