Thursday, July 8, 2010

पाठक कृपया अपने विवेक से काम लें....सन्दर्भ हैरॉल्ड पिंटर की एक कविता (अनुवाद एवं प्रस्तुति व्योमेश शुक्ल)

(दुनिया में अनाचार और अनाचारियों की उपस्थिति कभी कभी किसी कवि को कितना क्रोधित, हताश और क्षुब्ध करती है, इसका एक भीषण उदाहरण व्योमेश द्वारा उपलब्ध करायी गई इस कविता (?) में मिलता है। यहाँ अनूदित के साथ मूल कविता भी पेश है। हालाँकि इस कविता के लिए "पेश" ग़लत शब्द है....बस ये है....और क्या कह सकता हूँ....बाक़ी आप पाठक बताएँगे। इस कविता का अनुवाद और प्रस्तुति एक ऐसा विकट काम है, जिसके लिए साहस और दुस्साहस छोटे शब्द हैं....लेकिन व्योम ने इसे कर दिखाया है।)
हैरॉल्ड पिंटर नाटककार और कवि के रूप में लोकप्रिय हैं। उनके कई नाटकों के पूरी दुनिया में अनगिनत मंचन हुए हैं और उनकी लिखी पटकथाओं पर बनी फिल्में भी ख़ासी कामयाब हैं। पिंटर को नोबेल समेत पश्चिम के अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार मिले हैं और उनका नोबेल पुरस्कार व्याख्यान साम्राज्यवाद के प्रतिकार के मॉडल की तरह सुना, पढ़ा और समझा गया है। पिंटर हमारे लिए एक ऐसे सर्जक के तौर पर सामने आते हैं जिसके लिए राजनीति और कला अलग-अलग चीजें नहीं हैं। उन्होंने अमेरिकी ज़्यादतियों की मीमांसा की हरेक संभावना का कला और सच्चाई के हक़ में इस्तेमाल कर अप्रत्याशित संरचनाएँ संभव की हैं। पिंटर के यहां गद्य और कविता, नाटक और व्याख्यान, यात्रावृत्त और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को लिखी गई चिट्ठी में ज़्यादा फ़र्क नहीं है।

शायद मनुष्यता के काम आने वाली रचना हर बार विधागत घेरेबंदी के बाहर चली जाती है। उनकी नीले रंग के कवर वाली गद्यपद्यमय किताब ‘वैरियस वायसेज़: प्रोज, पोएट्री, पॉलिटिक्स 1948-2005’ इस धारणा का अद्वितीय प्रमाण है जिसे पढ़ते हुए रघुवीर सहाय की ऐसी ही पुस्तक ‘सीढ़ियों पर धूप में’ लगातार याद आती है। ज़ाहिर है कि ये दोनों कृतियाँ साहित्य, कला, विचार और संघर्ष के सुविधामूलक, शरारती, प्रवंचक और प्राध्यापकीय द्वैतों का अतिक्रमण करती हुई आती हैं। हैरॉल्ड पिंटर की कविताओं में साम्राज्यवादी उतपात, दमन और फरेब को लेकर गहरी नफरत है जिसे अपने विलक्षण कौशल से वे अलग-अलग शक्लों में ढाल लेते हैं। इराक और दूसरे इस्लामी देशों के साथ हुए जघन्य दुष्कृत्यों का बयान करती उनकी कविताएं किसी अतियथार्थवादी फिल्म की तरह देखी भी जा सकती हैं।

अमरीकी फुटबाल
(खाडी युद्ध पर एक प्रतिक्रिया)

प्रभु तेरी लीला अपरम्पार!
हमने उनकी ले ली।
उनकी टट्टी निकल गई।

हमने उनका गू उनकी गाँड में
घुसेड कर
उनके कानों से निकाल दिया।

उनकी तो बस ले ली।
टट्टी निकाल दी और अब वे
अपनी ही टट्टी में घुट रहे हैं।

धन्य हो प्रभु
तेरी लीला अपरम्पार!

हमने उनक गू निकाल दिया।
अब वे अपना ही गू खा रहे हैं।

प्रभु की लीला अपरम्पार।

हमने उनके अंडकोशों को
पीसकर चटनी कर दिया।

हमने कर दिखाया।

अब तुम पास आकर
मेरा मुँह चूसो।

( इस कविता के अनुवाद में वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी से कई मूल्यवान सुझाव मिले थे. अनुवादक उनका शुक्रगुज़ार है।)

-व्योमेश शुक्ल



American Football
(A Reflection upon the Gulf War)

Hallelullah!
It works.
We blew the shit out of them.

We blew the shit right back up their own ass
And out their fucking ears.

It works.
We blew the shit out of them.
They suffocated in their own shit!
Hallelullah.
Praise the Lord for all good things.

We blew them into fucking shit.
They are eating it.
Praise the Lord for all

good things.

We blew their balls into shards of dust,
Into shards of fucking dust.

We did it.

Now I want you to come over here

and kiss me on the mouth.

***

18 comments:

  1. दमनकारियों की ऐसी गर्वोक्तियाँ और ऐसा भाषाई तेवर उनकी आक्रामकता और नृशंसता को सही-सही व्यक्त करता है। अनुवाद की भाषा पर कोई टिप्पणी न करना अनुवाद की सटीकता का नकारना होगा। यह भाषा साम्राज्यवाद की औकात और नीयत को ही रिफ्लैक्ट करती है। भाई व्योमेश को सुन्दर अनुवाद व शिरीष जी को इस पोस्ट के लिए आभार। (इसी अमरीकी साम्राज्यवाद के विरोध में खड़ी रेड इंडियन कविता की झलक देती कविताओं की पोस्ट काव्य-प्रसंग पर भी देखें।)

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  2. मुझे लगता है अंतिम पंक्ति में kiss का अनुवाद चूमना बेहतर होता…चूसना उचित नहीं लग रहा…शेष अति उत्तम!

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  3. व्योमेश जी की भावनाओं को चोट न लगे इसलिए गुमनाम रह कर कमेंट कर रहा हूं।

    किस आन द माउथ का अनुवाद चूसना किस तरह हुआ भाई ?

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  4. ज़मान: सख्त कम आज़ार है बजान-ए-असद
    वगरन: हम तो तवक्को ज़ियादा रखते हैं

    गुमनाम दोस्त, चूमने की आत्मीयता और पारस्परिकता अनुवाद करते समय नहीं दिखी थी, लेकिन अगर यह इतना ज़रूरी लगता है तो जोड़ लूंगा आगे.

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  5. ये बड़ा अजीब है...
    objectionable लोगों से मेरा यह प्रश्न है कि वे "It works" का अनुवाद किस तरह करना चाहेंगे.
    जहां तक मेरी समझ है, यहाँ किसी चुम्बन की मांग नहीं की गयी है, ये एक बड़ी ताक़त के ख़िलाफ़ खड़ी हुई ताक़त है जो अपने पूरे रंग में है. आशा है कि आप इस रंग को बाख़ूब समझते होंगे.

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  6. भाई सिद्धान्त मोहन जी…इतनी समझ हम भी रखते हैं कि यहां प्रेमी किसी प्रेमिका से चुम्बन की मांग नहीं कर रहा…लेकिन 'एक बड़ी ताक़त के ख़िलाफ़ खड़ी ताक़त' 'चूसने (ओठ नहीं मुंह) से कैसे अपने पूरे रंग में आती है…यह ज़रूर मुझ नासमझ की समझ से बाहर है! यहां 'मुह चूमना' वाली प्रचलित शब्दावली ज़्यादा बेहतर लगी तो सुझाव दे डाला…पता नहीं क्यूं यह बार-बार भूल जाते हैं कि हमारे तमाम समकालीन किसी भी सुझाव से परे सिद्ध हो चुके हैं…तो इस ग़लती के लिये क्षमा!

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  7. अशोक भाई, सटीक अनुवाद तो चूमना बनता है.(दिमाग से.) लेकिन पाठ की रौ में *चूसना* ही ज़ुबान पे आता है.(दिल से !)
    व्योमेश ने गहरे घुस कर के अनुवाद किया है.ये ज़ोखिम तो रहता ही है. मूल कविता से आगे जा रहा है यह अनुवाद. और कविता के हर अनुवाद को जाना चाहिए.हो सकता है मैं गलत सोच रहा हूँ.......

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  8. अजेय भाई…मैने 'मुझे लगता है' जोड़ा था…यह मेरा विचार था…बाकी व्योमेश और पाठकों पर है…

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  9. परे न खिसकाइये अशोक भाई.

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  10. भाई व्योमेश मैं भी अशोक जी से सहमत हूँ
    चूसना ठीक अनुवाद नहीं लग रहा

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  11. मेरा एक दोस्त महाकाव्य लिख रहा है,जिसकी शुरूआत कुछ ऐसे है कि-

    गन्ने के खेत में 'घुस' कर प्यार की 'रौ' में 'चूसूँ' तुझे 'दिल से'/गन्ने के खेत में 'घुस' कर कौन चाहेगा भला 'चूमना' तुझे 'दिमाग से'

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  12. # रंगनाथ् सिंह , मंगलाचरण अद्भुत है. दोस्त को कहें इस महाकाव्य को ज़रूर पूरा करे.वैसे भी
    * कामायनी* के बाद कोई महाकाव्य लिखा नही गया.प्रसाद जी इस अंतराल से उकता गए होंगे. भईया , कोई तो आए....

    मैने तो अनुवाद की आलोचना करने की कोशिश की थी.

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  13. अजेय भाई,धन्यवाद कि आपने मेरे कमेंट के मित्रवत लिया। मैंने तो इसलिए चुटकी ली कि अलग-अलग आदमी का दिल और दिमाग अलग-अलग बात कह सकता है ! अतः किसी आलोचना में ऐसा कोई तर्क अनुचित होगा कि दिल से सोचें तो.....।

    खैर,आपको पता ही होगा, न हो तो मैं सूचित किए देता हूं कि हिन्दी के दुर्दिन गए प्रसाद जी की छोड़िए,अब तो गली-मोहल्लों में सीधे वेदव्यास(कलीयुगी) का अवतरण हो चुका है और महाकाव्य लिखा जा रहा है। अतः उम्मीद है उनके महाकाव्य से हिन्दी में सृजन की नई दिशा खुलेगी।

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  14. पढ़े कविता भी और बहस भी ..
    कविता सुन्दर है .. अनुवाद कविता से १९ नहीं है !

    अब जो मुझे लग रहा है वह कह रहा हूँ - व्योमेश भाई बनारसी होकर भी कुछ लजा से गए हैं , मैं होता तो अंतिम दो पंक्तियों का अनुवाद कुछ यूँ करता ---
    '' अब नजदीक आकर
    मेरा लंड चूसो ... ''
    व्यंजना को निबाहा जाय या शब्द को !
    'चूमने'-वालों से मैं यही कहना चाहता हूँ कि वीभत्स की जो त्वरा है उसमें 'चूमने' का तुक ही नहीं बैठता ! ए.के.-४७ के पास गुलाब का फूल रखने का क्या मतलब है !

    मेरी टीप आपत्तिजनक होगी तो डिलीट कर दीजिएगा , मुझे कोई दुःख नहीं होगा ! आभार !

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  15. अमरेन्द्र के कमेंट के बाद एक छोटी सी जिज्ञासा है। जिस भाषा में लिखते हैं उसमें सक/सक्स एक प्रचलित शब्द है। जिस त्वरा की बात अमरेन्द्र ने उठायी है वह स्वयं पिंटर ने क्यों भंग की है ?

    कविता विभत्स से अचानक कोमल तान पर खत्म हो अपनी व्यंजना को बढ़ा रही है या फिर सक्स पर खत्म होकर बढ़ाती !!

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  16. अगर कहीं 'ईश्वर' है तो उसका लाख-लाख शुक्रिया कि अनुवाद अमरेन्द्र जी ने नहीं मेरे प्रिय व्योमेश ने किया है…

    और इस बात के लिये भी कि कविता हैराल्ड पिंटर ने लिखी है किसी गे कवि ने नहीं…जो प्रसन्नता या वीभत्सता के महान क्षण में भी अंग विशेष ( साभार आदरणीय महेश कटारे जी) के चुम्बन या चूसे जाने की कामना नहीं करेगा।

    कविता के अनुवाद के समय कवि उपस्थित नहीं होता बस कविता होती है और उससे पूरा इंसाफ करना अनुवादक का परम कर्तव्य और अभीष्ठ्…यह क्रियेटर की नहीं पुनर्प्रस्तुति की भूमिका होती है…मैं चाह कर भी चे को बीड़ी नहीं पिला सकता…व्योमेश चूमने या चूसने की छूट ले सकते थे…ली…पर mouth के लिये वह शब्द!

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  17. @ रंगनाथ जी , आपकी जिज्ञासा का कोई जवाब नहीं है मेरे पास ! क्योंकि आप द्वारा कही बात से सहमत हूँ ! आभार !
    @ अशोक जी , मेरे अनुवाद पर आपका रोष वाजिब है ! पुनः पढ़ा तो लगा कि ऐसा अनुवाद औचित्यहीन और कवि के मूल भावों के खिलाफ है ! मुझसे '' Now I want you to come over here / and kiss me on the mouth.'' इन पंक्तियों के भाव ग्रहण में चूक हुई ! बेशक बड़ी चूक ! स्वयं अफ़सोस और हैरत में हूँ ! प्रिय व्योमेश जी का अनुवाद निश्चय ही सराहनीय है ! कष्ट के लिए खेद ! कई दिनों बाद यह बात कह रहा हूँ ! आभार !

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  18. अनुवादक जब कवि हो तो ऐसा स्वाभाविक है ।

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