Sunday, September 19, 2010

जीवन रहेगा

उत्तराखंड विपदा में है। सब कुछ उजड़ा - उजड़ा। कुछ दिन से अनुनाद पर आना भी नहीं हुआ। आज आया हूँ तो सोचा पोस्ट बदल दूँ। बस एक कविता जो पब्लिक एजेंडा में छपी थी...पिछले महीने...

जीव रहेगा

जीवन था
क्योंकि शर्त थी कि जीवन रहेगा
एक बदला ख़ुद से
जिसे जीकर ही लिया जा सकता था
हर हाल में

बदले में तकलीफ़ थी
जैसी पुरानी लड़ाइयों में प्राणघातक घाव लग जाने से होती थी
पर सन्तोष था कि जीकर ही भुगत लिया सबकुछ

सबकुछ यानी सबकुछ
सब जो प्रेम था और कुछ जो प्रेम नहीं था
दोनों को अलगाना नहीं था
साथ में वो ज़्यादा अर्थ देते थे

जीवन को ज़्यादा अर्थ की ज़रूरत थी
कम अर्थ उसे बिगाड़ सकता था
ख़त्म भी कर सकता था
लेकिन शर्त थी कि जीवन रहेगा
पर ज़्यादा अर्थवान होने से वह गूढ़ होता जाता था
समझ में नहीं आता था

समझ में नहीं आता था इसीलिए तो जीवन था
और शर्त थी कि वह रहेगा

रहेगा में एक ढाढ़स होना था
पर नहीं था
वह भीतर ही रोक ली गई उस रुलाई की तरह लगता था
जिसे एक औरत
घर भर से छुपाती थी

टी.वी. पर एक रियलिटी शो में
प्रतिभागी भोजपुरी नायक रह-रहकर दहाड़ता था -
जिन्दगी झण्ड बा
तब भी घमण्ड बा !

इस तरह
अपने समय में चुकी हुई कविता तो
लगातार सरल होती हुई एक जगह आकर ख़त्म हो जाती थी
पर गुणीभूत होता हुआ जीवन था

और शर्त थी कि वह रहेगा !
***

3 comments:

  1. "जीवन को ज़्यादा अर्थ की ज़रूरत थी
    कम अर्थ उसे बिगाड़ सकता था
    ख़त्म भी कर सकता था
    लेकिन शर्त थी कि जीवन रहेगा
    पर ज़्यादा अर्थवान होने से वह गूढ़ होता जाता था
    समझ में नहीं आता था"

    बहुत खूब, बहुत दिनों बाद फिर आना हुआ, आना सार्थक हुआ....

    ReplyDelete
  2. इस तरह
    अपने समय में चुकी हुई कविता तो
    लगातार सरल होती हुई एक जगह आकर ख़त्म हो जाती थी
    पर गुणीभूत होता हुआ जीवन था

    और शर्त थी कि वह रहेगा !
    shirish jee
    namaskar !
    achchi hai abhivyakti
    sadhuwad

    ReplyDelete
  3. जीवन रहेगा भाई…दुख भी … और संघर्ष भी रहेगा

    ReplyDelete

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