Saturday, March 12, 2011

कासिम हद्दाद बहरीन के विद्रोही जनकवि - चयन, अनुवाद और प्रस्तुति: यादवेन्द्र

तैयार हो जाओ,जो सामने दिख रहा है वो इतिहास है
63 वर्षीय कासिम हद्दाद बहरीन के विद्रोही जनकवि माने जाते हैं.स्कूल की औपचारिक शिक्षा भी पूरी ना कर पाने वाले हद्दाद आधुनिक अरबी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर माने जाते हैं.युवावस्था में आर्थिक तंगहाली के कारण उन्होंने निर्माण मजदूर का काम भी किया और राजशाही के देश में रहते हुए विरोधी राजनैतिक धारा का वरण किया.इसके लिए उन्हें सालों जेल की हवा भी खानी पड़ी.उनकी दर्जन भर से ज्यादा कविता और समालोचना पुस्तकें प्रकाशित हैं.उन्होंने देश में पहली बार लेखक संगठन बनाया और बरसों इसकी साहित्यिक पत्रिका के प्रधान संपादक रहे.थिएटर,फोटोग्राफी और पेंटिंग जैसे काला माध्यमों के साथ मिल कर हद्दाद ने अनेक प्रयोग किये.अंग्रेजी में अरबी साहित्य को सर्वसुलभ करने के लिए उन्होंने कुछ मित्रों के साथ मिलकर कुछ साल पहले www.jehat.com नामक वैबसाइट बनाया।


अरब देशों में हो रही वर्तमान सुगबुगाहट पर हद्दाद ने खुल कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है.यहाँ प्रस्तुत है हद्दाद की कुछ बेहद छोटी कवितायेँ जिन में अ-प्रकट तौर पर मुक्ति की छटपटाहट देखी जा सकती है।


1
ऐ बादशाह
हम तुम्हारे रेवड़ झुण्ड हैं
दुनिया को जिन्हें दिखा दिखा कर
सीना चौड़ा करता रहता है तू...
पर अब हमें गंध मारने लगी है
यह शोहरत.

2
मैं आजाद नहीं हूँ कि जी सकूँ अपनी मर्ज़ी से
मेरी आज़ादी है तो सिर्फ बस
मुखालफत के लिए।


3
मैं देख रहा हूँ कि हवा यहाँ
दिल्लगी कर रही है इश्तहारों के साथ
पर लोग घुटे जा रहे हैं
साँसों के बगैर।


4
विचार विमर्श के नाम पर वे मिलते हैं
अपने विचारों का करते हैं आदान प्रदान
जैसे कि एक दूसरे से अदला बदली कर रहे हों
अपने अपने मुखौटे.

5
ख़ामोशी...चुप्पी...
बेवकूफियों को पनाह देने वाला
इत्र से गमकता हुआ दालान.

6
मुझमें दफन हैं कई राज
मैं अपनी कविताओं में उन्हें पिरोता हूँ
और जुबान की बयार में धीरे से उड़ा देता हूँ
उन पर से परत उतारने के लिए...
इस काम के लिए किसी को आना होगा आगे.

7
कहते हैं कि भविष्य
उल्टा होता है अतीत के....
पर हमारा तो वर्तमान ही है
कि नाम नहीं लेता अंत का.

8
क्या फर्क होता है
बिना आँख के अंधे और
सब कुछ घट रहे को भी
न देखने वाले इंसान के बीच?

9
मेरी जंजीरें लेती हैं करवटें
तोड़ती हैं खालीपन का सन्नाटा
इस तरह मैं
उद्घोष करता हूँ आजादी का.

10
ख्वाब असलियत से बहुत दूर ही सही
तो भी बेहतर है
कदम कदम पर पालथी मारे बैठे हुए छलावों से.

11
खिड़की पर पड़ा हुआ पर्दा
उस चपरासी की मानिंद है
जो बादशाह से ज्यादा ताकतवर है.

12
पूरी रात मिल भी जाए
तो नाकाफी है
मेरे स्वप्नों के सैलाब के लिए.

13
वो बिलकुल निज़ाम की तरह है
दिनभर करती रहती है चेहरे पर रंग रोगन
और बतियाती है इसकी बाबत आईने से...
सुनती नहीं खुशफहमी में
अवाम की आवाज.

14
नंग धडंग मैं खड़ा हूँ बर्फीले अंधड़ में
निपट अकेला
वर्णमाला के पहले अक्षर की तरह अडिग
पर मैं कभी सिर नहीं झुकाता...
तमाम बुतों के खिलाफ करता हूँ
खुल के बगावत
पर मैं कभी सिर नहीं झुकाता....
एकबार लपलपाते अंगारों से निकलता हूँ बाहर
और प्रवेश कर जाता हूँ दूसरी आग के अंदर
पर मैं कभी सिर नहीं झुकाता...
***

4 comments:

  1. इतनी शानदार कृतियों से
    साक्षात्कार करवाने के लिए
    आभार और अभिवादन स्वीकारें .

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  2. हम विचारों को को मुखौटों की तरह पहन लेते हैं....


    ये सच मुच कमाल की कविताएं हैं. आभार, यादवेन्द्र जी, शिरीष.

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  3. बहुत सशक्त और धारधार कविताएँ

    बधाई शिरीष भाई

    ReplyDelete
  4. प्रिय यादवेन्द्रा जी ,
    शिरीष जी ,
    नमस्कार !
    '' जनाब कासिम हद्दाद साब को पढवाने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया , छोटी छोटी कविता एक दुसरे पे बहुत भारी पद रही है , सारी मन को चुने वाली है . लावी का छोटा परिचय भी प्रदान कर आप रचनाकार और रचना को ảउ सुंदरता प्रदान करदेते है , बधाई !
    सादर !

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