Tuesday, April 30, 2013

मेरे जीवन में-मन में वह एक-अकेला औघड़ बाबा - संस्‍मरण





प्रगतिशील हिंदी कविता का वह परम औघड़-ज़िद्दी यात्री, जिसे नागार्जुन या बाबा कहते हैं, मेरे जीवन में पहली बार आया तब मैं आठवीं में पढ़ता था। 1986 की बात रही होगी जब सुनाई पड़ा कि ये महाकवि हर बरस अपनी गर्मियाँ जहरीखाल में वाचस्पति जी के घर गुज़ारते हैं जो राजकीय महाविद्यालय में मेरे पिता की ही तरह हिंदी के प्राध्यापक हैं। हम उसी इलाक़े में नौगाँवखाल नामक गाँव में रहते थे। दो साल बाद हाईस्कूल की पाठ्यपुस्तक में नागार्जुन की एक कविता बादल को घिरते देखा हैसामने आयी। हालाँकि बरसात के दिनों में मित्रों के साथ शराब पी लेने के बाद पिता को अकसर इस कविता कुछ हिस्से सुनाते हुए पाया था, ख़ासकर वो जिसमें किन्नरों की मृदुल मनोरम अँगुलियाँ वंशी पर फिरती हैं, जाहिर है कविता के उस हिस्से में मदिरा का भी ज़िक्र था, जो तब तक पिता  के उदर और मस्तिष्क के कुछ अंशों पर हावी हो चुकी होती थी। बताना होगा कि पिता 70 के ज़माने में नागपुर में शोध करते हुए नागार्जुन के सम्पर्क रह चुके थे लेकिन उनके ऐसे अद्भुत प्रशंसक थे, जिनमें 60-70 किलोमीटर दूर जहरीखाल में मौजूद अपने प्रिय कवि से मिलने जाने की कोई इच्छा मैंने कभी जागते नहीं देखी। कुछ सबन्ध शायद ऐसे ही होते होंगे, जिनमें सम्पर्क करना/रखना अनिवार्य न होता हो।

बहरहाल, वक़्त बहुत जल्दी गुज़रा और 1990 की बरसात में हमारा परिवार पिता के स्थानान्तरण के फलस्वरूप नैनीताल जि़ले के रामनगर क़स्बे में जा पहुंचा। यहाँ पहुंचते ही सुनाई दिया कि अब फिर बाबा जहरीखाल से काशीपुर आ चुके वाचस्पति जी के घर पाए जाते हैं। काशीपुर की दूरी रामनगर से 27 किलोमीटर थी। मैं भी अब बी.एस-सी. का छात्र हो चुका था और कुछ इच्छाएँ साहित्य प्रेम के चलते मेरी भी जागने लगी थीं। अगले बरस यानी 1991 में वाचस्पति जी का संदेश आया कि बाबा पधार चुके हैं और हम अगर मिलना चाहें तो हमारा स्वागत है। यूं पिता और मैं उनसे मिलने काशीपुर गए। अब तक मैं नागार्जुन को काफ़ी कुछ पढ़ चुका था और उनके धारदार चुटीले व्यंग्य का कायल था। बस में वक़्त गुज़ारते हुए कई बार दिल की धड़कन बढ़ी कि मेरा भी अत्यन्त प्रिय हो चुका यह बुज़ुर्ग कवि कैसा होगा और हमसे कैसे मिलेगा। पतली गली में आकर थोड़ी खुली जगह पर एक उजड़ रही चूना भट्टी के सामने वाचस्पति जी का घर मिला, जिसके मुख्य द्वार पर कालबेल की छोटी गोल काली बटन तो थी ही, एक मोटी लोहे की साँकल भी थी, जिसे बिजली न होने की स्थिति में दरवाज़े पर भरपूर शोर के साथ बजाया जा सकता था। मैंने अपने उस किशोर उत्साह में दोनों का प्रयोग किया तो ऊपर मंज़िल से एक कड़क आवाज़ आयी - अरे बेटू देखो तो कौन है? कहो आ रहे हैं भाई, आ रहे हैं! इतनी भी जल्दी क्या है!  फिर तुरत ही ऊपर से मूंछों वाला एक चेहरा नीचे देखता हुआ बोला - कहिये ! किस से मिलना है!  अब पिता ने अपनी वाणी को अवसर देते हुए कहा - मैं हरि मौर्य हूं.... ऊपर वाला चेहरा एकाएक अपनी मूंछों में जैसे खिल उठा - अरे भाई साब आप है! आता हूं। आता हूं!  हम सीढ़ियों से ऊपर पहुंचे तो एक गोल बरामदे में हमें बैठा दिया गया। पता चला जिस बेटू को आवाज़ दी जा रही थी, वह वाचस्पति जी का बड़ा बेटा है और घर में मौजूद ही नहीं है। वे मूंछें ख़ुद वाचस्पति जी के चेहरे की शान हैं, जिन्हें शायद उन्होंने अपनी स्वाभाविक मानवीय स्निग्धता और स्नेह को छुपाने के लिए उगाया है, ताकि रौब ग़ालिब करने में कोई कसर न रहे। उन्होंने बताया बाबा अभी खाना खाकर सोए हैं, एकाध घंटे का इंतज़ार करना होगा। तब तक एक स्त्री निकल कर आईं, जिनके समूचे व्यक्तित्व में एक अनोखी आभा थी और उतना ही अनोखा अपनापा भी। वे घर की मालकिन शकुतंला आंटी थीं। परिचय के तुरत बाद ही वे मुझे अपने साथ बरामदे के दूसरे कोने पर मौजूद एक कमरे की ओर ले गईं जो उनका कार्यक्षेत्र था- उनकी रसोई। बिना कुछ बोले एक पीढ़े पर बिठाया और आलू-टमाटर की सब्ज़ी और गर्म पूडि़यों की एक विराट प्लेट मेरे सामने धर दी। मैं हिचकिचाया तो बोलीं-  अरे बस से आए हो। बच्चे हो भाई, भूख लग आई होगी। शर्माओ मत, खाओ। अभी खीर भी गर्म करती हूं।  मैंने सोचा क्या मैं यहाँ तक सिर्फ़ खाना खाने आया हूं? तब पता नहीं था कि यही खाना एक दिन मुझे जीवन की उन राहों तक ले जाएगा, जिन पर मुझे कविता से लेकर प्रेम तक वे तमाम चीज़ें मिलेंगी, जिनके बिना अब जीवन सम्भव नहीं।

कुछ देर बाद अंदर के कमरे से अचानक काफ़ी खाँसने-खँखारने और बलगम निकालने की आवाज़ों का एक विकट सिलसिला शुरू हो गया और वाचस्पति जी ने कहा -लगता है बाबा जाग गए!  यह साधारण-सा लगनेवाला वाक्य मेरे लिए बेहद असाधारण था और मैं तुरत कुर्सी से उठकर अंदर जाने को तत्पर हुआ। वाचस्पति जी ने रोका, कहा - ज़रा रुकिए, पहले देख लें कहीं और तो नहीं सोएंगे।  वे अंदर गए और सूचना लाए कि अब नहीं सोएंगे, आप लोगों को बुला रहे हैं। ख़ुदा-ख़ुदा करके सहर हुई थी। हम लोग अंदर गए। मैं पलंग पर बैठे व्यक्ति को देखकर भौंचक्का रह गया। चेहरा तो फोटो में देखा था और उस चेहरेवाले व्यक्ति की कल्पना एक पतले-दुबले बुज़ुर्ग़ की ही थी पर इतने अशक्त की नहीं। बहुत छोटा-सा क़द जो बैठे होने पर और भी छोटा लग रहा था। इस क़द के बड़प्पन के बारे में अभी मुझे बहुत कुछ जानना था।

हमारी पहली मुलाक़ात के तुरत बाद बाबा दस-पन्द्रह दिनों के लिए हमारे घर रामनगर आए और आनेवाले तीन साल तक इसी तरह आते रहे। कुल मिलाकर अपने जीवन के कोई साठ दिन उन्होंने हमारे साथ गुज़ारे होंगे और इन साठ दिनों की स्मृतियाँ अब मेरे जीवन भर का धन हैं। इस धन में बाबा के पत्रों का कुछ चक्रवृद्धि ब्याज भी है, जिन्हें कभी सबके पढ़ने के लिए उपलब्ध कराऊँगा। अभी की बात सिर्फ़ स्मृतियों की.....बाबा के बारे में जो कुछ मैं लिख रहा हूं शायद सैकड़ों बार कई लोगों ने यही कुछ लिखा होगा ...और ऐसा इसलिए कि बाबा का दिया हुआ स्मृतिधन मेरे अकेले की बपौती नहीं....मुझ जैसे सैकड़ों लोगों के पास वह है और कईयों के पास तो मुझसे कई गुना ज़्यादा। ऐसे लोगों में सर्वोपरि वाचस्पति जी हैं पर इस स्मृतिधन को ख़र्च करने में उनके जैसा कंजूस भी मैंने दूसरा नहीं देखा।

बाबा घर आए तो उनके आने की सूचना मुहल्ले की कुछ धर्मपारायण स्त्रियों को मिली। ऐसी स्त्रियों को जिनके पति सुनार, इंजीनियर, व्यापारी आदि थे और उनके गिर्द घूसखोरी, टैक्सचोरी, गबन आदि का बड़ा मज़बूत घेरा था, जिसके भीतर वे स्त्रियाँ पुण्य की लालसा में मंदिरों, सत्संगों, बाबाओं आदि के चक्कर काटा करती थीं। पुण्य और सत्संग की यही इच्छा उन्हें हमारे घर लायी। वे आयीं तो साथ में पुष्प, अक्षत, धूप, मिठाई वगैरह से भरी भारी-भारी थालियाँ भी लायीं, जिन्हें उन्होंने बाबा के चरणों में रखा। बाबा अद्भुत रूप से प्रसन्न हुए। अपनी मूंछों पर कुछ अंश गिराते हुए मिठाई में से कुछ उन्होंने ग्रहण भी किया। फूल आदि उन औरतों के सिर पर रखे तो वे धन्य हो गयीं। उन्होंने बाबा से सत्संग की प्रार्थना की तो उन्होंने कहा कि सुंदर गृहणियों का साथ तो हमेशा ही सत्संग है....वे और भी प्रसन्न हुईं। बाबा ने सासों से बहुओं के हाल पूछे और बहुओं से सासों के। पतियों का भी नंबर आया...कुछ नवविवाहिताएँ लजा गईं। उनके मुखड़े की लाली बाबा को भायी। मैं परेशान हुआ कि यह सब हो क्या रहा है! मुझे बाबा ने कालेज जाने का आदेश दिया। उस सत्संग में आगे क्या हुआ मैं नहीं जानता पर बाबा के प्रवास के दौरान उन स्त्रियों का आना हर साल अबाध रूप से जारी रहा।

मेरी माँ का नाम कला है और वे काफ़ी साफ़ रंग की हैं पर बाबा ने पहले दिन से ही उन्हें कल्लू कहा। बताया कि उम्र, शक्ल-सूरत और आदतों में वे ठीक बाबा की उड़ीसावाली बेटी की तरह हैं अतः वे उनकी बेटी ही हैं और मेरे पिता उनके दामाद जिन्हें ठीक किए जाने की सख़्त ज़रूरत है। माँ इन बातों से ख़ुश हुई और बाबा की ख़ातिरदारी में लगी रही। सामन्ती कूड़े के बीच ज़िन्दगी गुज़ारते रहने के कारण पिता को ठीक किए जाने वाली बात उन्हें विशेष अच्छी लगी थी। बाबा के साथ उनका सम्बन्ध स्थिर हो गया और स्थायी भी। बाबा ने पिता को तंग करने का कार्यक्रम आंदोलन के स्तर पर शुरू कर दिया। पिता से भयभीत रहनेवाला मैं उनकी विद्रोही गतिविधियों में शामिल रहने लगा।

कविता और साहित्य की कोई बात कई दिनों तक नहीं हुई। फिर एक दिन अचानक कुमाऊँनी के प्रसिद्ध कवि श्री मथुरादत्त मठपाल तशरीफ़ लाए। मठपाल जी का बड़ा बेटा नवेन्दु मुझसे पाँच साल बड़ा था और मेरे भीतर की ज़मीन तोड़ रहा था ताकि आइसा, आई.पी.एफ. और जसम के बीज वहाँ बोए जा सकें। मैं अपनी शिक्षा और संस्कारों से मार्क्‍सवादी ही था सो उसे अपने काम में दिक्‍कत नहीं हुई। मठपाल जी ने साहित्य का ज़िक्र बड़े ज़ोरों से छेड़ा...बाबा उनके परिवार में दिलचस्पी ले रहे थे पर मठपाल जी थे कि बात को काटकर कुमाऊँनी कविता पर आ जाते थे। उन्होंने आँग-आँग चिचैल है गोशीर्षक अपनी लोकप्रिय कविता का ज़ोरदार पाठ किया और बाबा को उसका भावानुवाद बताते हुए प्रतिक्रिया की अनिवार्य माँग रखी। बाबा ने थोड़ा पानी माँगा और कुछ देर ख़ामोश रहने के बाद टूटे-फूटे शब्दों में कहा कि जैसे बछड़े को दाग कर साँड बनने और लोगों के बीच आतंक फैलाने के लिए शंकर जी के नाम पर छोड़ दिया जाता है वैसे ही तुम्हें भी कुमाऊँनी के नाम पर किसी ने छोड़ दिया है। यह भीषण प्रतिक्रिया थी और मठपाल जी के कान शायद बाबा की अस्पष्ट आवाज़ को सुनने के लिए ठीक से अभ्यस्त नहीं थे, तब भी इसका भावार्थ उनकी समझ में तुरत आ गया। वे लाल हो गए और चुप भी। अपने आक्रमण के बाद छाए इस युद्धविराम के बीच अब बाबा ने उनकी पत्नी की ओर रुख़ किया। उनसे घर-गृहस्थी की बातें कीं और यह भी पूछा कि एक ज़िद्दी और इतने ज़बरदस्त कवि के साथ निभाने में उन्हें किन मुश्किलों का सामना आम तौर पर करना पड़ता है। कुछ बातें अपनी पत्नी अपराजिता देवी के बारे में बताई और उनके बलिदानों को सलाम भी पेश किया। मेरे लिए इस सत्संग में शामिल रहना कमाल की बात थी। मुझे अब लगने लगा कि यही बाबा नागार्जुन हैं और यही वह बात है जिसके कारण समूची प्रगतिशील कविता में वे अलग हैं। बाबा से मिलने आनेवालों में लालबहादुर वर्मा, उनके दामाद, स्थानीय रंगकर्मी अजीत साहनी और बहुत से वामपंथी कार्यकर्ता शामिल थे।

बाबा हर बार आते और कहने-सुनने को बहुत कुछ छोड़ जाते। मैं उनके व्यक्तित्व को अब जानने लगा। उनकी कविताओं में जो आग, अटपटापन, अपनी तरह की अनोखी कलात्मकता, सपाटबयानी, छंद, बहक, तोड़-फोड, भटकाव, विचार, प्रतिहिंसा, शास्त्रीयता, लोकराग आदि एक साथ था, वह सबकुछ ज्यों का त्यों ख़ुद उनमें भी उसी स्तर पर मौजूद था। वे अपनी कविताओं की तरह थे और कविताएँ उनकी तरह थीं।

दिनचर्या के बारे में निजी हो कर कहूं तो वे नहाना तो दूर कभी दाँत भी साफ़ नहीं करते थे। कपड़े कभी महीने में मुहूर्त निकालकर बदलते थे। उनके धुले कपड़े भी मनमाने इस्तेमाल के चलते ख़ासे गंदे ही दिखाई देते थे। मेरी माँ उन्हें एक-एक घंटा उबलते पानी में रखती थी। खाने के शौकीन पर कम खाते थे। दिन में एकाध बार बिफरने की हद तक नाराज़ हो जाते थे। भद्रलोक की ऐसी-तैसी करने का कोई मौक़ा नहीं गँवाते थे। भाषा का बोलचाल में कभी-कभी कवितानुमा इस्तेमाल करते थे और कविता में बोलचालनुमा का। मेरे हिस्से के दिनों में मैंने उन्हें कभी कविता लिखते नहीं देखा - हाँ, पत्र लिखा करते थे.... पोस्टकार्ड्स पर कुछ पंक्तियाँ, जो अकसर श्रीकांत, विजयबहादुर सिंह, हरिपाल त्यागी, रामकुमार कृषक आदि के नाम होते थे और उनमें बाबा की निकटसम्भावी दिल्ली वापसी का ज़िक्र होता था।

मेरे पिता पान खाया करते थे... दिनभर में चालीस-पचास......निरन्तर....जबड़ा चलता रहता था....बोलते बहुत कम थे। बाबा को यह बात अच्छी लगी। एक दिन कहा भी कि हरि तुम पान खाते हो और हम लोगों की जान खाते हैं....पान की वजह से बोलते नहीं हो...अच्छा करते हो....कई लोगों को सुख मिलता होगा। औरों का तो पता नहीं पर शायद ख़ुद बाबा को ज़रूर कोई सुख मिलता होगा। बाबा से पिता के रिश्ते पुराने थे...गुरु रामेश्वर शर्मा के ज़माने के, जिन्होंने हमारे चारों प्रगतिशील कवियों पर पहले आलोचनात्मक लेख लिखे। कुछ हँसी-मज़ाक का सम्बन्ध भी था, यूं हँसी-मज़ाक तो बाबा पहली बार मिले आदमी से भी करते थे। मैं भोजन में माँस पसन्द करता हूं और बाबा के लिए मेरा प्रतिदिन का माँसभक्षण उत्सुकता का कारण बनता गया। घर में माँस सप्ताह में एक बार ही बनता था पर मुझे चौराहे पर ठेले पर  मिलनेवाला भुटवा बहुत प्रिय था, जिसे बकरे की आँतों और दूसरे बेकार समझकर अलगाए गए हिस्सों से बनाया जाता था - यह मेहनतकश मजदूर वर्ग का व्यंजन है, उनके लिए प्रोटीन का एक बड़ा स्त्रोत जो कम दामों पर मिल जाता है। हमारे घर रहते हुए बाबा अकसर मुर्गे का सीनेवाला एक टुकड़ा बड़े स्वाद से खाया करते थे। रात के खानेपर अकसर इस बात पर बाबा का पिटारा खुला रहता था कि उन्होंने ख़ुद कितनी तरह का माँस अब तक खाया है। इस विषय में उनके पास तिब्बत से लेकर सिंहलद्वीप तक के अनुभव थे। बिहार और बंगाल का मत्स्यप्रेम इसमें शामिल था। भुटवा के बारे में पता लगने पर उन्होंने बताया कि मुसहरों के साथ भुना हुआ चूहा तक वे खा चुके थे। मछलियों की किस्मों पर बाबा अबाध और आधिकारिक किस्म का व्याख्यान प्रस्तुत करते थे। शाम को अकसर रसोई में पहुंच जाते थे। माँ की पाककला में निखार का बीड़ा उन्होंने उठाया और एक हद तक निखारकर भी दिखाया। आम उन्हें पसन्द थे पर शायद दमे के कारण वे आम खाते नहीं थे। बाबा के रामनगर आगमन का मौसम आसपास के बग़ीचों से ख़ुश्बूदार आम की आमद का मौसम भी होता था। बाबा साबुत आम लेकर उसे बहुत देर तक सूंघा करते। उन्हें मिथिला की अमराईयाँ याद आतीं। कभी कटे हुए टुकड़े पर हल्के-से जीभ की नोक फिराकर वापस रख देते। आम के साथ उनकी ये कार्रवाईयाँ प्रणय के स्तर तक जा पहुंचतीं। बाद में छूट लेते हुए मैंने इस दिशा में प्रकाश डाला तो वे खुलकर हँसे और कहा कि बच्चू इस कच्ची उम्र में प्रणय के बारे में कहाँ से जाना। मेरा जवाब था अज्ञेय के उपन्यास नदी के द्वीपसे। वे हँसे और कहा अगर अज्ञेय से प्रणय के बारे में जानोगे तो उम्र भर खोज पूरी नहीं होगी...वो तो शहरों की तरह स्त्रियाँ बदलता रहा...फिर बाबा ने शमशेर और एक स्त्री और अज्ञेय के किसी त्रिकोण का अस्पष्ट-सा ज़िक्र भी किया। मैं 19-20 साल का था और मेरे जीवन में प्रेम तो नहीं पर एक बेहद आत्मीय मित्रता का रिश्ता पनप चुका था...जो बाद में पक कर प्रेम बना।  बाबा आम के सन्दर्भ में कही गई मेरी बात को लेकर लगातार संज़ीदा होते गए। वे बारबार पूछते कि कितनी लड़कियों से तुम्हारी दोस्ती है....नहीं है तो क्यों नहीं है....और है तो किस हद तक है। एक अजीब से संकोच में मैं उन्हें कभी सीमा से नहीं मिला पाया, जो मेरी पत्नी बनी।

मैं भाऊ समर्थ की किताब चित्रकला और समाजसे बेहद प्रभावित था और उसके असर में रेखाचित्र बनाने लगा था जो कुछ पत्रिकाओं में छपने लगे थे। कविताएँ भी कुछ लिखीं थीं पर उन्हें किसी को दिखाया तक नहीं था...पता नहीं क्यों कविता करना मुझे प्रेम करने जैसा लगता था। वह संकोच और आइसा के कुछ कार्यकर्ताओं के बीच गोपन सम्भाषण का विषय था। मैंने बाबा को कविताएँ तो नहीं, रेखांकन ज़रूर दिखाए। उन्हें पसन्द आए और उन्होंने मुझसे कलाओं की सामाजिक भूमिकाओं पर कई बार बातचीत की। भाऊ समर्थ उनके मित्र रहे थे और मेरे पिता के भी....उन दोनों के बीच भाऊ की बातें अकसर हुआ करती थीं।

रामनगर रहते हुए बाबा से मिलने और उन्हें अपने घर न्योतने कई लोग आते थे। एम.ए. की कुछ लड़कियाँ थीं जिनमें कविता की समझ तो बिलकुल नदारद थी पर नागार्जुन का नाम और हैसियत उन्हें हमारे घर खींच लाती थी। एक सुंदर-सी लड़की ने बाबा के साथ फोटो खिंचाने की ख़्वाहिश जाहिर की तो बाबा ने कहा पहले कच्ची-पक्की कैसी भी एक कविता लिखकर लाओ हम फोटो खिंचा लेंगे। लड़की ने कहा उसे लिखना नहीं आता। बाबा ने जाँच बिठाई कि कुछ तो लिखती होगी...कुछ नहीं तो सहेलियों और रिश्तेदारों को पत्र.....वैसा ही कुछ ले आओ। इस संवाद के बाद उस लड़की ने हमारे घर का रुख़ कभी नहीं किया। फोटो के मामले में बाबा बहुत चौकन्ने थे। वाचस्पति जी ने भी बता रखा था कि वे फोटो खिंचाना पसन्द नहीं करते। मैं इस मामले में सावधान रहता था पर उन्होंने कई फोटो खींचने का मौका मुझे दिया।

बाबा की साप्ताहिक साफ़-सफ़ाई करने का जिम्मा मेरा था। हालाँकि वे इसके लिए आसानी से तैयार नहीं होते थे। कभी दमे का हवाला देते तो कभी हाइड्रोसिल का, जिसका वज़न बक़ौल बाबा साढ़े-तीन पाव था। मैंने अपनी नौजवानी के कुछ बेहद ऊर्जावान दिन उस औघड़ के साथ गुज़ारे और वह मेरे भीतर कहीं हमेशा के लिए बस गया। वे मुंहफट थे, ज़िद्दी थे, अटपटे थे लेकिन जीवन और अपार प्रेम से भरे। मेरे साथ रहते हुए उन्होंने कविता की बातचीत कम की...ख़ुद की कविता की तो बिलकुल नहीं। वाचस्पति जी ने दो-तीन बार उनके सम्मान में जो काव्यगोष्ठियाँ आयोजित कीं, उनका आनन्द बाबा ने अपने हिसाब से लिया। इन गोष्ठियों में स्थानीय तुक्कड़ और हास्य के नाम हद दर्जे़ की फूहड़ता परोसने वाले लोग होते थे, जिन्हें किसी हाल में कवि नहीं कहा जा सकता। कवि वहाँ दो होते थे- बल्लीसिंह चीमा और हरि मौर्य... एक बार मुरादाबाद से नवगीतकार श्री माहेश्वर तिवारी आए, जिन्हें सुनना अच्छा लगा। बाबा मौज में होते थे और अपनी बेतरतीब खिचड़ी मूंछों में मुस्कान बिखेरते। एक बार ऐसी ही गोष्ठी से कुछ पहले बाबा ने अपने झोले से सीताकान्त महापात्र की कविताओं का हिंदी संकलन निकाला और मुझे कहा जल्दी से पढ़ जाओ। यह 92 या 93 की बात है। मैंने उसे उलटाया-पलटाया और भगवान को धिक्कारती  एक कविता पर रुक गया...बाबा को वह पेज दिखाया....बोले – बिलकुल सही जगह पकड़े हो कविता को ...किताब अपने पास रखो और पेज नंबर भी याद रखो।  गोष्ठी शुरू हुई और किसी फार्म हाउस की मालकिन एक महिला ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। कुछ और लोगों की वाणी गूंजी फिर अचानक बीच राह में बाबा कड़के – यह कविता है? कविता की ऐसी तैसी हो रही है! फिर बोले ये जो कोने में लड़का बैठा है न हरि जी का सुपुत्र यह आपको बताएगा कि कविता क्या होती है। मैं अचकचाया। सारे लोगों की कुपित दृष्टि मुझ पर मानो मैंने बाबा को भड़का दिया हो। एक-दो बार थूक गटक कर मैंने बाबा को देखा, उनका चेहरा ख़ुराफ़ात करने के बाद किसी शैतान बच्चे-सा खिला हुआ....वैसी ही मुस्कान। मैं समझ गया। मैंने काँपते हाथों से वह किताब खोली और उस कविता का पाठ करना शुरू किया। शुरूआती भर्राहट के बाद स्वर भी स्थिर हो गया। यह मेरे जीवन का पहला कवितापाठ था और आश्चर्यजनक रूप से कामयाब भी...पीछे बाबा की मुस्कान टूटे-अधटूटे गँदले दाँतों वाली....कहती हुई ....अजी घिन तो नहीं आती? अजी बुरा तो नहीं लगता?

मैंने कविताएँ लिखीं...95 में कथ्यरूप से पहला संकलन एक पुस्तिका के रूप में आया...तब तक बाबा का काशीपुर-रामनगर आना छूट गया था। पता लगा कि बाबा के बड़े पुत्र को उनकी ऐसी यात्राएँ नहीं भातीं थीं। मैं दिल्ली गया पर अपनी पुस्तिका उन्हें नहीं दी। वे कभी ठीक से नहीं जान पाए कि शिरीष कविता लिखता है। मैंने अपनी पुस्तिका त्रिलोचन जी, कृषक जी, सलिल जी सहित कई कवियों को दी पर बाबा को देने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। बाबा कहते थे नए कवि अपनी कविताएँ लेकर प्रशंसात्मक प्रतिक्रिया और अन्यथा प्रोत्साहन की आकांक्षा में पुराने कवियों की तरफ भागते हैं, जबकि कविताओं को जनता के बीच जाना चाहिए। जनता ही किसी को कवि बना सकती है, कोई पुराना कवि या आलोचक नहीं। मेरी कभी हिम्मत नहीं हुई कि मैं बाबा को अपनी कविताएँ दिखाऊँ। मेरी यह कायरता दरअसल उस छोटे-से कमज़ोर शरीर के भीतर मौजूद हिंदी की महाकाय और महान कविता के प्रति मेरा प्रेम और आदर था और हमेशा रहेगा। मुझे ख़ुशी है कि बाबा ने मुझे एक राजनैतिक कार्यकर्ता और उत्साही नौजवान के रूप जाना और अपना प्यार दिया। वह बीहड़ व्यक्ति और कवि मेरी साहित्यिक ही नहीं, व्यक्तिगत और निजी स्मृतियों का भी वासी है, यह बात मुझे उपलब्धि की तरह लगती है और सुक़ून देती है। यह संस्मरणनुमा थोड़ा-सा लेखाजोखा भी उसी का एक छोटा-सा अंश है, बहुत कुछ बताना-कहना अभी शेष रह गया है, ठीक मेरी ऊटपटांग कविताओं की तरह!

पुरखों की ये कोहराम मचाती यादें इसी तरह धीरे-धीरे व्यक्त होंगी। 

8 comments:

  1. वे अपनी कविताओं की तरह थे और कविताएं उनकी तरह...
    बाबा पर लिखने के लिये जिस भाषा और जवानी की जरूरत है , लगता है वह अब हमें मिल गयी है.. आगे पढ़ने का इन्तजार है.

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  2. पढ़कर अच्‍छा लगा...वाचस्‍पति जी से भी लिखवाया जाना चाहिए।

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  3. एक फक्कड़ पर संस्मरण आपकी रोचक लेखनी से मगर बहुत कुछ अनकहा भी लगा

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  4. Bahut sunder sansmaran.

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  5. adbhut aur jiwant lekhn kai liyae badhai...

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  6. Bahut bhagashaali hain aap bhai jee. Aatmayee aalekh.

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  7. बेहद अच्छा संस्मरण है। बाबा को तो मैं बेहद निकट से जानता हूँ, लेकिन आपको भी जान गया। आपमें कविता का बीज कैसे आया, यह पहचान गया। मेरी हार्दिक मंगलकामनाएँ।

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  8. बेहद दिलकश. मियाँ आप ये इस किसिम का गद्य ज़्यादा काहे नहीं लिख पाते काहे लंबी लंबी आलोचनाओं में लगे हैं एसोसिएट प्रोफ़ेसर साहिब. वैसे इस गद्य पर जो कहना था वह नवीन कुमार नैथानी कह चुके. और हाँ अपने हियाँ छापने की जगह ऐसी चीज़ें हमारी तरफ सरका दिया करो.

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