Thursday, October 27, 2011

प्रो. रामदयाल मुंडा की स्‍मृति और रीता जो की कविता - यादवेन्‍द्र

प्रो रामदयाल मुंडा
पिछले दिनों देश की आदिवासी संस्कृति के बड़े विद्वान और पैरोकार 72 वर्षीय प्रो. रामदयाल मुंडा का निधन हो गया पर बड़े समाचार माध्यमों में इस घटना की कहीं कोई गूंज नहीं सुनाई दी.झारखण्ड प्रदेश की परिकल्पना को व्यवहारिक रूप देने वाले विचारकों में प्रो.मुंडा अग्रणी थे, रांची विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर भी रहे. कहा जाता है कि प्रो. मुंडा का कमरा झारखण्ड के युवा नेतृत्व का उदगम और प्रशिक्षण स्थल रहा.आदिवासी समाज,संस्कृति और भाषाओं पर उनका काम देश में काम और विदेशों में ज्यादा समादृत था इसी लिए अमेरिका सहित अनेक देशों में वे अध्यापन कार्य करते रहे. वे एक स्वतः स्फूर्त गायक के रूप में भी जाने जाते थे.उनकी इन्ही विशेषज्ञताओं की बदौलत उन्हें पद्मश्री और संगीत नाटक अकादमी की सस्यता से सम्मानित किया गया.कुछ समय पहले उन्हें राज्य सभा के सदस्य के रूप में नामित किया गया था.अपने विचारों के प्रचार प्रसार के लिए पहले उन्होंने खुद अपना एक दल बनाया पर संगठन का अनुभव न होने के कारण उसको उन्हें शिबू सोरेन के दल झारखण्ड मुक्ति मोर्चा में शामिल करना पड़ा.वहाँ भी उनको जब कोई सार्थक काम होता हुआ नहीं दिखा तो कांग्रेस में शामिल हो गए.

उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि आदिवासी समाज के दस करोड़ सदस्यों को जबरन हिन्दू या ईसाई समुदाय के अंदर समाहित करने की साजिश आजादी के बाद से की जाती रही है.उनकी आराधना पद्धति प्रकृति पूजा की है और उन्हें देश के छह धार्मिक समुदायों से अलग मान्यता मिलनी चाहिए...उनकी धार्मिक मान्यता को नयी पहचान प्रदान करने के लिए उन्होंने आदि धर्म का आन्दोलन शुरू किया था...इसी नाम से उन्होंने आदिवासियों की प्रचलित आराधना पद्धतियों को संकलित करते हुए एक किताब भी लिखी थी. यहाँ प्रो. राम दयाल मुंडा को स्मरण करते हुए मुझे कनाडा के आदिवासी समुदाय की प्रमुख कवियित्री रीता जो की एक प्रसिद्ध कविता याद आ रही है:



मुझे भूल गया बोलना बतियाना

रीता जो


मुझे भूल गया बोलना बतियाना
जब मैं छोटी बच्ची थी
और स्कूल में पढ़ती थी
तब तुम जाने कब इसको उठा ले गए थे.

तुम मेरे बोलने बतियाने को मुझसे छीन कर भाग गए थे
अब मैं तुम्हारी तरह बोलती हूँ
अब मैं तुम्हारी तरह सोचती हूँ
अब मैं तुम्हारी तरह कामधाम करती हूँ
अपनी दुनिया के बारे में ही नृत्य करते हुए
कई बार डांवाडोल और लड़खड़ा जाती हूँ.

अब मैं दो तरीकों से बतियाती हूँ
पर दोनों तरीकों में कहती एक ही बात हूँ
कि तुम्हारा ढब ढंग मुझसे कहीं ज्यादा बेहतर है.

अब मैं हौले से बढाती हूँ अपना हाथ
और कहती हूँ तुमसे
मुझे वापिस ढूंढ़ने दो अपना बोलना बतियाना
जिस से मैं समझा सकूँ
तुम्हें कि आखिर मैं हूँ कौन.


प्रस्तुति: यादवेन्द्र

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