Saturday, January 28, 2012

आजकल






मेरा पालतू कुत्ता
जो पहले चिडि़यों को हैरत से तका करता और भौंकता था
घात लगाने लगा है आजकल उनपर
छोटे पिल्ले से जवान होते हुए
उसमें खेलने की बजाए खाने की हसरत जागने लगी है

बेटा कुछ और बड़ा हुआ
मेरे कंधे तक आने लगा है
खेल में वह लेग स्पिनर हो गया है स्कूल टीम का
संगीत में बजाने लगा है तबला तीन क़ायदों के साथ
वाचालता में वक्ता हो गया है
वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में ज़ोर-आजमाइश करता हुआ

आजकल उसकी किताबें कुछ और कठिन हुई हैं
एल सी एम एच सी एफ
फ्यूचर कंटीन्यूीअस टेंस
ओरिजन ऑफ यूनीवर्स वगैरह होती हुई
अभी वह पांचवी में है
पर मैं बारहवीं के बारे में सोचने लगा हूं आजकल

मेरी नौकरी की जगह भी भरने लगी है
नवनियुक्त प्राध्यापकों से

पुराने रौबीले चेहरे प्रोफेसरों के मूंछदार
कड़क आवाज़ वाले नहीं दिखते आजकल

शिरीष कहकर बुलाने वाले कुछ ही बचे हैं
सर कहकर बुलाया जाने लगा है अब मुझे
शायद कनपटी पर दो-चार सफ़ेद हो चले बालों के कारण
पर मूंछें उतनी रोबीली नहीं मेरी
और न ही आवाज़ उतनी कड़कदार

घर में पत्नी़ आधी ख़ुश
आधी उदास
अपनी गृहस्थी़ की सफलता में उसने
अख़बार तक पढ़ना छोड़ दिया है आजकल

मैं ख़ुद भी हथेली पर तम्बाकू-चूना घिसने के बजाए
निकोटिन की मेडिकेटेड च्यूइंगम चबाने लगा हूं

भीषण है यह शब्द - आजकल
भाषा में
बहुत स्थानिक इसका प्रवाह

मुझे लाता -ले जाता हुआ
इसका ठहराव
किसी बम के फटने या गोली चलने से ठीक पहले जैसा
****

Sunday, January 8, 2012

बनता हुआ मकान - सिद्धेश्वर सिंह

एक लम्बे इंतज़ार के बाद जबकि मैं अपना मकान बनवा रहा हूँ...और तरह तरह की मुश्किलों से दो चार हो रहा हूँ तो मुझे रह रह कर अपने जवाहिर चा की ये कविता याद आ रही .... अपने गिर्द चारदीवारी खड़ी करना भी एक अजब और कड़ा अनुभव है...सभी लोग इससे गुज़रते हैं...यक़ीन हैं की जवाहिर चा की ये कविता भी मेरी तरह आप सबको भी अपनी सी लगेगी. 
  
यह एक बनता हुआ मकान है
मकान भी कहाँ
आधा अधूरा निर्माण
आधा अधूरा उजाड़
जैसे आधा - अधूरा प्यार
जैसे आधी अधूरी नफरत।

यह एक बनता हुआ मकान है
यहाँ सबकुछ प्रक्रिया में है- गतिशील गतिमान
दीवारें लगभग निर्वसन है
उन पर कपड़ॊं की तरह नहीं चढ़ा है पलस्तर
कच्चा - सा है फर्श
लगता है जमीन अभी पक रही है
इधर - उधर लिपटे नहीं हैं बिजली के तार
टेलीफोन - टीवी की केबिल भी कहीं नहीं दीखती।
अभी बस अभी पड़ने वाली है छत
जैसे अभी बस अभी होने वाला है कोई चमत्कार
जैसे अभी बस अभी
यहाँ उग आएगी कोई गृहस्थी
अपनी संपूर्ण सीमाओं और विस्तार के साथ
जिसमें साफ सुनाई देगी आलू छीलने की आवाज
बच्चॊं की हँसी और बड़ों की एक खामोश सिसकी भी।

अभी तो सबकुछ बन रहा है
शुरू कर कर दिए हैं मकड़ियों ने बुनने जाल
और घूम रही है एक मरगिल्ली छिपकली भी
धीरे - धीरे यहाँ आमद होगी चूहों की
बिन बुलाए आयेंगी चीटियाँ
और एक दिन जमकर दावत उड़ायेंगे तिलचट्टे।

आश्चर्य है जब तक आउँगा यहाँ
अपने दल बल छल प्रपंच के साथ
तब तक कितने - कितने बाशिन्दों का
घर बन चुका होगा यह बनता हुआ मकान।
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