Thursday, May 27, 2010

अजेय की कविताएँ / हिमालय की कविताएँ : एक लम्बी पोस्ट

आत्मकथ्य
इन कविताओं में हिमालय का घूमंतू जीवन है. हिमालय के भीतर और ट्रांस हिमालय के आदिम समुदायों में दो तरह की जीवन धाराएं हैं एक जो सेटेल्ड है, और दूसरा जो पशुपालक है और अभी तक ख़ानाबदोशों का जीवन जी रहा है. मैं उस सेटेल्ड समुदाय से आता हूँ जिस के पास अपनी क़ृषि योग्य भूमि है. पक्के मकान हैं और पिछली पीढी से सरकारी नौकरियों में भी लोग जा रहे हैं. हमारे बुज़ुर्गों को याद नहीं है कि उन्हें यह सेटेल्ड जीवन जीते हुए कितना अर्सा हो चुका है. लेकिन तय है कि बहुत अर्सा नहीं हुआ. क्यों कि तीन पीढ़ी पूर्व हम में से अधिकतर परिवारों के पास माल मवेशियों के बड़े बड़े रेवड़ होते थे. यारकन्द ,खोटान, रुदोक (उत्तरी तिब्बत ) के जो दर्रे सिल्क रूट की तरफ खुलते थे उधर से भारतीय मेन लेण्ड की तरफ बड़े पैमाने पर व्यापार चलता था. शायद हमारे पूर्वज इसी व्यापार के ट्रांसपोर्टर थे.. नई विश्व व्यवस्था में जब सिल्क रूट की अहमियत खत्म हुई और बदलते मौसम में हिमालय के विशाल ग्लेशियर अपना स्थान छोड़ने लगे तो कुछ उद्यमियों ने कृषि की ओर स्विच ओवेर कर लिया होगा , ऐसा मेरा मानना है . लेकिन इतिहास इस मामले में चुप है. पुराने दस्तावेज़ों में ऐसे कोई संकेत नहीं हैं. 1962 के चीनी अतिक्रमण के बाद छोटा मोटा स्थानीय लेन देन भी पूरी तरह से बंद हो गया, और घूमंतू जातियों की दशा बदतर हो गई .ऊपर से उन के चरागाहों को कुछ तो हम जैसे कृषक हड़पने लगे, कुछ सरकारी परियोजनाओं के हत्थे चढ़्ने लगे. कर्गिल प्रकरण के बाद तो सीमा पर तीनों तरफ से सड़्कों, पुलों हवाई अड्डों, सुरंगों के निर्माण की होड़ लग गई. इस प्रक्रिया में सब से ज़्यादा डिस्टर्ब हुआ है हिमलय का पशुपालक समुदाय . आप जानते हैं, विश्व भर में खाना बदोशों का जीवन सब से कठिन है. लेकिन इन्हें देख कर मुझे एक अजीब सी दिव्य ऊर्जा मिलती है. संघर्ष की प्रेरणा मिलती है. हमॆं ज़िन्दगी में एक बार भी घर छोड़ना पड़्ता है तो कितनी पीड़ा होती है? मानो हमारे जिस्म का कोई वाईटल अंग काट कर अलग किया जा रहा हो . और आसमान सिर पर उठा लेते हैं. हम इसे संसद मे मुद्दा बनाते हैं, अंतर्राषट्रीय प्लेट्फॉर्म तक ले जाते हैं . और कहाँ ये लोग हर पल एक नए विस्थापन का दर्द झेलते हैं, और तुरंत अगले विस्थापन के लिए तय्यार हो जाते हैं. जब जब इन की कोई टोली मेरी आँखों के सामने से गुज़रती है, तब तब इन प्रकृति पुरुषों के बीच अपनी जड़ों की खोज में खुद को भटकता पाता हूँ ... क्या इन में से कुछ हमारे पुरखे थे ? कोई नज़दीकी रिश्तेदार...? विकास के नाम पर क्या कुछ छीन लिया हम ने इन का ?

अपने बारे में क्या बताऊं? कविताएं लिखता हूं .हिमालय में रहता हूँ. कविता में हिमालय को डिस्कस करना चाहता हूँ. हिमालय की आध्यात्मिक और सैलानी रहस्य रोमाँच की छवि से इतर एक अन्दरूनी हिमालय जिसे मैं जानने का प्रयास करता हूँ. उस के फ्रेजाएल पर्यावरण को , संवेदन शील इकोसिस्टम को, उस की टिपिकल जिओपॉलिटिकल हालतॉं को , उस के संकट्ग्रस्त फ्लोरा और फॉना को, और इन सब के बीच जी रहे एक सुच्चे , भोले , निश्छल जन जीवन को , जो अभी बहुत कम प्रदूषित है, और आज भी विकसित विश्व की ओर आशा भरी नज़रों से देखना चाहता है! यहाँ अंतिम कविता में इसी तरह की चिंताएं हैं।

1984 से कविताएं लिखनी शुरू की थीं. जब कालेज से निकलने ही वाला था. चण्डीगढ़ में वे खालिस्तानी उग्रवाद के दिन थे. होस्टलों में आतंक के बीच रातें काटीं. सिख छात्र अपनी अल्मारियों में दर्जनों क़ृपाण और क़ट्टे भरे रखते थे. कुछ अंतरंग मित्रों को कॉमन रूम में सरे आम कत्ल होते देखा है......मै बौद्ध था , और धर्म का यह वाहियात रूप नहीं सह सकता था. ऐसे में कुमार विकल की कविताएं ताक़त देती थीं. एक दिन एक कविता पाठ में उन्हें झर झर आँसू बहाते देखा था...एक निरीह बच्चे की तरह . उस दिन तय किया था कि कविता लिखूँगा मैं भी. क्यों कि कविता में ही मानवता के बचे रहने की उम्मीद है.....फिर पंजाब विश्व विड्यालय के हिन्दी विभाग में प्रवेश लिया. कबीर को समझा, भक्ति काल को ले कर हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का डिस्कोर्स उन दिनों विभाग फिज़ाओं पर हावी था. और मेरे संस्कारों के मुआफिक बैठता था. पंजाबी साहित्य के छात्र भी हॉस्तल के मेरे ही ब्लॉक मे रहाते थे. उन की सोह्बत में पाश, शिव बटालवी, पातर जैसे कवियों को समझने का मौका मिला. कवि सत्यपाल सहगल से आधुनिक कविता पढ़ी. अज्ञेय और मुक्तिबोध की कविता ने बहुत गहराई से प्रभावित किया. एम. ए. से आगे नहीं पढ़ सका. पता नहीं कब मैं ख़ेमेबाज़ी का शिकार हो गया. विभाग की अन्दरूनी राजनीति से मुझे कोफ्त हो आती थी. अब जल्दी से अपने हिमालय की शरण में चले जाना चाह्ता था. बहुत भटकने के बाद 1995 में मेरा सपना पूरा हुआ . केलंग ( मेरे स्कूलिंग की जगह ) में राज्य सरकार के उद्योग विभाग में यह छोटी सी नौकरी मिल रही थी. आँखें बन्द कर के मैं ने ज्वाईनिंग दे दी. तब से हिमालय को जान रहा हूँ, समझ रहा हूँ. और कविताओं में उसे उतारने का प्रयास कर रहा हूँ. मैं मानता हूँ कि अभी भी यहाँ बहुत कुछ है, जिस का बचना मानवता के हित मैं लाज़िमी है. यह सब पता नहीं कब तक बचा रहेगा? लेकिन सब कुछ खत्म होने से पहले मैं बहुत कुछ सहेज लेना चाहता हूँ।
***
पहाड़ी खानाबदोशों का गीत

अलविदा ओ पतझड़ !
बाँध लिया है अपना डेरा-डफेरा
हाँक दिया है अपना रेवड़
हमने पथरीली फाटों पर
यह तुम्हारी आखिरी ठण्डी रात है
इसे जल्दी से बीत जाने दे
आज हम पहाड़ लाँघेंगे
उस पार की दुनिया देखेंगे !

विदा, ओ खामोश बूढ़े सराय !
तेरी केतलियाँ भरी हुई हैं
लबालब हमारे गीतों से.
हमारी जेबों में भरी हुई है
ठसाठस तेरी कविताएं
मिलकर समेट लें
भोर होने से पहले
अँधेरी रातों की तमाम यादें
आज हम पहाड़ लाँघॆंगे
उस पार की हलचल सुनेंगे !

विदा , ओ गबरू जवान कारिन्दो !
हमारी पिट्ठुओं में
ठूँस दिए हैं तुमने
अपनी संवेदनाओं के गीले रूमाल
सुलगा दिया है तुमने
हमारी छातियों में
अपनी अँगीठियों का दहकता जुनून
उमड़ने लगा है एक लाल बादल
आकाश के उस कोने में

आज हम पहाड़ लाँघेंगे
उस पार की हवाएं सूँघेंगे !

सोई रहो बरफ में
ओ, कमज़ोर नदियो
बीते मौसम घूँट घूँट पिया है
तुम्हें बदले में
कुछ भी नहीं दिया है
तैरती है हमारी देहों में
तुम्हारी ही नमी
तुम्हारी ही लहरें मचलती हैं
हमारे पाँवों में
सूरज उतर आया है आधी ढलान तक
आज हम पहाड़ लाँघेंगे
उस पार की धूप तापेंगे !

विदा, ओ अच्छी ब्यूँस की टहनियों
लहलहाते स्वप्न हैं
हमारी आँखों में
तुम्हारी हरियाली के
मज़बूत लाठियाँ हैं
हमारे हाथों में
तुम्हारे भरोसे की
तुम अपनी झरती पत्तियों के आँचल में
सहेज लेना चुपके से
थोड़ी सी मिट्टी और कुछ नायाब बीज

अगले बसंत में हम फिर लौटेंगे !
(कारगा, २० .२००६ .२००९)
***

पहाड़ के पीछे छिपा होगा इस का इतिहास
(रोहतांग पर शोधार्थियों के साथ पद यात्रा करते हुए)

मुझ से क्या पूछते हो
इस दर्रे की बीहड़ हवाएं बताएंगी तुम्हें
इस देश का इतिहास ।

इस टीले के पीछे ऐसे कई और टीले हैं
किसी पर उग आए हैं जंगल
कोई ओढ़ रहा घास - फूस
कहीं पर खण्डहर और कुछ यों ही पथरीले
तुम चले जाना उन टीलों के पीछे तक ।

चमकने लग जाएगी एक प्राचीन पगडण्डी
भटकती हुई कोई हिनहिनाहट आएगी
कहीं घाटी में से
घंटियों और घुंघरूओं की झनक
अभी कौंध उठेगी वह गुप्त बस्ती
धुंआती हुई अचानक
अनिन्द्य हिमकन्याएं जो सपनों में देखीं थीं
हैरतअंगेज़ कारनामे दन्त कथाओं वाले महानायक के

घूसर मुक्तिपथों पर भिक्खु लाल सुनहले
मणि-पù उच्चार रहे .......
ज़िन्दा हो जाएगा क्रमश:
पूरा का पूरा हिमालय तुम्हारा सोचा हुआ ।

लेकिन उस से पहले मेरे दोस्त
इस बेलौस ढलान पर लापरवाही से बिखरी
चट्टानों की ओट में खोज लेना
यहीं कहीं लेटा हुआ मिल सकता है
आलसी काले भालू सा
इस बैसाख की सुबह
धीरे से करवट बदलता इस देश का इतिहास।

उधर ऊंचाई पर खड़ी है जो टापरी
फरफराती प्रार्थना की पताकाएं रंग बिरंगी
गडरियों के साथ चिलम सांझा करते
किसी भी बूढ़े राहगीर से पूछ लेना तुम
वह क्या था
जिजीविषा या डर कोई अनकहा
हांकता रहा
जो उस के पुरखों को
पठारों और पहाड़ों के पार
जैसे मवेशियों के रेवड़ .....

मुझ से क्या पूछते हो
महसूस लो खुद ही छू कर
पत्थर की इन बुर्जियों में
चिन चिन कर छोड़ गए हैं इस देश के सरदार
कितनी वाहियात और खराब यादें
उन तमाम हादिसों के ब्यौरे
जिन के ज़ख्म ले कर लोग यहां पहुंचे
क्या कुछ खोते और खर्च कर डालते हुए
यहां दर्ज है एक एक तफसील
पूरा लेखा जोखा मुश्किल वक्तों का ।

उस गडरिए की बांसुरी की घुन में
छिपी हैं बेशुमार गाथाएं
तुम सुनते रहना
उन बेतरतीब यादों में से
चुनते रहना
अपना मन मुआफिक साक्ष्य
लेकिन टहल लेना उस से पहले मेरे विद्वान दोस्त
इस नाले के पार वाली रीढ़ियों पर
सुनना कान लगा कर
गूँजता मिल जाएगा
चंचल ककशोटियों और मासूम चकोरों की
प्रणय ध्वनियों सा
इस देश का इतिहास.............

मुझ से क्या पूछते हो
मैं तो बस यहां तक आया हूँ
बिलकुल तुम्हारी तरह ।
1991
***

रातों रात चलने वाले

यहाँ तक आये थे रातों रात चलने वाले यहाँ रुक कर आग जलाई उन्होंने
ठिठुरती हवा में
इस पड़ाव पर पानी ढोया गाड़े तम्बुओं के खूँटे

चूल्हे के पत्थर अब तक दीखतें हैं काले और लकड़ियाँ अधगीली कितना जलीं रात भर
कितना वक़्त था उनके पास तापने और सुस्ताने के लिए सपनों की जगह
काँपती रहीं थी आँखों में
बेहद खराब यात्राएं आने वाले कल की.....
समय की तरह
सब से आगे दौड़ गया था उनका सुकून
कितनी गुनगुनी थी पलभर की नींद
भयावह अंधड़ों की आशंका के बीच
बिखर गये थे जो पेचीदा सुराग
खोज रहे हम तन्मय पद्चिन्ह और अनाज के छिलके
और फलों की गुठलियाँ
और जो विसर्जित किए थे मल उनके पशुओं ने
जाँच रहे मूत्र में रसायन
जहाँ गहरा हो गया है मिट्टी का रंग ज़रा........
रातों रात चलने वाले नहीं रुकते
कहीं भी कुछ लिख छोड़ने की नीयत से
तो भी क्या कुछ पढ़ने की कोशिश करते
हर पड़ाव पर
हम जैसे कितने ही सिरफिरे !
(छितकुल , जुलाई 2006)
***
एक बुद्ध कविता में करुणा ढूँढ रहा है

धुर हिमालय में यह एक भीषण जनवरी है
आधी रात से आगे का कोई वक़्त है आधा घुसा हुआ बैठा हूँ
चादर और कम्बल और् रज़ाई में सर पर कनटोप और दस्ताने हाथ में
एक नंगा कंप्यूटर हैंग हो गया है जब कि एक बुद्ध कविता में करुणा ढूँढ रहा है .

तमाम कविताएं पहुँच रहीं हैं मुझ तक हवा में कविता कोरवा की पहाड़ियों से
कविता चम्बल की घाटियों से
भीम बैठका की गुफा से कविता स्वात और दज़ला से
कविता कर्गिल और पुलवामा से
मरयुल , जङ-थङ , अमदो और खम से
कविता उन सभी देशों से
जहाँ मैं जा नहीं पाया
जबकि मेरे अपने ही देश थे वे.

कविताओं के उस पार एशिया की धूसर पीठ है
कविताओं के इस पार एक हरा भरा गोण्ड्वाना है
कविताओं के टीथिस मे ज़बर्दस्त खलबली है
कविताओं की थार पर खेजड़ी की पत्तियाँ हैं
कविताओं की फाट पर ब्यूँस की टहनियाँ हैं
कविताओं के खड्ड में बल्ह के लबाणे हैं
कविताओं की धूल में दुमका की खदाने हैं

कविता का कलरव भरतपुर के घना में
कविता का अवसाद पातालकोट की खोह में
कविता का इश्क़ चिनाब के पत्तनों में
कविता की भूख विदर्भ के किसानों में
कविता की तराई में जारी है लड़ाई पानी पानी चिल्ला रही है वैशाली

विचलित रहती है कुशीनारा रात भर सूख गया है हज़ारों इच्छिरावतियों का जल
जब कि कविता है सरसराती आम्रपालि
मेरा चेहरा डूब जाना चाहता है उस की संदल- माँसल गोद में
कि हार कर स्खलित हो चुके हैं
मेरी आत्मा की प्रथम पंक्ति पर तैनात सभी लिच्छवि लड़ाके
जब कि एक बुद्ध कविता में करुणा ढूँढ रहा है.

सहसा ही
एक ढहता हुआ बुद्ध हूँ मैं अधलेटा हिमालय के आर पार फैल गया एक भगवा चीवर
आधा कंबल में आधा कंबल के बाहर
सो रही है मेरी देह कंचनजंघा से हिन्दुकुश तक
पामीर का तकिया बनाया है मेरा एक हाथ गंगा की खादर में कुछ टटोल रहा है
दूसरे से नेपाल के घाव सहला रहा हूँ
और मेरा छोटा सा दिल ज़ोर से धड़कता है
हिमालय के बीचों बीच.

सिल्क रूट पर मेराथन दौड़ रहीं हैं कविताएं गोबी में पोलो खेल रहा है गेसर खान
क़ज़्ज़ाकों और हूणों की कविता में लूट लिए गए हैं
ज़िन्दादिल खुश मिजाज़ जिप्सी
यारकन्द के भोले भाले घोड़े
क्या लाद लिए जा रहे हैं बिला- उज़्र अपनी पीठ पर
दोआबा और अम्बरसर की मण्डियों में
न यह संगतराश बाल्तियों का माल- असबाब
न ही फॉरबिडन सिटी का रेशम
और न ही जङ्पा घूमंतुओं का
मक्खन, ऊन और नमक है
जब कि पिछले एक दशक से
या हो सकता है उस से भी बहुत पहले से
कविता में असंख्य सुरंगें बन रही है!

खैबर के उस पार से
बामियान की ताज़ा रेत आ रही है कविता में
मेरी आँखों को चुभ रही है
करआ-कोरम के नुकीले खंजर
मेरी पसलियों में खुभ रहे हैं
कविता में है दहाड़ रहा है टोरा बोरा
एक मासूम फिदायीन चेहरा
जो दिल्ली के संसद भवन तक पहुँच गया है
कविता का सिर उड़ा दिया गया है
फिर भी ज़िन्दा है कविता
सियाचिन के बंकर में बैठे
एक सिपाही की आँखें भिगो रहा है
कविता में एक धर्म है नफरत का
कविता में क़ाबुल और काश्मीर के बाद
तुरत जो नाम आता, वह है तिब्बत का
कविता के पठारों से गायब है शङरीला
कविता के कोहरे से झाँक रहा शंभाला
कविता के रहस्य को मिल गया शांति का नोबेल पुरस्कार
जब कि एक बुद्ध कविता में करुणा ढूँढ रहा है.

अरे , नहीं मालूम था मुझे
हवा से पैदा होतीं हैं कविताएं
क़तई मालूम नहीं था

कि हवा जो सदियों पहले लन्दन के सभागारों और
मेनचेस्टर के कारखानों से चलनी शुरू हुई थी
आज पॆंटागन और ट्विन –टॉवर्ज़ से होते हुए
बीजिंग के तह्खानों में जमा हो गई है
कि हवा जो अपने सूरज को अस्त नही देखना चाहती आज मेरे गाँव की छोटी छोटी खिड़कियो को हड़का रही है

हवा के सामने कविता की क्या बिसात ?
हवा चाहे तो कविता में आग भर दे
हवा चाहे तो कविता को राख कर दे
हवा के पास ढेर सारे डॉलर हैं
आज हवा ने कविता को खरीद लिया है
जब कि एक बुद्ध कविता में करुणा ढूँढ रहा है .

दूर गाज़ा पट्टी से आती है जब
एक भारी भरकम अरब कविता
कम्प्यूटर के आभासी पृष्ट पर
तैर जाती हैं सहारा की मरीचिकाएं
शैं- शैं करता
मनीकरण का खौलता चश्मा बन जाता है उस का सी पी यू
कि भीतर मदरबोर्ड पर लेट रही है
एक खूबसूरत अधनंगी यहूदी कविता
पीली जटाओं वाली
कविता की नींद में भूगर्भ की तपिश
कविता के व्यामोह में मलाणा की क्रीम
कविता के कुण्ड में देशी माश की पोटलियाँ कविता की पठाल पे कोदरे की मोटी नमकीन रोटियाँ
आह!
कविता की गंध में यह कैसा अपनापा
कविता का यह तीर्थ कितना गुनगुना ....
जबकि धुर हिमालय में
यह एक ठण्डा और बेरहम सरकारी क्वार्टर है
कि जिसका सीमॆंट चटक गया है कविता के तनाव से
जो मेरी भृकुटियों पर बरफ की सिल्ली सी खिंची हुई है
जब कि एक माँ की बगल में एक बच्चा सो रहा है
और एक बुद्ध कविता में करुणा ढूँढ रहा है.
***

10 comments:

  1. जुझारू अजेय और उनकी जुझारू कविता से परिचय कराने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया। बहुत दिनों बाद अनगढ़ कविता जो अंतस तक उतर जाती है पढ़ने को मिली। http://utsahi.blogspot.com

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  2. antim kavita ko in dino baar baar padha hai.
    yah ajey kee kavita par gambheer baat shuru karne ke liye uksatee hui post hai,bahut umda kaam kiya hai pyare.

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  3. अजेय की ये कविताएँ जब पहले ‘अकार’ में पढ़ीं, तो मुझे लगा कि मैं खुद कैलोंग में बैठकर उनके एक-एक शब्द महसूस कर रहा हूँ। ‘अकार’ में उनका पता कैलोंग (हि.प्र.) के स्थान पर कैलोंग (जम्मू एवं कश्मीर) छप गया है। उनकी इन कविताओं को मैं अपने नवोदित ब्लाॅग पर अपनी लद्दाख यात्रा के कुछ चित्रों सहित पोस्ट करने की सोच ही रहा था कि आपके ब्लाॅग पर इन्हें पढ़ा। भाई शिरीश को इस सुन्दर पोस्ट के लिए बधाई।

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  4. आप सब कुछ ख़त्म होने से पहले जरूर सहेज लेंगे अजेय जी ! आपकी कविताएँ सुकून हैं ज़िंदगी के लिए ,जहाँ बुध्ध खुद करुणा ढूंढ रहा हो वहाँ क्या कहने !

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  5. Ajay ji ki chintayen ek samvedansheel kavi ka pata de rahi hain. Badhai aur Shubhkamnayen.

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  6. क्या कहूं? शिरीष ने जो टैग लगाया है 'श्रेष्ठ हिन्दी कविता' उसके आगे यहां कुछ लिख पाना मुश्किल है…

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  7. अजेय जी की कविताओं का कुछ अरसे से पाठक और प्रशंसक हूँ.हिमालय के प्रति गहरी आसक्ति जगाते हैं.आभार आपका और कवि दोनों का.

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  8. शिरीष सहित आप सभी का धन्यवाद. कविता में कुछ और गहरे उतरने की प्रेरणा मिली है.

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  9. अजेय भाई। बहुत अच्‍छी कविताएं। आभार शिरीष भाई का भी।

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यहां तक आए हैं तो कृपया इस पृष्ठ पर अपनी राय से अवश्‍य अवगत करायें !

जो जी को लगती हो कहें, बस भाषा के न्‍यूनतम आदर्श का ख़याल रखें। अनुनाद की बेहतरी के लिए सुझाव भी दें और कुछ ग़लत लग रहा हो तो टिप्‍पणी के स्‍थान को शिकायत-पेटिका के रूप में इस्‍तेमाल करने से कभी न हिचकें। हमने टिप्‍पणी के लिए सभी विकल्‍प खुले रखे हैं, कोई एकाउंट न होने की स्थिति में अनाम में नीचे अपना नाम और स्‍थान अवश्‍य अंकित कर दें।

आपकी प्रतिक्रियाएं हमेशा ही अनुनाद को प्रेरित करती हैं, हम उनके लिए आभारी रहेगे।

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