Thursday, July 15, 2010

तरुण भारतीय की कविता-२


गुप्त वस्तुओं की सूचना

ज़बान के तरीक़े तमाम
इतने भी नहीं कि
शरबत के किस्से अधूरे पड़ जाएँ

सुनोगी और हंसते—हंसते
निकलोगी दरवाजे से बैठो
यह तो तय है कि कानों–कान ख़बर होगी
पूजा पर बैठे तानाशाह को

जैसे कि यौडो बाजार के
गिटार बजाते मिस्टर थाबा
उनसे हमने अभी भी नहीं खरीदे
फारेंग वक्‍त के ग्लेड्यूला बीज

अभी तो चार ही बजे हैं
शहर के चेरा दरवाजे पर
शायर आशिक ड्राइवरों की भीड़ इकठ्ठी भी नहीं हुई
बैठो

ज़बान की हसरतें तमाम
इतनी भी नहीं कि
शिलांग पीक से चीखीं जा सकें

ड्रीमलैंड की ब्लैकिया काँगें याद हैं
रुमानियत से तर गालियाँ
यहीं इन्हीं अलमारियों में
नीम पत्तों के साथ समेटा है तुमने

हाँ हाँ यह ख़बर
बेच सकती हो
फारेंग पार्टियों में
नाचने से बचने के लिए

हड़बड़ी क्या है
बैठो
भींगने दो होंठ
87 आने दो तीर में

ज़बान के नुक्कड़ तमाम
इतने भी नहीं कि
सियासत की जुगाली की जा सके

अब तो एब्बा का हाफ़ वेज नूडल्स भी नहीं
उत्तर भी नहीं दक्षिण भी नहीं
चुटकुलों से कैसे खींचोगी बर्लिन की दीवार
बैठो

1934 के पियानो पर बजते ग़लत मोत्ज़ार्ट पर
हंसते-हंसते
गोविंदा के गीत रुकते हैं
मौलाई के बंदूकों के बीच

सब यहीं है
ख़ुदा फादर अडोनीस की कब्र ब्रिगेडियर पैकेन्टाइन का कैमरा
एलबर्ट की निराशा लीज़ा की बेतरतीब टैक्सी
शायद मैं डखार चीखते अलगाववादी

ज़बान की तारीख़ें तमाम
इतनी कि
सोया भी ना जा सके
- - -
*सोहरा-चेरापूँजी का खासी नाम

6 comments:

  1. ह्म्म्म...
    एक लुप्त होती छोटी छोटी संस्कृतियों का लेखा जोखा मानो उसने ही विनती की जा रही हो बैठे रहने की.
    एक अत्यंत निजी (शायद अत्यंत कहना उचित ना होगा क्यूंकि चेरापूंजी में और भी कुछ लोग होंगे जो उसे सोहरा कहते होंगे/पर फ़िर भी गुप्त चीजें अंतस में गुप्त ही होंगी) सा एकांत. कुछ बचे रहने कि इच्छा, और फ़िर श्रीश जी (इस ब्लॉग) के प्रोफाइल की कविता दोनों कविताएँ कहीं अंतस में synchronize करती हुई सी लगती हैं. ''अनुनाद" .

    ReplyDelete
  2. यह निश्चित तौर पर एक अच्छी कविता है शिरीष भाई…क्यूं न दो-तीन कवितायें एक साथ लगा दीजिये। तब समग्र रूप से उनको समझना थोड़ा आसान हो जायेगा

    ReplyDelete
  3. हाँ, कुछ और कविताएं दीजिए शिरीष. जी नहीं भरा.बल्कि मुझे तो कविता में * ढेर सारा नॉर्थ -ईस्ट * चाहिए....
    किसी भी जगह को कवि की आँखों से देखने क लुत्फ ही अलग होता है.

    ReplyDelete
  4. कुछ शब्द समझ नहीं आए, फिर ऐसा लगता है कविता मन में बैठ गई।

    ReplyDelete
  5. फारेंग शायद फिरंगी के लिए कहा गया हो..शायद और कांगें...पता नहीं

    ReplyDelete
  6. * ढेर सारे नॉर्थ -ईस्ट * में से थोड़े और के लियेः
    http://pratilipi.in/tarun-bhartiya/
    http://pratilipi.in/aruni-kashyap/

    ReplyDelete

यहां तक आए हैं तो कृपया इस पृष्ठ पर अपनी राय से अवश्‍य अवगत करायें !

जो जी को लगती हो कहें, बस भाषा के न्‍यूनतम आदर्श का ख़याल रखें। अनुनाद की बेहतरी के लिए सुझाव भी दें और कुछ ग़लत लग रहा हो तो टिप्‍पणी के स्‍थान को शिकायत-पेटिका के रूप में इस्‍तेमाल करने से कभी न हिचकें। हमने टिप्‍पणी के लिए सभी विकल्‍प खुले रखे हैं, कोई एकाउंट न होने की स्थिति में अनाम में नीचे अपना नाम और स्‍थान अवश्‍य अंकित कर दें।

आपकी प्रतिक्रियाएं हमेशा ही अनुनाद को प्रेरित करती हैं, हम उनके लिए आभारी रहेगे।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails