Sunday, February 9, 2014

अमित श्रीवास्‍तव की नई कविता



अमित श्रीवास्‍तव की यह कविता स्‍थान विशेष तक सिमट कर नहीं रह जाती, अपनी वैचारिक क्षमता और घुप्‍प अंधेरे बिम्‍बों की भयावहता के बीच देश भर में फैले ऐसे अनगिन स्‍थानों और लोगों के दु:खों का- संघर्षों का आख्‍यान बन कर सामने आती है। यह चीख़ की तरह फैलती जाती है, दिमाग़ के सोए तंतुओं को झकझोरती तनाव की तरह बढ़ती है। इसका द्वन्‍द्व गज़ब बौखलाता-सा पर सधा हुआ है। मनुष्‍यता को बचाने के लिए ज़रूरी क्रोध, अकसर जिससे आज की कविता वंचित रह जाती है, इस कविता को ख़ास बनाता है। ये अब भी युवा कविता में दुर्लभ जगहें हैं, जहां आँख के कोनों का कीचड़ भी दिप दिप करता है। अमित का कवि अब जितना वैचारिक होता जा रहा है, उतना ही साहसी भी – जो मेरे लिए बहुत सुन्‍दर और आत्‍मीय दृश्‍य है। इसे पढ़ते हुए अनायास ही नागार्जुन की 'हरिजन-गाथा' के कुछ अंशों की यादें भी जुड़ने लगती हैं।

कविता के बारे में अमित के अंतिम शब्‍द दुहराते हुए बहुत संक्षेप में कहूं तो दरअसल यह लाल रंग की एक सुबह की कविता है, जब पर्दा असल में उठता है...विश्‍वास है कि पाठक इसे गहराई से महसूस कर पाएंगे।

घटना की अख़बारी तफ़सील कुछ इस तरह है – वीरपुर लच्छी रामनगर, नैनीताल का एक गाँव जिसमे कुछ दलित परिवार, कुछ सिक्ख और कुछ अन्य जाति समुदाय के लोग रहते हैं। इसी गाँव से लगकर दाबका नदी से खनन होता है और यहीं पास में स्टोन क्रशर भी लगा है जिससे आने जाने वाले सैकड़ों डम्पर गाँव की कच्ची सड़क से धूल उड़ाते जाते हैं। इस स्टोन क्रशर के मालिक और गाँव के बाशिंदों के बीच विवाद होने के बाद एक समझौता हुआ कि डंपरों के गुजरने वाली सड़क पर बीच बीच में पानी का छिडकाव किया जाएगा। एक मई २०१३ को इसी पानी के छिडकाव को लेकर ग्रामीणों और स्टोन क्रशर मालिक व डम्पर चालकों के बीच काफी विवाद हुआ। लाठी डंडो का इस्तेमाल हुआ, बंदूकें लहराई गईं, फायर किये गए, झोपड़ियो में आगजनी की गयी, महिलाओं के साथ भयंकर अभद्रता की गयी। कुल मिलाकर फिर वही नाटक दुहराया गया जो हमेशा शोषक और शोषित समाज के बीच घटता रहा है। वामपंथ भी उभर कर सामने आया। दोनों पक्षों की ओर से मुक़दमा पंजीकृत हुआ, तफ्तीश हुई और..... अब की गयी तफ्तीश को एक बार फिर से पुनर्विवेचना के लिए भेजा गया है ... 

इधर की कविता में पहली बार दिखे मेरे प्‍यारे नायक जो दौड़े जाते हो बिना जिल्द वाली एक किताब सर पर उठाए, तुम्‍हें मेरा सलाम।
-शिरीष कुमार मौर्य



वीरपुर लच्छी
एक दिन की करतूत नहीं ये
सदियों लिखे गए अध्याय नाटक के

तलवार से...
फटकार से...
अब पुचकार से
बस पटाक्षेप कुछ अलग होने को संकल्पित
संकल्प, राजनीति के आजू बाजू
शायद रणनीति के ज्यादा

पर्दा उठता है
परदे के पीछे की कई अवांतर कथाएँ
दौड़ती हैं मंच पर अनावृत
धूल और ग़र्द से सनी
इधर दाहिने को एक लम्बी कथा
पेड़ के पीछे से तीर चलाती थी
उधर बाएँ एक छोटी कहानी
सफ़ेद रात में ढेर हो जाती है

बैकग्राउंड स्कोर में एक मनुपुत्र फफोलों के बीच चीखता है
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था’
आगे को आया उंगली उठाये एक नायक
बार बार फ्लैश बैक में चला जाता है
एक बूढ़ा लाठी पर देश की देह टिकाये
हे राम हे राम हे राम
ये कैसी मानव लीला है
नायक जो उद्घोषक होने को अभिशप्त है नई कथा में
कान में फुसफुसाता है
आँख में लहू के थक्के
कुछ निशान अभी बाक़ी हैं
सांस के पोरों पर नमक का स्वाद
छाती भर मवाद, देखो तो’

आँख के कोनों का कीचड़ दिप दिप करता है
उद्घोषक जो नायक होने को अभिशप्त है, रोता है 
बचपने पर राख मलती
उड़ती धूल पर पानी का छिडकाव
अधिकार से नहीं उम्मीद से माँगा था
वो लाज बचाने के धरने नहीं थे
ज़िंदा रह जाने के समझौते थे
जिनपर अंगूठे का नीला निशान
खतौनी की नीली स्याही से गिचपिच हो गया है’

बांह की नसों में एक तनाव ठहरता है
नायक जो उद्घोषक होने को अभिशप्त है
अब बेसाख्‍़ता चीख़ता है
वो दिन
झोपड़ी की आग में छुप गया
सूरज बुझ गया जब 
सामंती गाड़ियों के पहिये वृहद् विशाल 
गीली मिट्टी पर गहरे निशान छोड़ते
तोड़ते रहे मांद ढूह मेड़
मेड़ों पर उगे सपनों के कुकुरमुत्ते
स्वरों से हमारे पसीना नहीं
तब ख़ून टपकता रहा हुज़ूर

बंदूकों के बट इतने कमीने हो उठे
इतने ठोस और भोथरे
कि वो इनसे दूध पर काले चकत्ते छाप देता था
बन्दूक की नाल इतनी बेहया
कि वो लाज को नाल से ऊपर उठाता था
क़ानून... उधर दूर
किसी चश्मदीद के अभाव में
मुख़बिर मामूर करता रहा
चिपकता रहा न्याय
मूंछों के ताव में’

नाटक में एक पॉज़ आता है
उद्घोषक जो नायक होने को अभिशप्त है
नंगा दौड़ जाता है बिना जिल्द वाली एक किताब सर पर उठाए
एक बत्ती जलती है मंच के आख़िरी किनारे
धड़कती साँसों पर लगाम
छोटे बड़े अक्षरों में सबके नाम पते
और बार बार दुहराए बयान रिकॉर्ड करती है
लाल रंग की एक सुबह
पर्दा असल में अब उठता है...
***   
सम्‍पर्क : अमित श्रीवास्‍तव द्वारा शिरीष कुमार मौर्य, दूसरा तल ए-2, समर रेजीडेंसी, भवाली, जिला-नैनीताल(उत्‍तराखंड) पिन- 263 132  

Saturday, February 8, 2014

मृत्‍युंजय की कविताएं

           चर्चित युवा कवि मृत्‍युंजय अनुनाद पर लगातार छपते रहे हैं। उनकी कविताएं मिलना हमेशा ही अनुनाद के लिए सुखद अनुभव होता है। कहना ही होगा ये छंद युवा हिन्‍दी कविता में सामाजिक-राजनीतिक द्वंद्व की एक बेहद सधी हुई सलीकेदार लय सम्‍भव करते हैं। सभी कविता-प्रसंग हमारे बहुत आसपास के जाने-पहचाने हैं, लेकिन इन्‍हें देखने का यह तरीका बिलकुल नया है। 
             इस पत्रिका में तुम्‍हारा फिर फिर स्‍वागत है साथी। 


कवि की छवि केपी की नज़र में


1.
बूंद बूंद चासनी टपकती अंधकार के जल में
जड़-चेतन सब बंधे-बिंधे हैं जातुधान के छल में
सारी रात ओस गिरती थी श्वान वृंद के स्वर में
जाने कितनी दफ्न दहशतें मेरे घर भीतर में
गेहूं झुलस बुझा, मंजरियाँ सूख झरी पाले में
दृष्टि बेधता कुहरा कोई अभी फंसा जाले में

2.
रातें गहरी हिंस्र हवा नाखूनों नीचे सुई कोंच रही है
भीतर बाहर पानी की गरमाहट नोच रही है
धोती साड़ी गमछा चमड़ा गहन बरफ के दाव
बेध रहे हैं राइफलों से अनगिनती हैं घाव
घुटी घुटी सी चीख ठंड से जमी जमी जाती है
खुले कैंप में कब्रों की तादात बढ़ी जाती है

3.
बेहोशी की चादर नीचे भारी गहरी सांसें लो
रेतीले अंधड़ भीतर भी दोनों आँखें खुली रखो
सपने में छट-पट कर बैठो, पीटो छाती माथा पटको
नीम रोशनी के दरख्त से पैर बांध कर उल्टा लटको
बुरा वक्त है फूहड़ चाल रस्ता नहीं खड़ी दीवाल
भरी आँख के लाख सवाल रफ्ता रफ्ता हुए हलाल
छटपट बारहसिंघे पर यों कसता जाय कंटीला जाल
गहरा गहन घुप्प अन्हियारा पुरुष-अर्थ का मुलुक हमारा
सबके भीतर इक हत्यारा बैठ उगलता भाषा-गारा
ज्ञान गूदरी पर अधखाए सेबों के हैं दाग
हे कवि देस बिराना है यह जाग सके तो भाग

4.
सूने बंद अंधेरे कोने मन भीतर कबसे हैं बंद
घन की गहन चोट सी बाजे रातघड़ी की टिकटिक मंद
दुर्दम आवेगी विचार के खुले जख्म में धँसते फंद
दीपक लोभी फंसा फतिंगा अभी उठेगी मौत की गंध
स्वप्नहीन भाषा निषिद्ध मन भाव पत्थरी घायल छंद
काई नींद चीर लहराते ख्यालों के हैं फणिधर चंद
--------------- 

Monday, February 3, 2014

नीलाम्‍बुज की कविताएं

आज प्रस्‍तुत हैं युवा कवि नीलाम्‍बुज की कुछ कविताएं। इनमें कहीं कच्‍चापन है मगर भरपूर ताज़गी भी। अनुनाद कवि को आगे की अधिक विचारवान एवं परिपक्‍व रचना-यात्रा के लिए शुभकामना देता है। 



अंतिम पंक्ति का शीर्षक

तर्जनी , मध्यमा, अनामिका
और यहाँ तक कि कनिष्ठा भी
पा जाती हैं मुझ से ज्यादा इज्ज़त
लेकिन द्रोणाचार्यों  के बीच तो
मैं ही लोकप्रिय हूँ.
मैं ओ के  हूँ
मैं चीयर्स हूँ
मैं शेम हूँ
मैं लिफ्ट हूँ , हूट हूँ
मैं लाइक और डिसलाइक का फ्रेम हूँ
मैं अपने आप में अनूठा हूँ
मैं अंगूठा हूँ।
***

लापता 

कुछ पता नहीं चलता 
शम्बूक के कटे हुए सिर का 
छींटे तो पड़े होंगे रक्त के !
कहाँ हैं वो ?
क्या धो दिया गया उन्हें सोमरस से ?
या यज्ञ की वेदी के नीचे दबा दिया गया ?

क्या हुआ शबरी का
जूठन खिलाने के बाद ?
क्या राम ने दे दी उसे
वृद्धावस्था पेंशन ?
कहाँ दबी होगी उसकी फ़ाइल ?

और तो और
ना जाने कहाँ है
एकलव्य का कटा हुआ अंगूठा भी ,
नहीं दीखता 'गुरु द्रोणाचार्य' वाले
मेट्रो स्टेशन पर भी
या द्रोणाचार्य की किसी तस्वीर में ?

कहाँ गए ऐसे लोग ?
कहाँ गयी उनकी स्मृतियाँ ?

ठहरो !
धरती हिल रही है
और
पाताल तोड़ कर कोई
निकल रहा है बाहर !!!
*** 

मात्र

बाज़ार का दुलारा है 
बड़े प्यार से पाला है 

रोटी खाने जाओ तो मात्र 
टीवी खोलो तो मात्र 
फोन करो तो मात्र 

बाज़ार में तो 
हर होर्डिंग में चिपका मिला है बचुवा
कंडीशन अप्लाई का 
बड़ा भाई है मात्र 

दंगे में मात्र 
चुनावों में मात्र 
घोटालों में मात्र 

संविधान में नहीं है 
लेकिन समाज में 
बड़ी खाप है मात्र 

प्रेम में मात्र 
पुरस्कार में मात्र 
चोरी में मात्र 

हर जगह पूर्ण विराम के पहले 
रिक्त स्थान सा
उपस्थित है मात्र 

'मात्र' देखने में लगता है भोला भाला 
लेकिन 
बड़ा 'नागरिक' है मात्र 

मात्र इतनी सी बात 
इस कविता-मात्र से ही तो 
समझ नहीं आने की 

चलो साथी
तीन रुपये मात्र वाली 
चाय पी जाये । 
***

मदारी

यह कहाँ तक जायज़ है
कि-
इंसान के बच्चों को
हँसाने के लिए
बंदर के बच्चों को
इंसान का ही एक बच्चा
नचाता है
फिर भी –
घुड़की ही खाता है ।

क्या दुनिया भी
पूरी मदारी हो गई है ?
*** 
 
सामासिक संस्कृति
सभ्यता दाल-भात है ! 
स्वाद है संस्कृति?
केवल दाल-भात पेट तो भर देता है
लेकिन कभी-कभी एक अदद हरी मिर्च
(नमक के साथ)
स्वाद बढ़ा देती है
मिर्च कड़वी भी हो सकती है !
( फिर मीठी मिर्ची कभी सुनी भी तो नहीं !)
मिर्च कई तरह से खा सकते हैं –
हो सकता है बने चटनी
लोढ़े-सिलबट्टे पर ।
बन जाएगा आचार , यदि
भर दें उसमें थोड़ा सा मसाला और धन ।
यह बात भूख से निकली थी
और भूख संस्कृति नहीं होती
संस्कृति है स्वाद –
स्वाद : मेहनत का , पसीने का , खून का ।
इन्ही को समेट लो कवि !
सामासिक संस्कृति है यही , यही ।

कवि का कथन 
 
मेरा नाम नीलाम्बुज है. बचपन में पहला उपन्यास ही चित्रलेखा पढ़ा और कविता पढ़ी कुकुरमुत्ता . यहीं  से साहित्य के कीटाणु लग गएडी. यू. से नज़ीर अकबराबादी की कविताओं  पर एम्फिल कर चुकने के बाद  जे. एन. यू. के भारतीय भाषा केंद्र से 'सामासिक संस्कृति और आज़ादी के बाद की हिंदी कविता' पर  पी. एच. डी. कर रहा हूँ. आजीविका के लिए अध्यापन करता हूँ. फ़िलहाल केन्द्रीय विद्यालय, बगाफा, त्रिपुरा में हिंदी प्रवक्ता.
कुछ फुटकर रचनाएँ (शोधलेख, व्यंग्य,आलोचनाकवितायेँ, समीक्षाएं और रिपोर्ताजप्रकाशित.
संपर्क-
08729964909


LinkWithin

Related Posts with Thumbnails