Monday, July 28, 2014

नीलकमल का नया संग्रह 'यह पेड़ों के कपड़े बदलने का समय है'



कुछ बहसतलब खरी कविताओं के बीच


नीलकमल का दूसरा कविता संग्रह यह पेड़ों के कपड़े बदलने का समय है कई दिन से मेरी मेज़ पर रखा है और मेरी बेचैनी शामिल हो रहा है। कम कवियों की कविता ऐसी होती है जो आपको अपनी बेचैनी में शमिल लगे। यह लगभग भूरे पड़ चुके पन्‍नों पर छपा है –जर्जरता पर लिखे जा रहे नए आख्‍यान की तरह। नीलकमल का पिछला संग्रह हाथ सुन्‍दर लगते हैं मैं देख नहीं पाया,  लेकिन इस  संग्रह के आलोक में मैं उसकी अर्थवत्‍ता भी देख-समझ पा रहा हूं। रूपवाद के विरुद्ध श्रम के सौन्‍दर्य की उस विकल स्‍थापना को महसूस कर पा रहा हूं,  जो संग्रह के नाम में ही गूंजती है – यानी उन समृद्ध परम्‍परा को जो हिंदी कविता में निराला और प्रगतिशील कवियों से अब तक चली आयी है।

पेड़ों के कपड़े बदलने का समय मनुष्‍यों की जिजीविषा के निखरने का समय भी है। यहां प्रकृतिलोक धीरे से जनलोक में बदलता है - 

ढोलक की थाप पर
साल का पहला चैता गाकर
लौटेंगे लोग गांव की तरफ़
अब बदल जाएगा मौसम
तैयार होंगे पेड़
जेठ के उदास दिनों की
लम्‍बी दुपहरियों के लिए
                               (यह पेड़ों के कपड़े बदलने का समय है)

नीलकमल के यहां कविता वैचारिकी की अतिशय भावुक अभिव्‍यक्ति के नकलीपन से दूर हैं, कोई टीन का पत्‍तर नहीं बजता – यहां ठोस आवाज़ें हैं, अनाचार से विद्रोह की प्रतिबद्धता है। उनकी प्रार्थना के इस शिल्‍प पर मैं कुछ कहना चाहूंगा –

कि जहां कहीं भी जारी हो निषेधाज्ञा
लगी हो धारा एक सौ चव्‍वालीस
वहीं बनूं समूह का पांचवां आदमी
                                    (ओ मेरी प्रार्थनाओं)

जाहिर है कि इधर समय निषेधाज्ञाओं से भरा हुआ है। यह कवि आम समाज में प्रार्थना जैसी रूढ़ हो चुकी क्रिया को पूरे कवि-कौशल के साथ प‍हले तो परम्‍परागत लेकिन अपनी विशिष्‍ट अर्थच्‍छवियों द्वारा स्‍पष्‍ट करता है, फिर अंत में उसे उतनी ही ताक़त के साथ निषेधाज्ञाओं के विरुद्ध खड़ा कर देता है।

समकालीन हिंदी कविता में कुमार विकल की नास्तिक प्रार्थनाओं से लेकर देवीप्रसाद मिश्र की एक समूचे मिथकीय ढांचे को ढहाती विद्रोही प्रार्थना तक ऐसे उदाहरण मौजूद हैं कि मनुष्‍य का प्रार्थना पर विश्‍वास कायम रह सके। यह देखना रोचक है कि देवीप्रसाद मिश्र की प्रार्थना से उलट नीलकमल की प्रार्थना, प्रार्थना के शिल्‍प में ही है – वह शिल्‍प नहीं तोड़ती, उसमें नास्‍टेल्जिक प्रतीत होने वाली ध्‍वनियां हैं, वह पुरखों से अर्जित आशीष का सहारा नहीं छोड़ती, दरअसल वह कुछ भी नया करती हुई नहीं लगती – उसका नयापन और आग्रह यह है कि समाज के उस अत्‍यन्‍त साधारण जन के रूप में उसे पढ़ा जाए, जो वंचित है, जिसके लिए प्रार्थना ही सहारा है। नीलकमल कविता के अंत तक आते-आते उसी प्रार्थना को जनसमूह के बीच प्रतिरोध के औज़ार की तरह रख देते हैं। जो प्रार्थना कविता में मनुष्‍यता के पक्ष में अनिवार्य हथियार बनी है, वह नीलकमल के यहां औज़ार बनती है और इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि यह एक कारगर औज़ार है – हमें हथियारों और औज़ारों, दोनों की ज़रूरत है।             

नीलकमल की दृष्टि लोक में उन चीज़ों की ओर जाती है, जो उपेक्षित रहीं, जिन्‍हें झूटी महिमाओं के लदान ने अब तक ओझल रखा। मैं नेट पर उपलब्‍ध नीलकमल की कविताओं की इस विशिटता की ओर आरम्‍भ से ही खिंचता रहा हूं। उनसे वैचारिक असहमतियां होती रहीं क्‍योंकि वे असहमति का वैचारिक शिल्‍प जानते हैं – उनसे ब्‍लाग या फेसबुक पर हुए ऐसे संवादों ने अंतत: मुझे समृद्ध ही किया है। इस सबके बीच उनकी कविता के प्रति यह आकर्षण बढ़ता रहा,क्‍योंकि जिन बातों पर वे संवादों में बल देते रहे, उन्‍हें उन्‍होंने अपनी कविता में सम्‍भव करके दिखाया। मैं पूरे विश्‍वास से कह सकता हूं कि अष्‍टभुजा शुक्‍ल और केशव तिवारी की ही तरह नीलकमल के रचना संसार का लोक इधर की कविता का सबसे प्रामाणिक लोक है। ये बहुत सच्‍ची आवाज़ें हैं, इनका खरापन असंदिग्‍ध है। नीलकमल पर मेरे इस विश्‍वास के पीछे यह एक ऐसी कविता है, जो मेरी प्रिय कविताओं में है। इसे पूरा उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं किया जा सकता –

चैत के चढ़ते दिनों में
चिलचिलाती धूप में
ये खिलखिलाते फूल

पोखर के सतह पर
तैरते पुलकित मुदित
ये देव शिशु

पूजा घरों से बहिष्‍कृत
प्रेमीजनों से तिरस्‍कृत
लेकिन उठाए माथ
दीन अनाथ

ये नीलाभ-वर्णी आग की लपटें
पानी के महल में
                     (जलकुंभी के फूल)

ऐसी कविता जिसे आप सीधे नागार्जुन-केदार की प्रगतिशील परम्‍परा में देख सकते हैं। उन्‍हीं प्रिय ध्‍वनियों का मौलिक संधान। माथा उठाकर जीते बहिष्‍कृत-तिरस्‍कृत दीन-अनाथ जनों का शानदार रूपक रचती ऐसी कविता, सहजता जिसका सबसे बड़ा गुण है। त्रिलोचन के शब्‍दों में सहज-सुन्‍दर। जीवन की सुन्‍दरता को वहां खोजना, जहां समाज के महाजन उसे नकारते रहे। संघर्षशील वंचित जनों के लिए रचने के साथ उस शिल्‍प में रचना, जो उन तक पहुंच सके और बड़े-बड़ों में देखे गए सरलीकरण से बुरी तरह ग्रस्‍त सुभाषित भी न बने – यही वह खरा कवि कौशल है, जिसकी वजह से मैं नीलकमल की कविता का सम्‍मान करता हूं, उसे प्‍यार करता हूं।   

नीलकमल के इस संग्रह में एक सधा हुआ व्‍यंग्‍य हर कहीं मौजूद है। कहने की ज़रूरत नहीं कि व्‍यंग्‍य बहुत जटिल शिल्‍प है, जिसके लिए वैचारिक प्रतिबद्धता, अपने आसपास से गहरा लगाव और सजग सामाजिक दृष्टि ज़रूरी होती है। कविता के भीतर यह कविता की आलोचना है - 

कभी आप विचार को
जनेऊ की तरह धारण करते हैं

कभी आप जनेऊ को
विचार की धारण करते हैं

दोनों ही स्थितियों में सुविधानुसार
विचार को कान पर टांग लेने की सुविधा है
कविता की दुनिया में बस यही एक दुविधा है
                                                          (सुना आपने)             

कान पर जनेऊ टांगने के बाद जो जैविक जीवन में होता है, ठीक वही विचार को कान पर टांगने से कविता में होता है। भीतर से खोखले हो चुके विचार से चूके हुए कवि सर्वत्र यही करते हुए दिखाई देते हैं। नीलकमल कविता में इसे इंगित कर पाने का साहस है। व्‍यंग्‍य के शिल्‍प में आग्रह नहीं, एक तड़प होती है, जैसी यहां है कि भाई विचार जनेऊ के दिखावे की तरह धारण करने और कान पर टांगने की चीज़ नहीं है। फिर यह भी समझने की बात है कि जनेऊ का उल्‍लेख अनायास ही एक तरह के जातीय अभिजात्‍य की ओर भी इशारा करता है, ठीक यहीं आप जलकुंभियों के फूलों को याद करें तो बात और स्‍पष्‍ट हो जाएगी।    

इस संग्रह की कविताओं में कविता की बहस भी लगातार जारी रहती है। समकालीनता के बारे में,मखमली शब्‍द बचे रहेंगे, राजधानी के कवि, दस्‍तख़त न करना आदि ऐसी ही कविताएं है। लांग नाइंटीज़ की बहस में कविता की यह भागीदारी देखिए –

उनके चेहरों से ज्‍़यादा चमक
है उनके जूतों पर

वे नब्‍बे के दशक में पैदा हुए
और सवारी की अस्‍सी की पीठ पर

उनके जैसा नहीं हुआ
कोई भी चमकदार किसी दशक में
न उनके पीछे न उनके बाद

कुछ इस अंदाज़ में
इतिहास में दर्ज़ होने के लिए
मचलते रहे जूते और चमक जूतों की।
                                                (चमक)

यह प्रतिक्रिया उसी कोलकाता से उपजी है, जहां कविता को दशकों के दड़बों में बंद करने की वह बहस छेड़ने की कोशिश की गई।

मैंने पाया है कि नीलकमल की कविता सिर्फ़ बहस नहीं छेड़ती,अपने विरुद्ध बहस छेड़ने का अवकाश भी छोड़ती है। कविता में रहने-बसने का इस कवि का अपना अंदाज़ है, जो कई लोगों के लिए अड़चन पैदा कर सकता है, जिसे आप इन पंक्तियों में महसूस कर सकते हैं और कविता के पक्ष में एक और नई बहस छेड़ सकते हैं –

व्‍यवस्‍था की क्रूरता सबसे पहले
चिन्हित करता हूं पिता में
बाज़ार की चमक में घिसे सिक्‍के-सा
उछालता हूं प्रेम
और अपराजित उम्‍मीद के साथ
हे कविता के अंतिम प्रेमी
तुम्‍हारी ही चौखट तक लौटता हूं

युगों से तुम्‍हारी ही लड़ाई लड़ता
मैं कवि-कुल-शील ख्‍यातिलब्‍ध
राजेश, मंगलेश, अरुण,
केदार, बद्री नहीं
                    (इस सफ़र में- एक आत्‍म वक्‍तव्‍य)      
  
संग्रह में शामिल लम्‍बी कविता के लिए एक अलग लम्‍बी टीप की ज़रूरत है- उस पर अगली बार। कविसाथी नीलकमल को पाठ और संकेतों के नए-नए बन रहे झूटे संसार में अनेक अभिप्रायों से भरे इस खरे और बहसतलब संग्रह लिए बधाई और अनेक शुभकामनाएं।
***
- शिरीष कुमार मौर्य  

1 comment:

  1. मैंने नीलकमल जी की कविताएँ फेस बुक , ब्लॉगस और कुछ पत्रिकाओं में पढ़ी हैं ... वे शानदार कवि हैं . यहाँ उनकी समीक्षा पढ़कर अच्छा लगा . शिरीष जी आपका हार्दिक आभार !!
    - कमल जीत चौधरी [ साम्बा , जे० & के० ]

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