Thursday, July 26, 2012

कुमाऊंनी कविता की दशा -दिशा के बहाने - अनिल कुमार कार्की


कुमाऊंनी कविता की दशा-दिशा के बहाने 

गिर्दा
यह  कुमाऊंनी कविता के बदलते हुए प्रतिमान और शिल्प की बात है।  जब भी कुमाऊंनी कविता की भंगिमा की बात की जाएगी तो मैं कहूँगा की आज के लिख्वारों को हिंदी विभागों और अकादमिक समुदायों से दूर रहकर रचनाकर्म करना चहिये।  असल में  कुमाऊंनी  कविता ने पिछले दस  सालों  में जो करवट ली है, वह कोई आकस्मिक परिवर्तन नही है ! और न ही वह किसी नई शैली  का ही प्रभाव है। उतराखंड बनने के  के बाद का मोहभंग तथा उससे पूर्व का जो संक्रमणकालीन दौर है, उससे यथार्थ को जो लय मिली है, आज की कुमाऊंनी  कविता उसी की उपज है।  कुछ लोग कह सकते है कि मैं कुमाऊंनी  कविता की गौरवशाली कविता परम्‍परा को कठघरे में खड़ा  कर रहा हूँ,  पर ऐसा नही है।  हमारे पास एक लम्बी परंपरा है।  पिछले दिनों शेर दा अनपढ़ की मृत्यु पर कुछ लोगों का कहना था की उनका ठीक से मूल्याकंन नही हो पाया। उनकी श्रद्धांजलि सभा जो पिथौरागढ़ में आयोजित हुई थी, उसमें बोलने वाले कुछ मित्रों ने स्पष्ट कहा की उन्होंने बाहरी अर्थात पश्चिमी संस्कृति का विरोध किया। ये उनके बारे में बहुत ही हल्का मूल्यांकन है। असल में जो यह परम्परा है ... गुमानी पन्तजिन्होंने गोरखा राज पर कविता लिखी, जिन्होंने अल्मोड़ा के जन जीवन को लिखा और उसके बाद गौर्दा ने अंग्रेजी राज के बीच रचनाकर्म किया ....उसके बाद जिन दो रचनाकारों ने आजादी के बाद का मोहभंग दिखाया, उनमें बालम सिंह जनौटी और शेर दा अनपढ़ प्रमुख है। इनकी रचनाओं में लूट-खसोट और आज़ादी के बाद का लोकतंत्र गुलाटी मारता है, जिसमें टीस तो है ही और तीखे व्यंग भी है, आक्रोश है, संघर्ष है ...और शेर दा की कविता 'मुर्दा क बयान'  इसी काले और अपने अर्धसामन्ती और अर्धउपनिवेशवादी व्यवस्था के बीच अपने ही आम जन मानस की आत्माभिव्यक्ति है।  जो लोग उनमें रहस्यवाद देखने की बात करते है, उन्हें इस बात को समझना चाहिए कि वह किस दौर में थे और तब रचनाकार क्या  भोग रहा था। उनकी दूसरी कविता है 'धन मेरि छाती'  जो गहन निराशाओं के बीच रचनाकार के ऊर्जस्वित अंतर्मन का परिचायक है। बालम सिंह जनौटी और शेर दा की संयुक्त किताब फचैक में उनके सामाजिक सरोकारों और रचनाकर्म को समझा जा सकता है 


शेरदा अनपढ़ 

तुम हरिं कांकड जास हाम सुखि लाकड़ जास
तुमरी कुड़ी साजि रै हमरी कुड़ी बांजि  है रै

यह जो आक्रोश दिखायी देता है, उस पर भी बात होनी चाहिए थी, पर नही हुई।  जब हुक्मरानों के तलवे चाटने वाले भाड़ों और विलासियों की हिजड़ी सेना सर पर चमेली का तेल लगाकर मंत्रियों के आगे पीछे दुम हिलाती हो तब हम यह उम्मीद भी नही कर सकते की जनकवियों का ठीक मूल्यांकन हो पायेगा। जो लोग मंत्रियो के नामों पर नामाक्षरी पढ़ते है,  तब तो यही लोग जनकवि होंगे..... गुमानीपन्त पुरस्कारों के खुले दावेदार भी वही होंगे, जिन्होंने कुमाऊंनी कविता के नाम पर  निरर्थक प्रलाप किया है!  फौजी गायकों ने जिस तरह हमारे गीतों को विकृत किया है, उसी तरह कुछ तुक्कड़ लोग कुमाऊंनी कवि भी हैं।  ख़ैर इन कवियों के बाद जो खरा कवि हमारी परम्परा को मिला है, वह है गिर्दा। यह क्रम बहुत पहले से चल  रहा था- ये बात गिर्दा भी बखूबी जानते थे, इसीलिए गोर्दा की कविता आज हिमाला तुमुकें ध्तुयों छो  को उन्होंने नये रूप में प्रस्तुत  किया।  गिर्दा राजनैतिक चेतना से लैस पहले  कवि हैं।  हिंदी साहित्य में नागार्जुन से उनकी तुलना इसीलिए होती रही है। उन्‍होंने कविता और जीवन के बीच कोई अंतर नही आने दिया।  गिर्दा जन-आंदोलनों और राज्य-सत्ताओं के दमन से उपजे कवि हैं।  वह उस उठापटक के दौर को न सिर्फ़ देख रहे थे, बल्कि जी भी रहे थे!  जब लोकतंत्र की आड़ में सरकारें और पूँजीपति हमारे जल-जंगल-ज़मीनों से हमें बेदखल कर रहे थे, उत्तराखंड आन्दोलन के मूल में पहाड़ की अनदेखी और शिक्षा-स्वास्थ्य सड़क के मुद्दे थे, तब इस आन्दोलन में गिर्दा रचनात्मक और आंदोलनात्मक, दोनों भूमिकाओं में निरन्‍तर मौजूद रहे। जिस तरह पहाड़ में लगातार उत्पादन संबंध बदले है, जल-जंगल स्वार्थपरक राजनीति और वर्गीय हितों की चपेट में आये हैं।  इसने पहाड़ी जनमानस के मन में एक अलग किस्म का अवचेतन निर्मित किया है, जिसे हम केवल आधुनिक जीवनबोध के माध्यम से ही समझ सकते है, परम्परागत भोंथरे औजारों  से नहीं।  न बहुत ज्यादा पहाड़ीपन से और न बहुत ज्यादा यादवादी होकर।  नि:संदेह शेर दा अनपढ़ बलम सिंह जनौटी और गिर्दा -  हमारे  केदार , नागार्जुन  और त्रिलोचन हैं।  कुमाऊंनी कविता में यह दौर मोहभंग का है, यदि आप इसकी परख करना चाहें तो उत्तराखंड बनने के बाद की तमाम कविताएँ, कहानियाँ, उपन्यास उठाकर देखिये -  मोहभंग  और आत्मनिर्वासन उनकी प्रधान प्रवृति  है। इतिहास और साहित्य का संबंध, जटिल होने के साथ साथ सघन भी होता है।   नरेंद्र सिंह नेगी का एक गीत है .. जिसमें एक पत्नी परदेश में अपने पति से निवेदन करती है कि खेतों में प्योंली खिल गयी होगी और बालक बसंत लौट कर आ गया होगा, अब मुझे घर छोड़ आओ, क्योंकि ये शहर अजीब सा है।  यहाँ सब अनजान से हैं।  और तो और यहाँ से नीला आसमान भी नही दिखाई देता,यहाँ सब भाग रहे है आदि.....  लेकिन ठीक दस-बीस साल बाद की  स्थिति इसके उलट है?  असल में महानगरीय बोध का प्रभाव पहाड़ पर फैशन या सूचन- क्रांति से उतना नही पड़ा। इसके पीछे जो बड़ी बात है, उस रोज़ी-रोटी के अजनबीपन को नरेंद्र सिंह नेगी के गीत की नायिका तब एक दम स्पष्ट पहचान  रही थी....ऐसा क्या हुआ कि पन्‍द्रह-बीस सालों में यह समझ उस नायिका से जाती रही

गुमानी पंत
प्रह्लाद सिंह महरा मेरा पसंदीदा गायक था!  कभी सुनिएगा ..जिसकी सामाजिक चेतना एक समय 'पहाड़ की चेली ले कभे न खाया दुई रव्‍टा सुख ले' या फिर 'कैले उजाड़ो होलो यो मेरो पहाड़' ..लिख रही थी, २००५ के आते-आते उसकी मधुलि ब्यूटी पालर्र जाने को क्यों मजबूर हो गयी ? फ़िल्मी,नेपाली, असमी धुनें चोरी होने लगी  और फौजी ललित मोहन जोशी सरीखे गायकों ने जो बेडा गर्क किया है, उसे सब जानते है। वह पहाड़ी महिला जिसके कांधों में पहाड़ के टिके होने का दावा हम करते थे, उसकी उन्मुक्तता और प्रकृति के साथ उसके गहन संबंध अब नये नगरीकरण  के दियासलाईनुमा खोकों की भेंट चढ़ गये।  ये हमारे पहाड़ों को लुटने की पहली शर्त थी कि कैसे भी दाथुलीधारी महिलाएं पहाड़ को छोड़ दे...वो भूमण्डलीकरण ने कर दिखाया। उसने पहाड़ों में भी  व्यापक रूप से नगरीकरण किया। इस ताने बाने में एक ओर जहाँ पहाड़ में लोक पर सीधा असर हुआ, वहीं दूसरी ओर पहाड़ी महिलाओं को मध्यमनगरीय ऊब ,संत्रास और कुंठा से अभिशप्त होने को मजबूर किया ! यही वो असर था जिसने पहाड़ के ढांचे को न सिर्फ़ गिराया, बल्कि उसकी पुनर्रचना का भी बेड़ा उठाया। हम किसी भी समाज का बेमतलब यथावत बने रहना स्वीकार नहीं सकते। जब स्काटलैंड का बाजा बैगपाईपर यहाँ मशकबीन बन सकता है और हमारी रागात्‍मक जीवनवृतियों को व्यक्त कर सकता है, तो इससे क्या परहेज और क्यों ? इस ढांचे के गिरने के पीछे और बनने पीछे सबसे बड़ा कारण था शिक्षा ...  आपने और हमने देखा है कभी कुमाऊंनी बोलना कितना गवाँरुपन की चीज थी ये अलग बात है की आज यह एक अच्छा बाजार भी दे रही है... या देगी... इसलिए वही लोग इसके पैरोकार भी है, जो कभी इसे भनमजुओं की बोली समझते थे। शायद मैं अच्छी कुमाऊंनी नही बोल पाता - इसके जिम्मेदार मेरे अपने बुजुर्ग है, मैं नही, क्योंकि मानव इसीलिए मानव है कि वह स्मृति से अपनी बोली-संस्कृति अपनी अगली पीड़ी को सौंपता है।  हमारे बुजुर्गों ने हमें यह नहीं सौंपी। शिक्षा-स्वाथ्य के प्रति जागरूकता ने जिस नये समाज का निर्माण किया है उसका सौन्दर्य भी बदला। उसमें सत्तर से अस्सी फीसदी सैनिक परिवार थे और आज भी हैं। असल में उनका जो अवचेतन बना वह बहुत जटिल था.. और आज भी जटिल है... आधा बकरी-आधा शेर वाला। इसमें एक तरफ़ तो लगातार प्रचलित मिथकों का मोह बना रहा और दूसरी ओर साब बनने की ललक।  इन दोनों के बीच जो मुख्य तनाव था उससे जो चीज निकलनी चाहिए थी, वह थी प्रचलित अंधविश्वासों का मुखर विरोध और राज्य सत्ता के विरुद्ध आवाज बुलंद करना....जो नही हो पाया !  आज भी हम परी-बयाल और मॉस हिस्टीरिया के केस देख रहे हैं, जो बंद समाजों का प्रमुख रोग है। इसका कारण ही यह है कि हममें मनोवैज्ञानिक समझ परंपरागत ही रही है।   यह इसलिए भी नही हो पाया कि पहाड़ी युवक जो बुद्धिजीवी बना उसकी नसों में फौजी डालडा ही बहता रहा।  सेना और अंधराष्‍ट्रवाद, पुलिस  के प्रति उसकी अंधी समझ ने उसे मुखर नही होने दिया। आज भी उनके बड़े-बड़े भूभागों, नदियों और जंगलों का बेतरतीब तरीके से राज्य सरकारें अधिग्रहण कर रही है ! हाँ अब पहाड़ी परिवार सेना की चुंगुल से निकल कर बहुउद्देशीय कम्पनियों के चुंगुल में जा फंसे है, जो और भी खतरनाक है।  बी.टेक, एम.टेक, बी.सी.ए, एम.सी.ए करने वाले युवाओं के हाल देखिये।  असल में बदला कुछ नहीं ...बदला है तो केवल वक्त। जो परम्परागत नजरिया था, वह अब फैशन हो गया है और यह चुप्पी कब टूटेगी कुछ नही कहा जा सकता।  फिर भी प्रतिरोध तो होगा ही, क्योंकि असंतोस जिस तरह से बढ़ा है.... लगता है कि १० -१५ सालों में ये मोहभंग आक्रोश  की सही दिशा पकड़ेगा। इस बीच जो जद्दोज़ेहद और पेसोपेश हुआ है, उसने एक नये नगरीकरण का निर्माण किया है। सर्वहारा वर्ग उसमें कितना संतुष्ट है, या असंतुष्ट, यह देखने की बात है।  पहले जो अंतर्विरोध प्रमुख थे, वह अब गौण होते जा रहे हैं।  अब नये अंतर्विरोध उभर कर सामने आ रहे हैं। उत्पादन संबंध बदलने के साथ साथ अंतर्विरोध भी बदले हैं, जिन्होंने साहित्य समाज संस्कृति को भी गहरे स्तर  पर प्रभावित किया है। यह जो नया नगरीकरण है, वह किसी भी महानगर से कितना भिन्न है ..सीधा सा सवाल है ये।  एक किस्म के बेसकैम्प है, जहाँ से आदमी निरंतर आगे की और खिसक रहा है। ये जो खिसकन है ,वो शौक नहीं, मजबूरी है .. इसलिए आज कोई भी प्रवासी नही है ..अगर है तो फिर सब प्रवासी हैं।   सभी  आत्मनिर्वासन झेल रहे है... पर सवाल ये है कि ये अस्थायी नगरीकरण कहाँ ले जायेगा ? (अल्मोड़ा,पिथोरागढ़.रामनगर.रानीखेत,चम्पावत) और ये भी सोचने की बात है कि सबसे ज्यादा पलायन अल्मोड़ा में हुआ है।  यह बात रोचक है हल्द्वानी अल्मोड़े से लभग १०० किलोमीटर दूरी पर है ..अब इसका दूसरा पहलू  यह है की इस नये किस्म के नगरीकरण ने पहाड़ में नये किस्म के संबंधो की भी रचना की है जिसमे नातेदार नौकर प्रमुख संबंध है। यह इस किस्म का संबंध है, जिसमें एक समर्थ आदमी अपनी ज़मीन किसी ग़रीब रिश्तेदार को दे देता है और अनाज पर अपना अधिकार मांगता है.... या फिर छमाही किस्त के हिसाब से पैसे वसूलता है।  साथ ही पहाड़ पर खनन ने एक नया मजदूर पैदा किया किया।  और विधायकी और ग्राम पंचायतों  ने बचे-खुचे युवाओं को भी खड़ंजामुंशी बना दिया है। स्थानीय उत्पादों - बुरांस के फूलों, मड़ुवा, हिसालू, किल्मोड़े, काफल आदि  पर भी  बहुउद्देशीय कम्पनियों की नजर है .....  बल्कि यह भी होने लगा है.. समुचित आर्थिक नियोजन के अभाव में आत्मनिर्वासन झेल रहा पहाड़ी जनमानस, जिसकी श्रमशक्ति खरीदी जा चुकी है, वह भले ही जी रहा है लेकिन उसके जीवन के जो संवेदनागत या अनुभूतिजन्य कमियां हैं।  जो अराजकतावादी यथार्थ उसके जीवन में व्याप्त है, वही अब लिखी जा रही कुमाऊंनी कविता का प्रमुख स्वर है और होना भी चाहिए ...  यह रचाव ही समकालीन समाज और मानव के जटिल संबंधों का अभिव्यक्ति के स्तर पर प्रत्‍युत्‍तर है!  आवश्यकता इस मोहभंग को सही दिशा और वैचरिक आधार देने की है।  पहाड़ में सूचनाक्रन्ति का असर उस तरह से नही पड़ा है, जिस तरह से हम समझ रहे है।  अगर यह सीधा असर होता तो परी पूजने वाले ओझा स्कूलों में ससम्मान नही बुलाये जाते, बल्कि इन दिक्‍कतों का समाधान मनोवैज्ञानिक स्तर पर किया जाता। स्त्रियों के हालात गुणात्मक रूप से भिन्न भी होते। असल बात यह है कि हमें अपनी कमियों को अपनी सामाजिक संरचना में ही ढूंढना होगा। अपने लोक के प्रचलित मिथकों में आधुनिक भावबोध भरने ही होंगे और उनकी गहन पड़ताल भी करनी होगी। लोक कथाओं को जैसे का तैसा उठाकर, बिना गहन विश्लेष्णात्मक हल के नये विद्यार्थियों के सामने रखकर हम उन्हें कुछ नया करने के बजाय परंपरागत रूढयों की ओर धकेल रहे हैं - जैसे कुमाऊंनी साहित्य, संस्कृति-इतिहास आदि  के सन्‍दर्भ में जो कहानियां उठाई गयी हैं, वह बिना विश्लेषण के ही हैं।  ऐसा क्यों हुआ होगा ?  या ऐसा क्यों है ? इस पर कोई बात नहीं  हो  रही है। हमारे पास वर्गसंघर्षों का लम्बा इतिहास है।  यदि पड़ताल करें तो हमारे पास गंगनाथ-भाना की  प्रेम कथा है, राजुला-मालुशाही है, सरपद्यो-रजा की कहानी है ,भिटौली के विषय में विभिन्न प्रचलित कथाएं हैं- इन प्रचलित कहानियों को  तत्कालीन  समाजों के अध्ययन का औज़ार बनाना ही होगा, जो हमें उन आदिम समाजों तक ले जा सकते हैं, जिनसे हमारे सामूहिक अवचेतन को समझने में सहायता मिलेगी !


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अनिल कुमार कार्की
अनुनाद पर आए इस लेखक ने शुरूआत में ही बड़ी हमलावर मुद्रा में लोकभाषाओं के नए लिख्‍वारों को हिंदी विभागों और अकादमिक समुदायों से दूर रहकर लिखने की सलाह दी है । हमारे विभागों और अकादमिक समुदायों ने शायद नई ऊर्जाओं और सम्‍भावनाओं के लिए इतनी जगह कभी बनाई ही नहीं कि वे उसमें अपने होने के मायने खोज पाएं। नए वक्‍़त की इन नई ज़मीनों के बारे में बिना ढंग से जाने हम सिर्फ़ तय कर दी गई किताबों को पढ़ाने में रह गए,जबकि उनकी हमसे उम्‍मीदें कुछ और ज्‍़यादा की थीं... कुछ और ज्‍़यादा की हैं। मुझे गहरा अहसास है कि यह मोहभंग अकादमिक शिक्षण के लिए एक संकटग्रस्‍त भविष्‍य की आहट है। यह सिर्फ़ यहां नहीं हो रहा है- दिल्‍ली, बनारस, इलाहाबाद, भोपाल, मुम्‍बई, जयपुर...कहीं कम-कहीं ज्‍़यादा...पर सभी जगह हो रहा होगा। 

अनिल कुमार कार्की डी.एस.बी. परिसर के हिंदी विभाग में शोधछात्र है। ''हिंदी की लम्‍बी कविताएं:शिल्‍प एवं विचार'' उसका शोधविषय है। कभी-कभी अबूझ बीहड़ता लेकिन वैचारिक रूप से हमेशा काफी हलचलों से भरा एक नौजवान....जिसे अपने रास्‍ते अभी तय करने हैं। दुनिया को अभी और खुलना है उसके जीवन में। हिंदी-युग्‍म की कविता प्रतियोगिता में वह पंकज बिष्‍ट और अनामिका द्वारा पुरस्‍कृत है यानी औपचारिक रूप से दिल्‍ली भी देख आया है। समकालीन यथार्थ और विचारधाराओं से बख़ूबी परिचित है। सुपरिचित युवा कवि महेश पुनेठा के सम्‍पर्क से आकर मेरा विद्यार्थी बना और अब मुझे अकसर ही कई-कई बहसतलब बातों में मुब्तिला रखता है, जो एक शोधार्थी के लिए अच्‍छा  लक्षण है। उसका लिखा यह कच्‍चा-पक्‍का लेख उसी की तरह बीहड़ और वाचाल किंतु एक निश्चित वैचारिक दिशा में जाता लेख है। अनुनाद इस लेख को लोकभाषाओं और उनकी कविता पर निरन्‍तर कुछ न कुछ छापते रहने की आकांक्षा के रूप में प्रस्‍तुत कर रहा है। अनुनाद तक आने वाले कवियों-आलोचकों-पाठकों से मेरा अनुरोध हैं कि इस कड़ी को आगे बढ़ाने में अनुनाद को सहयोग दें।     


2 comments:

  1. अनिल का यह आलेख तमाम जरूरी सवालों से जूझता है.पूरे लोक साहित्य को एक रूमानी ब्रश से रंगने की जगह उसके जनपक्षीय अवयव को सामने लाने तथा अपने समय की समाजार्थिक सच्चाइयों के बरक्स उसके उत्स और उसकी भूमिका की पहचान के ज़रूरी काम को अंजाम देने की कोशिश करता यह आलेख एक गंभीर लेखक के आगमन की सूचना देता है...शुभकामनाएं.

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  2. Anil ne kumauni kavita ke bahane is aalekh main apane anchal ke poore samaj or samaya ki achhi padatal ki hai.lok sahitya ko ek sahi najar se dekha hai. sateek sawal khade kiye hain.aawashyakata hai in swalon par vistar se kam karane ki.Anil bhayi main is kam ko aage badane ki bharpoor kshamata hai.....shrish bhayi shadhuwad ke patra hain ki unhone apani gambheer tippani ke sath ise apane blog main sthan diya.लोकभाषाओं और उनकी कविता पर निरन्‍तर कुछ न कुछ छापते रहने की unaki आकांक्षा ka ham swagat karate hain.....aasha hai yah kram aage badega.

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