Thursday, October 28, 2010

यहाँ एक शब्द है बेचैनी

मित्रो ये एक पुरानी कविता है...१९९८ की...जो मेरे दूसरे संग्रह "शब्दों के झुरमुट में" शामिल है।
यहाँ
हवा कुछ उड़ाने के लिए
बेचैन है
और पानी कुछ बहाने के लिए

यहाँ
पत्थर कुछ दबाने के लिए
बेचैन है
और मिटटी कुछ उगाने के लिए

यहाँ
पाँव कहीं जाने के लिए
बेचैन हैं
और स्मृतियाँ आने के लिए

यहाँ
चिड़िया दाने के लिए
बेचैन है
और वंचितों का मन
कुछ पाने के लिए

यहाँ
एक शब्द है बेचैनी
जो
सारे शब्दों पर भारी है

छुपा हुआ
शब्दों के झुरमुट में
एक और शब्द है यहाँ
कविता

जो पहले शब्द से बना है
और
उसका आभारी है।
***

15 comments:

  1. सुन्दर…बेहद ख़ूबसूरत कविता…

    (यह संकलन हमारे पास नहीं है…कैसे मिल सकता है?)

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  2. यहाँ
    एक शब्द है बेचैनी
    जो
    सारे शब्दों पर भारी है

    बढिया कविता .....

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  3. सही और सटीक ।

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  4. अशोक भाई किताब २००४ में छपी थी और २००६ में पहला संस्करण समाप्त होना बताया गया....फिर दूसरे की नौबत ही नहीं आई ... प्रकाशन ही बंद हो गया...कथ्यरूप से आई थी ये किताब...अनिल श्रीवास्तव जी ने बहुत स्नेह से छापी थी.

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  5. यानि कोई उम्मीद नहीं…:-(

    तो इसकी कवितायें पढ़वाते रहियेगा…यहां भी और अन्य जगहों पर भी

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  6. यहाँ
    एक शब्द है बेचैनी
    जो
    सारे शब्दों पर भारी है
    ..........
    सुंदर !!!!!!

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  7. कैलाश वानखेड़ेOctober 29, 2010 at 7:48 AM

    बहुत भारी है बैचेनी ,,बहुत भारी पड़ी ,,,बैचैन करती है

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  8. तो इसकी कवितायें पढ़वाते रहियेगा...

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  9. सन ९८ के शिरीष की कविता में व्यक्त सार्थक बेचैनी आज भी टटकी है. कविताई ये अंदाज बरकरार रहे तो क्या बात है. अच्छी कविता के लिए बधाई

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  10. yaha har koe bechin hai................sundar kavita

    shikha shukla
    http://baatbatasha.blogspot.com/

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  11. इस बेचैनी के मूल में कर्म का स्वप्न है, कुछ करने या रचने की तीव्र आकांक्षा है। दरअसल यह बेचैनी और कुछ नहीं चैन का स्वप्न है, एक ऐसा चैन जो कुछ करणीय को करने, रचनीय को रचने या प्राप्य को पाने से ही मिलता है। हर कवि को इस बेचैनी का आभारी होना चाहिए।
    सुंदर कविता के लिए बधाई।

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  12. यहाँ दो शब्द हैं-
    पहला शब्द है 'बेचैनी' और दूसरा , 'कविता'...... दूसरा शब्द पहले से बना है इसी लिए उस का आभारी है. नायाब विचार ! इस कविता को मैं भी लिखना चाहता हूँ.

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  13. यहाँ
    एक शब्द है बेचैनी
    जो
    सारे शब्दों पर भारी है
    shirish jee ,
    namskar !
    sunder rachna kavita 12 saal baad bhi taro tazza lagti hai .
    sadhuwad

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  14. काफ़ी दिन बाद आया आपके ब्लॉग पर। आपकी यह कविता पढ़कर लगा कि वास्तव में एक बहुत प्यारी और अच्छी कविता पढ़ी। ऐसी प्यारी कविताएं पढ़वाते रहें।

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