Thursday, May 19, 2011

अमित श्रीवास्तव की कविता




आंख के बेहद ज़रूरी अन्दरूनी हिस्से मे
ये एक शहर है
जो कभी कभी एक दर्द भी है
रीढ़ का..
यहां
भयानक काले दिन के बाद
एक हिचकी के साथ खूब चमकीली
रात होती है

यहीं आंख के इसी कोने मे
गोल चारपाई के पैतानो पर
ठस्स दरवाज़ों और लचीली
दीवारों से बना एक मकान है
जो कभी कभी भाषा की एक मज़ार सा लगता है
यूं कि शब्द सोए पड़े हैं हर तरफ
सांस की संत्रास के

हाल फ़िलहाल
एक नुकीली चुप्पी
मुंड़ेर पर बैठा हूं मै
छत के किसी साभिप्राय कोने मे

आर पार का सारा संसार
गोल गोल घूमता
पोशम्पा भई पोशम्पा
घुस रहा है जेब मे मेरी

खूब फैली हथेलियों मे अजीब लिखावट
रेखाचित्रीय पहेलियों सा दर्ज होता जा रहा है
मेरा आखिरी ठहाका
मेरी पहली नौकरी के इग्यारह सौ पैंतीस रुपये
और अपनी साझी मजबूरी के मायने
यानी कि वो शब्द
और मै छला गया..
और मै छला गया..

रात के कई सूरजों से अलग
वो जो मेरे ठीक आगे
पेट और पीठ पर अनोखे वादे की मुहर
वक्त की नुमाइंदगी
के साथ उगा है
इसके उगने का जयघोष होता है
फिर एक इल्तिजा
और एक खतरनाक चुप का उत्सव

फिलहाल
मेरी चुप्पी का उत्सव
कमीज़ के कॉलरों पर बिछा है
कन्धे के सितारों पर

मुंड़ेर की नींव के कुछ पत्थर
आपसी वार्तालाप के बाद
एक खामोश समझौते मे ध्वस्त हैं
झींगुरों की अरदास से अंटे सटे

तीन चीटियां अपने खाने की खोज मे
रात की पाली मे काम मांगने आई हैं
दरअसल ये अस्मत की खोज है
जो इतनी महीन है कि
दिन के अंधेरे और रात के उजाले मे गड्मड है

इन सबके बीच ठीक नाभि के पास
बहुत गहरे चटख रंग वाले अनगिन
पाठों अन्तरपाठों की एक बहुत बड़ी एकीकृत किताब है
जो कि दरअसल असल मुद्दे की बात है

जहां मेरी नींद कभी छिपकर सोती है

जिसके हर पन्ने पर एक दावा लिखा है
और एक धोखे का अन्तर्पाठ है

उकड़ू मुकड़ू बैठे खेल रहे हैं
पाठ पाठान्तर
चाचा भतीजा
चाचा के अभी सगे भाई बन्द
नमक उड़
चिड़िया उड़
पानी उड़

ये लो जी चिड़िया उड़ चली
नमक उड़ चला
पानी उड़ चला
जादूगरों के देस
पकड़ो पकड़ो पकड़ो
मेरी मां को पकड़ो
बंद करो सब खेल तमाशे
बंद करो!
***
अमित की कविताएँ अनुनाद के पाठक पहले भी पढ़ चुके हैं। मेरा अनुरोध है कि इस कविता की एनाटामी पर गौर करें...जो आँख के भीतरी कोने से रीढ़ के दर्द से होती, कमीजों के कालरों और कंधे के सितारों से होती हुई, पोशम्पा के खेल में उलझती हुई कविता के एक अलग भूगोल में प्रवेश कर जाती है।



कवि के निजी परिचय में ये कि वो इक ऐसा पुलिस अधिकारी है जो फ़िलहाल भूमंडलीकरण और समकालीन हिंदी कविता पर उसके प्रभाव विषयक शोध में उलझा हुआ है।


***


चित्र - वाल स्ट्रीट जर्नल से साभार

1 comment:

  1. अमित की यह कविता बहुत धैर्य से पढ़े जाने की मांग करती है...बेहद कसी और सघन...एक वाक्य का मिस हो जाना भी कविता से दूर कर देगा. उन्हें बधाई और आपका आभार.

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