Tuesday, May 10, 2011

बाबू जी दुखी हैं कि मरने वाले पैसा लेते हैं - मनोज कुमार झा की कविता

पंडिज्जी ने कहा तो कहा मगर रहने दो इस खेत को
पूजापाठ की सूई निकाल नहीं पाती कलेजे का हर कांटा बाढ़ में बह तो गया मगर यहीं तो था जोड़ा मंदिर
किसी तरह बचा लो मेरे मां-बाप के प्रेम की आखिरी निशानी
जल रहे पुल का आखिरी पाया कहते रहे पिताजी मगर बिक ही गया वो भी आखिर और
मोटरसाइकिल दी गई जीजाजी को जो ठीक-ठाक ही चल रही है
कुछ ज़्यादा धुंआ फेंकती कभी-कभार

उस टुकड़े में हल्दी ही लगने दो हर साल
नहीं पाओगे हल्दी के पत्तों का ये हरापन किसी और खेत में
शीशम तो कोई पेड़ ही नहीं कि जब बढ़ जाए तो
बांहों में भरकर मापते हैं मोटाई कि कितने में बिकेंगे कटने पर बार-बार समझाते रहे मगर ब्लाक से लाकर रोप दी गई खूंटियां
फिर वे कभी नहीं गए उधर और हमने भी डाला डेरा शहर में
अब विचारते रहते हैं कि जब और बुढ़ा जायेंगे बाबूजी तो खींच लायेंगे यहीं

एक दिन हांफते आये दूर से ही पानी मांगते दो घूंट पानी पीते चार सांस बोलते जाते कि जब भी जाओ दिसावर
सत्तू ले जाओ गुड़ ले जाओ, न भी ले मगर ज़रूर लेके जाओ घर लौटने की हिम्मत
हालांकि घरमुंहा रास्ते भी रंग बदलते रहते हैं
सच कह रहे थे रहमानी मियां कि सामान कितने भी करने लगे हों जगर-मगर
आज़ादी दादी की नइहर से आई पितरिहा परात की तरह ख़ाली ढन-ढन बजती है
वो लड़का बड़ा अच्छा था बाप से भी बेहतर बजाता था बांसुरी
ताड़ के पत्तो से बनाता था कठपुतली और हर भोज में वही जमाता था दही
पर ये कुछ भी न था काम का उस कोने में जहां उसने गाड़ा खम्भा
एक त्यौहार वाले दिन तोड़ लिया धरती से नाता कमर में बम बांधकर
जब से सुनी यह ख़बर छाती में घूम रहा साइकिल का चक्का
धुकधुकी थमती ही नहीं चार पढ़ चुका हनुमान चालीसा
तब से सोच रहा यही लगातार कि जिन्होने छोड़े घर-दुआर
जिन पर टिकीं इतनी आंखें
उन्हों ने जब किया अपनी ही नाव में छेद तो किनारे बचा क्या, सिर्फ़ पैसा?
तो क्या यही मोल आदमी का कि ज़िन्दा रहे तो पैसा गिनते-भंजाते और मरे तो दो पैसा जोड़कर
***




(इधर मनोज ने अपनी कविताओं से लगातार सिद्ध किया है कि वे समकालीन युवा कविता की लीक से अलग अपनी राह बनायेंगे। बौद्धिकता का कोई अतिरिक्त आग्रह न रखते हुए भी एक अनूठा वैचारिक-सैद्धान्तिक बयान दे जायेंगे। उनकी लगभग हर कविता गांव-जवार, घर-दुआर से शुरू होती हुई अचानक बहुत चुपचाप वैश्विक आशयों में प्रविष्ट कर जाती है। यह मनोज की कला है। उनकी कविता में नागार्जुन-रेणु की धरती बोलती है, न सिर्फ़ बोलती है बल्कि घूमती है। खेत बिकने और ज़मीनी मोह के निजी शुरूआती ब्यौरों से आरम्भ होने वाली यह कविता रहमानी मियां से होते हुए कमर में बम बांध कर मर जाने वाले कमेरे लड़के तक जा पहुंचती है। हिंदी में कितना साहित्य मौजूद है जो उस लड़के की ऐसी शिनाख़्त कर पाता है ? आतंकवाद और पूंजी के अंतर्सम्बन्धों को कौन-सा कवि इस तरह गह सका है ? यह धरती से नाता टूटने और अपनी ही नाव में छेद कर कर लेने का कोई साधारण बयान नहीं, ज़िन्दगी भर जी सकने लायक पैसा गिनने-भंजाने और मरते वक़्त दो पैसा जोड़ जाने की असाधारण कथा है। यहां मुश्किल उस पैसे की है, जो पूंजी की गिरफ़्त में है। समझ पाएं तो पैसे से पूंजी की इस लड़ाई में हम अपने जीवन और उसकी वंचनाओं के कई छोर तलाश सकते हैं। इतना ही कहकर मैं अपने इस अत्यन्त प्रिय कविसाथी को सलाम पेश करते हुए उसकी इस कविता को अनुनाद के पाठकों के हवाले करता हूं।)

4 comments:

  1. पढ़े. आकर फिर पढ़ेंगे. शुक्रिया.

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  2. घर-दुआर से शुरू होकर मन में घर बनाती हुई कविता …बहुत बढ़िया

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  3. पूँजी और पैसे की लड़ाई .... बहुत खूब कहा शिरीष. कविता मे विचार आए तो बस ऐसे आए. कवि को बधाई !

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