Tuesday, September 7, 2010

एक बहती हुई उज्जवल नदी

`युवराज` राहुल गांधी सोवियत संघ के पतन का हवाला देते हुए उस विचारधारा को सड़ी-गली बताते हैं जिसने दुनिया भर में अन्याय और गैर बराबरी के खिलाफ संघर्षों की ज़िद पैदा कीराहुल कांग्रेस से हैं और कांग्रेस की कोई विचारधारा है, यह उस दौर में भी पता नहीं लगाया जा सकता था, जब राहुल के नाना जवाहर लाल उसी `सड़ी-गली` विचारधारा से खुद को गर्व से प्रेरित बताते हुए आत्मनिर्भर-सेक्युलर हिन्दुस्तान बनाने की कोशिशों में जुटे थेहाँ फिलहाल अमेरिका की चाकरी कर रही और दक्षिणपंथ की सियासत कर रही कांग्रेस की नीतियां साफ हैं और उनके नेता के ऐसे बयान स्वाभाविक हैंइन दिनों मैं `जलसा` पढ़ रहा हूँ और उसमें से शुभा की ये पंक्तियाँ यहाँ देना मुझे बेहद अर्थपूर्ण लग रहा है :

बार-बार एक दृश्य टेलीवीज़न पर दिखाया जा रहा हैएक मूर्ति के गले में रस्सी डाली जाती है और वह ज़मीन पर गिर रही है हालाँकि गिरते हुए उसकी मज़बूत पीठ दिखाई देती है लेकिन फिर भी आख़िर वह गिर ही रही हैयह मूर्ति किसी देवता की नहीं है केवल किसी राष्ट्रनायक की भी नहींयह ऐसी मूर्ति है जिसे देखकर राष्ट्र की अंधी सीमाएं दूर हटने लगती हैं और पृथ्वी की अखंडता बहुत बार एक साथ दिखाई पड़ती हैयह उस इंसान की मूर्ति है जिसने एक इंसान के तौर पर, एक इंसान की क्षमताओं के तौर अपने को अधिकतम रूप में अभिव्यक्त किया था, मनुष्य और मानव जाति की छुपी क्षमता का एक ख़ज़ाना खोज निकाला था, एक ऐसी खदान का मुंह खोल दिया था जिसमें असंख्य खनिज और अमूल्य धातुओं का अपार बहाव थाइस खदान को मनुष्य से मानव दृष्टि से संपृक्त करने वाली यह मूर्ति गिरते हुए भी ऐसे विराट दृश्यों की ही याद दिला रही थी जो दृश्य केवल मनुष्य के सामूहिक साहस से ही पैदा होते हैंयह मूर्ति गिरते हुए भी उतनी ही लम्बी और मज़बूत थी
ऐसे लोग हैं जिनके दिलों में यह गिरती हुई मूर्ति और भी दृढ़ता से खड़ी हो गईयह एकदम अधिक समकालीन बन गईयह अब तक हमारे सामने थी अब हमारे अन्दर उतर गई हैऐसी मूर्तियाँ जो समकालीन बनकर हृदय में उतर जाती हैं गिराई नहीं जा सकतींकभी-कभी उनकी उपस्थिति प्रमाणित होने में समय लग जाता हैकभी कम कभी बहुत अधिक लेकिन अंततः उनकी उपस्थिति दर्ज होती हैदर्ज ही नहीं होती, वह अपने को प्रमाणित भी करती हैऐसे समय बार-बार आये हैं और आते हैं जब तमाम षड्यंत्रों, उन्माद और अत्याचार की बड़ी से बड़ी चट्टानों को तोड़ते हुए न्याय का रास्ता चमकता हैऔर एक बहती हुई उज्ज्वल नदी आख़िर सबको अपनी ओर खींचती है

2 comments:

  1. शुभा जी को पढना हमेशा सुखद अहसास देता है.
    और मजबूती भी देता है. बहती उज्जवल नदी की तरह उनका लेखन भी अपनी ओर खींचता है...

    ReplyDelete

यहां तक आए हैं तो कृपया इस पृष्ठ पर अपनी राय से अवश्‍य अवगत करायें !

जो जी को लगती हो कहें, बस भाषा के न्‍यूनतम आदर्श का ख़याल रखें। अनुनाद की बेहतरी के लिए सुझाव भी दें और कुछ ग़लत लग रहा हो तो टिप्‍पणी के स्‍थान को शिकायत-पेटिका के रूप में इस्‍तेमाल करने से कभी न हिचकें। हमने टिप्‍पणी के लिए सभी विकल्‍प खुले रखे हैं, कोई एकाउंट न होने की स्थिति में अनाम में नीचे अपना नाम और स्‍थान अवश्‍य अंकित कर दें।

आपकी प्रतिक्रियाएं हमेशा ही अनुनाद को प्रेरित करती हैं, हम उनके लिए आभारी रहेगे।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails