Thursday, October 4, 2012

कविता जो साथ रहती है / 1 : नवीन सागर की कविता पर गिरिराज किराड़ू

सल्वादोर डाली : गूगल इमेज से साभार 

नवीन सागर की कविता उनके प्रस्‍थान के बाद भी बची हुई है, बची रहेगी। मुझे बार-बार कहना पड़ता है और फिर कहना पड़ रहा है कि नवीन सागर भी उन्‍हीं कवियों में हैं, जिन्‍हें हिंदी कविता में उनका दाय और न्‍याय कभी नहीं मिला। वे चले गए। व्‍यक्ति नहीं मिल पाते पर कविता कहीं न कहीं, कभी न कभी मिल जाती है। व्‍यक्ति नहीं है पर कवि है, यह भी एक यथार्थ है और विचार भी.. नवीन सागर और उनकी कविता को प्‍यार करने वाले लोग हैं और आगे भी बने रहेंगे। उन्‍हें अनुनाद याद करता है। आगे हमारी कोशिश रहेगी कि उन पर कुछ और बात हो सके। 

कवि गिरिराज किराड़ू की यह टिप्‍पणी शुरूआत है अनुनाद पर एक नए स्‍तम्‍भ की, जिसका नाम ख़ुद गिरिराज ने 'कविता जो साथ रहती है' रखा है। इधर कुछ समय में जिस तरह से कई मित्रों का रचनात्‍मक और वैचारिक सहयोग हमें मिल पा रहा है, उसके लिए आभार प्रकट करने को अब शब्‍द कम पड़ने लगे हैं और गिरिराज चूंकि मित्र है इसलिए बहुत संक्षेप में उसे एक छोटा-सा शुक्रिया भर कह रहा हूं....इस कड़ी में जल्‍द और टिप्‍पणियां गिरिराज की तरफ़ से आनी हैं, उनके इंतज़ार के साथ.... 

गिरिराज किराड़ू ने यह टिप्‍पणी तीन लोगों को समर्पित की है और मैं उसमें एक नाम और जोड़ते हुए अनुनाद की ओर से यह पोस्‍ट नवीन सागर के मित्र कवि अनिरुद्ध उमट को समर्पित करता हूं।

नवीन सागर की कविता
नवीन सागर
देना !

जिसने मेरा घर जलाया
उसे इतना बड़ा घर
देना कि बाहर निकलने को चले
पर निकल न पाये.

जिसने मुझे मारा
उसे सब देना
मृत्यु न देना .
जिसने मेरी रोटी छीनी
उसे रोटियों के समुद्र में फेंकना
और तूफान उठाना.

जिनसे मैं नहीं मिला
उनसे मिलवाना
मुझे इतनी दूर छोड़ आना
कि बराबर संसार में आता रहूँ .

अगली बार
इतना प्रेम देना
कि कह सकूं : प्रेम करता हूँ
और वह मेरे सामने हो.
***
गिरिराज किराड़ू
1
नवीन सागर की इस कविता में प्रतिशोध और करुणा जिस तरह एक दूसरे पर निर्भर हैं (अन्योन्याश्रितता?) बल्कि जिस तरह एक दूसरे का बयान और चेहरा हैं वह मेरे देखने, अनुभव करने में एक नयी चीज़ थी और इसी वजह से यह कविता बरसों मेरे साथ रही है और अभी भी रहती है. हम हर दूसरी कविता के बारे में इस तरह बात करने के आदी हैं कि उसके आने से हम और यह संसार बदल गये हैं लेकिन कितनी कविताएँ, कितनी कला होती है  जो किसी पाठक के लिए ऐसा कर पाती है?

नवीन की यह कविता गाँधीवादी अहिंसा के प्रस्ताव - 'जिसने मेरा घर जलाया उसे इतना बड़ा घर देना'/ 'जिसने मुझे मारा उसे सब देना' / ‘जिसने मेरी रोटी छीनी 
उसे रोटियों के समुद्र में फेंकना’ - को प्रतिशोध कामना - 'कि बाहर निकलने को चले पर निकल न पाये'/ 'मृत्यु न देना'/ ‘और तूफान उठाना’ से जोड़ देती है. एकदम वाक्यविन्यास के स्तर पर!   गाँधीवादी अहिंसा  का प्रस्ताव और प्रतिशोध कामना न सिर्फ एक वाक्य के दो अंग हैं - प्रतिशोध कामना खुद अहिंसा की विधि में ही निहित है! घर इतना बड़ा हो कि निकल ना पाये!

प्रतिशोध और करुणा (वह भाव जिससे यह अहिंसा प्रस्ताव जन्म लेता है) का यह युगल (किस तरह की) तकलीफ़ और जुल्म की किस समझ से उत्पन्न हुआ है? यह शेक्सपीरियन त्रासदियों से भिन्न है हालाँकि उनके जैसा एकबारगी लग जरूर सकता है - हेमलेट और मैकबैथ या लियर का अंत निश्चित है (वह त्रासदी की पूर्व शर्त है) लेकिन जब तक वे हैं और अपने अपने हैमर्शिया से बिंधे हैं उनके साथ नाटककार क्या करे? एक हत्यारे, जैसे कि मैकबैथ, के साथ नाटककार क्या करे? वह उसे सुखांत नहीं बख्श सकता; सपाट प्रतिशोध उसे ठीक नहीं लगता – वह उसे 'अंतर्ज्ञान' बख्शता है; मैकबैथ के प्रति नाटककार की करुणा इसी रूप में सामने आती है कि वह उसे ‘अंतर्ज्ञान’ से नवाजता है और  ‘अंतर्ज्ञान’ – अपने पर नज़र रखने की, अपने कर्मों को करते हुए 'साक्षी' भाव से उन्हें देखने की यह तकलीफ़देह काबिलियत – मैकबैथ को हमारे लिए एक 'स्पेसीमेन' में बदल देती हैः मनुष्य और उसकी 'आत्मा' में महत्वाकांक्षा, सत्ता और हिंसा जिन 'अंधेरों' का आविष्कार करती है उनको हमारे लिए उजागर करने वाला एक स्पेसीमेन! लेकिन खुद मैकबैथ को इस 'अंतर्ज्ञान' से क्या मिला? क्या बिना इस 'अंतर्ज्ञान' के वह एक अधिक सुखी जीवन और मृत्यु दोनों को नहीं पा लेता? क्या यह 'अंतर्ज्ञान' ही उसकी सबसे मर्मान्तक पीडाओं का कारण नहीं है? क्या इससे उसे कोई राहत मिलती है? शायद नहीं और अगर नहीं तो इसी अर्थ में शेक्सपीयर की मैकबैथ के लिए 'करुणा' क्या उसी तरह प्रतिशोधात्मक नहीं जिस तरह नवीन की इस कविता के कवि-स्वर की उसके लिए जिसने 'उसका' घर जलाया या जिसने ‘उसे’ मारा. नहीं! शेक्सपीयर की प्रतिशोधात्मक करुणा लेकिन इस अर्थ में यहाँ तुलनीय नहीं है कि यहाँ प्रतिशोध और करुणा का सम्बन्ध सीधे उनके बीच हैं जिनमें से एक का घर जला है और दूसरे ने जलाया है - यहाँ उस दूरी के लिए कोई स्थान नहीं है जो नाटककार और मैकबैथ के बीच है और इसलिए नाटककार को यह सुविधा है कि वह मैकबैथ को एक सपाट, अंतर्द्वंद्वहीन हत्यारे की बजाय एक अधिक जटिल और 'समृद्ध' इनर-स्केप (आतंरिक जगत) वाला चरित्र बना सके. आतंरिक जगत की यह समृद्धि क्या मैकबैथ के लिए किसी किस्म की राहत का माध्यम बन पाती है? शायद नहीं लेकिन शायद हाँ भी! लेकिन क्या व्यक्तित्व की यही 'जटिलता' और इनर-स्केप की यह 'समृद्धि' एक तरह से मैकबैथ के अपराध के प्रति हमारे रेस्पोंस को भी मैनीपुलेट नहीं करती? हम उससे उस तरह नफ़रत नहीं कर पाते जैसे एक सपाट सत्ताकामी हत्यारे से कर पाते मानो व्यक्तित्व की 'जटिलता' और इनर-स्केप की 'समृद्धि' ने उसके अपराध को कम कर दिया हो!

नवीन की कविता प्रतिशोध के प्रश्न को सीधे संबोधित करती है और जिसने अन्याय किया है उसके लिये मनोवैज्ञानिक रूप से ज्यादा खौफ़नाक सज़ा की कामना करती है. इस कविता को यह प्रत्यक्ष ज्ञान, यह पहला सबक है - 

The first lesson of psychoanalysis here is that this “richness of inner life” is fundamentally fake: it is a screen, a false distance, whose function is, as it were, to save my appearance. … The experience we have of our lives from within, the story we tell ourselves about ourselves in order to account for what we are doing, is thus a lie – the truth lies rather outside, in what we do. 
(First As Tragedy, Then As Farce, Slavoj Žižek)

लेकिन कविता के आखिरी दो बंद प्रतिशोध और करुणा के नहीं कामना और यथार्थ, जीवन और मृत्यु के युगल से बने हैं और उन्हें पढ़ते हुए अब इस तथ्य को इस पठन में शामिल कर लेना चाहिए कि यह कविता प्रार्थना के शिल्प में है ही नहीं स्वयं एक प्रार्थना है! एक प्रतिशोधात्मक प्रार्थना. किससे कहा जा रहा है कि ' जिसने मेरा घर जलाया उसे इतना बड़ा घर देना' या ' सब देना मृत्यु न देना'? ईश्वर? और कौन है यह कहने वाला? क्या इस कविता को आत्मकथात्मक ढंग से पढ़ा जा सकता है? शायद नहीं!

यह कविता ऐसे किसी व्यक्ति की प्रतिशोधात्मक प्रार्थना है, न्याय की गुहार है जिसे इस संसार की न्याय प्रणालियों से न्याय की कोई उम्मीद नहीं बची, जिसके लिए 'प्रतिशोधात्मक करुणा' ही न्याय का अंतिम संभव रास्ता है? यह कविता उस अर्थ में आत्मकथा नहीं कि यह व्यक्ति नवीन सागर की कथा कहती है. यह हर उस  आम (भारतीय?/ हिंदू?) व्यक्ति की कविता है जिसे सेक्यूलर प्रणालियाँ न्याय नहीं दिला पायी हैं और जो उस न्याय को किसी अन्य (अवास्तविक) सत्ता 
(ईश्वर?) से, किसी अन्य (अवास्तविक) काल  ('अगली बार' = 'अगले जन्म') में पाने के लिए प्रार्थना कर रहा है.  और ऐसा करते हुए भी उसकी यह 'प्रार्थना' सेक्यूलर न्याय-प्रणालियों की असफलता का शोक बन जाती है ईश्वरीय न्याय की प्रवक्ता नहीं.
***
2
मैं नवीन सागर से कभी नहीं मिला. एक बार मौका था. मैं भोपाल के होटल पलाश से  अपना सब-समाऊ थैला लेकर निकल रहा था, एक गैर-लेखक मित्र के स्कूटर पर पीछे बैठकर. सामने  नवीन  विनोद कुमार शुक्ल से बात कर रहे थे. हम तक आवाज़ आ रही थी. मित्र ने कहा एक घटिया आदमी खड़ा है! जाहिर ही उसका इशारा नवीन की तरफ था. विनोदजी के सम्मान में तो उसने अपना स्कूटर फिर भी रोका ही (नवीन के क़रीबी मित्र अनिरुद्ध  उमट ने इस प्रसंग का जिक्र अपनी एक कविता में किया है).  विनोदजी ने मुझे और मेरे बैग को देखते हुए कहा लगता है आप पर्वतारोहण को जा रहे हैं. मैं 'घटिया आदमी' को देखता रहा, उसने भी मुझे देखा. स्कूटर स्टॉर्ट हो गया.

उसके बाद, नवीन के देहांत के बाद, उनकी वह आवाज़ फिर सुनी - बीकानेर से उनका संग्रह प्रकाशित हुआ, मंगलेश डबराल ने उसका एक बेहतरीन ब्लर्ब लिखा और उसके लोकार्पण में नंदकिशोर आचार्य, अनिरुद्ध और मेरे नवीन की कविताएँ पढ़ने से पहले उस शाम जो पहली आवाज़ आनंद निकेतन के हॉल में सुनाई पड़ी वह खुद नवीन की थी. उनकी आवाज़ में रिकॉर्डेड एक टेप से शुरू हुआ था मेरे जीवन का शायद इकलौता याद रखने लायक लोकार्पण!

यह लिखते हुए उस शाम के साथ साथ संजीव मिश्र की याद बुरी तरह आ रही है, जो शीन काफ़ निज़ाम की तरह इस आयोजन के लिये बीकानेर आये थे और इस बात से अचंभित और प्रसन्न थे कि एक हिन्दी कवि और उसके लिखे से यूँ भी प्रेम किया जाता है.


(छोटे भाई गिरीश, आशुतोष भारद्वाज और सत्यानन्द निरुपम के लिए)
***
...यह अनुनाद की 576 वीं पोस्‍ट है

9 comments:

  1. कविता जो साथ रहती है...
    [यहां पढ़ कर यह कविता अब हमेशा मेरे साथ भी रहेगी...]

    कवि को मेरा सादर नमन!!!!!

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  2. Good poem; and the new look of your blog is also welcome.

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  3. प्यारे गिरी और्प्यारे शिरीष
    पहले तो बधाई स्वीकारो की इस पुरस्कृत और प्रायोजित काव्य समय में तुम उस परित्यक्त कविता को ला रहे हो जो इस प्रायोजित मार्क्सवादी कवि-दौर से भी तारतम्य नहीं रखती. दरअसल, मुझे आजकल लगता है की बाज़ार ने , भारतीय संस्कृति की ही तरह , अपने विरोधी को भी आत्मसात करके उसके प्रतिरोध को महिमा मंडित कर दिया है ताकि, उसीकी बातें उसीके सन्दर्भ में समझी जाएँ और किसी को भनक भी न लगे. हमने सदियों से यही किया है, विरोध को इस तरह से समा लो की वह विरोध ही न लगे, एक जीवन पद्धति लगे. जागृत कवियों को सामीक्षा और आलोचना की परवाह किये बिना लिखना चाहिये. जिन्हें चाहिए वे सभी पुरस्कार ले लें. जिन्हें नहीं चाहिए यह सब वही इन मानदंडों को धता बता कर कोई सही बात कर सकते हैं जो इन प्रायोजित विचार धाराओं से विद्रोह कर के उनको उनकी जगह बता सकते हैं. पर किसमें इतना दम है की लड़ पड़े ? सबको आत्मrव्याप्ति चाहिए और यह चालाक समय इसे जानता है. क्या कोई आज का कवि इससे लड़ सकता है. मैं इनकम टैक्स में हूँ और इन सभी foundatiorns की पोल जानता हूँ. बंधू, सभी पुरस्कृत कवि, यह माया है. तुम मुगालते में हो. खेल कुछ और है.!
    खाई रहने दो ! मुझे अच्छा लगा की (वर्तनी की अशुद्धि को मुआफ करें, तकनीक प्रायोजित मेरे वश में नहीं है)
    दरअसल, यही अलक्षित उपेक्षित कवितायें हैं जो सच्ची. बाकी तो पुरस्कृत या यश कामना से उद्वेलित फर्जी कवितायें जिन पर हमारे विमर्श भी चाहे अनचाहे , जाने अनजाने ही, प्रायोजित हैं.
    एक नामवर या उनकी संतति ही टी करेगी क्या की क्या अच्छा है ?
    अगर उन्हीं से तय होता है तो हम कवि नहीं हैं.

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    1. प्यारे तुषार

      जानना चाहता हूँ कि इस 'मार्क्सवादी दौर' से तुम्हारा अभिप्राय क्या है? क्या सिर्फ मार्क्सवादी पुरस्कृत हो रहे हैं? या सभी 'मार्क्सवादी' पुरस्कृत हैं और गैर-मार्क्सवादी अपुरस्कृत?

      यार भाई, मुझे लगता है प्रायोजित मार्क्सवाद समर्थन की तरह एक भयानक चीज प्रायोजित/आयोजित मार्क्सवाद विरोध भी है.

      और गुरु, अपुरस्कृत रहने के अपने मजे हैं :)

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  4. कहते हैं कि गालियों, फब्तियों और कोसने का भी अपना एक समाजशास्त्र होता है| `तोर भलवा भए’ या `ओ कर्मावालियाँ’, `नाती पोते वालियां’ जैसी गालियाँ हमारी सांस्कृतिक- सामाजिक सहिष्णुता की बानगी हैं या उस शेक्सपीरियन त्रासदी की जिसका उल्लेख गिरिराज अपनी समीक्षा में कर रहे हैं| शायद दूसरी बात तब ज्यादा महत्वपूर्ण है जब कि नवीन सागर एक विचारक, एक कवि और उसकी कविता के बीच रचने-बनने-बसने की अंतर्यात्रा पर हों| नवीन सागर जी की ये पहली कविता मैंने पढ़ी है| निस्संदेह मेरे साथ भी रहेगी|

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    1. उनकी कुछ कवितायें यहाँ

      http://asuvidha.blogspot.in/2012/04/blog-post.html

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  5. बहुत दिनों बाद इस ब्लॉग पर आया. तुषार धवल की नयी कविता पढ़ने के लिए. कविता पसंद आयी.

    फिर नवीन सागर का नाम देखकर इस पोस्ट पर चला आया. गिरिराज किराडू ने कविता तो सुन्दर चुनी है. लेकिन जिस चीज ने कमेन्ट करने पर बाध्य कर दिया वो तुषार धवल की टिपण्णी है.

    अजीब बात है कि कई कवि अपनी कविता से बाहर कभी-कभी बहुत ज्यादा निराश कर देते हैं.

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  6. नवीन सागर को फिलहाल ही पहली बार पढ़ा था और पहली बार में ही मुरीद हो गया था. उनके पास सहज भाषा की गहरी कवितायें हैं. यह कॉलम एक बहुत अच्छी शुरुआत है जिससे कविता विशेष पर, और उसके अर्थ/निहितार्थों पर बात हो सकेगी. हमेशा समग्रता में कवि और काव्य को देखने के कुछ साइड इफेक्ट भी हैं जिनमें एक है इकाई के रूप में कविता का अवमूल्यन. अनुनाद और गिरिराज जी को बधाई!

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