Saturday, June 30, 2012

कहरवा पर दो युवा कवियों की कविताएं




चित्र यहां से साभार 

धागेनतिनकधिन - व्‍योमेश शुक्‍ल 

एक लड़का तबला बजाना सीख रहा है
हारमोनियम पर बजते लहरे के साथ अपने उत्साही अपरिष्कार में वह आठ मात्राओं
का मशहूर ताल बजाता है
इस ताल के अनोखे संसार में उसका स्वागत है

समय ने बीतना इसी ताल से सीखा है तो
सबसे पहले वही मिलता है बूढ़ा दरवेश सृष्टि के आरम्भ से इसी ताल को अपने
इकतारे पर बजाता हुआ झूमता हुआ
न जाने कितनों के दिल मिलते हैं इसी ताल पर धड़कते हुए
कभी टूटते हुए भी
भारतीय संगीत के सभी दिवंगत दिग्गज वहां इसी ताल पर अपने रियाज़ करते हैं
दरख़्त इसी ताल के अनेक आवर्त्तनों के बाद आने वाले किसी सम पर
अपनी पत्तियां गिराते हैं
मुम्बइया सिनेमा के कुछ महामन्द लोकप्रियतावादी संगीत निर्देशकों ने
आठ मात्रे की इस ताल की आड़ में
जो भयानक गुनाह किए हैं वे यहां जाहिर हैं
इस ताल को मलिन करने की ऐसी सभी कोशिशों को वहां एक कोने में लयपूर्वक
हल्की-फुल्की सज़ाएं
दी जा रही हैं
ज्ञानी होना जरूरी नहीं, ताल के राज में ज़रूरत सिर्फ़ संवेदना की है
क्योंकि वहां लोग जानते हैं कि पृथ्वी पर पैदा होने वाले हरेक प्राणी को यह ताल
आता है यह बात उसे मालूम हो, न हो
नदियों के उद्गम, झरनों के गिरने की जगहों, हवा की गति में यह ताल पहले ही
पा लिया गया था अब तमाम मशीनों के चलने की लय, फोन की घंटी, जेनरेटर आदि की
आवाज़ों में यह रोज़ नई शक्लों में उस संसार के लोगों को मिल रहा है

हिन्दी की महान छान्दिक कविता में यह बिलकुल साफ़ तौर पर था लेकिन जब गीत नवगीत ने
इसकी चापलूसी की हद कर दी तो ख़फ़ा होकर यह गद्य के विषण्ण
संगीत में चला आया

तो अब गद्य के अनोखे संसार में उस ताल का स्वागत है
यहां जो लड़का तबला बजाना सीख रहा है, ताल के संसार में गद्य में से होता हुआ
हुआ जा रहा है
उसके पास अभ्यास नहीं अनुभव नहीं सफ़ाई नहीं
एक जुनून है यह ताल बजाने का
कभी कभी यह भी होगा कि वह इस रास्ते पर चलते चलते भटक जाए लड़खड़ा जाए
सड़कें गड्ढों से भरी हुई हैं, पुल कमज़ोर पुराने हैं, पीछे से बेताल का समुद्र
हहराता हुआ आ रहा है

बेसुरे दारोग़ा न्याय करने के लिए टहल रहे हैं।
***

कहरवा - सिद्धान्‍तमोहन तिवारी 


हमेशा सरल होने का अभिनय करते हुए
सरलतम रूप में स्थापित कहरवा हमेशा
हमारे बीच उपस्थित होता है
जिसकी उठान मैनें पहली दफ़ा सुनी थी 
तो पाया कि युद्ध का बिगुल बज चुका है
तिरकिट तकतिर किटतक धा
मज़बूत बायाँ हाथ 
इसके मदमस्त चाल की ताल वाले संस्करण को जन्म देता है
इससे उम्र में आठ मात्रा बड़ा भाई तीनताल 
मटकी लेकर चलने और मटक कर चलने जैसे 
तमाम फूहड़ दृश्यों को समझाता है

लेकिन,
मटकी लेकर तेज़ी से भागने
पहाड़ों को तोड़कर निकल जाने
नदियों का रास्ता रोकने की क्रिया में
बजा कहरवा

कहरवा पत्थरों के टूटने की आवाज़ है

मिट्टी, पत्थर, पेड़, शहर, गाँव
राम-रवन्ना, अल्ला-मुल्ला
सभी कहरवा बजाते हैं
पहाड़ी-तिक्काड़ी और खेती-बाड़ी
सभी की आवाज़ों में कहरवा खनकता है

कहरवा की दृश्य अनुकृति
घड़े होते हैं
कहरवा खुशदिल तो नहीं है लेकिन दुःख में भी नहीं
हमेशा अनमनेपन के लापरवाह पराक्रम से
कहरवा की आवाज़ निकलकर आती है

कई चीज़ें कहरवा बनने के लिए बनीं
और बजने के लिए भी
जब 'नाल' बना
तो कहरवा ही बजा सिर्फ़ उस पर 

तबले पर कहरवा बज ही नहीं सका
आज दालमंडी में कहरवा ही सुनाई देता है
जो तीनताल और दादरा की अनुगूंजों में व्याप्त है

कहरवा. तुम तो इन्सान हो
कई रूपों में बजा करते हो.
***

Sunday, June 17, 2012

रेत मजदूर को देखते हुए - पंकज मिश्र


फेसबुक पर कभी-कभी बहुत अच्‍छी कविताएं मिल जाती हैं। अशोक कुमार पांडेय के सौजन्‍य से यह कविता अभी मिली...जिसे अनुनाद पर लगा देने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पा रहा हूं। 

***

उसने लोहा उठाया  ,
झट, उसका कान उमेठा
बाल्टी के नंगे कानों में पहना,
चल दिया,
वो भी ,सज संवर
बाहों में लटक ....चल पडी
साथ उसके डुबुक ...
छिछले पानी में घुसता,
नीचे मोतियों का,घूरा चमकता,
ले आता उपर,रेत भर भर
बस एक परत
मटमैले पानी के भीतर
मोतियों का चूरा,दमकता
डूबता उतराता , तैरता,
भर बाल्टी रेत,उलीचता 
तट से दूर खड़ी,नाव में
नदी किनारे बसे,तुम्हारे गाँव में 
भरी दोपहरी , थक कर 
गर्म तवे पे चलकर
धूसर ढूह की सूनी छांव में,
छितर जाता....... 

अखबार में गठियायी, 
बासी खबरे समेटे ,सूखी रोटी
काले धब्बों वाले पीले चाँद सी रोटी...कुडकुडायी 
अक्षर शब्द सब,रोटी के जिस्म पे
उलट पुलट चिपक गए .....
पीला चाँद,आइने सा 
दुनिया का अक्स लिए 
बोल रहा था.....
सारी दुनिया का सारा सच
खारी दुनिया का खारा सच
खोल रहा था.....

वो कौर पे कौर पे कौर
तोड़ रहा था  
एक कौर और
असंगठित मजदूरों की कल्याण कारी योजनाये 
सीधा हलक के भीतर 
एक कौर, और 
जापानी बुखार का कहर  
पानी के घूँट के साथ
उतर गया
सर्कस में कोई
सफ़ेद बाघ था, मर गया
ओबामा के भोज में
चिकन तंदूरी,
हैदराबादी बिरयानी
सैफ करीना की कहानी  
एक कौर, और
........ये मेरी नहीं, 
जनता की जीत है
............ये हमारी 
सेवाओं का फल है
बाद चुनाव् ,होने वाले सद्र की 
नवधनिक दीमकों की मुस्कुराती,
हाथ मिलाती तस्वीरें,  
......चबाये जा रहा है
दाँतों का झुनझुना
बजाये जा रहा है  
गाये जा रहा है......

रोटी खत्म ....
पेट आधा भर गया
तमाम ख़बरें 
पानी के साथ ,निगल गया
चल दिया आदतन  
ढूह  की ओट में
खाने के बाद मू....ने 
रोटी रह गयी पेट में ,
पानी बह गया रेत में,
सूख गयीं, भाप हुईं ,
गर्म तवे पर
तमाम ख़बर .....

तन मन ,बाद दो पहर ,
फिर तर बतर 
छालों में स्वेद बिंदु भर,
निर्विकार,थक हार
ढलते सूरज के साथ ,ढह जाता 
नाउमीद सन्नाटे सा ,
नदी किनारे पसर जाता  
गठियायी शैम्पू की पुडिया
टेंट से निकालता 
देह भर,साबुन की
सस्ती टिकिया लगाता 
दिन भर की हजार डुबकियों
के बाद भी,जाने क्या छुडाता  ,
मल मल नहाता...
सस्ता गम्कौउआ तेल लगा
किसी आस सा ,संवर गया 
पानी में जाने कब कैसे
दिन भर का छाला घुल गया
पसीना फिर पानी से धुल गया   
सूरज ढलने के साथ साथ 
तारों की बारात चली 
उसके संग फिर रात चली .......
देशी दारू के ठेके पे 
सारी दुनिया है ठेंगे पे .....

Monday, June 11, 2012

कात्‍यायनी की एक पुरानी कविता


कात्‍यायनी हमारे समय की सुपरिचित और महत्‍वपूर्ण कवि हैं। उनकी ये कविता 'चक दे' की चकाचौंध से बहुत पहले की है। इस कविता को बार-बार पढ़ता रहा हूं। रामनगर नाम के जिस छोटे-से क़स्‍बे में मेरी रिहाइश रही है, वहां तमाम वर्जनाओं के बावजूद लड़कियों में खेलों के प्रति एक उन्‍माद-सा था। शाम को हमारे कालेज का मैदान लड़कियों से भरा रहता था। कुछ वालीबाल खेलतीं, कुछ हाकी और एकाध लम्‍बी दौड़ के अभ्‍यास में मैदान के चक्‍कर लगाती दीखती। वाकई में होता ये था कि लड़के चौराहे पर छींटाकशी में वक्‍़त गुज़ारते थे और लड़कियां छोटे-छोटे झुंडों में मैदान की ओर आती-जाती दिखती थीं। वे सभी शानदार लड़कियां थीं। वे कभी एन.सी.सी. की ड्रेस में नज़र आतीं तो कभी कुमाऊं विश्‍वविद्यालय के ट्रेकसूट में। उनमें कुछ बहुत आगे तक पहूंचीं- राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पदक लायीं, कुछ को पुलिस में नौकरी मिलीं, कुछ स्‍कूलों में पी.टी.आई. हो गयीं। उनमें से एक अब भी सम्‍पर्क में है। उसकी शादी एक मिठाईवाले से हुई और अब वो काउंटर के पास जलेबी और समोसे बनाती दिखाई देती है। हम पति-पत्‍नी बाज़ार जाते हैं तो उससे मुलाक़ात होती है और पुराने दिनों की बातें भी- हाकी खेलने और अपने खेतों में ट्रेक्‍टर चलाने वाली उसी लड़की को समर्पित है यह अद्भुत कविता। 

हॉकी खेलती लड़कियाँ


आज शुक्रवार का दिन है
और इस छोटे से शहर की ये लड़कियाँ
खेल रही हैं हॉकी।
खुश हैं लड़कियाँ
फिलहाल
खेल रही हैं हॉकी
कोई डर नहीं।

बॉल के साथ दौड़ती हुई
हाथों में साधे स्टिक
वे हरी घास पर तैरती हैं
चूल्हे की आँच से
मूसल की धमक से
दौड़ती हुई
बहुत दूर आ जाती हैं।

वहाँ इंतज़ार कर रहे हैं
उन्हें देखने आए हुए वर पक्ष के लोग
वहाँ अम्मा बैठी राह तकती है
कि बेटियाँ आएं तो
संतोषी माता की कथा सुनाएं
और
वे अपना व्रत तोड़ें।

वहाँ बाबूजी प्रतीक्षा कर रहे हैं
दफ्तर से लौटकर
पकौड़ी और चाय की
वहाँ भाई घूम-घूम कर लौट आ रहा है
चौराहे से
जहाँ खड़े हैं मुहल्ले के शोहदे
रोज़ की तरह
लड़कियाँ हैं कि हॉकी खेल रही हैं।

लड़कियाँ
पेनाल्टी कार्नर मार रही हैं
लड़कियाँ
पास दे रही हैं
लड़कियाँ
'गो...ल- गो...ल' चिल्लाती हुई
बीच मैदान की ओर भाग रही हैं।
लड़कियाँ
एक-दूसरे पर ढह रही हैं
एक-दूसरे को चूम रही हैं
और हँस रही हैं।

लड़कियाँ फाउल खेल रही हैं
लड़कियों को चेतावनी दी जा रही है
और वे हँस रही हैं
कि यह ज़िन्दगी नहीं है
-इस बात से निश्चिंत हैं लड़कियाँ
हँस रही हैं
रेफ़री की चेतावनी पर।

लड़कियाँ
बारिश के बाद की
नम घास पर फिसल रही हैं
और गिर रही हैं
और उठ रही हैं

वे लहरा रही हैं
चमक रही हैं
और मैदान के अलग-अलग मोर्चों में
रह-रहकर उमड़-घुमड़ रही हैं।

वे चीख़ रही हैं
सीटी मार रही हैं
और बिना रुके भाग रही हैं
एक छोर से दूसरे छोर तक।

उनकी पुष्ट टांगें चमक रही हैं
नृत्य की लयबद्ध गति के साथ
और लड़कियाँ हैं कि निर्द्वन्द्व निश्चिन्त हैं
बिना यह सोचे कि
मुँह दिखाई की रस्म करते समय
सास क्या सोचेगी।

इसी तरह खेलती रहती लड़कियाँ
निस्संकोच-निर्भीक
दौड़ती-भागती और हँसती रहतीं
इसी तरह
और हम देखते रहते उन्हें।

पर शाम है कि होगी ही
रेफ़री है कि बाज नहीं आएगा
सीटी बजाने से
और स्टिक लटकाये हाथों में
एक भीषण जंग से निपटने की
तैयारी करती लड़कियाँ लौटेंगी घर।

अगर ऐसा न हो तो
समय रुक जाएगा
इन्द्र-मरुत-वरुण सब कुपित हो जाएंगे
वज्रपात हो जाएगा, चक्रवात आ जाएगा
घर पर बैठे
देखने आए वर पक्ष के लोग
पैर पटकते चले जाएंगे
बाबूजी घुस आएंगे गरजते हुए मैदान में
भाई दौड़ता हुआ आएगा
और झोंट पकड़कर घसीट ले जाएगा
अम्मा कोसेगी-
'किस घड़ी में पैदा किया था
ऐसी कुलच्छनी बेटी को!'
बाबूजी चीखेंगे-
'सब तुम्हारा बिगाड़ा हुआ है !'
घर फिर एक अँधेरे में डूब जाएगा
सब सो जाएंगे
लड़कियाँ घूरेंगी अँधेरे में
खटिया पर चित्त लेटी हुईं
अम्मा की लम्बी साँसें सुनतीं
इंतज़ार करती हुईं
कि अभी वे आकर उनका सिर सहलाएंगी
सो जाएंगी लड़कियाँ
सपने में दौड़ती हुई बॉल के पीछे
स्टिक को साधे हुए हाथों में
पृथ्वी के छोर पर पहुँच जाएंगी
और 'गोल-गोल' चिल्लाती हुईं
एक दूसरे को चूमती हुईं
लिपटकर धरती पर गिर जाएंगी !
***

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