Tuesday, August 10, 2010

आह, त्रिलोचन को भूला मैं !


टिप्पणी का शीर्षक `आह, त्रिलोचन को भूले हम´ भी हो सकता था पर मैंने महज अपनी जिम्मेदारी लेना स्वीकार किया है, अपनी समूची कविपीढ़ी की नहीं। हो सकता है कुछ साथियों को त्रिलोचन याद हों....हालांकि ऐसा दिखता तो नहीं.... तब भी....

त्रिलोचन को भूल जाना मेरे कविजीवन की एक बड़ी त्रासदी है। उन्हें काफ़ी पढ़ा पर समय रहते ठीक से गुना नहीं। मेरे लिए एक तरफ नागार्जुन का खांटी आकर्षण था तो दूसरी तरफ मुक्तिबोध के बनाए क्रूर वास्तविकताओं के भयावह भवन - बीच में कहीं छूट गए त्रिलोचन। पता नहीं कैसे यह तथ्य विस्मृति की गर्त में जाता रहा कि प्रगतिशील कविता में त्रिलोचन ने एक सर्वथा नया संसार बसाया। एक संस्कृत पढ़ा हुआ बहुभाषाविद् शास्त्री अपने समय की कविता में ऐसी भाषा लाया, जो जन(वादी) परम्परा की सबसे सरल, समीप और सटीक किन्तु कविता के लिए बिल्कुल नई भाषा थी। आधुनिकता से परे जाकर भी अपने भीतर एक अधुनातन भावबोध को सम्भाल पाने और जीवित रखने वाली भाषा। हैरत होती है कि इस मामले में बिम्बविधान के आचार्य हमारे वो अत्यन्त प्रिय कवि भी पिछड़े, जो आजीवन त्रिलोचन का आभार जताते उन्हें अपना कविगुरू बताते रहे- मुझ जैसे कम पढे़ युवाओं की तो बात और औक़ात ही क्या? सोचता हूँ अब कोई भूलसुधार सम्भव है? शायद नहीं! असद ज़ैदी के शब्दों में -

कोई इंसानी कोशिश उसे सुधार नहीं सकती
मेहनत
से और बिगाड़ होता है पैदा
वह
संगीन से संगीनतर होती जाती एक स्थाई दुर्घटना है !

दिमाग़ में अचानक आयी यह टिप्पणी हालांकि त्रिलोचन पर है लेकिन अगर इसमें ऊपर बताई स्थाई दुर्घटना की गूँज भी सुनाई देती रही तो कोई आश्चर्य नहीं। त्रिलोचन की इस भाषा को मैं अज्ञेय की एक विख्यात काव्यपंक्ति से तुरत प्रकट कर सकता हूँ। बकौल अज्ञेय `मौन भी अभिव्यजंना है´ - अब यही बात त्रिलोचन के जनपदीय संस्कारों में `अनकहनी भी कुछ कहनी है´ में बदल जाती है और हम देख सकते हैं कि जनता और कविता, दोनों के लिए कौन-सी पंक्ति अधिक आत्मीय है। यहां से भाषा के दो अलग संस्कार साफ़ पहचाने जा सकते हैं। मैं तो त्रिलोचन के संस्कार के साथ जाऊंगा। इस संस्कार के साथ एक चुनौती भी है, जिसे ख़ुद त्रिलोचन ने कुछ यूं व्यक्त किया है कि `कैसे और कहां से शब्द अनाहत पाऊं´। अज्ञेय के संस्कार में अनाहत शब्द पाना बहुत सरल है लेकिन त्रिलोचन के संस्कार में, जहां समूचा जीवन ही आहत है, यह एक असम्भव युक्ति है। `मौन´ बेबसी के साथ-साथ कवि की इच्छा या अभिमान को भी प्रकट करता है पर `अनकहनी´ में एक ऐतिहासिक विवशता है। मौन स्वेच्छा से भी हो सकता है पर अनकहनी में तो कुछ ऐसा है, जिसे कहा जाना था पर कहने से रोक दिया गया हो। इसमें उन अनाचारी ताकतों की भी छाया है, जिन्होंने सैकड़ों साल से सही बात को कहे जाने से रोका है और दबाव या सेंसरशिप इतनी ज़्यादा हो गई है कि अब अनकहनी भी कुछ कहनी है

हिन्दी कविता में सबसे बड़ी विडम्बना यह हुई है कि कवि आगे आ गए और वह लोक या जन पीछे रह गया, जिसके लिए और जिसकी वजह से कविता सम्भव हो पायी - अब किसी ने अज्ञेय की भांति लोक या जन से कटकर ही रहना और कहना स्वीकार किया हो तो उसकी अलग बात है। यह विडम्बना मेरे जैसे युवाओं के लिए अधिक है, जिन्हें पॉलिटिकली करेक्ट होने की भी चिन्ता हो। त्रिलोचन ने `उस जनपद का कवि हूँ´ में संकलित एक सानेट में एक सीधी-सरल किन्तु कविता के शिल्प में जटिल और चुनौतीपूर्ण कामना की थी -

यह तो सदा कामना थी, इस तरह से लिखूँ जिन पर लिखूँ, वही यों अपने स्वर में बोलें
परिचित
जन पहचान सकें, फिर भले ही दिखूँ....

इधर अलग मुहावरे की मार ने कविता को इस तरह आहत किया है कि हम यही मूल बात भूल गए हैं। अलग होने-दिखने से कोई आपत्ति नहीं। ख़ुद त्रिलोचन ने कहा है कि मैं बहुत अलग कहीं और हूँ ... इस तरह वह भी एक सपना और सफलता है पर किस क़ीमत पर....अब तो स्थिति यह है कि `परिचित जन दिखें दिखें, मैं ही मैं दिखूँ ´। मैं अपने आसपास ऐसे कई कवियों को पाता हूँ, जैसे त्रिलोचन के जीवन में भी अवश्य रहे होंगे, तभी तो `शब्द´ में यह सानेट आता है -

डर लगता है जीवन में उनसे जो अपने
होते
हैं, अपनेपन का ज्ञापन करते हैं
भावों
और अभावों का मापन करते हैं
तुलना
द्वारा और अनंजित दृग के सपने
मुखरेखा
से जान लिया करते हैं, छपने
से
पहले ही उनका विज्ञापन करते हैं

त्रिलोचन की इस चेतावनी को समझ सकें तो हमारी महान मित्रताओं के बीच यह एक संकट की घड़ी है। छपने से पहले ही विज्ञापन के कुछ अद्भुत प्रकरण अभी बिल्कुल अभी की कविता में हमारे सामने हैं।

फिलहाल इस संक्षिप्त टिप्पणी को अतिसंक्षिप्त रखते हुए त्रिलोचन के ही शब्दों की उधारी से काम चलाऊंगा -

जीवन जिस धरती का है, कविता भी उसकी
सूक्ष्म
सत्य है, तप है, नहीं चाय की चुस्की !
****

यह टिप्पणी एक लेख की तैयारी में लिए गए एक तुरत नोट जैसी है, जानता हूँ इसमें काफ़ी जल्दबाज़ी और झोल हैं, कृपया आप मित्रगण इसकी सीमाओं से अवगत कराएं.....कुछ ग़लत या अधिक कह दिया हो तो वह भी बताएं !

5 comments:

  1. जीवन जिस धरती का है, कविता भी उसकी
    सूक्ष्म सत्य है, तप है, नहीं चाय की चुस्की !
    ****
    त्रिलोचन बाबा की चर्चा ही एक तप है आज के इस संदिग्ध समय मे .........

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  2. शिरीष भाई
    यह सच है कि मुक्तिबोध और नागार्जुन के बीच युवा पीढ़ी के बीच त्रि‍लोचन कहीं नदारत से हो गये लगते हैं.. मगर आपने बड़ी सहजता से उनका स्‍मरण दिला दिया.

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  3. अज्ञेय और त्रिलोचन की तुलना मौन और अनकहनी को लेकर अच्छा लगा. इसे क्या और भी आगे बढाया जा सकता है?

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  4. हिन्दी कविता की सहजबोध की परंपरा में तुलसी से लेकर त्रिलोचन तक अपने समय और भूगोल का गहराई व व्यापकता का सहज विवेचन करने की अदभुत समर्थता से आज की हमारी पीढ़ी लगभग अपरिचित है| वैसे भी पूर्वजों से सीखने की लालसा सांप्रत पीढ़ी में रही आई है| तभी तो बाबा त्रिलोचन ने कहा है कि "बाबा तुलसी भाषा हमने तुमसे सीखी" और आज जनबोध की सरल भाषा में वर्तमान समय-समाज की जटिलता को अभिव्यक्त करने कला आपने दुचित्तेपन से ही सही अपनाने ज़ो स्वीकारोक्ति की है, वह वरेण्य है|

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  5. जीवन जिस धरती का है, कविता भी उसकी
    सूक्ष्म सत्य है, तप है, नहीं चाय की चुस्की !
    ..इसी को भूल गए बाकी सब याद रहा.
    ..उम्दा पोस्ट.
    ..आभार.

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