Wednesday, March 13, 2013

अच्‍युतानन्‍द मिश्र की कविताएं


बहुत उम्‍मीद जगाने, भरोसा बढ़ाने वाले युवा कवि-साथियों में अच्‍युतानन्‍द मिश्र का नाम ख़ास तौर पर लिया जाना चाहिए। अनुनाद को उनकी कविताएं मिलीं हैं, जिनमें वह सब कुछ दर्ज़ है, जिसे एक प्रतिभावान-ऊर्जावान युवा बहुत ध्‍यान से समझता और व्‍यक्‍त करता है। यहां दी जा रही कविताओं में एक ' इस बेहद संकरे समय में' पर वरिष्‍ठ कवि नीलाभ ने अवसाद और फिर आशा के समीकरण स्‍पष्‍ट करते हुए अपने ब्‍लाग नीलाभ का मोर्चा में लम्‍बी टिप्‍पणी की है। मैं इतना कहना चाहता हूं कि जीवन के विविध प्रसंग और रूप जो उनकी कविता में आते हैं, वे इतने विश्‍वसनीय हैं कि हमारे हो जाते हैं। यहां जल से जीवन और जीवन से जल की मांग एक अनूठी किंतु आदिम प्रार्थना है। मछलियों के इंतज़ार में रो रहे बच्‍चे, चूल्‍हे से उठता धुंआ और गुमसुम बैठी औरतों का संसार इस तरह  पहली बार हिंदी कविता में आता हुआ लग रहा है। इन कविताओं में बिम्‍बों का भी एक तरह का परावर्तन है। और, खूब अपनी भाषा। इन कविताओं के लिए मैं कवि को शुक्रिया कहता हूं और अनुनाद पर उनका स्‍वागत करता हूं।      
***

हिंदी अधिकारी के लिए

कहाँ घुसे जा रहे हो
ठहरो अच्युतानंद
यह हिंदी अधिकारी
का दफ्तर है

यह कोई तुम्हरी
कविता की कापी नहीं
कि शब्द लिखे जाएँ
और काट दिए जाएँ

बेतरतीबी इसे
एकदम पसंद नहीं

यह भाषा में
और जीवन में
कभी भी तुम्हे
तुम्हरी औकात बता सकता है

इस बात को समझों
कि अपनी पुस्तक भेंट करते हुए
वह बार-बार
तुम्हारे कुर्ते के टूटे बटन की ओर
देख रहा है

उसकी मुस्कराहट
हिंदी की मुस्कुराहट है
और उसकी कविता राष्ट्र की संपत्ति

अगरचे तुम देशभक्त हो
तुम्हे इसका सम्मान करना चाहिए .

*** 

इस बेहद सँकरे समय में

वहाँ रास्ते खत्म हो रहे थे और
हमारे पास बचे हुए थे कुछ शब्द
एक फल काटने वाला चाकू
घिसी हुई चप्पलें
कुछ दोस्त

हमारे सिर पर आसमान था
और हमारे पाँवों को जमीन की आदत थी
और हमारी आँखें रोशनी में भी
ढूँढ़ लेती थीं धुंधलापन

हम अपने समय में जरूरी नहीं थे
यही कहा जाता था
गो कि हम धूल या पुराने अखबार
या बासी फूल या संतरे के छिलके
या इस्तेमाल के बाद टूटे हुए
कलम भी नहीं थे,
हम थे
और हम बस होने की हद तक थे

सड़क पर कंकरीट की तरह
हम खुद से चिपके हुए थे
हम घरों में थे
हम सड़कों पर थे
हम स्कूलों में और दफ्तरों में थे
हम हर जगह थे
और जमीन धँस रही थी
और नदियाँ सूख रही थीं
और मौसम बेतरह सर्द हो रहा था
और हम रास्तों के पास
जमीन के उस ओर चले जाना चाहते थे
हम मुक्त होना चाहते थे
और मुक्ति की कोई
युक्ति नहीं थी
अब तो धूप भी नहीं थी
पेड़ भी नहीं थे
पक्षी और बादल भी नहीं
आकाश और जमीन
और इनके बीच हम

हम अपने ही समय में थे
या किसी और समय में?
दोस्तों के कंधे उधार लेकर
हम तनने का अभिनय क्यों करते थे?

समय नर्म दूब की तरह
नहीं उग आया था हमारे गिर्द

हम फूल की तरह नहीं थे
इस धरती पर
हम पत्थरों की तरह
किन्ही पर्वतों से टूटकर नहीं आये थे
हमने सूरज की तरह तय की थीं
कई आकाशगंगाएँ

सितारे टूटकर गिरते
और हम अपने कंधे से धूल झाड़ते
चाँद की ओर पीठ कि ये बढ़ रहे थे

हमारी आँखों में
चमक रहे थे सूरज
और पैरों में दर्ज होने लगे थे
कुछ गुमनाम नदियों के रास्ते
खुद के होने की बेचैनी
और रास्तों की तरह बिछने का हौसला भी था।

सभ्यता की शिलाओं पर
बहती नदी की लकीरों की तरह
हम तलाश रहे थे रास्ते
इस बेहद सँकरे समय में!
***

जाल, मछलियाँ और औरतें
                                               
वह जो दूर गांव के सिवान पर
पोखर की भीड़ पर
धब्बे की तरह लगातार
हरकत में दिख रहा है
वह मल्लाह टोल है

वहीँ जहाँ खुले में
जाल मछलियाँ और औरतें
सूख रहीं हैं
आहिस्ते –आहिस्ते वे छोड़ रहीं हैं
अपने भीतर का जल –कण

मछलियों में देर तक
भरा जाता है नून
एक एक कर जाल में
लगाये जाते हैं पैबंद 
घुंघरुओं की आवाज़ सुनकर
नून सनी मछलियाँ  काँप जाती हैं

मछुवारिने जाल बुनती हैं 

पानी की आवाज़ देर तक
सुनते हैं लोग और
पानी के जगने से पहले 
औरतें पोंछ लेती है पानी
पानी के अंधकार में वे दुहराती हैं प्रार्थना
हे जल हमें जीवन दो
फिर उसे उलट देती हैं
हे जीवन हमें जल दो

मछलियाँ बेसुध पड़ी हैं नींद में
मछुवारों के पैरों की धमक
सुनती हैं वे नींद में
नींद जो कि बरसात के बूंदों की तरह
बूंद- बूंद रिस रही है

बूंद -बूंद घटता है जीवन
बूंद बूंद जीती हैं मछुवारिने
कौन पुकारता है नींद में
ये किसकी आवाज़ है
जो खींचती है समूचा बदन
क्या ये आखिरी आवाज़ है
इतना सन्नाटा क्यों है पृथ्वी पर ?

घन-घन- घन गरजते हैं मेघ
झिर-झिर-झिर गिरती हैं बूंदें 
देर तक हांड़ी में उबलता हैं पानी
देर तक उसमे झांकती है मछुवारिने
देर तक सिझतें हैं उनके चेहरे 

मछलियों के इंतज़ार में बच्चे रो रहे हैं
मछलियों के इंतज़ार में खुले है दरवाज़े
मछलियों के इंतज़ार में चूल्हों से उठता हैं धूआं
मछलियों के इंतज़ार में गुमसुम बैठी हैं औरतें

मल्लाह देखतें हैं पानी का रंग
जाल फेंकने से पहले कांपती है नाव

मल्लाह गीत गाते हैं
वे उचारते हैं
मछलियाँ मछलियाँ,मछलियाँ
उबलते पानी में कूद जाती हैं औरतें
वे चीखतीं हैं
मछलियाँ,मछलियाँ,मछलियाँ
बच्चे नींद में लुढक जाते हैं
तोतली आवाज़ में कहतें हैं
मतलियां  मतलियां  मतलियां 

उठती है लहर
कंठ में चुभता है शूल
जाल समेटा जा रहा है
तड़प रही हैं मछलियाँ
उनके गलफ़र खुलें हैं
वे आखिरी बार कहती हैं मछलियाँ
मल्लाहों के उल्लास में दब जाती है
यह आखिरी आवाज़
*** 

वे तिलचट्टे नहीं थे

बहुत पहले उनके पुर्वज
सदियों तक
हल के साथ
बैल की तरह
उन्हें जोतते रहे
उनकी खुराक
बैल से कम थी
और वे बैल से
कई गुणा ज्यादा
सोच सकते थे

उन्होंने अपना
रंग बदला
ढंग बदला
इरादे बदले
तेवर बदला
उन्होंने ट्रैक्टर इजाद किया
पर उन्हें खाद की जरुरत थी
और ट्रैक्टर के पहियों के नीचे
मसल दिया उन्हें
मसले जाने के बाद भी
वे जीते रहे 
मिट्टी के अंधकार में

वे तिलचट्टे नहीं थे
की हवा में लटकाकर अपने पैर
घोषित करते अपनी मृत्यु

उन्हें मालूम नहीं था
जिन्हें वे खाद समझ रहें हैं
वे एक दिन अमरबेल बन जायेंगे
और रक्त बीज की तरह
फ़ैल जायेंगे हर तरफ

मिट्टी में दफन
उनके पुर्वज
यह बताना भूल गए थे कि
एक किसान के माथे को
जमीन से मत लगाना
वरना तुम्हारा सिर
जमीन के खूब भीतर
धँस जायेगा और
तुम्हारे पैर
तिलचट्टे की तरह
हवा में लटके होंगे
***

इन दिनों बार -बार

एक रंग लील गया है पूरे आसमान को
आसमान का रंग
क्यों ढूंढते हो मेरे चेहरे में?

पृथ्वी के सारे गुरुत्वाकर्षण के
खिलाफ बहती हुई हवा का
एक कण भी नहीं हूँ मैं
आसमान का रंग
क्यों ढूंढते हो मेरे चेहरे में?

न चुप रहना और
न बोलना
बीच की एक लय है
इसी लय में ढूंढो
वो आसमानी रंग
वो गुनगुनी धुप
वो कोमल तान सी कविता
वो मुलायम गद्देदार बिछौने सा उपन्यास
ढूंढो ,वहां  तुम्हे
आग में झुलसे हुए हाथ नहीं
झुलसे हुए हाथों में
कांपता हुआदिया
जैसे की
नाक में कांपती हुई नथ
और उस कंपन में
इस विराट असीम
चराचर जगत का साक्षात्कार
यहीं करो महसूस
कहा है कवि ने
कभी –कभार
इन दिनों बार -बार !

आसमान का रंग
क्यों ढूंढते हो मेरे चेहरे में?
*** 

अच्युतानंद मिश्र:जन्म 27फरवरी1981 को बोकारो में हुआ  स्कूल तक की पढाई बोकारो से, आगे की पढाई दिल्ली से. महत्वपूर्ण पत्र पत्रिकाओं में कवितायेँ एवं आलोचनात्मक गद्य प्रकाशित.कविता संग्रह आंख में तिनका २०१३ में प्रकाशित . आलोचना की पुस्तिका नक्सलबाड़ीआंदोलन और हिंदी कविता प्रकाशित .प्रसिद्ध उपन्यासकार चिनुआ अचेबे के उपन्यास ARROW OF GODका देवता का बाण शीर्षक से हिंदी अनुवाद हार्पर कॉलिंस से प्रकाशित. प्रेमचंद के प्रतिनिधि गद्यों का प्रेमचंद :समाज संस्कृति और राजनीति शीर्षक से संपादन.
मोबाइल-9213166256
mail : anmishra27@gmail.com

7 comments:

  1. यथार्थ-संवेदन और अद्यतन कल्पनाशीलता इनकी कविताओं कि विशेषता है

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  2. बहुत पकी हुई संवेदना , बेहद आश्वस्त करते शब्द , बेतरह उम्म्मीद जगाती सोच . थेंक्स , शिरीष .

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  3. Behad khoobsoorat kavitayein, bahut sundar gadhan, bhasha. Narm bichowne sa upanyas, aadi bimb bahut hi sundar, aaj ki hinsa ke daur mein. Rangon ko leel jaane wala aasmaan bhi ek saath vishal, aur kaid.

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  4. bhai achuthanand mishra ji, Behand sundar kavithayeim hain. Hindi adhikari ke liye aur jaal machliyam aur aurateim kaphi pasand ayi.
    Dr Santosh Alex

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  5. Bahut badia.....hardik badhai bandhu. Abhaar Shirish jee

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  6. aap sb mitron ka bahut shukriya .

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