Friday, February 8, 2013

अनिरुद्ध उमट की नौ कविताएं


आज कई महीने बाद अपने उचाट सूनेपन में मेरे क़दम अब तक स्‍थगित रखे गए फेसबुक की ओर बढ़ गए और वहां वो मिला, जिसकी मुझे कुछ सुकून दिया। वहां अपने स्‍टेटस में अनिरुद्ध उमट ने अपने सहज संकोची स्‍वभाव के अनुरूप नौ कविताएं पोस्‍ट की थीं, जिन्‍हें उन्‍होंने अपने कविता संग्रह में छोड़ दिया था। मैंने हाल ही में इस संग्रह पर प्रतिलिपि में लिखा था...सो कई तार इधर से उधर जुड़ते चले गए। प्रस्‍तुत हैं अनुनाद के पाठकों के लिए ये कविताएं, जिन्‍हें इनका कवि संग्रह में लेने से जाने क्‍यों सकुचा गया।  

१-
समुद्र के ऊपर था वह 
उड़ता सा या 
तैरता सा. 

या तैरता सा उड़ता .

चोंच थी खुली.

देखने पर ऊपर लगता
ताना उसी ने 
समुद्र पर 
आकाश.

नीचे देखने लगता
हिला रखा जैसे 
उसी ने 
समुद्र.

२-
कहाँ है नमक 
रंगों में 
बने जिनसे चेहरा
देह 
नमक की 

आँख जो देखती 
चिलकता वहां 
मिलता दुःख 
दुःख 
सुना न था 
जिसके बारे में 
होगा जो नमक सा.



३-
दिन भर कहाँ गुम रहती 
अनगिनत 
बला की छोटी 
मगर
खूबसूरत चिड़िया 

संध्या जैसे खोलती पिंजरा 
वे ज़रा से बदन से 
निकालती सूर्य किरणों सी लम्बी आवाजें 

पगलाई 
मथ रही हो जैसे 
आकाश 

डूबता सूर्य 
नीद की कोख में 
देखता सपना 
भोर का 
जब वे उसे जगाएँगी 

चाहेगा वह 
मुंदी रहे पलकें 
और वे 
खुल जायेंगी .

४-
चिड़िया 
बीच इंद्रधनुष
जा रुकी क्षण भर 
-पंखो पर सवार हो जैसे सात रंग-

फिर लहराई 
एक गोता नीचे लगाया 
उतरने लगी गहरे 

कोमलता से 
उतार लाई इन्द्रधनुष 
थमा दिया रीते बच्चे हाथों में 

हिल रहा झुनझुने की तरह 
बज रहा 
इन्द्रधनुष 

चिड़िया 
उड़ती 
भर रही 
खाली जगह 

रहा था इतरा जहां 
इन्द्रधनुष 
पहले कुछ क्षण जहां .

५-
इसी दिन 
होना था आरम्भ 
पतझर 
बिफरना था अग्नि को 
बिलखना था 
बच्चों को 
इसी दिन 

गुजरना था 
छूटे शहरों से
बिसर गए लोगों से 

पत्रों को विस्मृत करते 
इसी दिन 
करने थे काम कुछ दूसरे 
डाकिये को 

इसी दिन उन्हें मरना था 
इसी दिन 
शब्दों को 
होना था भूमिगत 

इसी दिन मिलनी थी 
बिसर चुकी 
खोयी डायरी
बदहवास 
अधूरी कविता में .

६-
आसमान से 
दीखी पृथ्वी 

गुथमगुत्था कई रंगों में 

मालूम हुआ 
खूबसूरत चादर 
किसी ने बड़े जतन से रंगी 

फिर तनिक 
सूखने
फैला दी .



७-
जिन बस्तियों को हमने 
दिए पक्षियों के नाम 

पक्षी वे लुप्त हुए 

-सूखे जिस्मों सी बस्तियां-

लोग जानेकहां गए 

किससे पूछें 

सन्देश लेने देने वाले 
पक्षी भी 
न रहे .

8-
तमाम चहचहाट 
नींद में 
जंगल की .

फडफडाती 

मारती चोंच 

रात की देह पर .

९-
बरसों बाद
देखी देह 
निर्वसन 

मछ्ली सी 
बल खाती 
अपने में 

मंत्रमुग्धा 

बरसों बाद 
देखी देह 
उसने भी 
निर्वसन 

कांटे सी 
तीखी 
बींधती

बीच में था जल
ठहरा 

पिरोई जा रही थी जिसमे 
आवाजाही 
***
इस पोस्‍ट में प्रयुक्‍त सभी तस्‍वीरें गूगल छवि से साभार

1 comment:

  1. अपनी कविताओं में टटके बिंबों एवं शिल्प गठन की उच्च गुणवत्ता की वजह से अनिरूद्ध उमट की छोटी कविताएं भी चुंबक की तरह अपनी ओर आकर्षित करती हैं। सभी कविताएं बेहतरीन है । कवि को विशेष रूप से बधाई।

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