Sunday, September 23, 2012

अपने जनपद का पक्षी विश्‍व गगन को तोल रहा है (केशव तिवारी की कविता) -शिरीष कुमार मौर्य

आसान नहीं विदा कहना - केशव तिवारी 


गद्य के इलाक़े में मेरी यात्रा अभी शुरू ही हुई और इस शुरूआत में मैंने कुछ समीक्षात्‍मक - संस्‍मरणात्‍मक लेख लिखे हैं, जिनका एक संग्रह उपलब्‍ध है। अब तक मैंने जिन भी कवियों पर लिखा, उनके कविकर्म को देखूं तो तुरत अहसास होता है कि केशव तिवारी पर लिखना निश्चित रूप से अलग होगा। ऐसा अहसास मुझे इससे पहले सिर्फ़ हरीशचन्‍द्र पांडे की कविता पर लिखते हुए हुआ है। केशव तिवारी की कविता में उपस्थिति, कुछ अपनी शान्‍त गति और इधर हिंदी में हो रही आलोचना की कुछ दुर्गति के कारण उस स्‍तर पर रेखांकित नहीं हो पायी है। ऐसा नहीं है कि केशव तिवारी पर बिलकुल ही लिखा नहीं गया... लिखा गया है पर उसमें लोक, गांव-जवार, खांटी देशजता आदि के उल्‍लेख इतने अधिक हैं कि आधुनिकता और उस पर आसन्‍न सामाजिक-राजनीतिक संकटों का सामना करने की कसौटी पर केशव के लिखे का मूल्‍यांकन हो ही नहीं पाया। इस सत्‍य को स्‍वीकारने का समय आ गया है कि गांव पर लिखी कविता भी जितना नागरिक जीवन में पढ़ी जाती है, उतना ग्रामीण जीवन में नहीं। ग्रामीण जीवन का असली साहित्‍य तो अपनी ही कुछ परम्‍पराओं और बोली-बानियों में है। फिर देखना होगा कि गांव भी वही नहीं रहे जो कुछ बरस पहले तक थे। लोक की गरिमा गिरी है और उसे महज कुछ पेड़ों, फूलों, ऋतुओं, गंवई शब्‍दों के इस्‍तेमाल, भूगोल-विशेष के बनावटी चित्रण आदि से नहीं बचाया जा सकता।
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मार्मिकता एक मूल्‍य होता था लोकधर्मी कविता का... वह खोता-सा गया है। बदलाव के नाम पर फूहड़पन पसरने लगा है। गांव-गांव में मोबाइल फोन है... और उस पर गीत-संगीत का विकट वीभत्‍स भंडार है। पहले हम कविता में आ रहे लोकदृश्‍यों में बिंध कर रह जाते थे... अब उसे एक विवरण की तरह पढ़ते हैं। लोकधर्मिता के नाम पर दरअसल अब कुछ पुरास्‍मृति के बिम्‍ब वास्‍तव में घटित होते दिखाए जा रहे हैं कविता में। जो नष्‍ट हो रहा है, उसके वास्‍तविक प्रमाण नहीं मिल पा रहे। ऐसे में केशव तिवारी की कविताएं बहुत हद तक वर्तमान का सामना करती हैं। वे नष्‍ट होते हुए को कोशिश भर सहेजती हैं, उसके दस्‍तावेज़ बनाती हैं और नष्‍ट करने वाली ताक़तों की शिनाख्‍़त भी करती हैं।
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लोकजीवन में जो कुछ भी नष्‍ट हुआ या हो रहा है, उसमें सभी कुछ अच्‍छा नहीं था। लोकजीवन में विकट सामन्‍ती तत्‍व थे, धार्मिक आडम्‍बर थे, छुआछूत और तमाम तरह के भेदभाव थे...आधुनिक भावबोध ने उन्‍हें नष्‍ट किया है तो यह सार्थकता है उसकी। लेकिन लोक में जीवट है, सताए हुओं की बद्दुआ है, मनुष्‍यता के लिए लड़ने के उदाहरण है, धरती और पर्यावरण को इस्‍तेमाल करने का एक सलीका है... यह सब किसी भी क़ीमत पर बचाया जाना चाहिए। इधर मैं देख रहा हूं कि लोकधर्मी कहलाए जाने वाले कुछ युवा कवियों में लोक तो बहुत लदा हुआ है पर उसे व्‍यक्‍त करने की सही राजनीति और विचारधारा से उनकी कोई निकटता धरातल पर नहीं दिखती। ऐसे कवियों से विनम्र स्‍वर में कहना चाहूंगा कि केशव तिवारी का नाम और काम एक अनूठा उदाहरण है, राजनीति और विचारधारा के इस सन्‍दर्भ में। उनकी बहुत खुलकर सांस लेती वामपंथी राजनीति और वैचारिकी है, जिससे उनकी कविता को ज़रूरी औज़ार मिलते हैं – इस अर्थ में यह कवि एक प्रेरणा हो सकता है।    
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केशव तिवारी का पहला संग्रह मैं नहीं देख पाया हूं पर उनका पतला-सा दूसरा संग्रह ‘आसान नहीं विदा कहना’ मेरे सामने है, जिसमें कविताओं की संख्‍या भले कम हो पर प्रगतिशील वैचारिकी को विस्‍तार देता अनुभव संसार भरपूर है। मैंने इस लेख को जो शीर्षक दिया है, वो ‘तिरलोचन’ के लिए लिखी कवि की इन पंक्तियों से लिया है –

अपने जनपद का पक्षी वह
विश्‍व गगन को तोल रहा है

केशव तिवारी की कविताओं से गुज़रते हुए भी ये अहसास बना रहता है। वे वैश्विक संकटों के प्रति सजग कवि हैं और कविता में अपने हथियारों के साथ उनका सामना करते हैं। नई अवधारणाओं ने समस्‍याओं के हल निकालने के नाम पर बहुत चतुराई से पूंजी के वर्चस्‍व और नवसाम्राज्‍यवाद के हित में नए खेल किए हैं। केशव तिवारी की मर्मबेधी दृष्टि उन पर बनी हुई है –

यह वक्‍़त ही
एक अजीब अजनबीपन में जीने
पहचान खोने का है
पर ऐसा भी हुआ है
जब-जब अपनी पहचान को खड़ी हुई हैं कौमें
दुनिया को बदलना पड़ा है
अपना खेल

ध्‍यान देना होगा कि केशव तिवारी की कविता में आने वाली यह कौमें, नस्‍लें और क़बीले नहीं हैं ... अपने-अपने भूगोल और संस्‍कृति में आबाद एकजुट मनुष्‍य हैं। जिसे दुनिया कहा गया, वो हमारे वक्‍़त की अकादमियां हैं...जहां से ज्ञान के साथ-साथ षड़यंत्रों और दुश्‍चक्रों का भी फैलाव होता रहा है.. और यह होना जारी है, साथ ही जारी है उनकी शिनाख्‍़त भी।
***
केशव तिवारी की कविताओं में लोक क्‍या है .... वह दरअसल बंधन से अधिक एक अतिक्रमण है। लोक की बात करते हुए उसे अपने साथ लिए बाहर की दुनिया में उसका हित-अहित दिखाने का हुनर इस कवि में है। उदाहरण के लिए एक कविता है यहां ‘डिठवन एकादशी’ नाम से। यह एक लोक-परम्‍परा के बारे में है, जिसमें इस ख़ास दिन गांव की ग़रीब मेहनतकश औरतें मुंह अंधेरे उठकर गन्‍ने के टुकड़े से सूप पीट-पीट का अपने चौतरफ़ा फैले दरिद्दर को गांव के बाहर खदेड़ने का उपक्रम करती हैं, लेकिन –

यह एक रस्‍म बन गई है धीरे-धीरे
ये जान चुकी हैं
कि इस तरह नहीं भागेगा दलिद्दर
लेकिन उसे भगाने की इच्‍छा
अभी बची है इनमें

ये स्त्रियां उसी ‘जन’ की प्रतिनिधि चरित्र हैं, जिसे हमने नागार्जुन, त्रिलोचन और केदार की कविता में लगातार लड़ते-भिड़ते देखा है – जिसमें जीवन को बदलने की इच्‍छा बची है अभी और कई कड़ी मारों के बावजूद जीवट भी। इसके बाद कविता उस दिशा में मुड़ती है, जिसे मैंने अभी अतिक्रमण कहा -    

ये जान नहीं पा रही हैं
आखिर दलिद्दर टरता क्‍यों नहीं
ये नहीं समझ पा रही हैं
कि कुछ लोग इसी के बल जिन्‍दा हैं
उनका वजूद
इनकी भूख पर टिका है
जिसे गन्‍ने से सूप बजाकर
खदेड़ा नहीं जा सकता

जिस दिन इस रस्‍म में
छिपे राज को ये समझ जाएंगी
इस दिन से इनके जीने की
सूरत भी बदल जाएगी।

यहां केशव लोक से आई एक रस्‍म का जिक्र करते हुए उस लोक और उसमें रहनेवाली उन स्त्रियों का दैन्‍य भर नहीं दिखाते, उस रस्‍म–विशेष के राज़ को समझते हुए ‘कुछ लोगों’ की निशानदेही करते हैं। समझ पाना मुश्किल नहीं कि ये उंगली कवि के अपने इलाक़े बुन्‍देलखंड में अब भी व्‍याप्‍त उस अलक्षित-सी सामंतशाही की ओर उठी है, जो ख़ुद परम्‍परा में लोक का एक अंग रही है। केशव, केदार के जनपद के कवि हैं। उन्‍होंने केदार से धरती ही नहीं, विचार भी साझा किया है.... इस कविता में वे इसी साझी विचारधारा के साथ यह अतिक्रमण इसलिए करते हैं कि लोक में किसी तरह वर्ग की समझ जागे। केदारनाथ अग्रवाल ने जीवन भर यह प्रयास किया और अब कितनी ख़ुशी की बात है कि इस विरासत को समझने-सम्‍भालने वाला एक और कवि उसी धरती पर कर्मरत है, उसी विचार के साथ। इस बात को स्‍वीकारने में कोई उलझन नहीं होनी चाहिए कि वर्ग और वर्ग-संघर्ष की समझ के बिना लोक और लोक-संघर्ष की हमारी समझ न सिर्फ़ अधूरी है, बल्कि आत्‍मघाती भी। 
***
इधर की कविता के सामने एक चुनौती यह भी दिखाई दे रही है मुझे कि उसमें भावुकता का लोप हो रहा है, निष्‍ठुर प्रसंग बढ़ रहे हैं जीवन में तो जाहिर है कि कविता में भी बढ़ेंगे ही पर मेरे लिए एक न्‍यूनतम भावुकता कविता का मानवीय मूल्‍य है। मैं ख़ुद आजकल अपनी कविता में इससे वंचित हो जाता हूं तो लगता है कि बिना रिखब का कोई राग गा रहा हूं – हालांकि वह राग है पर उसमें कोमलता लगभग नहीं है। लगता है सब कुछ गांधार और धैवत की गम्‍भीरता और चमत्‍कारों में खो-सा रहा है। किंचित विषयान्‍तर होगा यह कहना पर प्रसिद्ध गायिका अश्विनी भिड़े देशपांडे ने एक  साक्षात्‍कार में इंगित किया है कि 'अगर किसी राग में ऋषभ कोमल है तो धैवत को भी कोमल होना चाहिए।'  एक कोमल सुर दूसरे को भी कोमल बना देता है ताकि दूसरे सुरों में संवाद कायम रह सके। हम इतने क्रूर नहीं हो सकते कि जीवन के रागों में कहीं भी एक कोमल ऋषभ न बचा पाएं। इसे बचाने से कुछ मनुष्‍यता बचती है। मुझे ख़ुशी होती है देखकर कि केशव तिवारी की कविताओं में यह तत्‍व बचा हुआ है। पूरे संग्रह में ऐसे कई प्रसंग हैं। कम बात नहीं है कि केशव तिवारी वैचारिक चुनौतियों का प्रतिबद्ध सामना करते हुए भावों का एक पूरा लोक अपने भीतर बसाए हुए हैं।
केशव तिवारी के संग्रह पर ये मेरा द्रुत पाठ है, कई सुरों को छूकर आगे बढ़ना नियति है ऐसी पढ़त की। ऐसे ही एक छुए हुए सुर पर फिर लौटते हुए इतना और निवेदन है मेरा कि केशव तिवारी की कविता के सन्‍दर्भ में लोक के  बरअक्‍स हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा प्रयुक्‍त शब्‍द ‘जन’ मुझे अधिक प्रासंगिक लगता है। इस ‘जन’ के जनवाद में बदल जाने की कथा सब जानते हैं और जाहिर है कि केशव तिवारी की कविता भी कोरी लोकवादी कविता न होकर व्‍यापक अर्थों में जनवादी कविता है।
***

कवि का संक्षिप्‍त परिचय      
             
जन्‍म 4 नवम्‍बर 1963 को अवध के जिला प्रतापगढ़ के एक छोटे से गांव जोखू का पुरवा में। वाणिज्‍य से स्‍नातक केशव तिवारी बांदा में हिंदुस्‍तान यूनीलीवर के विक्रय विभाग में काम करते हैं। इस संग्रह से पूर्व रामकृष्‍ण प्रकाशन, विदिशा, म.प्र. से एक संग्रह 'इस मिट्टी से बना' नाम से 2005 में आया। जनवादी-प्रगतिशील सांस्‍कृतिक तथा सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय। 2009 में 'सूत्र सम्‍मान' से सम्‍मानित। यह दूसरा संग्रह रायल पब्लिकेशन, जोधपुर(राजस्‍थान) से 2010 में छपा है। कवि से द्वारा पांडेय जनरल स्‍टोर, कचहरी रोड, बांदा (उ.प्र.) पर पत्राचार किया जा सकता है। फोन नम्‍बर 9918128631 तथा ई मेल पता keshav_bnd@yahoo.co.in  है।     
-  शिरीष कुमार मौर्य 

8 comments:

  1. बहुत मन से लिखा है आपने | केशव जी की कविताएं न सिर्फ लोक जीवन से आती हैं , वरन वे विचार , प्रतिबद्धता और पक्षधरता के साथ भी आती हैं | कविताएँ किसी गणितीय फार्मूले से नहीं वरन जीवन और उसके जुड़ाव से लिखी जाती हैं , केशव जी हमें यह भी बताते हैं ..| अनुनाद का आभार |

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  2. अच्छा आलेख ....जहाँ तक लोकधर्मिता की बात है आज रचनाकार शहर में बैठकर गांवों की ना सिर्फ कहानी /कवितायेँ बल्कि उपन्यास तक बेझिझक लिख रहे बल्कि उन्हें ‘’संजीव,शिवमूर्ति,अखिलेश या केदारनाथ सिंह जैसे उत्कृष्ट रचनाकारों के साक्षात्कार लेते हुए भी देखा/पढ़ा जाता है |इस सन्दर्भ में गौरतलब और रेखांकित करने योग्य मुद्दा ये है कि क्या उन्हें आंचलिक जीवन की वास्तविकता, परेशानियों,उनकी परम्पराओं या रीति रिवाजों का अनुभव है? क्या ब्योरों संकेतों और पुस्तकों के उद्धरणों से कोई रचना वही स्थान पा सकती है जो ठेठ गाँव में अपना जीवन व्यतीत करने वहां की रोजमर्रा दिक्कतों से रु ब रू होने वहां की परम्पराओं से जुड़ने के बाद लिखी जाती है?आपने जो लोकधर्मिता पर राजनैतिक व विचारधारा से निकटता की बात कही है वो मर्म भी कमोबेश इसी सूत्र से जाकर जुडता है | कविता का जो वास्तविक उद्देश्य कहा जाता रहा है जैसे ‘’मानवीय संवेदनाओं को बचाना ‘’या ऐसी द्रष्टि देना जो जीवन को जीने में हमारी मदद करे ‘’वगेरा ये सब सोद्देश्यता अब कहीं ना कहीं धूमिल पड़ चुकी है |निस्संदेह कालगत बदलाव के असर से साहित्य कलाएं विचारधाराएँ ,कथानक अपने को विलग नहीं रह सकते प्रभावित होते ही हैं लेकिन ये परिवर्तन समाज पर किस तरह (सकारात्मक या नकारात्मक)प्रभाव छोड़ रहा है ज़रूरी ये है| जैसा कि आपने आज के दौर का ज़िक्र करते हुए कहा है कि बदलाव के नाम पर फूहडपन पसरने लगा है ये आजकी बाजारवादी मनोवृत्ति जिसने मनुष्य मात्र की सोच को संकीर्ण बनाया है का दुष्प्रभाव भी माना जा सकता है | दरअसल आज कविता में भावुकता का लोप हो रहा है और यदि भावुकता है तो उसे अतिवादी रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है |सच यही है कि ‘’रचनाकार का काम मूल्यों ,संवेदनाओं व विचार के क्षरण के विरुद्ध संघर्ष करना है ना कि उनका भव्यीकरन करना ‘’और वस्तुतः हो यही रहा है |आपने कोमल रिखब की जो बात कही है ये सही है कि संगीत में कोमल शब्द वस्तुतः एक दयालुता,सह्रदयता का आभास कराते हैं |रे ध कोमल वाले राग (भैरव ठाट के )बेहद सुन्दर और कोमल-प्रकृति वाले राग हैं भैरवी (सभी स्वर कोमल)इसी पंक्ति का एक और उदाहरण है |शिरीष जी बहुत धन्यवाद इस सुन्दर,पठनीय पोस्ट के लिए |केशव जी के काव्यांश पढकर एक उम्मीद अवश्य जागती है | व्याख्या सही और सटीक |अनुनाद निश्चित ही ब्लॉग की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना रहा है |बधाई और शुभकामनाएं |

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  3. यह पढ़ कर केशव जी की कवितायेँ पढने की इच्छा बलवती हो आई है. इससे पहले उनकी इक्का दुक्का कवितायेँ पढने को मिली थीं. आपके मूल्यांकन के बाद इस नजरिये से भी देखने की दृष्टि मिलेगी. उद्धृत काव्य अंश में भी लोक के प्रति उनकी दृष्टि देखी जा सकती है..दलिद्दर का टरना खासा देशज है ....

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  4. इसमें कोई संदेह नहीं केशव जी लोक की संकीर्णता और भावुकता से ऊपर उठे कवि हैं . वे युवा कविता में लोक चेतना के सबसे सशक्त और प्रमाणिक कवि हैं. उनके लिए लोक गाँव का पर्यायवाची न होकर अभिजात्य का विपरीतार्थक है. उनका लोक सर्वहारा का समानार्थी है. इसीलिए उनके यहाँ वर्गीय टकराहटें साफ-साफ दिखाई देती हैं. यही कारण है केशव तिवारी युवा कवियों में मेरे सबसे अधिक प्रिय कवि हैं। उनके यहाँ मुझे वह सब कुछ मिलता है जो मेरे दृष्टि से एक अच्छी कविता के लिए जरूरी है। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए पता चलता है कि कविता की तमाम शर्तों को पूरा करते हुए भी कैसे कविता सहज-संप्रेषणीय हो सकती है। कैसे नारा हुए बिना कविता विचार की वाहक बन सकती है । कैसे स्थानीय होकर भी कविता वैश्विक अपील करती है । लोकधर्मी होते हुए भी कविता को कैसे भावुकता से बचाया जा सकता है और कैसे अपने जन-जनपद और प्रकृति से जुड़े रहकर पूरे धरती से प्यार किया जा सकता है। सबसे बड़ी बात तमाम भय और प्रलोभनों के बीच खुद को एक प्रतिबद्ध कवि के रूप में कैसे खड़ा रखा जा सकता है। यह कहते हुए मुझे कोई झिझक नहीं है कि कविता के नाम पर अबूझ कविता लिखने वाले हमारे समय के ’कठिन कविता के प्रेतों’ और लोक के नाम पर कोरी-लिजलिजी भावुकता की कविता लिखने वालों को उनसे सीखना चाहिए। केशव तिवारी में मुझे त्रिलोचन जैसी सरलता केदार बाबू जैसी कलात्मकता और नागार्जुन जैसी प्रखरता दिखाई देती है। उनकी कविता का सहज ,भावपूर्ण एवं विविध आयामी स्वरूप मध्यवर्गीय रचना भूमि का अतिक्रमण करता है। वे अपनी देशज जमीन पर खड़े मनुष्यता की खोज में संलग्न रहते हैं। उनकी कविताएं यथार्थ का चित्रण ही नहीं करती बल्कि उसको बदलने के लिए रास्ता भी सुझाती हैं। कुल मिलाकर उनकी कविता मौजूदा लोकतान्त्रिक व्यवस्था में लोक का सच्चा प्रतिनिधित्व करती है इस अर्थ में उनको लोकधर्मी कहलाना हमेशा भाता रहा है.

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    1. महेश भाई बिलकुल सही आकलन है आपका.... मैं बस 'कठिन कविता के प्रेतों' की जगह 'कविता के कठिन प्रेतों' पर केन्द्रित होना चाह रहा हूं... कविता के कठिन होने का सबसे अधिक आरोप मुक्तिबोध पर भी लगता रहा है....
      ***
      केशव तिवारी में विचार और लोक के संतुलन और अनुशासन का होना बहुत प्रिय लगता है मुझे। मैं पहले भी आपसे अनुरोध कर चुका हूं..इस मंच से फिर आमंत्रित कर रहा हूं कि इन सन्‍दर्भों में एक लेख अनुनाद को दीजिए, जिसकी पूरी-पूरी सम्‍भावना आपकी इस टिप्‍पणी में मौजूद है। आपके अलावा अशोक कुमार पांडे से भी अनुरोध किया था मैंने...क्‍या पता इस बहाने एक सार्थक बहस सम्‍भव कर पाएं हम, जो निश्चित रूप से हमारे समय की कविता के हित में होगी।
      ***

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  5. केशव तिवारी की कविताओं के विषय में शिरीष जी के साथ महेश पुनेठा जी के विचार बड़े काम के लगे..अभी तक केशव जी की कोई किताब नहीं पढ़ पाया हूँ, फुटकर कवितायें पढ़ी हैं...इस आलेख ने एक उत्सुकता जगा डी है... पुरी किताब पढ़ कर ही किसी पर अपने विचार रखा जा सकता है.. अभी तो जान कर ही आनंदित हूँ..

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  6. यों देखा जाये तो ये केशव की कवितायें 'लोक' से जबरन विदा किये जा रहे 'जन' की दारुण गैर-आसानियों की अकथ कहानियां हैं .

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  7. bahut achcha aalekh. Keshav Tiwari Ki Kavitaon Ka Falak Bahut Vistrit hai. Bahut Badhai.

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