Monday, May 31, 2010

संजय व्यास की कविता - दूसरी किस्त

घर गृहस्थी में धंसता पुराना प्रेम पत्र
(एक काव्यकथा)
" श्री गोपीवल्लभ विजयते"

बम्बोई
(तिथि अस्पष्ट)
प्यारी सुगना,
मधुर याद.

श्री कृष्ण कृपा से मैं यहाँ ठीक हूँ और तुम भी घर पर प्रभु कृपा से सानंद होंगी.मेरा मन तो बहुत कर रहा है कि पत्र के स्थान पर स्वयं उपस्थित हो जाऊं पर एक सेठ का मुनीम होना कितना ज़िम्मेदारी का काम है ये मैं पिछले देस-प्रवास में तुम्हे बता चुका हूँ. काम गाँव भर का और पगार धेला. वहीं सेठ के पास काम धेले का नहीं और माया अपार. वैसे अन्दर की बात ये है कि इस सेठ की नाव डूब रही है. मैं ये बात सेठजी को बता भी चुका हूँ पर लगता है मामला अब उनके बस का नहीं. देनदारियाँ भारी पड़ रही है.

ये मैं क्या बातें ले बैठा,पर बताना भी ज़रूरी है आखिर मुझे भी नई नौकरी तलाश करनी पड़ सकती है.कभी कभी सोचता हूँ सब छोड़ छाड़ के देस आ जाऊं.

यहाँ तो मैं लाल जिल्द वाली बही के पीले पन्नों में भी तुम्हारी छवि ही देखता हूँ,भगवान् झूठ न बुलवाए. पर दो ननदों, देवर शिवानन्द, सास,ससुर के साथ नैनू बेटे के भरे पूरे घर में रहते तुम्हे क्यों भला मेरी याद आएगी?
नैनू पहाडे सीख रहा होगा. पिताजी उसे डेढे और ढाईये भी अच्छे से याद करवा रहे होंगे. एक कामयाब मुनीम के लिए ये बहुत ज़रूरी है. मैंने भी बचपन में ये सब सीखा था.

इस बार यहाँ मेह इतना बरसा कि कांकरिया सेठ की पेढी डूबने के नौबत आ गयी थी पर वहां देस में छींटे-छिड्पर भी कहाँ!आदमी तो जैसे तैसे गुज़ारा कर ले पर गउओं का क्या होगा? भगवान् भलीस करेंगे.

पिताजी के मस्से ने उन्हें खूब परेशान कर रखा है. यहाँ एक आयुर्वेदिक दवा जानकारी में आई है, समय रहते भेज दूंगा. मां का स्वभाव थोडा तेज़ है पर तुम जानती हो वो शिवानन्द की चिंता में आधी हुई जाती है.मैं स्वयं शिवानन्द को लेकर बहुत आशंकित हूँ. भगवान् भलीस करेंगे, अगर वो पिताजी से विवाह-संस्कार विधि ही सीख लेता तो कोई संस्कारी परिवार अपनी कन्या देने आगे आ सकता था. आगे मर्ज़ी साँवलिए की.

बहनों की ज़्यादा चिंता फिकर नहीं है. गाय दुहना सीख गयी हैं,पापड बनाना भी सीख जायेंगी. तुम स्वयं इस विद्या में पारंगत होकर आई हो सो तुम्हारा ज्ञान उन्हें यहाँ उपलब्ध हो सकेगा.

और यहाँ सब ठीक है वहां मोहल्ले में भी सब बढ़िया ही चल रहा होगा.प्रभुलाल की औरतों के बीच पंचायती की आदत गयी नहीं होगी.क्या आदमी है! दिन रात औरतों के बीच. अब बुद्धि कहाँ से आएगी, बारह ही नहीं आई तो बत्तीस क्या आएगी.राह चलते औरतें भी दूसरी के बारे में उसी से पूछती है. महिलाओं का मुखबिर. और... वो दामोदर, वो आज भी लोगों के घरों में तांका झांकी करता होगा. सुबह हुई नहीं और घर की छत से लोगों के आँगन में झाँकने लग जाएगा. कुछ कहो तो झगडे पर उतारू. अब उससे कौन झगडा और निवेडा करे.खैर इन लोगों के बारे में बात न ही की जाय तो अच्छा. मंदिर में अपने घर की ओर से मनोरथ करवाया होगा इन दिनों. पुजारी वैसे तो कंजूस है प्रसाद देने में पर उसका तो क्या किया जा सकता है?उसको खाने दो.

और घर में काम ठीक ही चल रहा होगा अभी यहाँ भी पगार तीन महीनों की बाकी है.गोरकी गाय दूध ठीक दे रही होगी.मां की तरह उसका भी स्वभाव तेज़ है पर है तो गऊमाता ही.

चलो बहुत बातें हो गयी अब चिट्ठी यहीं समाप्त करता हूँ.और हाँ वो चित्रित किताब तुम्हारी शादी के वेश वाले बक्से में ही है न? किसी के हाथ न लग जाय. यहाँ बम्बोई में चारों तरफ पानी है देखता हूँ तुम्हे दिखा पाता हूँ कि नहीं.

सबको यथाजोग.

तुम्हारा
दीपचन्द
कविता के साथ लगा चित्र यहाँ से साभा

अनुनाद पर संजय व्यास यहाँ भी ...
***

Thursday, May 27, 2010

अजेय की कविताएँ / हिमालय की कविताएँ : एक लम्बी पोस्ट

आत्मकथ्य
इन कविताओं में हिमालय का घूमंतू जीवन है. हिमालय के भीतर और ट्रांस हिमालय के आदिम समुदायों में दो तरह की जीवन धाराएं हैं एक जो सेटेल्ड है, और दूसरा जो पशुपालक है और अभी तक ख़ानाबदोशों का जीवन जी रहा है. मैं उस सेटेल्ड समुदाय से आता हूँ जिस के पास अपनी क़ृषि योग्य भूमि है. पक्के मकान हैं और पिछली पीढी से सरकारी नौकरियों में भी लोग जा रहे हैं. हमारे बुज़ुर्गों को याद नहीं है कि उन्हें यह सेटेल्ड जीवन जीते हुए कितना अर्सा हो चुका है. लेकिन तय है कि बहुत अर्सा नहीं हुआ. क्यों कि तीन पीढ़ी पूर्व हम में से अधिकतर परिवारों के पास माल मवेशियों के बड़े बड़े रेवड़ होते थे. यारकन्द ,खोटान, रुदोक (उत्तरी तिब्बत ) के जो दर्रे सिल्क रूट की तरफ खुलते थे उधर से भारतीय मेन लेण्ड की तरफ बड़े पैमाने पर व्यापार चलता था. शायद हमारे पूर्वज इसी व्यापार के ट्रांसपोर्टर थे.. नई विश्व व्यवस्था में जब सिल्क रूट की अहमियत खत्म हुई और बदलते मौसम में हिमालय के विशाल ग्लेशियर अपना स्थान छोड़ने लगे तो कुछ उद्यमियों ने कृषि की ओर स्विच ओवेर कर लिया होगा , ऐसा मेरा मानना है . लेकिन इतिहास इस मामले में चुप है. पुराने दस्तावेज़ों में ऐसे कोई संकेत नहीं हैं. 1962 के चीनी अतिक्रमण के बाद छोटा मोटा स्थानीय लेन देन भी पूरी तरह से बंद हो गया, और घूमंतू जातियों की दशा बदतर हो गई .ऊपर से उन के चरागाहों को कुछ तो हम जैसे कृषक हड़पने लगे, कुछ सरकारी परियोजनाओं के हत्थे चढ़्ने लगे. कर्गिल प्रकरण के बाद तो सीमा पर तीनों तरफ से सड़्कों, पुलों हवाई अड्डों, सुरंगों के निर्माण की होड़ लग गई. इस प्रक्रिया में सब से ज़्यादा डिस्टर्ब हुआ है हिमलय का पशुपालक समुदाय . आप जानते हैं, विश्व भर में खाना बदोशों का जीवन सब से कठिन है. लेकिन इन्हें देख कर मुझे एक अजीब सी दिव्य ऊर्जा मिलती है. संघर्ष की प्रेरणा मिलती है. हमॆं ज़िन्दगी में एक बार भी घर छोड़ना पड़्ता है तो कितनी पीड़ा होती है? मानो हमारे जिस्म का कोई वाईटल अंग काट कर अलग किया जा रहा हो . और आसमान सिर पर उठा लेते हैं. हम इसे संसद मे मुद्दा बनाते हैं, अंतर्राषट्रीय प्लेट्फॉर्म तक ले जाते हैं . और कहाँ ये लोग हर पल एक नए विस्थापन का दर्द झेलते हैं, और तुरंत अगले विस्थापन के लिए तय्यार हो जाते हैं. जब जब इन की कोई टोली मेरी आँखों के सामने से गुज़रती है, तब तब इन प्रकृति पुरुषों के बीच अपनी जड़ों की खोज में खुद को भटकता पाता हूँ ... क्या इन में से कुछ हमारे पुरखे थे ? कोई नज़दीकी रिश्तेदार...? विकास के नाम पर क्या कुछ छीन लिया हम ने इन का ?

अपने बारे में क्या बताऊं? कविताएं लिखता हूं .हिमालय में रहता हूँ. कविता में हिमालय को डिस्कस करना चाहता हूँ. हिमालय की आध्यात्मिक और सैलानी रहस्य रोमाँच की छवि से इतर एक अन्दरूनी हिमालय जिसे मैं जानने का प्रयास करता हूँ. उस के फ्रेजाएल पर्यावरण को , संवेदन शील इकोसिस्टम को, उस की टिपिकल जिओपॉलिटिकल हालतॉं को , उस के संकट्ग्रस्त फ्लोरा और फॉना को, और इन सब के बीच जी रहे एक सुच्चे , भोले , निश्छल जन जीवन को , जो अभी बहुत कम प्रदूषित है, और आज भी विकसित विश्व की ओर आशा भरी नज़रों से देखना चाहता है! यहाँ अंतिम कविता में इसी तरह की चिंताएं हैं।

1984 से कविताएं लिखनी शुरू की थीं. जब कालेज से निकलने ही वाला था. चण्डीगढ़ में वे खालिस्तानी उग्रवाद के दिन थे. होस्टलों में आतंक के बीच रातें काटीं. सिख छात्र अपनी अल्मारियों में दर्जनों क़ृपाण और क़ट्टे भरे रखते थे. कुछ अंतरंग मित्रों को कॉमन रूम में सरे आम कत्ल होते देखा है......मै बौद्ध था , और धर्म का यह वाहियात रूप नहीं सह सकता था. ऐसे में कुमार विकल की कविताएं ताक़त देती थीं. एक दिन एक कविता पाठ में उन्हें झर झर आँसू बहाते देखा था...एक निरीह बच्चे की तरह . उस दिन तय किया था कि कविता लिखूँगा मैं भी. क्यों कि कविता में ही मानवता के बचे रहने की उम्मीद है.....फिर पंजाब विश्व विड्यालय के हिन्दी विभाग में प्रवेश लिया. कबीर को समझा, भक्ति काल को ले कर हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का डिस्कोर्स उन दिनों विभाग फिज़ाओं पर हावी था. और मेरे संस्कारों के मुआफिक बैठता था. पंजाबी साहित्य के छात्र भी हॉस्तल के मेरे ही ब्लॉक मे रहाते थे. उन की सोह्बत में पाश, शिव बटालवी, पातर जैसे कवियों को समझने का मौका मिला. कवि सत्यपाल सहगल से आधुनिक कविता पढ़ी. अज्ञेय और मुक्तिबोध की कविता ने बहुत गहराई से प्रभावित किया. एम. ए. से आगे नहीं पढ़ सका. पता नहीं कब मैं ख़ेमेबाज़ी का शिकार हो गया. विभाग की अन्दरूनी राजनीति से मुझे कोफ्त हो आती थी. अब जल्दी से अपने हिमालय की शरण में चले जाना चाह्ता था. बहुत भटकने के बाद 1995 में मेरा सपना पूरा हुआ . केलंग ( मेरे स्कूलिंग की जगह ) में राज्य सरकार के उद्योग विभाग में यह छोटी सी नौकरी मिल रही थी. आँखें बन्द कर के मैं ने ज्वाईनिंग दे दी. तब से हिमालय को जान रहा हूँ, समझ रहा हूँ. और कविताओं में उसे उतारने का प्रयास कर रहा हूँ. मैं मानता हूँ कि अभी भी यहाँ बहुत कुछ है, जिस का बचना मानवता के हित मैं लाज़िमी है. यह सब पता नहीं कब तक बचा रहेगा? लेकिन सब कुछ खत्म होने से पहले मैं बहुत कुछ सहेज लेना चाहता हूँ।
***
पहाड़ी खानाबदोशों का गीत

अलविदा ओ पतझड़ !
बाँध लिया है अपना डेरा-डफेरा
हाँक दिया है अपना रेवड़
हमने पथरीली फाटों पर
यह तुम्हारी आखिरी ठण्डी रात है
इसे जल्दी से बीत जाने दे
आज हम पहाड़ लाँघेंगे
उस पार की दुनिया देखेंगे !

विदा, ओ खामोश बूढ़े सराय !
तेरी केतलियाँ भरी हुई हैं
लबालब हमारे गीतों से.
हमारी जेबों में भरी हुई है
ठसाठस तेरी कविताएं
मिलकर समेट लें
भोर होने से पहले
अँधेरी रातों की तमाम यादें
आज हम पहाड़ लाँघॆंगे
उस पार की हलचल सुनेंगे !

विदा , ओ गबरू जवान कारिन्दो !
हमारी पिट्ठुओं में
ठूँस दिए हैं तुमने
अपनी संवेदनाओं के गीले रूमाल
सुलगा दिया है तुमने
हमारी छातियों में
अपनी अँगीठियों का दहकता जुनून
उमड़ने लगा है एक लाल बादल
आकाश के उस कोने में

आज हम पहाड़ लाँघेंगे
उस पार की हवाएं सूँघेंगे !

सोई रहो बरफ में
ओ, कमज़ोर नदियो
बीते मौसम घूँट घूँट पिया है
तुम्हें बदले में
कुछ भी नहीं दिया है
तैरती है हमारी देहों में
तुम्हारी ही नमी
तुम्हारी ही लहरें मचलती हैं
हमारे पाँवों में
सूरज उतर आया है आधी ढलान तक
आज हम पहाड़ लाँघेंगे
उस पार की धूप तापेंगे !

विदा, ओ अच्छी ब्यूँस की टहनियों
लहलहाते स्वप्न हैं
हमारी आँखों में
तुम्हारी हरियाली के
मज़बूत लाठियाँ हैं
हमारे हाथों में
तुम्हारे भरोसे की
तुम अपनी झरती पत्तियों के आँचल में
सहेज लेना चुपके से
थोड़ी सी मिट्टी और कुछ नायाब बीज

अगले बसंत में हम फिर लौटेंगे !
(कारगा, २० .२००६ .२००९)
***

पहाड़ के पीछे छिपा होगा इस का इतिहास
(रोहतांग पर शोधार्थियों के साथ पद यात्रा करते हुए)

मुझ से क्या पूछते हो
इस दर्रे की बीहड़ हवाएं बताएंगी तुम्हें
इस देश का इतिहास ।

इस टीले के पीछे ऐसे कई और टीले हैं
किसी पर उग आए हैं जंगल
कोई ओढ़ रहा घास - फूस
कहीं पर खण्डहर और कुछ यों ही पथरीले
तुम चले जाना उन टीलों के पीछे तक ।

चमकने लग जाएगी एक प्राचीन पगडण्डी
भटकती हुई कोई हिनहिनाहट आएगी
कहीं घाटी में से
घंटियों और घुंघरूओं की झनक
अभी कौंध उठेगी वह गुप्त बस्ती
धुंआती हुई अचानक
अनिन्द्य हिमकन्याएं जो सपनों में देखीं थीं
हैरतअंगेज़ कारनामे दन्त कथाओं वाले महानायक के

घूसर मुक्तिपथों पर भिक्खु लाल सुनहले
मणि-पù उच्चार रहे .......
ज़िन्दा हो जाएगा क्रमश:
पूरा का पूरा हिमालय तुम्हारा सोचा हुआ ।

लेकिन उस से पहले मेरे दोस्त
इस बेलौस ढलान पर लापरवाही से बिखरी
चट्टानों की ओट में खोज लेना
यहीं कहीं लेटा हुआ मिल सकता है
आलसी काले भालू सा
इस बैसाख की सुबह
धीरे से करवट बदलता इस देश का इतिहास।

उधर ऊंचाई पर खड़ी है जो टापरी
फरफराती प्रार्थना की पताकाएं रंग बिरंगी
गडरियों के साथ चिलम सांझा करते
किसी भी बूढ़े राहगीर से पूछ लेना तुम
वह क्या था
जिजीविषा या डर कोई अनकहा
हांकता रहा
जो उस के पुरखों को
पठारों और पहाड़ों के पार
जैसे मवेशियों के रेवड़ .....

मुझ से क्या पूछते हो
महसूस लो खुद ही छू कर
पत्थर की इन बुर्जियों में
चिन चिन कर छोड़ गए हैं इस देश के सरदार
कितनी वाहियात और खराब यादें
उन तमाम हादिसों के ब्यौरे
जिन के ज़ख्म ले कर लोग यहां पहुंचे
क्या कुछ खोते और खर्च कर डालते हुए
यहां दर्ज है एक एक तफसील
पूरा लेखा जोखा मुश्किल वक्तों का ।

उस गडरिए की बांसुरी की घुन में
छिपी हैं बेशुमार गाथाएं
तुम सुनते रहना
उन बेतरतीब यादों में से
चुनते रहना
अपना मन मुआफिक साक्ष्य
लेकिन टहल लेना उस से पहले मेरे विद्वान दोस्त
इस नाले के पार वाली रीढ़ियों पर
सुनना कान लगा कर
गूँजता मिल जाएगा
चंचल ककशोटियों और मासूम चकोरों की
प्रणय ध्वनियों सा
इस देश का इतिहास.............

मुझ से क्या पूछते हो
मैं तो बस यहां तक आया हूँ
बिलकुल तुम्हारी तरह ।
1991
***

रातों रात चलने वाले

यहाँ तक आये थे रातों रात चलने वाले यहाँ रुक कर आग जलाई उन्होंने
ठिठुरती हवा में
इस पड़ाव पर पानी ढोया गाड़े तम्बुओं के खूँटे

चूल्हे के पत्थर अब तक दीखतें हैं काले और लकड़ियाँ अधगीली कितना जलीं रात भर
कितना वक़्त था उनके पास तापने और सुस्ताने के लिए सपनों की जगह
काँपती रहीं थी आँखों में
बेहद खराब यात्राएं आने वाले कल की.....
समय की तरह
सब से आगे दौड़ गया था उनका सुकून
कितनी गुनगुनी थी पलभर की नींद
भयावह अंधड़ों की आशंका के बीच
बिखर गये थे जो पेचीदा सुराग
खोज रहे हम तन्मय पद्चिन्ह और अनाज के छिलके
और फलों की गुठलियाँ
और जो विसर्जित किए थे मल उनके पशुओं ने
जाँच रहे मूत्र में रसायन
जहाँ गहरा हो गया है मिट्टी का रंग ज़रा........
रातों रात चलने वाले नहीं रुकते
कहीं भी कुछ लिख छोड़ने की नीयत से
तो भी क्या कुछ पढ़ने की कोशिश करते
हर पड़ाव पर
हम जैसे कितने ही सिरफिरे !
(छितकुल , जुलाई 2006)
***
एक बुद्ध कविता में करुणा ढूँढ रहा है

धुर हिमालय में यह एक भीषण जनवरी है
आधी रात से आगे का कोई वक़्त है आधा घुसा हुआ बैठा हूँ
चादर और कम्बल और् रज़ाई में सर पर कनटोप और दस्ताने हाथ में
एक नंगा कंप्यूटर हैंग हो गया है जब कि एक बुद्ध कविता में करुणा ढूँढ रहा है .

तमाम कविताएं पहुँच रहीं हैं मुझ तक हवा में कविता कोरवा की पहाड़ियों से
कविता चम्बल की घाटियों से
भीम बैठका की गुफा से कविता स्वात और दज़ला से
कविता कर्गिल और पुलवामा से
मरयुल , जङ-थङ , अमदो और खम से
कविता उन सभी देशों से
जहाँ मैं जा नहीं पाया
जबकि मेरे अपने ही देश थे वे.

कविताओं के उस पार एशिया की धूसर पीठ है
कविताओं के इस पार एक हरा भरा गोण्ड्वाना है
कविताओं के टीथिस मे ज़बर्दस्त खलबली है
कविताओं की थार पर खेजड़ी की पत्तियाँ हैं
कविताओं की फाट पर ब्यूँस की टहनियाँ हैं
कविताओं के खड्ड में बल्ह के लबाणे हैं
कविताओं की धूल में दुमका की खदाने हैं

कविता का कलरव भरतपुर के घना में
कविता का अवसाद पातालकोट की खोह में
कविता का इश्क़ चिनाब के पत्तनों में
कविता की भूख विदर्भ के किसानों में
कविता की तराई में जारी है लड़ाई पानी पानी चिल्ला रही है वैशाली

विचलित रहती है कुशीनारा रात भर सूख गया है हज़ारों इच्छिरावतियों का जल
जब कि कविता है सरसराती आम्रपालि
मेरा चेहरा डूब जाना चाहता है उस की संदल- माँसल गोद में
कि हार कर स्खलित हो चुके हैं
मेरी आत्मा की प्रथम पंक्ति पर तैनात सभी लिच्छवि लड़ाके
जब कि एक बुद्ध कविता में करुणा ढूँढ रहा है.

सहसा ही
एक ढहता हुआ बुद्ध हूँ मैं अधलेटा हिमालय के आर पार फैल गया एक भगवा चीवर
आधा कंबल में आधा कंबल के बाहर
सो रही है मेरी देह कंचनजंघा से हिन्दुकुश तक
पामीर का तकिया बनाया है मेरा एक हाथ गंगा की खादर में कुछ टटोल रहा है
दूसरे से नेपाल के घाव सहला रहा हूँ
और मेरा छोटा सा दिल ज़ोर से धड़कता है
हिमालय के बीचों बीच.

सिल्क रूट पर मेराथन दौड़ रहीं हैं कविताएं गोबी में पोलो खेल रहा है गेसर खान
क़ज़्ज़ाकों और हूणों की कविता में लूट लिए गए हैं
ज़िन्दादिल खुश मिजाज़ जिप्सी
यारकन्द के भोले भाले घोड़े
क्या लाद लिए जा रहे हैं बिला- उज़्र अपनी पीठ पर
दोआबा और अम्बरसर की मण्डियों में
न यह संगतराश बाल्तियों का माल- असबाब
न ही फॉरबिडन सिटी का रेशम
और न ही जङ्पा घूमंतुओं का
मक्खन, ऊन और नमक है
जब कि पिछले एक दशक से
या हो सकता है उस से भी बहुत पहले से
कविता में असंख्य सुरंगें बन रही है!

खैबर के उस पार से
बामियान की ताज़ा रेत आ रही है कविता में
मेरी आँखों को चुभ रही है
करआ-कोरम के नुकीले खंजर
मेरी पसलियों में खुभ रहे हैं
कविता में है दहाड़ रहा है टोरा बोरा
एक मासूम फिदायीन चेहरा
जो दिल्ली के संसद भवन तक पहुँच गया है
कविता का सिर उड़ा दिया गया है
फिर भी ज़िन्दा है कविता
सियाचिन के बंकर में बैठे
एक सिपाही की आँखें भिगो रहा है
कविता में एक धर्म है नफरत का
कविता में क़ाबुल और काश्मीर के बाद
तुरत जो नाम आता, वह है तिब्बत का
कविता के पठारों से गायब है शङरीला
कविता के कोहरे से झाँक रहा शंभाला
कविता के रहस्य को मिल गया शांति का नोबेल पुरस्कार
जब कि एक बुद्ध कविता में करुणा ढूँढ रहा है.

अरे , नहीं मालूम था मुझे
हवा से पैदा होतीं हैं कविताएं
क़तई मालूम नहीं था

कि हवा जो सदियों पहले लन्दन के सभागारों और
मेनचेस्टर के कारखानों से चलनी शुरू हुई थी
आज पॆंटागन और ट्विन –टॉवर्ज़ से होते हुए
बीजिंग के तह्खानों में जमा हो गई है
कि हवा जो अपने सूरज को अस्त नही देखना चाहती आज मेरे गाँव की छोटी छोटी खिड़कियो को हड़का रही है

हवा के सामने कविता की क्या बिसात ?
हवा चाहे तो कविता में आग भर दे
हवा चाहे तो कविता को राख कर दे
हवा के पास ढेर सारे डॉलर हैं
आज हवा ने कविता को खरीद लिया है
जब कि एक बुद्ध कविता में करुणा ढूँढ रहा है .

दूर गाज़ा पट्टी से आती है जब
एक भारी भरकम अरब कविता
कम्प्यूटर के आभासी पृष्ट पर
तैर जाती हैं सहारा की मरीचिकाएं
शैं- शैं करता
मनीकरण का खौलता चश्मा बन जाता है उस का सी पी यू
कि भीतर मदरबोर्ड पर लेट रही है
एक खूबसूरत अधनंगी यहूदी कविता
पीली जटाओं वाली
कविता की नींद में भूगर्भ की तपिश
कविता के व्यामोह में मलाणा की क्रीम
कविता के कुण्ड में देशी माश की पोटलियाँ कविता की पठाल पे कोदरे की मोटी नमकीन रोटियाँ
आह!
कविता की गंध में यह कैसा अपनापा
कविता का यह तीर्थ कितना गुनगुना ....
जबकि धुर हिमालय में
यह एक ठण्डा और बेरहम सरकारी क्वार्टर है
कि जिसका सीमॆंट चटक गया है कविता के तनाव से
जो मेरी भृकुटियों पर बरफ की सिल्ली सी खिंची हुई है
जब कि एक माँ की बगल में एक बच्चा सो रहा है
और एक बुद्ध कविता में करुणा ढूँढ रहा है.
***

Tuesday, May 25, 2010

होमलैंड सिक्योरिटी : बफ़ व्हिटमन-ब्रॅडली



होमलैंड सिक्योरिटी

घंटे दर घंटे दिन प्रतिदिन
एअरपोर्ट सुरक्षाकर्मी
खड़ी रहती है एक्सरे मशीन के पास
बगल से गुज़रते भूतों को
मॉनिटर पर देखते हुए
तह किये हुए कपड़ों के हलके धारीदार खाके
में बहती हुईं
धुंधले किनारों वाली स्याह आकृतियाँ
वह अपने काम अच्छी है
उसने सीख लिया है
फर्क करना
बम और साबुन की टिकिया में
कंघे और हैण्डगन में

पर वक़्त बीतने पर
उसे मशीन की ज़रुरत नहीं रहती
वह सीधे देख सकती है
आपके ब्रीफकेस आपके हैण्डबैग के भीतर
गिन सकती है वे सिक्के
जो आप जेब से बाहर निकालना भूल गए थे
वह देख लेती है
आपके पहने हुए कपड़ों
आपके ओढ़े हुए माँस की कुम्हलाई क्षणिकता के आर-पार
और आपके दिल की जर्द धड़कती परछाई के इर्द-गिर्द
की भुतहा हड्डियों तक

और अब उसने जाना कि
दिन के चौबीसों घंटे हफ़्ते के सातों दिन
वह देखने लगी है इसी तरह
काम के तनाव को लेकर बहुत परेशान रहने लगी है
परेशान कि कहीं वह पागल न हो जाये
वह इसे ऑफ कर देना चाहती है
पर नहीं कर पाती
कोड हमेशा रेड होता है
और दुश्मन हर तरफ.

*****
(रिकी रोमां की पेंटिंग ट्राइआर्की प्रेस की वेबसाइट से साभार)

Friday, May 21, 2010

अशोक कुमार पाण्डेय की एक कविता

एक पुरस्कार समारोह से लौटकर

वह सीकरी का दरबार ही था भरा-पूरा
और वहां संत ही थे सारे
यह ग़र्मियों की एक ख़ुशनुमा शाम थी

जब शहर के सारे पेड़ मुरझा चुके थे
उस लान की घास रंगों से भी ज़्यादा गहरी हरी थी
और इतनी ताज़ी कि शायद ओस भी शर्माती होगी उन पर गिरने से पहले
फूल सारे के सारे खिले हुए
और पत्तियां मंच पर बैठी मोहतरिमा के भौंहों की ही तरह तराशी हुईं
कुर्सियों के कवर इतने सफ़ेद
कि बैठने से पहले कई बार देखा अपनी मटमैली सी जींस को
और जूते चुपचाप छुपा लिये कुर्सियों में घुसा

मंच पर उसी सफ़ेदी की चकाचौंध थी
दिवंगत नगरसेठ की आदमक़द तस्वीर
और उसके सामने सकुचाई सी प्रतिमा सरस्वती की
सारे नास्तिकों के हाथ जुड़े थे और आंखे झुकीं मंच की ओर
शायद सरस्वती की भी

सारे नायक चाय परोसने में व्यस्त थे
खलनायक पढ़ रहा था स्वागत भाषण
नायिका अभी-अभी सरस्वती वंदना गा कर दुबक गयी थी अपनी कुर्सी में
सारे संत उसके स्वर की प्रशंसा करते हुए
लगातार देख रहे थे मंच की तरफ़

वह सीकरी ही थी गर्मियों की उस ख़ुशनुमा शाम
कुम्भनदास दरवाज़े के बाहर घूम रहे थे बेक़रार
और जो संत थे
सारे के सारे भीतर गा रहे थे मंगलाचार!
***

Tuesday, May 18, 2010

स्त्रियों की खिलखिलाहटें - लाइज़ेल म्यूलर / अनुवाद तथा प्रस्तुति : यादवेन्द्र

स्त्रियों की खिलखिलाहटें
धू धू कर जला देती हैं अन्याय के महल चौबारे
और झूठी मनगढ़ंत कहानियाँ
इनमे तप कर सुन्दर सफ़ेद दीप्ति से निखर जाती हैं...
ये संसदीय गलियारों को थर्रा देती हैं
खिडकियों को धक्के मार मार कर
खोल डालती हैं पूरा प्रशस्त
जिस से धज्जियाँ बन बन कर उड़ जाएँ बाहर
सारे ऊल जलूल व्याख्यान...
स्त्रियों की खिलखिलाहटें पोंछ देती हैं
बुजुर्गों के चश्मों पर जम गयी ओस की बूंदें
और उन सब को एक एक कर के अपने आगोश में लेता जाता है
आनंद सागर में अहर्निश डुबोये रखने वाला छुतहा रोग
वे ऐसे ठहाके लगाने लगते हैं
मानों छा गयी हो जवानी उन पर फिर से एक बार...
अँधेरे तहखानों में बंद कैदियों को लगने लगता है
जैसे दिख गया हो उनको दिन का उजाला
जब जब उनकी स्मृति में कौन्धती हैं
स्त्रियों की खिलखिलाहटें...
नदी की धार सी बहती हैं स्त्रियों की खिलखिलाहटें
जो हाथ थाम कर मिला दिया करती हैं
अलग अलग मुंह फेर कर चलते विरोधी किनारे
आकाश में उठने वाले भभूके की तरह
वे एक दूसरे को देती हैं कूट संकेत
खुद की प्रवाहमान उपस्थिति का...
स्त्रियों की खिलखिलाहटें
कैसी अजब है ये भाषा
चपल, इतराती हुई और सिरे से विद्रोहिणी...
हमने तब से सुनी हैं ऐसी खिलखिलाहटें
जब पैदा भी नहीं हुए थे कानून और धर्म ग्रन्थ
और समझ गए थे
कि क्या होती है
असल में
आजादी....
***
१९२४ में जर्मनी में पैदा हुई लाइज़ेल म्यूलर १५ वर्ष की उम्र में हिटलर की तानाशाही बर्बरता से तंग आ कर अपने परिवार के साथ अमेरिका आ गयीं.कई प्रसिद्ध शिक्षा संस्थानों में अध्यापन के साथ साथ उन्होंने साहित्यिक समीक्षाएं भी लिखीं.उनके करीब एक दर्जन कविता संकलन प्रकाशित हैं और पुलित्ज़र सम्मान समेत अनेक साहित्यिक सम्मान और पुरस्कार मिले.हाल में मुझे उनकी ये बहुचर्चित कविता पढने को मिली तो लगा क्यों न अनुनाद के सुधी पाठकों के साथ साझा किया जाये.

Sunday, May 16, 2010

आज मंगलेश जी का जन्मदिन है ...

होने के प्रमाण

मंगलेश जी के बग़ैर दृश्य की कल्पना नहीं की जा सकती और यह सिर्फ़ साहित्यिक दृश्य नहीं है. यह जीवन, संघर्ष और सौन्दर्य का दृश्य है. यह मेरी ज़िन्दगी का दृश्य है. यह बात कितनी भी भावुक या अजीब लग सकती है लेकिन मंगलेश जी को समझने के बाद कोई दिन ऐसा नहीं गुज़रा जिसमें उनकी याद या उनका ख़याल या उनके होने के दूसरे एहसास न हों. लेखक और मनुष्य के तौर पर मैं और मुझ जैसे कई लोग उनके बग़ैर संभव ही नहीं थे. मेरा और हमारा लेखक होना उनके होने का प्रमाण है या उनके होने की व्युत्पत्तियाँ. आगे पढ़ने के लिए क्लिक करें.....

आज हमारे प्यारे मंगलेश दा का जन्मदिन है ...मैं इस तारीख़ को कभी नहीं भूलता....दरअसल मुझे सिर्फ़ तारीख़ ही याद रहती है...और इस हिसाब से मेरा बेटा उनसे एक दिन बड़ा साबित होता है... ऐसा सोचना भी मुझे अच्छा लगता है...और ऐसे ही मैं उन्हें याद करता हूँ हर साल बिना उन्हें बताये....
ऊपर दिया लिंक अनुराग वत्स के ब्लॉग का है और पंक्तियाँ व्योमेश शुक्ल की...दोनों का आभार ... और ये अनुनाद की चार सौवीं पोस्ट ...जिसे इस तरह संभव करना मेरे लिए एक आत्मीय और निजी राग है।
***

Wednesday, May 12, 2010

संजय व्यास की कविता - एक

मैं अनुनाद के लिए जिन कवियों की कविता हासिल करना चाहता रहा हूँ...संजय उनमें से एक हैं। इस बार काफ़ी संकोच के बाद अंततः उन्होंने मेरे अनुरोध का मान रखा है। संजय व्यास जोधपुर में रहते हैं और मैं नहीं जानता कि उनकी कविता उनके ब्लॉग के अलावा भी कहीं छपी है। इस तरह वे शायद पहली बार कहीं छप रहे हैं। मुझे उनसे काफ़ी उम्मीदें हैं। मेरी कामना है कि जल्द ही उनकी कविताएँ हिंदी की पत्रिकाओं में दिखाई दें। जब भी वे वहाँ होंगी युवा कविता की दुनिया में ज़रूर नया कुछ जोड़ देंगी। अनुनाद पर अभी संजय की कविताओं का सिलसिला चलता रहेगा।
आत्मकथ्य

राजस्थान के पश्चिमी सीमावर्ती जिले बाड़मेर के जिला मुख्यालय यानी बाड़मेर क़स्बे का मूलतः निवासी.पिछले कई सालों से जोधपुर में हूँ. आकाशवाणी में कार्यरत. विज्ञान और पत्रकारिता में स्नातक तथा इतिहास में अधिस्नातक. अपने व्यक्तित्व को भी इसी तरह से बेमेल घटकों का समुच्चय पाता हूँ.लगातार अच्छा पढने की रूचि को बनाए रखना चाहता हूँ.यही रूचि कभी कभी लिखने का मोह भी पैदा करती है पर अपने लिखे पर संशय हमेशा बरकरार रहता है।

- संजय व्यास

कोरस में असंगत

दुःस्वप्न उसकी उम्मीद से ज्यादा वास्तविक थे
वे तमाम हॉलीवुड मूवी चैनलों और
हॉरर धारावाहिकों की तरह रोज़ दीखते
और कुछ फीट के फासले पर
घटित होते थे
जिन्हें देखने के लिए रात और नींद का
इंतज़ार नहीं करना पड़ता था
पर हाँ रात और नींद में
कुछ अधिक तीव्रता से
मायावी प्रभाव के साथ
उपस्थित होते थे
स्कूटर पर लदे दिन में जबकि
देर तक मंद और घातक असर से युक्त।

दोनों प्रकारों के बीच सिर्फ़
सुबह की चाय ही रहती थी
या यूँ कहें कि
उसकी सुबह सिर्फ़ उस चाय की प्याली में ही
रहा करती थी
जो प्याली के साथ ही
रीत जाया करती थी

इसके बरक्स
उम्मीद
किसी रेगिस्तानी कसबे में
अरब सागर की
किसी लहर के इंतज़ार की तरह
क्षीण और दूरस्थ थी
या अखबार के परिशिष्ट की
बिना हवाले वाली अपुष्ट ख़बर की तरह अवास्तविक
जो अमेरिका द्वारा
तीसरी दुनिया की भूख के
जादुई डिब्बाबंद समाधान की शोध के
अन्तिम चरण में होने की
बात करती थी

असल में ये एक बीमारी थी
जिसके इलाज़ की ज़रूरत थी
वरना क्या वज़ह थी कि
दुनिया के विज्ञापक नमूने
हर वक्त रौशनी को
परावर्तित करते थे
टीवी के सैकड़ों चैनल
जिनमे न्यूज़ चैनल भी शामिल थे
तत्पर थे उसके मनोरंजन को
शहर के होटल चौबीस घंटे
परोसते थे खाना
और उपभोक्ता सेवा केन्द्र
टेलीफोन की एक घंटी पर
दौड़ पड़ते उसकी ओर।

शोर भी यही है कि
दुनिया बनी हुई है इन दिनों
उम्मीद की राजधानी
फ़िर उसका दम
क्यों घुट रहा है ***

Wednesday, May 5, 2010

पुराने दोस्त

वेन गोग़ की पेंटिंग गूगल से साभार

पुराने दोस्त याद आते हैं पुराने दोस्त स्मृतियों में रहते हैं

मेरा जीवन तीन चौथाई स्मृतियों से बना है और एक चौथाई उम्मीदों से
तीन चौथाई में भी दोस्त एक चौथाई में रहते हों शायद दूसरी कई सारी चीज़ों के साथ
हो सकता है दूसरी चीज़ें कबाड़ लगती हों उन्हें
और कबाड़ छांटते हों मेरी स्मृतियों का
पुराने दोस्त

मुझे भिन्न पसन्द नहीं थी गणित में और इस तरह एक भिन्न में रहते हुए अभिन्न होते जाते हैं पुराने दोस्त

पुरानी नदियां पुराने तारे पुरानी रातें पुराने गांव पुरानी गलियां पुरानी हवाएं पुराने स्वप्न पुरानी चीज़ें
पुराने लोग पुराने शब्द पुरानी कविताएं पुराने चित्र

खरी पुरानी ईंटों में बजते हुए पुराने घर

पुराने दोस्तों के साथ
पुराना
और पुराना हो जाता है

नए दिनों की नई आंखों में भी आते हैं
पुराने ही आंसू

पुराने आंसुओं में डबडबाते हैं पुराने दोस्त
वे पुराने तैराक भी हैं

पुराने दिन और पुरानी लड़ाइयां पुरानी नहीं रहतीं
पुराने नहीं रहते पुराने दोस्त !
***
(योगेश पान्थरी, सुरेश पान्थरी, धनेश पान्थरी, अनिल रावत, प्रताप मनराल, रामकृष्ण मुण्डेपी, टीकाराम पोखरियाल, देवेन्द्र कुण्डलिया, सुरेन्द्र बहुखण्डी, गुड्डी दी, हेमू, और किट्टू के लिए)


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