Monday, May 31, 2010

संजय व्यास की कविता - दूसरी किस्त

घर गृहस्थी में धंसता पुराना प्रेम पत्र
(एक काव्यकथा)
" श्री गोपीवल्लभ विजयते"

बम्बोई
(तिथि अस्पष्ट)
प्यारी सुगना,
मधुर याद.

श्री कृष्ण कृपा से मैं यहाँ ठीक हूँ और तुम भी घर पर प्रभु कृपा से सानंद होंगी.मेरा मन तो बहुत कर रहा है कि पत्र के स्थान पर स्वयं उपस्थित हो जाऊं पर एक सेठ का मुनीम होना कितना ज़िम्मेदारी का काम है ये मैं पिछले देस-प्रवास में तुम्हे बता चुका हूँ. काम गाँव भर का और पगार धेला. वहीं सेठ के पास काम धेले का नहीं और माया अपार. वैसे अन्दर की बात ये है कि इस सेठ की नाव डूब रही है. मैं ये बात सेठजी को बता भी चुका हूँ पर लगता है मामला अब उनके बस का नहीं. देनदारियाँ भारी पड़ रही है.

ये मैं क्या बातें ले बैठा,पर बताना भी ज़रूरी है आखिर मुझे भी नई नौकरी तलाश करनी पड़ सकती है.कभी कभी सोचता हूँ सब छोड़ छाड़ के देस आ जाऊं.

यहाँ तो मैं लाल जिल्द वाली बही के पीले पन्नों में भी तुम्हारी छवि ही देखता हूँ,भगवान् झूठ न बुलवाए. पर दो ननदों, देवर शिवानन्द, सास,ससुर के साथ नैनू बेटे के भरे पूरे घर में रहते तुम्हे क्यों भला मेरी याद आएगी?
नैनू पहाडे सीख रहा होगा. पिताजी उसे डेढे और ढाईये भी अच्छे से याद करवा रहे होंगे. एक कामयाब मुनीम के लिए ये बहुत ज़रूरी है. मैंने भी बचपन में ये सब सीखा था.

इस बार यहाँ मेह इतना बरसा कि कांकरिया सेठ की पेढी डूबने के नौबत आ गयी थी पर वहां देस में छींटे-छिड्पर भी कहाँ!आदमी तो जैसे तैसे गुज़ारा कर ले पर गउओं का क्या होगा? भगवान् भलीस करेंगे.

पिताजी के मस्से ने उन्हें खूब परेशान कर रखा है. यहाँ एक आयुर्वेदिक दवा जानकारी में आई है, समय रहते भेज दूंगा. मां का स्वभाव थोडा तेज़ है पर तुम जानती हो वो शिवानन्द की चिंता में आधी हुई जाती है.मैं स्वयं शिवानन्द को लेकर बहुत आशंकित हूँ. भगवान् भलीस करेंगे, अगर वो पिताजी से विवाह-संस्कार विधि ही सीख लेता तो कोई संस्कारी परिवार अपनी कन्या देने आगे आ सकता था. आगे मर्ज़ी साँवलिए की.

बहनों की ज़्यादा चिंता फिकर नहीं है. गाय दुहना सीख गयी हैं,पापड बनाना भी सीख जायेंगी. तुम स्वयं इस विद्या में पारंगत होकर आई हो सो तुम्हारा ज्ञान उन्हें यहाँ उपलब्ध हो सकेगा.

और यहाँ सब ठीक है वहां मोहल्ले में भी सब बढ़िया ही चल रहा होगा.प्रभुलाल की औरतों के बीच पंचायती की आदत गयी नहीं होगी.क्या आदमी है! दिन रात औरतों के बीच. अब बुद्धि कहाँ से आएगी, बारह ही नहीं आई तो बत्तीस क्या आएगी.राह चलते औरतें भी दूसरी के बारे में उसी से पूछती है. महिलाओं का मुखबिर. और... वो दामोदर, वो आज भी लोगों के घरों में तांका झांकी करता होगा. सुबह हुई नहीं और घर की छत से लोगों के आँगन में झाँकने लग जाएगा. कुछ कहो तो झगडे पर उतारू. अब उससे कौन झगडा और निवेडा करे.खैर इन लोगों के बारे में बात न ही की जाय तो अच्छा. मंदिर में अपने घर की ओर से मनोरथ करवाया होगा इन दिनों. पुजारी वैसे तो कंजूस है प्रसाद देने में पर उसका तो क्या किया जा सकता है?उसको खाने दो.

और घर में काम ठीक ही चल रहा होगा अभी यहाँ भी पगार तीन महीनों की बाकी है.गोरकी गाय दूध ठीक दे रही होगी.मां की तरह उसका भी स्वभाव तेज़ है पर है तो गऊमाता ही.

चलो बहुत बातें हो गयी अब चिट्ठी यहीं समाप्त करता हूँ.और हाँ वो चित्रित किताब तुम्हारी शादी के वेश वाले बक्से में ही है न? किसी के हाथ न लग जाय. यहाँ बम्बोई में चारों तरफ पानी है देखता हूँ तुम्हे दिखा पाता हूँ कि नहीं.

सबको यथाजोग.

तुम्हारा
दीपचन्द
कविता के साथ लगा चित्र यहाँ से साभा

अनुनाद पर संजय व्यास यहाँ भी ...
***

5 comments:

  1. Prem aur pariwaar ka maarmik bayaan.
    kitni sthaaniyata aur kitni geetatmak rangat hai. Badhai Sanjay.

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  2. व्योमेश से सहमत नहीं हो पा रहा भाई…न तो मै इसे कविता की श्रेणी में रख पा रहा न ही इसमे कोई विलक्षणता लक्षित कर पा रहा…एक बेहद साधारण सा गद्य…

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  3. mainashok jee ki hi baat ka samarthan karuga , shirshak se kavita aur dikhane me kahani?
    saadar

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  4. कविता तो यह नहीं है काव्यकथा भी नहीं. शायद गिरिराज किराडू ने काव्यकथा नाम को इधर स्वीकार्य सा बना दिया है...लेकिन इस रचना में ऐसा कुछ भी नहीं जो इसे कविता के रूप में स्वीकृति दिला पाये... फ्रेंच और अँगरेज़ी की prose poetry एक अलग चीज़ है वहाँ लाइन ब्रेक्स को भले ही हटा दिया गया हो लेकिन कविता के अन्य तत्वों से छेडछाड नहीं की गई है. बोदलेयर तो इसे भविष्य का अनिवार्य काव्य रूप मानते थे. यह रचना शिवमूर्ति की कहानी सिरी सिरी उपमा जोग का संक्षिप्त और विरल चित्र मालूम पड़ रही है. नेट से ही निकल कर prose poetry के बारे में एक पैरा आप सब के आनंद के लिये..
    Although the prose poem resembles a short piece of prose, its allegiance to poetry can be seen in the use of rhythms, figures of speech, rhyme, internal rhyme, assonance (repetition of similar vowel sounds), consonance (repetition of similar consonant sounds), and images. Early poetry (such as the Iliad and the Odyssey, both written by Homer approximately 2,800 years ago) lacked conventional line breaks for the simple fact that these works were not written down for hundreds of years, instead being passed along (and presumably embellished) in the oral tradition. However, once poetry began to be written down, poets began to consider line breaks as another important element to the art. With the exception of slight pauses and inherent rhyme schemes, it is very hard for a listener of poetry to tell where a line actually breaks.

    The length of prose poems vary, but usually range from half of a page to three or four pages (those much longer are often considered experimental prose or poetic prose). Aloysius Bertrand, who first published Gaspard de la nuit in 1842, is considered by many scholars as the father of the prose poem as a deliberate form. Despite the recognition given to Bertrand, as well as Maurice de Guerin, who wrote around 1835, the first deliberate prose poems appeared in France during the 18th Century as writers turned to prose in reaction to the strict rules of versification by the Academy.

    Although dozens of French writers experimented with the prose poem in the 1700s, it was not until Baudelaire’s work appeared in 1855 that the prose poem gained wide recognition. However, it was Rimbaud’s book of prose poetry Illuminations, published in 1886, that would stand as his greatest work, and among the best examples of the prose poem. Additional practitioners of the prose poem (or a close relative) include Edgar Allen Poe, Max Jacob, James Joyce, Oscar Wilde, Amy Lowell, Gertrude Stein, and T.S. Eliot. Among contemporary practitioners of the prose poem are: Russell Edson, Robert Bly, Charles Simic, and Rosmarie Waldrop.

    और एक लिंक भी
    http://www.webdelsol.com/tpp/

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  5. कविता तो यह नहीं है काव्यकथा भी नहीं. शायद गिरिराज किराडू ने काव्यकथा नाम को इधर स्वीकार्य सा बना दिया है...लेकिन इस रचना में ऐसा कुछ भी नहीं जो इसे कविता के रूप में स्वीकृति दिला पाये... फ्रेंच और अँगरेज़ी की prose poetry एक अलग चीज़ है वहाँ लाइन ब्रेक्स को भले ही हटा दिया गया हो लेकिन कविता के अन्य तत्वों से छेडछाड नहीं की गई है. बोदलेयर तो इसे भविष्य का अनिवार्य काव्य रूप मानते थे. यह रचना शिवमूर्ति की कहानी सिरी सिरी उपमा जोग का संक्षिप्त और विरल चित्र मालूम पड़ रही है. नेट से ही निकल कर prose poetry के बारे में एक पैरा आप सब के आनंद के लिये..
    Although the prose poem resembles a short piece of prose, its allegiance to poetry can be seen in the use of rhythms, figures of speech, rhyme, internal rhyme, assonance (repetition of similar vowel sounds), consonance (repetition of similar consonant sounds), and images. Early poetry (such as the Iliad and the Odyssey, both written by Homer approximately 2,800 years ago) lacked conventional line breaks for the simple fact that these works were not written down for hundreds of years, instead being passed along (and presumably embellished) in the oral tradition. However, once poetry began to be written down, poets began to consider line breaks as another important element to the art. With the exception of slight pauses and inherent rhyme schemes, it is very hard for a listener of poetry to tell where a line actually breaks.

    The length of prose poems vary, but usually range from half of a page to three or four pages (those much longer are often considered experimental prose or poetic prose). Aloysius Bertrand, who first published Gaspard de la nuit in 1842, is considered by many scholars as the father of the prose poem as a deliberate form. Despite the recognition given to Bertrand, as well as Maurice de Guerin, who wrote around 1835, the first deliberate prose poems appeared in France during the 18th Century as writers turned to prose in reaction to the strict rules of versification by the Academy.

    Although dozens of French writers experimented with the prose poem in the 1700s, it was not until Baudelaire’s work appeared in 1855 that the prose poem gained wide recognition. However, it was Rimbaud’s book of prose poetry Illuminations, published in 1886, that would stand as his greatest work, and among the best examples of the prose poem. Additional practitioners of the prose poem (or a close relative) include Edgar Allen Poe, Max Jacob, James Joyce, Oscar Wilde, Amy Lowell, Gertrude Stein, and T.S. Eliot. Among contemporary practitioners of the prose poem are: Russell Edson, Robert Bly, Charles Simic, and Rosmarie Waldrop.

    और एक लिंक भी
    http://www.webdelsol.com/tpp/
    महेश वर्मा, अंबिकापुर, छत्तीसगढ़

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