Friday, December 2, 2011

औरत होने के मायने, उसके दुःख-दर्द, संघर्ष और प्रेम की उदात्तता की दास्तान

                                     
                 - महेश चंद्र पुनेठा
  
‘धनुष पर चिड़िया‘ चंद्रकांत देवताले की स्त्रीविषयक कविताओं का संग्रह है जिसका चयन व संपादन युवा कवि व आलोचक शिरीष कुमार मौर्य द्वारा किया गया है। भले ही सभी कविताएं स्त्री प्रश्नों को नहीं उठाती हैं फिर भी प्रत्येक में स्त्री उपस्थित है-कहीं माँ के रूप में तो कहीं पत्नी ,कहीं प्रेमिका ,कहीं बेटी ,कहीं बचपन की साथिन और कहीं श्रमसंलग्न स्त्री के रूप में। इन कविताओं को पढ़ते हुए कवि की स्त्री के प्रति सोच सामने आती है। साथ ही स्त्रियों की दुनिया जहाँ औरत होने के मायने , उसके दुःख-दर्द व संघर्ष और प्रेम की उदात्तता की दास्तान है। इस रूप में ये कविताएं कवि को पहचानने और उसकी नजर में औरत को जानने का एक अच्छा अवसर प्रदान करती हैं। इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता स्त्री के प्रति कवि के मन में निहित गहरे सम्मान की भावना है जिसे  प्रस्तुत संग्रह में संकलित एक कविता ‘स्त्री का साथ’ कविता की ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी तरह बता देती हैं-

सचमुच मैं भाग जाता चंद्रमा से, फूल से और कविता से
 नहीं सोचता कभी कोई भी बात जुल्म और
ज्यादती के बारे में
अगर नहीं होतीं प्रेम करने वाली औरतें इस
पृथ्वी पर
स्त्री के साथ और उसके भीतर रहकर ही
मैंने अपने को पहचाना है

ऐसी पंक्तियाँ केवल वही कवि लिख सकता है जो सच्चे अर्थों में स्त्री का सम्मान करता हो , उसको स्वतंत्रता और समानता देता हो तथा मानवीय गरिमा प्रदान करता हो। जो उसे निखालिस देह या मन के रूप में नहीं बल्कि देह और मन दोनों के संयोग में देखता हो। कवि तभी तो इतने विश्वास के साथ कहता है- मुझे औरत की अंगुलियों के बारे में पता है

                       ये अंगुलियाँ समुद्र की लहरों से निकलकर
                       आती हैं
                       और एक थके-मांदे पस्त आदमी को
                       हरे-भरे-गाते दरख्त में बदल देती है

कवि की नजर में , औरत ‘जब अपनी चमकती आँखों के साथ होती है तब सारी बेजान चीजें मानुषी स्पर्श की आत्मीयता में ’ थर्राने लगती हैं। वह ‘ एक पत्थर चेहरे को पारदर्शी और शिशुवत बना देती है’ । इसलिए तो कवि पूछता है उससे- तुम इतना जीवन-रस कहाँ से ले आती हो/अंगुलियों की पोर से टपकता हुआ/तुम्हारे जाने पर क्या रहेगा यहाँ। औरत जीवन-रस का स्रोत है। उसके भीतर ‘ निष्कपट पानी का संगीत है जिस पर किसी भी चाकू की कोई खरोंच नहीं है’। उसके सापेक्ष पुरुष का चेहरा खुरदुरा और बेस्वाद है। स्त्री के सामने पुरुष जुगनू के समान है। ‘औरत आग पर सिर्फ रोटियाँ ही नहीं सेंकती है /खुद आग की हिरनी तरह चैकड़ी भी भरती है।’ औरत पुरुष की उदासी ,निराशा ,कुंठा ,अवसाद ,मायूसी को हर कर उसे मृत्यु से लड़ने की सामथ्र्य देती है। उसे ‘कत्लेआम’ के दौर में ‘भेड़िया फजीहत’ से बचा लेती है।उसमें औरतपन और बुद्धिमत्ता के साथ-साथ आदमीपन भी होता है। औरत ‘धँसकती हुई रातों और तड़कते हुए दिनों मे’ हमेशा पुरुष के साथ रहती है ,उसका हौंसला बनकर और उसकी आजादी व मूर्खताओं को बर्दाश्त करती है। हो सकता है ये शब्द किसी स्त्री के प्रेम में पड़कर कहे गए हों पर ये भावावेश का प्रतिफल या वायवीय नहीं हैं। इनमें बहुत कुछ सारतत्व है। एक माँ के रूप में तो औरत का कोई सानी नहीं । माँ औरत के उदात्त रूप की पराकाष्ठा है। तभी तो माँ पर बहुत सारी कविताएं लिखने के बाद भी कवि कहता है ‘ माँ पर नहीं लिख सकता कविता’ । धरती,चंद्रमा,आकाश,समुद्र और सूरज पर कविता लिखी जा सकती है पर माँ पर लिखना कठिन है अर्थात माँ इन सबसे बड़ी है क्योंकि - माँ ने हर चीज के छिलके उतारे मेरे लिए/देह ,आत्मा आग और पानी तक के छिलके उतारे/ और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया। भले ही कवि ‘ प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता ’ कहते हुए पिता के प्रेम को कहीं से कम नहीं मानता पर माँ ही है जो अपनी संतान की भूख और प्यास को रत्ती-रत्ती पहचानती है- ‘ जिसका दूध /दूब पर दौड़ते हुए बच्चों में /खरगोश की तरह कुलाँचें भरता है।’ औरत के इस महारूप को समझने के लिए कवि यदि यह कहता है कि ....सिर्फ एक औरत को समझने के लिए /हजार साल की जिंदगी चाहिए मुझको’ तो यह अतिशयोक्ति नहीं है। यहाँ औरत को देवी बनाकर उसका गुणगान या महिमामंडन नहीं किया गया है बल्कि मानवी के रूप में उसको देखा गया है ,यह बहुत अच्छी बात है। 

इसे कवि चंद्रकांत देवताले की स्त्री के प्रति श्रद्धा ,सम्मान व प्रेम ही कहा जाएगा कि समुद्र से आकाश के बीच हवा-पानी की तरह फैले स्त्री जीवन की धूप ,छाया और सपनों को वे इतनी गहराई और व्यापकता से स्वर दे पाए हैं। उसके जीवन को समग्रता से व्यक्त करने के उद्देश्य से ही उन्होंने ’ समुद्र’,‘आकाश’,’धूप’,’छाया’,‘हवा’,‘आग’,‘चिड़िया’,‘पेड़’तथा ’पानी‘ जैसे शब्दों का बार-बार प्रयोग किया है। इन शब्दों का स्त्री से गहरा संबंध है। समुद्र और आकाश तो लगभग हर तीसरी कविता में आ जाते हैं। यह अनायास नहीं हो सकता है। कवि देवताले इस बात को जानते हैं कि यही वे शब्द हैं जो स्त्री के पूरे व्यक्तित्व को अच्छी तरह व्यक्त कर सकते हैं। ये शब्द इन कविताओं में ऐसी छटा बिखेरते हैं कि बहुत कुछ अनकहे ही मुखर हो उठता है। एक छोटी कविता देखिए-

तुम्हारे एक स्तन से आकाश
दूसरे से समुद्र
आँखों से रोशनी 
तुम्हारी वेणी से बहता
बसंत का प्रपात
जीवन तुम्हारी धड़कनों से
मैं जुगनू
चमकता
तुम्हारी
अँधेरी
नाभि के पास।

इन कविताओं में पाठक स्त्री के रूप, रस ,गंध ,स्वाद और स्पर्श को अपने भीतर शाकाहारी रूप में महसूस कर सकता है। कवि का कहना बिल्कुल सही है कि - सब कुछ संभव यदि हासिल कर लें हम महारत देह से बाहर निकलने की। वास्तव में स्त्री को उसके संपूर्ण रूप में देखना है तो उसे केवल देह के रूप में देखने से बाहर निकलना होगा। फिर हमें निर्वसनता में भी अश्लीलता नजर नहीं आएगी।

प्रस्तुत संग्रह की कविताओं में प्रेम की गहरी अनुभूति के दर्शन होते हैं जिसमें अशोक वाजपेयी की  कविताओं की तरह की माँसलता या ऐंद्रिकता  नहीं है । एक आध्यात्मिक किस्म का प्रेम है जो वासना से कोसों दूर है। अशरीरी । प्रेम की गझिनता-प्रवणता-सांद्रता इनमें मौजूद है।प्रेम चिपचिपा सा नहीं टपकता-सा है। कुछ पंक्तियाँ उदाहरणस्वरूप देखी जा सकती हैं  -

और तुम मुझे कहीं भी अकेला नहीं जीने देतीं
जितनी दूर जाता हूँ उतनी ही नजदीक होती हो
तुम
मुझे कहीं भी
अकेलेपन में
मरने तक नहीं देतीं!
......थकी हुई और पस्त चीजों के बीच
पानी की आवाज जिस विकलता के साथ
जीवन की याद दिलाती है
तुम इसी आवाज और इसी याद की तरह
मुझे उत्तेजित कर देती हो।
......तुम जानती हो तुमसे बोलना
और सुनना
तुम्हारे मुँह से निकलते दिपदिपाते जुगनुओं को
मुझे अच्छा लगता है। 
......तुम पतझर के उस पेड़ की तरह सुंदर हो
जो बिना किसी पछतावे के पत्तियों को विदा कर चुका
.......तुम सूखे पेड़ की तरह सुन्दर  

कैसा अद्भुत प्रेम है। एक प्रेमी कवि ही सूखे पेड़ में भी सुंदरता देख सकता है। इस तरह चंद्रकांत देवताले की कविताएं सौंदर्यबोध की परंपरागत दृष्टि पर भी चोट करती है इसलिए तो वे एक ‘ काली लड़की ’ को अपनी कविता का विषय बना पाते हैं। उसके सौंदर्य को देख इस तरह अभिभूत होते हैं-

वह शीशम के सबसे सुन्दर फूल की तरह
मेरी आँखों के भीतर खुप रही थी
अपने बालों में पीले फूलों को खोंसकर
वह शब्दों के लिए गैरहाजिर
पर आँखों के लिए मौजूद थी। 

जो कवि स्त्री से सच्चे अर्थों में प्रेम करता है वह उसके दुःख को भी उसी गहराई से अनुभूत कर सकता है जिस गहराई से उसके प्रेम को। उसी को स्त्री जीवन का अँधेरा दिखाई देता है। वही उसके साथ होने वाले अन्याय-अत्याचार-शोषण को देख चुप नहीं रह सकता है और पूरे विश्वास से कह सकता है -

आकाश-पाताल में भी अट नहीं सकता इतना है
औरतजात का दुःख
धरती का सारा पानी भी धो नहीं सकता
इतने हैं उसके आँसुओं के सूखे धब्बे।
......कोई लय नहीं थिरकती उनके होठों पर
नहीं चमकती आँखों में
जरा-सी भी कोई चीज .......वह औरत
आकाश और धूप और हवा से वंचित घुप्प गुफा में
कितना आटा गूँध रही है?
........एक औरत अँधेरे में खर्राटे भरते हुए आदमी के पास
निर्वसन जागती शताब्दियों से सोई है।

इन पंक्तियों में कवि औरत के दुःख-दर्द-यातना की निरंतरता को बता रहा है जो  एक-दो दिन ,महिनों या सालो से नहीं बल्कि शताब्दियों से उसके साथ है। उसे कभी सुख नहीं मिला। हँसी-खुशी के एक टुकड़े से भी महरूम रही है वह- मिलता जो सुख वह जागती अभी तक भी/ महकती अँधेरे में भी फूल की तरह/या सोती भी होती तो होंठों पर या भौहों में /तैरता-अटका होता/हँसी-खुशी का एक टुकड़ा बचा-खुचा कोई। कैसी विडंबना है कि उसकी-माथे की सिलवटें तक नहीं मिटा पाती/सोकर भी। कवि का सपना है उसको हँसते देखना। इन कविताओं में स्त्री का शताब्दियों का अतीत और उतनी ही स्मृतियाँ अथाह कुँए में  गिरी पीतल की दमदार बाल्टी की तरह दबी हैं। कवि उन्हें ढूँढता रहता है और हमेशा स्त्री के पक्ष में खड़ा होता है ।

कवि देवताले अपनी कविताओं में कुछ छुपाते नहीं हैं जो कुछ भी भीतर है उसे खोलकर बाहर रख देते हैं । छद्म प्रगतिशीलता नहीं ओढ़ते । ‘ दो लड़कियों का पिता होने से’ कविता में इसे साफ-साफ देखा जा सकता है-

सिर्फ बेटियों का पिता होने भर से ही
कितनी हया भर जाती है
शब्दों में......
बेटियों को गुड़ियों की तरह गोद में खिलाते हैं हाथ
बेटियों का भविष्य सोच बादलों से भर जाता है
कवि का हृदय
एक सुबह पहाड़-सी दिखती हैं बेटियाँ
कलेजा कवि का चट्टान-सा होकर भी थर्राता है
पत्तियों की तरह।

कवि का यहाँ अपने-आप को खोलना भी बहुत कुछ कह जाता है कैसी विडंबना है कि एक पढ़ा-लिखा-समझदार  व्यक्ति जो पूरी तरह से स्त्री के पक्ष में भी है और उसका पूरा सम्मान भी करता है। बेटियों को चाहता भी है और उन्हें बेहद प्यार भी करता है फिर भी उनको बढ़ते हुए देखकर डर जाता है जबकि खुश होना चाहिए था। बस यही वह बिंदु है जहाँ यह कविता हमें उस ओर सोचने के लिए प्रेरित करती है कि औरत के साथ होने वाले भेदभाव के लिए कोई व्यक्ति विशेष जिम्मेदार नहीं है बल्कि वह सामाजिक-आर्थिक  व्यवस्था जिम्मेदार है जिसने औरत को पुरुष से कमतर और उस पर आश्रित बनाया। फलस्वरूप इसका समाधान कुछ व्यक्तियों की मानसिकता में परिवर्तन आ जाने मात्र से नहीं होगा। समाज में आमूलचूल बदलाव ही औरत की हालात को बदल पाएंगे। एक बड़ी कविता यही काम करती है बिन कहे भी बहुत कुछ कह जाती है।

कवि पूरी ईमानदारी और बिना लाग-लपेट के साथ अपने-आप को व्यक्त करता है-

मुझे माफ करना मैं अपनी मूर्खता और प्रेम में समझा था
मेरी छाया के तले ही सुरक्षित रंग-बिरंगी दुनिया होगी
तुम्हारी
अब जब तुम सचमुच की दुनिया में निकल गई हो
मैं खुश हूँ सोचकर
कि मेरी भाषा के अहाते से परे है तुम्हारी परछाई ।

यह वही पुरुष कह सकता है जिसने अपने पुरुष होने के अहंकार को तिरोहित कर दिया हो। अन्यथा पुरुष तो हमेशा से यही मानते आए हैं कि वे ही औरत के भाग्य विधाता हैं उनके बिना औरत का क्या अस्तित्व है। देवताले ऐसा नहीं मानते । वे तो अपने अपराध को भी स्वीकार करते हैं जैसा कि इस कविता में -

वह सताई गई औरत मुझे देखती है
अपने हमदर्द और मददगार की तरह
पर मैं गड़ जाता हूँ शर्म से
क्योंकि उस दोपहर मैं साबित हुआ एक घटिया आदमी
मुझे चीखना था और तमाशा खड़ा करके
सिद्ध कर देनी थी एक मेहनतकश औरत की
आकाश छूती हैसियत
और उसके सामने एक नींबू और उस बाई साब की
बित्ता भर औकात!

यहाँ कविता में कवि ने वह कर दिखाया है जो वह यथार्थ में नहीं कर पाया और करना चाहता था अर्थात पाठक को मेहनतकश औरत के पक्ष में खड़ा कर देता है। एक अच्छी कविता का यह भी काम है।       

इन कविताओं में औरत का दुःख-दर्द धुँधला नहीं पड़ता है। जीवन में पछाड़ खाती औरत का दुःख-दर्द और उसके साथ होने वाला अमानवीय व्यवहार पूरी सांद्रता के साथ व्यक्त होता है। ये कविताएं औरत के भुरभुरे दर्द को सुनाती नहीं , दिखाती हैं जिसमें धर्म-परम्परा-सत्ता के मद की नींद में विछा हुआ पुरुष प्रधान समाज जाग जाता है। संग्रह में ऐसी कविताएं भी हैं जिनमें श्रमसंलग्न स्त्रियों और गृहस्थी संभालती पत्नियों के जीवन का कठोर यथार्थ और संघर्ष पूरी जीवंतता के साथ व्यक्त हुआ है। उनका दैनिक जीवन पूरी क्रियाओं तथा बारीक ब्यौरों के साथ चित्रित हुआ है। यहाँ उनका खान-पान ,रहन-सहन , वेश-भूषा,घर-परिवार सभी कुछ है-उनका खटना-पिटना-रौंदा जाना-रोना-सुबकना-कोसना-असहायपन-आजादी का खोखलापन। साथ ही पुरुषप्रधान समाज  की क्रूरता ,धूर्तता और संवेदनहीनता भी । इस दृष्टि से ‘बालम ककड़ी बेचने वाली लड़कियाँ’,‘शाम को लगभग पाँच बजे’,‘वह आजाद थी सुबकने के लिए’ ,‘नहाते हुए रोती औरत’ ‘उस औरत का दुःख ’ , ‘देवी-वध’ ‘ ‘इस मामले में भी यही बताया गया ’ ‘बाई!दरद ले’ ‘औरत का हँसना’ ,‘ एक नींबू के पीछे’,‘कोई नहीं उसके साथ’  आदि कविताएं उल्लेखनीय हैं। ये कविताएं अपने कहन और कथ्य  से कविता में आए  स्त्री पात्रों से पाठक की तादात्म्यता स्थापित कर देती हैं। वे पाठक के सामने उपस्थित हो संवाद-सा करने लगती हैं। पाठक उनके साथ चलने लगता है। इनके बहाने कवि अमानवीय होते समय और समाज को रेखांकित करता है। अपनी नाटकीयता से ये कविताएं पाठक को बाँधती हैं और उन्हें पछाड़ खाती औरतों की स्थिति पर सोचने को विवश कर देती हैं। उनकी जीवन की दयनीय एवं संघर्षपूर्ण परिस्थितियाँ काँटों की तरह चुभने लगती हैं। भयभीत चिड़ियों-सी ये स्त्री पात्र बार-बार याद आने लगती हैं। उनके नन्हें पक्षियों की तरह भयभीत शब्द जेहन में फड़फड़ाते रहते हैं। हम अपने आसपास मौजूद उस तरह के पात्रों के प्रति अधिक संवेदनशील हो उठते हैं। पत्थर के आदमी नहीं रह जाते। उन्हें देखने का हमारा नजरिया बदल जाता है। भले ही कवि सोच नहीं पाया हो औरतों की इस अमानवीय और क्र्रूर दुनिया और दृश्यों के बाद कि उसे क्या करना चाहिए पर पाठक कविता को पढ़कर अपना पक्ष जरूर तय कर लेता है। और यहीं पर  कविता सफल हो जाती है। ‘वह आजाद थी सुबकने के लिए’ कविता स्त्री की आजादी और छद्म प्रगतिशील पुरुषों पर जबरदस्त व्यंग्य है। खुलकर वह रो भी नहीं सकती । रोने के लिए भी उसे वक्त का चयन करना पड़ता है ,‘ नहाते हुए रोती औरत’ इस बात का प्रमाण है। कितनी मार्मिक पंक्तियाँ हैं ये- दुख हथेली पर रखकर दिखाने वाली नहीं है यह औरत/रो रही है बेआवाज पत्थर और पत्तियों की तरह/वह जानती है पानी बहा ले जाएगा आँसुओं और/सिसकियों को चुपचाप/शिनाख्त नहीं कर पाएगा कोई भी। कवि जानता है -मामूली वजहों से अकेले में/कभी नहीं रोती कोई औरत ! फिर भी कवि के लिए उसके रहस्य को पूरी-पूरी तरह बता पाना संभव नहीं है।  इस सब के बावजूद एक बात जरूर कहनी पड़ेगी कि रोती-सुबकती ,खटती-पिटती जिंदगी जीने और दुख बरदाश्त करने के रास्ते खोज लेती स्त्रियाँ  तो इन कविताओं में खूब आती हैं पर लड़ती हुई स्त्रियाँ नहीं दिखाई देती है।

भले प्रस्तुत संग्रह में प्रकृति पर कोई कविता न हो पर अनेक बिंब ऐसे हैं जिनमें प्रकृति के विविध रूप-रंग-गंध-दृश्य मौजूद हैं जो प्रकृति से कवि की निकटता को बताते हैं.   साथ ही कविताओं में नई सरसता का संचार कर देते हैं। कुछ पंक्तियों को यहाँ उद्धरित करने का लोभ में संवरित नहीं कर पा रहा हूँ-

सूरज की तेज धूप पत्थरों को
कुरेद रही है
समुद्र का पानी पत्थरों को
थरथरा रहा है.......
धूप में खिल गई है तुम्हारी हँसी......
मेरे होठों पर समुद्र का खारा स्वाद
मेरी त्वचा पर धूप का गुनगुना हाथ
और मेरी जेब में कुछ पत्थर हैं जो समुद्र ने दिए मुझे
तुम्हारे लिए!
.......रंगीन फुहारों में नहाती तुम्हारी हँसी की हंसध्वनि
चटकने लगती टहनियाँ चुप्पी की.....
जो जल में डूबे पत्थरों पर लिपटी काई की तरह
दिखाई तो देते
पर हाथ नहीं आते
.....और तुम बादल-काट बिखरी तेज धूप-सी हँसने लगती हो
......तुम बसंत के आकाश की टहनियों को
पकड़कर खड़ी थी
और यह दृश्य मेरे लिए
एक तट छोड़ता जहाज था ......
तुम्हारी निश्चल आँखें
तारों-सी चमकती हैं मेरे अकेलेपन की रात के आकाश में
.....नदी में डबडब आँखों-से कमल के फूल
या बरसात में फूटती चिंगारियों-सी नहाती हुई रोती औरत
.......दूर आम के झुरमुट में एक कोयल कूकती जा रही है
लगातार .....
देखो
परिंदों की चहचहाहट से घिरा
चल रहा है स्मृतियों का काफिला
......पतझर के नीले पड़ते उजाले मे
तुम परछाई हो वसंत की
......तुम शरीर नहीं
एक विराट छत्ता हो शहद का
.....ज्वार से लबालब समुद्र जैसी तुम्हारी आँखें
मुझे देख रही हैं
और जैसे झील में टपकती हैं ओस की बूँदें ।

प्रकृति से जुड़े इन शब्दों को थोड़ी देर के लिए कविता से निकाल दिया जाय तो समझा जा सकता है कि कविताएं कितनी शुष्क और ठस हो जाएंगी ।

प्रकृति से लिए गए इन बिंबों के चलते अधिकांश कविताओं की भाषा सरस  और प्रभावशाली हो गई है। बावजूद इसके संग्रह की अनेक कविताओं में हमें भाषा का चमत्कार दिखाई देता है जो कौतुक पैदा करता है। कहीं-कहीं इसके चलते उनकी कविता दुरुह भी हो जाती है। सहजता से अर्थ की खिड़की नहीं खुलती । फिर भी उससे जूझने में आनंद आता है क्योंकि भाषा की गाँठ खुलने के बाद उसके भीतर बहुत कुछ ऐसा मिलता है जो झनझनाता भी है और गुदगुदाता भी।  चंद्रकांत देवताले का भाषा को बरतने का तरीका ही अलग है। उनके यहाँ ’रोशनी में स्वाद‘ तो हँसी में रंग फूट पड़ता है। उनकी कविता का अपना एक अलग मुहावरा है । पुटपुटाते हुए रोना , खदखद हँसना जैसे क्रिया विशेषण उनकी कविता में विशेषरूप से ध्यान खींचते हैं। यहाँ क्रिया एक बिंब में बदल जाती है। मतकमाऊ, थिगा ,गावदी  जैसे शब्द पहली बार पढ़ने को मिलते हैं। इनकी कविताओं का कोई एक शिल्प नहीं है अपने शिल्प को हर दूसरी कविता में तोड़ डालते हैं। शिल्प की विविधता है। कही एक दृश्य खड़ा करते हैं तो कहीं प्रतीकों में अपनी बात कह जाते हैं। एक समर्थ कवि ही ऐसा कर सकता है।

कुल मिलाकर इस संग्रह में कविताओं का चयन बहुत सूझ-बूझ के साथ किया गया है कविताओं में कथ्य और शिल्प दोनों स्तरों पर विविधता है। संग्रह को पढ़ते हुए एकरसता और ऊब नहीं होती है। कविताओं को बार-बार पढ़ने का मन करता है। हमारे समय के महत्वपूर्ण वरिष्ठ कवि चंद्रकांत देवताले की स्त्री विषयक कविताओं को एक साथ संकलित करके शिरीष कुमार मौर्य ने प्रंशसनीय कार्य किया है ।

***
महेशचंद्र पुनेठा युवा कविता का बहुत जाना-पहचाना नाम हैं. इधर उन्होंने कविता पर आलोचनात्मक लेखन भी आरम्भ किया है. यह समीक्षा इसी क्रम में लिखा गया उनका एक और महत्वपूर्ण  लेख है. अनुनाद इसके लिए उन्हें धन्यवाद देता है.  

18 comments:

  1. सचमुच मैं भाग जाता चंद्रमा फूल और कविता से ....नही सोचता कभी कोई बात ज़ुल्म और ज्यादती के बारे में ....अगर नही होती प्रेम करने वाली औरतें इस धरती पर... कवि की गहरी सोच, संवेदना और स्त्रियों के प्रति सम्मान की भावना को नमन.. चंद्रकांत देवताले जी की कवितायेँ अद्भुत रूप से मन में अध्यात्म को जन्म देती हैं.. सुबह सुबह पढ़ी थी .. उस समय जल्दी में थी.. आभार एक सुन्दर लेख को शेयर करने के लिए..

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  2. देवताले जी की कविताओ में एक खास तरह की आग होती है.....हम अरसे से उन्हें इस आग के लिए ही पढ़ते भी आये है....मसलन इस सदी की शुरुआत पर उन्होंने जो कविता लिखी थी , वह मेरी सबसे प्रिय कविताओ में से एक है..."एक दिन न्याय माँगने वाले / खोजते हुए ईंधन / और पा जायेंगे डाईनामाईट / उसी दिन तय होगा / यह किसकी नयी सदी है / और कैसी नयी सदी / " ..देवताले जी के पास ऐसी कविताओ की एक लम्बी श्रंखला है....लेकिन इस संग्रह में हम उनका दूसरा रूप भी देख पाते है ....प्रेम का वह उद्दात रूप , जिसे प्रेम के घोषित कवि भी छू नहीं पाते......"माँ" पर तो उन्होंने विलक्षण कविता लिखी है ...यह स्वागत योग्य है कि शिरीष जी ने देवताले जी के दूसरे कविरूप को हम सबके सामने एक साथ प्रस्तुत किया है....हां.... महेश जी को उत्कृष्ट प्रस्तुति के लिए बधाई...

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  3. स्त्रियों के सन्दर्भ में ऐसे शब्दों,शिल्प,भावो और गहरे तक छूने वाली अभिव्यक्ति तक पहुचने वाली दृष्टि और अंतर्मन से मिल कर सदैव ही तसल्ली मिलती है और उम्मीद बंधती है कि ऐसी व्यापक सोच और संवेदनाएं अगर ऐसे ही जन्मती रहेंगी तो स्त्रियों की उपेक्षित दुनियाँ और बाकी की आधी दुनियाँ के मध्य खड़ा अस्तित्व का युद्ध मिट सकता है वो भी सच में मुस्कुरा सकेंगी अपने पूरे विस्तार में ....
    आलेख देवताले जी की स्त्री विषयक कविताओ की बहुत सटीक पड़ताल करता है. उन्हें उनके पूरे सौंदर्य के साथ पढ़ने वाले के लिए खोलता है. इन सारी कविताओ के संसार में जाने और इन्हें इनकी समग्रता में गहराई से पढ़ने की तीव्र उत्सुकता जगाता है ... पुनेठा जी का बहुत-बहुत आभार ..

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  4. बहुत अच्छा लगा ..............

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  5. जिस तरह आपने समीक्षा की है उससे उनकी किताब पढने की इच्छा जागृत हो गयी है……………सच गज़ब का लेखन है औरत को जैसे खुद जीया है शायद तब ही इतना लिख पाये हैं…………यूँ तो औरत होना आसान नही मगर उसके होने से भी ज्यादा उसमे उतरना आसान नही……………

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  6. आपके ब्लोग को कैसे फ़ोलो किया जाये?

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  7. संपादक और समीक्षक दोनों को बधाई।

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  8. bahut खूब..बधाई..हम तक लाने के लिए..

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  9. बदिया...हम तक लाने का..

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  10. उम्दा , आलीख . यह किताब मैं पढ़ूँगा . अभी परसो ही देवताले जी का फोन आया..... . वे स्वस्थ रहें , और खूब लिखें . आमीन !

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  11. देवताले जी की कवितायेँ पढ़कर मैं स्तब्ध रह गयी....औरत के अंतर्मन से उभरे दर्द को बखूबी शब्द रूप दिए हैं उन्होने, स्त्री-मन और संबंधों से जुड़े हर पहलु को उभारा है उन्होंने अपनी कविताओं में, उस पर सोने पर सुहागा महेश जी की विवेचनात्मक समीक्षा ने कविता का एक नयी रौशनी में सामने रखा है ....दोनों को ही मेरी ओर से बधाई.......

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  12. देवताले जी की कवितायेँ पढ़कर मैं स्तब्ध रह गयी....औरत के अंतर्मन से उभरे दर्द को बखूबी शब्द रूप दिए हैं उन्होने, स्त्री-मन और संबंधों से जुड़े हर पहलु को उभारा है उन्होंने अपनी कविताओं में, उस पर सोने पर सुहागा महेश जी की विवेचनात्मक समीक्षा ने कविता का एक नयी रौशनी में सामने रखा है ....दोनों को ही मेरी ओर से बधाई.......

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  13. रंजीत ठाकुरDecember 6, 2011 at 6:49 PM

    मुझे पुनेठा जी को पढ़ के गर्व होता है की आज भी नागार्जुन की विरासत के कवी है !!!

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  14. चंद्रकांत देवताले की कविताओं में स्त्री अपनी सम्पूर्ण अस्मिता के साथ अभिव्यक्त हुई है. उन की कविताओं पर महेश पुनेठा जी की यह समीक्षा विशेष ध्यान खींचती है. एक बेहतरीन कवि होने के साथ- साथ वे एक अच्छे आलोचक भी है.

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  15. महेश जी, लेख पूरा पढ़ लिया. बहुत अच्छी समीक्षा है. अभी केवल बधाई, लेख पर और आपके लेखन पर जल्दी ही कुछ लिखूँगा.

    आपका,
    सईद अय्यूब

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  16. बहुत तबीयत से लिखा है, महेश. वह दिन दूर नहीं, जब तुम समीक्षा के क्षेत्र में ऐसा मुक़ाम बना लोगे जहां से तुम्हें कोई हिला नहीं पाएगा. देवताले जी की कविता को तुमने एक कवि और समीक्षक दोनों ही की दृष्टि से देखा है,इसलिए तुम उनकी कविताओं की असल ताक़त को रेखांकित कर पाए हो. बधाई और शुभकामनाएं.

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