Friday, April 30, 2010

लूसिले क्लिफ्टन : यादवेन्द्र

इस वर्ष फरवरी में ७३ वर्ष की आयु में स्तन कैंसर से १६ वर्षों तक जूझने के बाद प्रसिद्ध अमेरिकी अफ़्रीकी कवियित्री लूसिले क्लिफ्टन (१९३६-२०१०)का निधन हुआ.अमेरिका में उन्हें अपनी अश्वेत बिरासत का गर्व करने के साथ साथ बेवाकी,चुटीलेपन और स्त्रीवादी सोच के लिए भी याद किया जाता है...स्त्री शरीर को महिमामंडित करने का कोई मौका उन्होंने अपनी कविताओं में नहीं छोड़ा...गर्भाशय, कूल्हे, गर्भपात, स्तन और मासिक स्राव जैसे विषयों पर लिखी उनकी कविताओं का अमेरिकी साहित्य में सम्मान जनक स्थान है. मजदूर माता पिता की संतान---कविता लिखने की प्रेरणा उन्हें माँ से मिली जिनकी कवितायेँ पिता ने कभी छपने नहीं दीं,पर अपनी संकल्प शक्ति से उन्होंने अपना संकलन छपवाया.बचपन की इस घटना को वे जीवनपर्यन्त भूली नहीं और स्त्रियों के जीवन में अन्याय के प्रतीक के तौर पर अंतिम दिनों तक स्मरण करती रहीं.अक्रिब दर्जन भर काव्य संकलन उन्होंने प्रकाशित किये--१९६९ में पहला--साथ ही बच्चों के लिए भी उन्होंने खूब लिखा.अमेरिका के अनेक बड़े विश्व विद्यालयों और कालेजों में उन्होंने अध्यापन किया,अमेरिका के लगभग सभी बड़े पुरस्कार और सम्मान उन्हें मिले--१९७९-८५ के दौरान वे मेरीलैंड राज्य की राज कवि भी रहीं. यहाँ प्रस्तुत है उनकी कुछ चुनिन्दा कवितायेँ...
अपने कूल्हों की शान में

ये कूल्हे खूब हृष्ट पुष्ट हैं
और काफी जगह चाहिए
इन्हें हिलने डुलने को..
कोनों अंतरों में ये भला कहाँ समा पाएंगे
ये तो आजाद कूल्हे हैं..
इन्हें बंध कर रहना बिलकुल नहीं भाता
न ही ये कभी गुलाम हो कर रहे..
जहाँ जी चाहे,चले जाते हैं
जो जी करे,कर लेते हैं
ये मजबूत कूल्हे हैं
ये जादू भरे कूल्हे हैं...
मैं खूब वाकिफ हूँ
कि कैसे जकड़ लेता है इनका सम्मोहन
मर्दों को अपने पाश में
और फिर नचाता फिरता है
नन्ही फिरकी की मानिंद...
***

१९९४ *

मैं पूरे ही करने वाली थी चौवनवां साल
तभी बर्फ का अंगूठे जैसा गोला
जोर से आ के टकराया मेरे दिल के पास
हर किसी की होती है अपनी कहानी
तजुर्बे दहशत के,आंसुओं के
ना यकीनी के दाग धब्बे और निशान
ये तो जगजाहिर है
कि सबसे मनहूस झूठ बोलते हैं
हम खुद से ही...
तुम्हे मालूम ही होगा कितना खतरनाक होता है
दो स्तनों के साथ इस दुनिया में कदम रखना
तुम्हे ये भी मालूम ही होगा कितना खतरनाक होता है
काली चमड़ी के साथ इस दुनिया में कदम रखना...

मैं पूरे ही करने वाली थी चौवनवां साल
कि अचानक आ गिरी ठन्डे और मरणशील देह के
बर्फीले बियावान में
बर्फ के बारीक धागे यहाँ वहां टंगे हुए
और एक पगलाया सा स्तनाग्र बिलखने लगा
होकर बेकाबू
यदि हम ईश्वर की अच्छी भली संतानें न होते
तो न मिल पाती हमें इस धरती की बिरासत..
पर अफ़सोस ये सब जानने के वास्ते
हमें जीना ही पड़ेगा एक अदद ठिठुरता हुआ जीवन
पूरा पूरा...

*इसी साल कवियित्री को स्तन कैंसर होने की सूचना मिली.
***

झड़ती पत्तियों की सीख

झड़ती पत्तियों की सीख.. ...
पत्तियों को भरोसा है
कि ऐसे झड़ना प्रेम है..
ऐसा प्रेम आस्था है
आस्था शालीनता है
शालीनता ही तो ईश्वर है..
और मेरा सिर हिलता है
पत्तियों की हाँ में हाँ मिलाता हुआ...
***

नृशंसता

मुझसे नृशंसता की बाबत कोई गुफ्तगू मत करो
या यह भी मत पूछो कि क्या क्या कर सकती हूँ मैं..
जब मन में आया कि तिलचट्टों को मारना है तो बिलकुल यही आया
और मैंने उन्हें मार डाला...झाड़ू से बुहार कर घर से बाहर फेंक भी दिया
पहले से चेताये बिना उन्हें कुचला रौंदा..एक पल को सुस्ताई भी नहीं
और ये सब करते हुए मैं मुस्काती भी रही अनवरत..
ये तिलचट्टों का होलोकास्ट था..चारों ओर बिखरे हुए
तिलचट्टे ही..उनकी टाँगें...उनके पंख..फर्श चपचप लाल..
मैंने पूछे नहीं उनके नाम पते
उनमे जानने जैसा मिलता भी क्या...
अब जितनी बार भी कमरे के अन्दर दाखिल होती हूँ..चौंक के ख़ुद को देखती हूँ
मुझे ख़ुद भी नहीं मालूम था क्या क्या कर सकती हूँ मैं...
***
क्या तुम मेरे साथ साथ खुशियाँ नहीं मनाओगे?

क्या तुम मेरे साथ साथ खुशियाँ नहीं मनाओगे
कि किस मशक्कत से
मैंने गढा है अपने जीवन का स्वरुप?
मेरे सामने नहीं थी कोई माडल
बेबीलोन में जनमी हुई
दुर्भाग्य से मैं थी भी दोनों ही..अश्वेत और स्त्री
अपने सिवा कुछ भी तो नहीं था सामने
जिसे देख देख के बड़ा होना सुकून देता..
ऐसे ही बढ़ाये मैंने कदम पुल के ऊपर
जिसके एक छोर पर थी तारों से टिमटिमाती रात
तो दूसरे पर थी धूल मिटटी
मेरा एक हाथ कस के थामे रहा मेरा दूसरा हाथ...
आओ मेरे साथ मनाओ खुशियाँ
कि कोई न कोई साधता रहा मुझपर निशाना
मार डालने को हार रोज बिला नागा
पर अंत में निराशा ही हाथ लगी उसके
अपनी चूक दर चूक पर...
***

Tuesday, April 27, 2010

गाज़ा में कविता है लापता : बफ़ व्हिटमन-ब्रॅडली



गाज़ा में कविता है लापता


गाज़ा में कविता है लापता
हालाँकि उसके देखे जाने की छुटपुट और अपुष्ट
सूचनाएं हैं
एक कहता है कि उसे गटर से बहते हुए
उफनती हुई खून की नदी में मिलते देखा
दूजा खबर देता है कि बम फटने से मलबे और मिट्टी में बदल गई
इमारत के नीचे उसकी चीखें सुनी हैं
गाज़ा में कविता है लापता
हो सकता है वह हो खुली हवा में बने मुर्दाघर में
उन बच्चों की लाशों के बीच
जो आसमान से आई मौत से मर गए बस का इंतज़ार करते हुए
एक डॉक्टर का मानना है कि शायद उसने
कविता के तार-तार हो चुके पैरों को काट दिया
और उन्हें फेंक दिया दूसरे अंगों के ढेर पर

धमाकों से पिघल गईं उसकी आँखें हिल गए कान के पर्दे
हिलोरे लेती सड़कों पर
उसका पीछा कर रहे हैं लोग लौह मुस्कानों वाले
जिनकी साँसों से आती है गोला-बारूद की गंध
जिनकी माइक्रो-प्रोसेसर सी आँखें देखती हैं हर जगह
सिवाय दिल के

गाज़ा में कविता है लापता
लौह मुस्कानों के बड़े मंसूबे हैं
वे दीवार बना देंगे कविता के इर्द-गिर्द
क़ैद कर देंगे उसे तडपाएंगे उसे चुरा लेंगे उसकी ज़मीन
काट डालेंगे जैतून के पेड़ और
धीरे धीरे मारेंगे भूखा कविता और उसके बच्चों को तब तक
जब तक उनमें बचे न कुछ भी

पर कविता बचती है लौह मुस्कानों से
लंगड़ों से लूलों से बहरों से अंधों से
और पहुँचती है उसी चौपाटी पर
जहाँ पिकनिक मनाता एक परिवार मारा गया गोलीबारी में
कविता लहरों को नहीं सुन सकती
और
न देख सकती है आसमान को जर्द पड़ते हुए
पर
वह महसूस करती है गर्म रेत को
और सूंघ लेती है शाम के खुशबूदार हाथों को

और कविता याद कर सकती है
मार दिए गए बच्चों को याद कर फिर जिंदा कर सकती है कविता
याद कर सकती है गाँवों को जो गायब कर दिए गए इस धरती से कहीं अलग
घर लौटते शरणार्थियों के स्वागत में बाहें पसारे
कविता याद कर सकती है जैतून के बागों से होकर बहती शर्मीली हवाओं को
और कविता जो याद करती है वह बन जाता है एक गीत

और वह गीत उठ खड़ा होता है
और चौपाटी से चलने लगता है गाँवों और क़स्बों के उजाड़ की ओर
जहाँ से उठ रहा है धुआँ
गीत को लौह मुस्कानें नहीं सुन पातीं क्योंकि उनके दिमागों में है धमाके
और कानों में भरा है खून
लोग मगर सुन सकते हैं हौले से गाना शुरू करते हैं
नहीं मिटेंगे हम और न ही मरेंगे.

*********

(बफ़ व्हिटमन-ब्रॅडली के दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं; उनकी कविताएँ कई अमरीकी साहित्यिक पत्रिकाओं में छप चुकी हैं. लेखन के अलावा वे ऑडियो और वीडियो वृत्तचित्रों के निर्माण से भी जुड़े हैं. इराक़ और अफ़गानिस्तान में लड़ने से इनकार करने वाले अमेरिकी सैनिकों के उनके द्वारा लिए गए साक्षात्कार यहाँ सुने जा सकते हैं. वे उत्तरी कैलिफोर्निया में रहते हैं.)

*डोरा मैक्फ़ी की बनाई चारकोल-पैस्टल तस्वीर ' हॉस्टेज इन गाज़ा' ऑस्ट्रेलियंस फॉर पैलेस्टाइन की वेबसाइट से साभार

Thursday, April 22, 2010

गिरिराज किराडू की कविताएँ


अनुनाद के भले दिन लगे हैं। मनोज के बाद अब हमें गिरिराज की कविताएँ मिली हैं। एक आम शिकायत है कि गिरि की कविताओं में कला है ! उसे महज कलाकार मानने और दूसरों से भी ऐसी उम्मीद रखने वाले बहुत सारे आत्मीय मित्र हैं मेरे। जी हाँ... इनमें कला है लेकिन वो कला, जो जीवन के मरुथल में चलकर हासिल होती है। देखिये न हमारे सामान्य कार्यव्यवहार में भी तो कला है....और जब हम आम आदमियों में से कोई कवि होने की तरफ क़दम बढ़ाता है तो तब क्या वह अपने लोगों के पक्ष में कलाकार होने का फैसला नहीं ले रहा होता? कवियों में ही देखें तो हमारे प्रेरणापुंज निराला, मुक्तिबोध, शमशेर, त्रिलोचन, रघुवीर सहाय, आलोक धन्वा, विष्णु खरे, वीरेन डंगवाल, मनमोहन, मंगलेश डबराल, अरुण कमल, असद ज़ैदी में भी कितनी तो कला है। हाँ, ज़रूरत है सहाय जी के उस अमर वाक्य को याद रखने की ...जहाँ कला बहुत होगी विचार कम होगा... गिरि की कला उसे सब्जी बेचने वाली, जीसा, क़त्ल कर दिए गए या ज़हर पीकर मर चुके बेरुजगार लोगों के बीच ले जाती है ; जिन्हें वह एक अद्भुत आत्मीय और आंतरिक टीस से भरी भाषा के सहारे अपने भीतर की बस्ती में आबाद रखता है। उसका कवि आम जनता की तकलीफों और उसके भीतरी हाहाकार का कवि है इसलिए निश्चित रूप से यहाँ विचार भी बहुत है। पता नहीं गिरि इस बारे में क्या सोचता है पर मेरे लिए वह विचार का ही कवि है। गिरि की कविताओं के वैचारिक संसार और उसके बेहद स्पष्ट संघर्षों की एक छोटी सी झलक मैं यहाँ लगा रहा हूँ।


कविता प्रतियोगिता के निर्णायक का आत्म-निवेदन
उन्हें पता था कविता की एक भाषा होती है
जैसे –
“दिल से कलम तक
जीवन है जब तक”
“दिल से जो चाहे वो मांग लो खुदा से
हम दुआ करते रहेंगे वो सब मिल जाये तुमको”
“वो आँखों का नूर वो जिगर का टुकड़ा
जो दो माओं का पूत था
एक थी उसकी विधवा माँ,
दूजी धरती को उसने माना था”
“यह कैसी मानवता, कैसा है समाज
कुत्ता रमता है कार में, बच्चा तड़पत दिन रात” –

उनमें से बहुत से सिर्फ उन कुछ घंटों के लिए ही कवि थे
उनकी कविताओं में संसार बस खत्म होने ही वाला था
वे किसी ट्रेन को भागते हुए पकड़ लेने ही वाले थे
सीमा पर मरने वालों जवानों को उनके अलावा हर कोई भूल जाने ही वाला था
आखिरी हरी पत्ती पर तेजाब गिरने ही वाला था
आतंक से आखिरी मनुष्य भी मरने ही वाला था

मृत
अलंकृत
भाषा के एक दूसरे द्वीप पर
अपने उस पल कवि होने की प्रसन्नता और घबराहट के साथ
मंडरा रहे एक निर्लज्ज उचक्के को
पुरस्कार दिया मैंने
कितने अच्छे भरे पूरे थे तुम सब जब तक
कवि बन कर नहीं आये थे
बस एक ही दिन के,
इतने ही अभिनय के कवि बनके रह जाना
यह इस्लाह नहीं आशीष है, मेरे बच्चों
खुश रहो
***


पिटा हुआ वाक्य

सपने देखता हूँ कहने से पाठक सोचता था जो उसके पास नहीं वैसा कोई चश्मा है मेरे पास जिसे पहनने पर दिखते हैं सपने पाठक है कहने से लगता था कोई है जिसे लगातार धोखा दे रहा हूँ धोखा दे रहा हूँ कहने पर वह समझती फिर से कोई माया फैला रहा हूँ फिर से माया फैला रहा हूँ की कल्पना करने पर कुछ ऐसा नजारा होता सब कुछ नष्ट हो रहा है सब कुछ होना बचा रहेगा एक मंत्र है सब कुछ होना बचा रहेगा एक मंत्र है बुदबुदाने पर वे हंसते सब कुछ रहेगा ही तो नष्ट होने बचाने की बात षडयंत्र है बात षडयंत्र है कहने पर चेहरा गिर पड़ता अपार रेलमपेल में

कुचले हुए चेहरे से पहचान सको तो अपना दिल तुम्हें देता हूँ अपनी जान तुम्हारे नाम करता हूँ
कितना सूकून है यह जानने में तुम हँस कर उड़ा दोगे अगर कोई कहेगा मेरे दिलदार कि यह अंतिम वाक्य एक पिटा हुआ वाक्य था
(रघुवीर सहाय की उपस्थिति के नाम श्रृंखला से)***
मातृभाषा-मृतभाषा
राजस्थानी कवि और मित्र नीरज दइया के लिए

वह कुछ इतने सरल मन से, लेकिन थोड़ा शर्मसार खुद पर हंसते हुए यह बात बोल गया कि यकीन नहीं हुआ यह सचमुच प्रेम में होने वाली भूल जैसी कोई बात है

उसे कविता उसके जीसा सौंप गये थे या शायद कविता को उसे जीसा जिन्होंने कभी कोटगेट पर कोई कविता नहीं लिखी पर आपनी एक कविता में जीसा का श्राद्ध करते हुए उसने एक पत्तल कोटगेट के लिए भी निकाली थी और मुझे तो उसे देखते ही उसके उन्हीं जीसा की भावना होती थी कभी देखा नहीं जिन्हें मैंने

हाँ सिर्फ प्रेम में ही ऐसा हो सकता है मैंने देखा मेरे सामने चार भाषाओं के नाम लिखे हैं और उनमें एक मेरी भाषा भी है हाँ यह प्रेम ही था मृत को मातृ पढ़ा मैंने और चाहे कोई गवाह नहीं था किसी ने नहीं देखा पर अपनी भाषा को मृत कहा मैंने यकीन मानो यह सिर्फ़ प्रेम के कारण हुआ वह भाषा जो जीसा सौंप गये थे मुझे उसे मृत लिखा मैंने

यह उसके कहे हुए का अनुवाद है
मैं कविता ‘उसकी’ मातृभाषा में नहीं लिखता
यह जानता है वो
अनुवाद में जीसा को जीसा ही लिखना कहा उसने
***

उन गर्मियों में

इस नन्ही-सी, नाटी-सी, कमजोर नजर मालिन से ही
लेना है मुझे पुदीना, पालक कोई हरा साग

पर ऊधो-सी चतुर व्यौपारिन ताड़ गई है
खोटे हैं सिक्के मेरे और थमा दे रही है ठूंठ

इन सिक्कों का यही मोल है प्यारे
जाओ किसी और को बहकाओ
यहां तो बरसों का मंदा है
इस सूखे में न आग लगाओ
***

सकुशल

यह कुछ इतनी सादा सरल भोली बात है
कि आप इस पर शक करेंगे
मुझे मूर्ख नहीं मक्कार समझेंगे
पर फिर भी मैं आपको बताना चाहता हूं कि
जो जला दिये गये
जिन्हें गोली मार दी गई
लटका दिया गया
वे मेरे भीतर आबाद बस्ती में सकुशल हैं

जो डूब गये
जिन्होंने नसें काट लीं
जहर पी लिया
वे वहां बिल्कुल ठीक हैं

आपको भरोसा तो नहीं दिला सकता पर
उसमें से कुछ को रुजगार मिल गया है
कुछ का घर बस गया है
कईयों की इज्ज़त बन गयी है

आप इसे चाहें तो षड़यंत्र समझें पर
वे जो गायब कर दिए गये
भुला दिए गये
फेंक दिए गये
वे वहां अपने पूरे कुनबे के साथ राजी-खुशी हैं

आपसे नहीं पूछूंगा कि आपके भीतर ऐसी कोई बस्ती है कि नहीं?
(अंतिम दोनों कविताएं कुछ बरस पहले पंकज चतुर्वेदी ने वागर्थ में प्रकाशित की थी, उन्हीं के लिये)
***

Sunday, April 18, 2010

मनोज कुमार झा की कविताएँ - दूसरी किस्त

मुझे बस उत्सव में शामिल कर लो



बाँसक ओधि उखाड़ि करै छी जारनि
हमर दिन नहि घुरतकि हे जगतारिनि
(नागार्जुन, पत्रहीन नग्न गाछ, १९६८)

(बाँस की जड़ें खोदकर लाता और मात्र वही जलावन, ऐ जगतारनी क्या मेरे दिन नहीं फिरेंगे?)

एक स्त्री के द्वारा बाँस की जड़ें उखाड़कर अपने हिस्से की आग जुटाने का कठिन श्रम, उस जड़ के जलने से उठ रहे पुतली झँवा देने वाले धुँआ से जूझकर अन्न-संस्कार और फिर जगतारनी से प्रश्न । इहलौकिक-परलौकिक सत्ता-विग्रहों पर प्रश्न-प्रहार। प्रश्न कि जिनके पग-प्रहार से जीवन के नेत्रकोष खुलते हैं। प्रश्न अर्थात कविता की दिपती लिलार, प्रश्न अर्थात सघन तम की चमकती आँख, प्रश्न अर्थात चुका तो नहीं है जीवन। विभाषा की आशा। यूँ होता तो क्या होता। सहर होने तक शमां को कई रंगों में जलने की उम्मीद ।

एक उम्मीद कि मनुष्यताएँ कभी भी प्रक्षीण नहीं होगी। कालोहि निरवधि विपुला च पृथ्वी। परंतु काल के सूते को किसी एपोकेलिप्स (Apocalypse) के खोखल में कपास हो जाने का भय; काल-प्रवाह में मनुष्य की जिजीविषा, उसके श्रम, संघर्ष एवं स्वप्न के द्वारा अर्थ के निवेश की प्रक्रिया के स्थगन का शोर (एण्ड ऑफ हिस्ट्री) तथा विपुल मानवता के धन-पुतली के क्लोन के रूप में पचित-पतित हो जाने की आशंका एंव विपुला को उन्मक्त ऐरावत द्वारा खुरेठ दिए जाने का आतंक। साथ ही, टेरर-हीस्टीरिया से लेकर वियाग्रा-व्यग्रता तक के भ्रांतिकर चिन्हों का भूमंडल-भ्रमण; यथास्थिति-भंग से संतृप्त एंव असंतृप्त लिप्साओं के प्रेत-नाच में व्यवधान होने की चिन्ता उन्हें भी जो नाचघर की सीढ़ियों के पास गोदो की प्रतीक्षा में बैठे हुए हैं। फिर भी, जीवन जहाँ दुष्कर है वहाँ भी अपने होने का उत्सव मनाता जैविक-बर्हिजैविक व्यूह में फँसा जर्जर देह (जो कि जाहिर है “अचार का मर्तबान या टूथब्रश नहीं अपितु अर्थवाही क्रियाओं की जन्मभूमि है” एवं नेमते-जीस्त अपने कोटिशीश व्यक्तित्व के संस्पर्श से अन्न, जल, वायु एवं मशीन को नए संदर्भ देता, इनके नवल बिम्बों-प्रतिबिम्बों के अवतरण का हेतु बनता और कविता इस तरह से होने की गुइयाँ। पृथ्वी का पुलक-उद्गम। बहुलता का जीवन-उद्यम।

‘संरचित बहुलता’ के भंडारघर में जब एक टावर टूटता है तो एक विशाल शोक-संरचना खड़ी की जाती है और गढ़े गए कारणों की ओट से हमारे वर्तमान और हमारी एक पुरानी सभ्यता पर एक साथ बमबारी की जाती है और यह नहीं देखा जाता है कि इस पार भी बच्चे विद्यालय जाते हैं, वृद्धाएँ प्रार्थना-गृह जाती हैं एवं पितर स्वर्ग जाते हैं। टावर की संरचित विराट अनुपस्थिति के मध्य उनकी अनुपस्थिति को दफन कर दिया जाता है जो टावर के शिखर-पुरूषों को चाय-कॉफी पहुँचाते थे, उनके धवल वस्त्रों पर के दाग छुड़ाते थे। अस्मिता-आश्मन के इस क्षण में इनकी अस्मिता का क्या हुआ? उनके बारे में कुछ पता नहीं चला क्योंकि पूँजी-यात्रा के राजमार्ग के इस बड़े चौक तक किसी तरह जिन्दा रह पाने के लिए की गई उनकी यात्रा महाजनों के मानकों के आधार पर अवैध थी। मगर कविता हर ऐसी यात्रा का सम्मान करती है। कविता के हाथों में मनुष्य की हर यात्रा के लिए थोड़ा सा सतू, जीवन की ओर बढ़ रहे हर साँस के खोंइछे के लिए दूब-धान ।


लो इन्द्रसभा में फेंक रहा हूँ देह में छुपा कवच-कुण्डल
मुझे बस उत्सव में शामिल कर लो।

कविता कब अच्छी लगने लगी, पता नहीं। वसंती हवा अच्छी लगती थी, उन दिनों भी जब जानता नहीं था कि यह हवा वसंती है। फिर कोर्स में इस शीर्षक से कविता देखी। वाह! उत्तम! अरे यह तो बहुतों को अच्छा लगता है, मास्साब को भी । कितना सुखद! मेरा प्रिय दूसरों का भी प्रिय। बहरहाल, बाद में तो वह अनुभूति भी सुखद ही रही जब कुछ सिर्फ मेरा प्रिय रहा। जब यह इतनों को प्रिय है तो गाँव में इसकी चर्चा क्यों नहीं होती। क्या नून-तेल-लकड़ी की जुगाड़ में लगे लोग वे नहीं कह पाते जो वे कहना चाहते हैं ? नहीं, ऐसा तो नहीं होना चाहिए। नून-तेल-लकड़ी की तरह कविता भी मनुष्य की जिजीविषा के रोऐं ही तो हैं और वस्तुतः कविता तो थी ही चारों ओर पत्तों के झौर में छुपे टिकोरों की तरह, पर मुझे देखना न आता था। रामचरितमानस का पारायण तो चलता ही रहता था। पर यह तो धार्मिक ग्रंथ माना जाता था। तो क्या इस ग्रंथ के वातायन जीवन के बाहर खुलते थे! तो फिर भोला चाचा भर छाक गांजा सोंट लेने के बाद इसकी चौपाइयाँ क्यों जोर-जोर से गाते थे या फिर लड्डू चाचा पोखर में भैंस धोते वक्त इसके हिस्से क्यों गुनगुनाते थे ?

फिर एक दिन पता चला कि चूड़ा-दही के लिए घर-घर डोलते रहने वाले बालानंद वैदिक श्लोक भी रचते हैं। उनके श्लोक की उतनी चर्चा नहीं होती थी, उनका क्रोध प्रसिद्ध था। एक बार जब शिक्षक के रूप में नियुक्ति के लिए उनसे प्रमाण-पत्र माँगा गया तो उन्होंने जीभ दिखा दी और क्रोध में कहा कि मैं किसी भी प्रमाण-पत्र को अपने से बड़ा नहीं मानता। कहते थे कि उनकी देह में अक्षरों का विष है। उनके किसी कवि-मित्र ने ही कहा होगा शायद? तो क्या वे जो दही के लिए घर-घर छुछुआते थे वे इसी विष के शमन हेतु था। दरभंगा शहर में रहकर पढ़ाई के दिनों में जब एक शाम बस से उतरा तो इसी बालानंद वैदिक को धूल से सने फटे-चीथड़ें कपड़ों में हाथ में प्लास्टिक का कप लिए हर आने जाने वाले के पीछे दौड़ते देखा और एक दिन वे ऐसी ही अवस्था में सड़क किनारे नाली में लुढ़क गए और उनके सकुचौहाँ लड़के का क्या हुआ किसी को नहीं मालूम। तो क्या कवियों की मौत ऐसे ही होती है ?

कवियों की ही नहीं, हमने अपने आस-पास जितनी मौतें देखी सब वही … बदरंग, बेढ़ब और बेहूदी। जो लोग फलों को रसायनों के माध्यम से पकाने के खिलाफ थे,उन्हें कौन सा रसायन भीतर-ही-भीतर चाट जाता था ! किस कुचक्र में फँसे थे वे ! यह जो हमारा समय था, उसमें सत्ता-तंत्र के पास ‘जीने दो’ या ‘जीवन ले लो’ (‘let live’ or ‘take life’) की जो पुरानी ताकत थी उसके साथ ‘जीवन रचो’ या ‘मरने दो’ (‘make live’ or ‘let die’) की नई ताकत भी घुल गई थी (फूको). एड्स से बचाओ या कालाजार से मरने दो, अंगूर खिलाकर बचाओ या अकाल से मरने दो। हीरा सदा टी.बी. से मरा एक दिन धान रोपकर लौटने के बाद खून की उलटी कर। कई स्त्रियाँ मर गईं कुँए से पानी खींचते-खींचते। कई वृद्ध मर गए बैल के पीछे दौड़ते-दौड़ते। ‘मरने की इच्छा तो समर्थ की इच्छा है’, तो फिर नथुनी सहनी की पत्नी टाँग टूट जाने के बाद बार-बार ऊपर वाले से अपना टिकस काटने की गुहार क्यों करती थीं या घर के पिछवारे की दस धूर जमीन, जिसे उनके इलाज के लिए बेचने की बात चल रही थी, उनकी सामर्थ्य-भूमि थी। मृत्यु के इस चेहरे ने सौंदर्य की तरफ खुलते कई दरीचों पर पर्दे गिरा दिये। अक्सरहा जब “अपनी खुशी न आये, न अपनी खुशी चले” से मन में कोई लपट उठने को होती है तो बाढ़ में बहकर आए नवजात शिशु के फूले पेट की स्मृति उस पर पानी डाल देती है। जब-तब आ धमकने वाली मौत का चेहरा इतना बदशक्ल था कि वह अपनी पेटी में क्या लाता है, इस पर कभी भी ठहरकर सोच नहीं सका।

गाँव में लोग घूरे के पास बैठकर दिव्य-प्रश्नों में घी डालते रहते थे, मगर जब भात पर ढ़ाली गई दाल पनीली होती थी तो थाली फेंक देते थे। क्या ऐसा करना पाखंड था ? पता नहीं । या यह हथ-धोअन में फँसी हुई मक्खी के पंखों की फड़फड़ाहट थी या या कदाचित वह पाताल-गंगा थी जो दैव-माया से कुण्ठित जीवन से पार्थिव अविशुद्धताओं तक जाती थी। दादाजी सोते समय भज गोविन्दम स्तोत्र गाते थे। जब-तब सोचता हूँ तो लगता है दादाजी “डुकृञ्‌करणें” का अभ्यास करनेवाले वृद्ध के पक्ष में क्यों नहीं थे, जबकि वे खुद व्याकरण के विद्वान थे । वृद्धावस्था में अपनी भाषा सुधारने की चेष्टा मुझे तो बड़ी आह्लादक लगती है। काश ! कोई ऐसी सफेद वृद्धावस्था हो जहाँ हम अपनी भाषा की पलकें सँवार सके – रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे। मगर यहाँ तो स्थिति यह थी कि गाँव के अधिकांश वैदिक वृद्धावस्था में विक्षिप्तता के कूप में नहाने निकल गये। जो जीवन भर वेदमंत्रों के संकेतों का मीजान बिठाते रहे उन्हें मिली क्या तो विक्षिप्तता…. विक्षिप्तता अर्थात (break in signifying chains) क्यों होता था ऐसे ! जैविक हिमशिला सामाजिक हिमशिला से कहाँ आकर एकमेक होती थी, पता नहीं चलता। अब भी तो ऐसा ही होता है। मेरे वर्ग के एक होनहार लड़के ने आत्म-हत्या कर ली। क्या उसने इसलिए स्यूसाइड-नोट नहीं लिखा कि उसके अक्षर बड़े सुन्दर होते थे, या इसलिए कि वह भाषा से बाहर आकर मरना चाहता था ? बात कविता से अपने रिश्ते के बाबत करना चाहा था और पहुँच गया मृत्यु की तरफ। कविता जीवन से रिश्ता ही तो है और इधर जीवन सड़ रहे अमरूद की तरह- एक फाँक जीवन, एक फाँक मृत्यु, क्या कहाँ से शुरू पता नहीं। तटभ्रंश ! एक किचड़ैल नदी लोटती चारों ओर!

कहते तो हमारी तरफ नामकरण-संस्कार में यह भी है कि “बड़े होकर कवि बनो”। पर निरभिप्राय दुहराते जाने पर गुणकीलन गुड़किल्ली हो जाता है। और फिर कविता तो उसका अधिकार भी है जिसका नामकरण नहीं होता, जिसका नाम सीधे ऋतुओं, वृक्षों, फलों की पाँत से उठा लिया जाता है। बल्कि कविता तो उसकी ही भूमि है जिसका नामकरण नहीं हुआ।

यही उल्टा-सीधा सोचते शब्दों के साथ शब्द बिठाने लगा. एक दिन एक कवि सम्मेलन में कुछ पैसे भी मिल गये, ज्यों के त्यों घर लेते आया, मँजे हुए कवियों की तरह अपने पैसे का एक पान भी न चबाया . रास्ते भर नोटों की सलबटें ठीक करता कि आज जब काव्य-पाठ कर लौटने के बाद कहूँगा तो कविता के पीछे पैसों का भी बल होगा – Money gives meaning to numbers. आज ये न बताऊँगा कि इतनी कविताऐं पढ़ी जो अक्सर बिना पूछे बताया करता था बल्कि ये बताऊँगा कि इतने पैसे मिले हैं . पर, ”गिरनी थी हम पे बर्के तजल्ली न तूए पर”…. माँ ने बताते ही झटपट कह दिया कि तो तुम भी पूजा कर ही पैसा कमाओगे , तुम्हारे बाप ने भी पुरोहिताई नहीं किया, पर तुम इसी में चले जाओगे ! पर, हम तो अभी पुरोहिताई से टेढ़ा रिश्ता रखनेवाली कवितायें पढ़ के आये हैं . उससे क्या होता है? तुम उदाहरणों से सबकी कल्पनाओं का रूख थोड़े मोड़ सकते हो ! स्मृति के सारे फाँस किसी के सामने नहीं खुले हैं . क्रीमिनल के लिए एक Value-neutral शब्द बल्कि एक रौबदार शब्द क्राईमर भले चल निकला हो, तुम्हारे इलाके में, पर कवि तो अभी भी निरीह हैं . कदाचित यह उलटी तरफ से व्यक्त किया जाने वाला प्रेम ही हो . और, तुम भी क्यों भूल जाते हो जो तुम्हारे एक रिश्तेदार ने कहा था कि तुम तो अंग्रेजी भी जानते हो, गणित भी, फिर कहावतें कहने में क्यों लग गए . पर, पुरोहिताई को लेकर नफरत अभी तक तुम क्यों नहीं भांप पाये थे . अतिपरिचयात्‌ अवज्ञा न कहो, अवज्ञा उतनी विध्वंसक नहीं है और तुम भी तो मन्द मन्द, कोमल मुद्राओं में मंत्र पढ़ने वाले पंडितो- पुरोहितों की तुलना में उन ओझाओं-गुनियों की तरफ ही खिंचते थे जो दिखने में तो दुर्बल होते थे, पर Performance के क्षणों में आवेग-स्फूर्त हो जाते थे . हाँ, मेरी स्मृति में तिलचट्टे के टुकड़ों की तरह हमारी तरफ आने वाले ओझा के चाल-ढ़ाल फँसे हुए हैं, जो अक्सरहा जुड़कर साबुत तिलचट्टे हो नाचते हैं . वे शुरू में किसी पीर की वन्दना करते थे और आखिर में जब ध्वनियाँ उनके जब्र के घेरे से बाहर निकल आती थी तो हम सुनते थे “खाओ, खेलो और खुश रहो” यह किसे कहा जाता था – प्रेत को उस स्त्री को जो प्रेताविष्ट रहती थी (जिसे कारनी कहते थे) . उस पीर को जिसकी वन्दना की जाती थी या हम देखने वालों को. खाओ, खेलो और खुश रहो – किसके हिस्से की उम्मीद थी यह .कहीं उस अधनंगे ओझा के अपने हिस्से की ही तो नहीं ! हम कहाँ जान पाते कि कौन किससे मुखातिब है . वही ओझा जब शाम में गेहूँ के खेतों से मैना उड़ा रहा होता था तो यह उसके लिए एक खेल ही क्यों नहीं होता था. क्या तबतक वह मंत्र भूल चुका होता था, जो उसे फिर तभी याद आ सकता था जब उसके सम्मुख कोई प्रेत आये. क्या वह भी कोई मैना था जिसे कोई रात, कोई दिन, कोई सुबह, कोई शाम उड़ा रहा होता था ! क्या इस डूब रहे सूरज के वश में उसके लिए कोई जादू नहीं जो बारहा, “खाओ, खेलो और खुश रहो ” कहता आया है . क्या वह जुनूँ में बकता रहता था. आह ! कोई जादू क्यों नहीं होता ! सबकुछ माया क्यों नहीं है …… “The World, alas, is real”.
***

तटभ्रंश


आंगन में हरसिंगार मह मह
नैहर की सन्दूक से मां ने निकाला था पटोर
पिता निकल गए रात धांगते
नहीं मिली फिर कहीं पैर की छाप

पानी ढ़हा बाढ़ का तो झोलंगा लटकाये आया एक मइटुअर सरंगी लिए
मां ने किया झोलंगा को उसकी देह का और ताकने लगी मेरा मुंह
ऐसा ही कुर्ता था तुम्हारे बाप का
पता नहीं किस वृक्ष के नीचे खोल रहा होगा सांसों का जाल

उसी पेड़ की डाल से झूलती मिली परीछन की देह
जिस के नीचे सुस्ताता था गमछा बिछाकर
सजल कहा माँ ने यूँ निष्कंप न कहो रणछोड़ , उत्कट प्रेम भी रहा हो कहीं जीवन से
***


रात्रिमध्ये


तै तो था एक एक सुग्गे को बिम्बफल
उसका भी वो जो उदि्वग्न रातभर ताकता रहता चांद
अगोरता रहा सेमल का फल पिछले साल
वन वन घूम रही प्यास की साही
निष्कंठ ढ़ूंढ़ती कोई ठौर पथराई हवा से टूट रहे कांटे

घम रहा रात का गुड़
निद्राघट भग्न पपड़िया रहा मन

खम्भे हिल रहे थे, तड़-तड़ फूट रहे थे खपड़े
ग्राह खींच रहा था पिता के पांव
उस अंधड़ में बनाया था कागज की नाव भाई की जिद पर
सुबह भूल गया था भाई, गल गई कहीं
या चूहे कुतर गए
या दादी ने रख दिया उस बक्से में जहां धरा हुआ है उनका रामायण
और सिंहासन बत्तीसी
छप्पर की गुठलियां दह गई
इधर की गुठली हुई आम किधर या सड़ गई
किसी लाश की लुंगी में फंसकर किसी डबरे में
मुठभेड़ के बाद वह आदमी सड़क हो गया
दौड़ रहे महाप्रभुओं के रथ, कल तो वो
डाभ मोला रहा था बच्चे संग लिए
वसन्त की उस सुबह रक्त में घुली थी जिसकी छुअन
क्या उसका चेहरा भी हो गया फटा टाट !
चेहरे क्यों हो जाते फसल कटे खेत एक दिन
ताजिया पड़ा हुआ ... निचुड़ती रंग की कीमिया पल पल ....
लुटती रफ्ता कागज की धज ...
ये कहां चली छुरी कि गेन्दे पर रक्त की बूंदें
कुछ भी नहीं जान सका उस तितली की मृत्यु का
मैं तो ढ़ूंढ़ रहा था कबाड़ में कुरते का बटन
हर कठौती की पेंटी में छेद, हर यमुना में कालियादह
कहां भिगोऊं पुतलियां ....... किस घाट धोऊं बरौनियां .....
तांत रंगवाऊ कहां .... किस मरूद्वीप पर खोदू कुंआ
बहुत उड़ी धूल, पसरा स्वेद-सरोवर क्षितिज के पार तक
रौशनी सोख रही आंखों का शहद ....
धर तो दूं आकाश में अपने थापे हुए तारे
... क्या नींद के कछार में बरसेंगी ओस
पंक हुए प्यास में जनमेगी हरी दूब जहां पांव दाब चलेंगे देवगण ..... !
***

Thursday, April 15, 2010

पोएट्री ऑफ़ विटनेस : कैरोलिन फोर्शे


साक्ष्य (विटनेस) की कविता पाठक को रूबरू कराती है उसकी व्याख्या से जुड़ी एक दिलचस्प समस्या से. हम अभ्यस्त हैं अपेक्षाकृत सरल श्रेणियों के: फ़र्क करते हैं "वैयक्तिक" और "राजनीतिक" कविताओं में; पहली श्रेणी से भान होता है प्रेम और भावनात्मक क्षति के गीतों का, और दूसरी इशारा करती है एक सार्वजनिक भागीदारी की ओर जो ज़रूरी होते हुए भी विभाजनात्मक (डिवाइज़िव) है. वैयक्तिक और राजनीतिक के बीच का भेद राजनीतिक क्षेत्र को बहुत अधिक और बेहद कम विस्तार दे देता है; उसी समय वह वैयक्तिक को बना देता है अति महत्त्वपूर्ण और यथेष्ट महत्त्व न रखनेवाला. अगर हम वैयक्तिक के आयाम को तजते हैं तो प्रतिरोध की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण जगह के छूटने का खतरा होता है. वैयक्तिक का सेलेब्रेशन हालाँकि एक मायोपिया दर्शा सकता है; अक्षमता यह देख पाने की कि अर्थव्यवस्था और राज्य की विशाल संरचनाएं अगर व्यक्तिगत के दुर्बल क्षेत्र को निर्धारित न भी करें तो सीमाबद्ध कैसे करती हैं.
हमें एक तीसरे पद की आवश्यकता है, एक ऐसा पद जो राज्य एवं वैयक्तिक की कथित सुरक्षित शरण-स्थलियों के बीच की स्पेस को बयान कर सके. इस स्पेस को हम नाम दे देते हैं "सामाजिक". उत्तरी अमेरिका के बाशिंदों के तौर पर हम खुशनसीब हैं: हमारे लिए लड़ाइयाँ (अगर हम खुद लड़ने वाले न हों) लड़ी जाती हैं कहीं और, दूसरे देशों में. जिन पर बम बरसाए जाते हैं वे औरों के शहर होते हैं. जिन घरों को ध्वस्त कर दिया जाता है वे घर होते हैं दूसरों के. हम खुशकिस्मत इसलिए भी हैं कि हम मार्शल लॉ के अधीन नहीं रहते, नाम मात्र के प्रतिबन्ध हैं राज्य सेंसरशिप पर, हमारे नागरिकों को देशनिकाला नहीं दिया जाता. अपने सहयोगियों को चुनने और अपनी सामुदायिक ज़िन्दगियों को निर्धारित करने के लिए हम वैधिक एवं न्यायिक तौर पर स्वतंत्र हैं. मगर हमें शायद अपनी सामाजिक ज़िन्दगियों को अपनी पसंद (चॉयस) का प्रतिफल मात्र नहीं मान लेना चाहिए: प्रतिरोध और संघर्ष का एक स्थान है यह सामाजिक, जहाँ पुस्तकें प्रकाशित होती हैं, कविताएँ पढ़ी जाती हैं और विरोध प्रचारित किया जाता है. ये वह क्षेत्र है जिसमें इन्साफ़ के नाम पर राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ़ दावे पेश किये जाते हैं.
इस सामाजिक स्पेस में कविता को स्थित करके हम अपने कुछेक अवशिष्ट पूर्वाग्रहों को दूर कर सकते हैं. जो कविता पराकाष्ठा की अवस्थिति के दूसरे छोर से हमें पुकारती है, उसका मूल्यांकन "विशुद्धता" (एक्युरसी) और "जीवन सत्य" (ट्रुथ ऑफ़ लाइफ) की सरलीकृत धारणाओं द्वारा नहीं किया जा सकता. उस कविता का मूल्यांकन तो, जैसा कि लूडविग विट्गनस्टाइन ने कन्फेशन के बारे में कहा था, उसके परिणामों के आधार पर करना होगा न कि उसमें निहित सच्चाई को प्रमाणित करने की हमारी क्षमता के आधार पर. वास्तव में कविता हमारे लिए इस बात का एकमात्र प्रमाण हो सकती है कि कोई घटना घटी है: हमारे लिए वह किसी घटना के एकमात्र सुराग (ट्रेस) के तौर पर जिंदा है. वैसे तो कुछ भी नहीं है हमारे वास्ते जिस पर कविता को स्थापित किया जा सके, कोई निष्पक्ष विवरण मौजूद नहीं है जो हमें बताए कि किसी टेक्स्ट को "वस्तुनिष्ठ" सच के तौर पर देखा जाए या नहीं. कविता है सुराग की तरह, कविता है प्रमाण की भाँति.


- कैरोलिन फोर्शे, "ट्वेनटिएथ सेंचुरी पोएट्री ऑफ़ विटनेस," अमेरिकन पोएट्री रिव्यू 22:2 (मार्च-एप्रिल 1993), 17 से.

Monday, April 12, 2010

मनोज कुमार झा की कविताएँ

यह नौजवान साथी प्रगतिशील हिंदी कविता की परंपरा से जीवनद्रव खींचता हुआ हमारे समय की  कविता लिख रहा है। बिहार की धरती नागार्जुन, अरुण कमल के बाद एक बार फिर हिंदी कविता का उदात्ततम रूप लेकर हमारे सामने उपस्थित है। उसका ट्रीटमेंट अद्भुत और स्पृहणीय है। अनुनाद इस कवि को सेलीब्रेट कर रहा है। दरअसल यह पहले ही हो जाना था पर कवि से तब संपर्क नहीं हो पाया। मनोज के कविकर्म पर यह पहली प्रस्तुति है, आगे यह क्रम जारी रहेगा। पहली बार में मनोज को दिए गए भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार की संस्तुति और मनोज की तीन कविताएँ।

संस्तुति - भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार 2008

इस वर्ष का भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार श्री मनोज कुमार झा को उनकी कविता `स्थगन´ के लिए प्रदान किया जाता है। यह कविता `कथन´ पत्रिका के जुलाई-सितम्बर, 2008 अंक में प्रकाशित है।

स्थगन कविता को निरीक्षण की नवीनता, बिम्बों की सघनता और कथन की अप्रत्याशित भंगिमाओं के लिए रेखांकित किया जाता है। बार-बार घटित होने वाले एक पुरातन अनुभव और स्थिति को बिल्कुल नयी तरह से रचते हुए यह कविता भारतीय ग्राम-जीवन को अद्यतन सन्दर्भों में प्रस्तुत करती है। हमारे समाज के निर्धनतम वर्ग की लालसा और जीवट को अभिव्यक्त करती यह कविता हमें पुन: उन लोगों और दृश्यों की ओर ले जाती है जो बाहर छूटते जा रहे हैं।

मनोज कुमार झा की कविताएं जो हाल के दिनों में प्रकाशित हुई हैं उन्होंने अपने गहन इन्द्रिय बोध, वैचारिक निजता और साहसिक भाषिक आचरण से सहृदय पाठकों को आकर्षित किया है। दरभंगा के एक धुर गांव मउ बेहट में रहकर सृजनरत मनोज की कविताओं की सामग्री प्राय: गांवों के जीवन से आती है, लेकिन अपनी अन्तिम निर्मिति में वह विचारप्रवण तथा वैश्विक होती है मानों यह सिद्ध कर रही हो कि कविता का जीवन स्थानबद्ध होते हुए भी सार्वदेशिक होता है। मैथिली के शब्दों-मुहावरों से संपृक्त उनकी कविताएं हिन्दी को एक सलोनापन देती हैं और सर्वथा नये बिम्बों की श्रृंखला अभी के निचाट वक्तव्यमय काव्य मुहावरे को अभिनंदनीय संश्लिष्टता। 1976 में जन्मे मनोज कुमार झा आजीविका की अनिश्चितता के बावजूद निरन्तर अध्ययनशील और रचनाकर्म में संलग्न हैं। उन्होंने अनेक अनुवाद किए हैं, निबंध भी लिखे हैं और वह सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलनों में भी सक्रिय रहे हैं। इस वर्ष का भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार प्रदान करते हुए हमें हार्दिक प्रसन्नता है।

- अरुण कमल
***
इस कथा में मृत्यु

(1)
इस कथा में मृत्यु कहीं भी आ सकती है
यह इधर की कथा है।
जल की रगड़ से घिसता, हवा की थाप से रंग छोड़ता
हाथों का स्पर्श से पुराना पड़ता और फिर हौले से निकलता
ठाकुर-बाड़ी से ताम्रपात्र
- यह एक दुर्लभ दृश्य है
कहीं से फिंका आता है कोई कंकड़
और फूट जाता है कुंए पर रखा घड़ा ।

गले में सफेद मफलर बांधे क्यारियों के बीच मन्द-मन्द चलते वृद्ध
कितने सुन्दर लगते हैं
मगर इधर के वृद्ध इतना खांसते क्यों हैं
एक ही खेत के ढ़ेले-सा सबका चेहरा
जितना भाप था चेहरे में सब सोख लिया सूखा ने
छप्पर से टपकते पानी में घुल गया देह का नमक
कागज जवानी की ही थी मगर बुढ़ापे ने लगा दिया अंगूठा
वक्त ने मल दिया बहुत ज्यादा परथन ।

तलुवे के नीचे कुछ हिलता है
और जब तक खोल पाए पंख
लुढ़क जाता है शरीर।

उस बुढ़िया को ही देखिए जो दिनभर खखोरती रही चौर में घोंघे
सुबह उसके आंचल में पांच के नोट बंधे थे
सरसों तेल की शीशी थी सिर के नीचे
बहुत दिनों बाद शायद पांच रूपये का तेल लाती
भर इच्छा खाती मगर ठण्ड लग गई शायद
अब भी पूरा टोला पड़ोसन को गाली देता है
कि उसने रांधकर खा लिया
मरनी वाले घर का घोंघा ।

वह बच्चा आधी रात उठा और चांद की तरफ दूध-कटोरा के लिए बढ़ा
रास्ते में था कुआं और वह उसी में रह गया, सुबह सब चुप थे
एक बुजुर्ग ने बस इतना कहा-गया टोले का इकलौता कुआं।

वह निर्भूमि स्त्री खेतों में घूमती रहती थी बारहमासा गाती
एक दिन पीटकर मार डाली गई डायन बताकर ।

उस दिन घर में सब्जी भी बनी थी फिर भी
बहू ने थोड़ा अचार ले लिया
सास ने पेटही कहकर नैहर की बात चला दी
बहू सुबह पाई गई विवाहवाली साड़ी में झूलती
तड़फड़ जला दी गई चीनी और किरासन डालकर
जो सस्ते में दिया राशनवाले ने
- पुलिस आती तो दस हजार टानती ही
चार दिन बाद दिसावर से आया पति और अब
सारंगी लिए घूमता रहता है।

बम बनाते एक की हाथ उड़ गई थी
दूसरा भाई अब लग गया है उसकी जगह
परीछन की बेटी पार साल बह गई बाढ़ में
छोटकी को भी बियाहा है उसी गांव
उधर कोसी किनारे लड़का सस्ता मिलता है।

मैं जहां रहता हूं वह महामसान है
चौदह लड़कियां मारी गई पेट में फोटो खिंचवाकर
और तीन महिलाएं मरी गर्भाशय के घाव से ।

(2)
कौन यहां है और कौन नहीं है, वह क्यों है
और क्यों नहीं- यह बस रहस्य है।
हम में से बहुतों ने इसलिए लिया जन्म कि कोई मर जाए तो
उसकी जगह रहे दूसरा ।
हम में से बहुतों को जीवन मृत सहोदरों की छाया-प्रति है।
हो सकता है मैं भी उन्हीं में से होऊं ।
कई को तो लोग किसी मृतक का नाम लेकर बुलाते हैं।
मृतक इतने हैं और इतने करीब कि लड़कियां साग खोंटने जाती हैं
तो मृत बहनें भी साग डालती जाती हैं उनके खोइछें में ।
कहते हैं फगुनिया का मरा भाई भी काटता है उसके साथ धान
वरना कैसे काट लेता है इतनी तेजी से।
वह बच्चा मां की कब्र की मिट्टी से हर शाम पुतली बनाता है
रात को पुतली उसे दूध पिलती है
और अब उसके पिता निश्चिन्त हो गए हैं।

इधर सुना है कि वो स्त्री जो मर गई थी सौरी में
अब रात को फोटो खिंचवाकर बच्ची मारने वालों
को डराती है, इसको लेकर इलाके में बड़ी दहशत है
और पढ़े-लिखे लोगों से मदद ली जा रही है जो कह
रहे हैं कि यह सब बकवास है और वे भी सहमत हैं
जो अमूमन पढ़े-लिखों की बातों में ढू़ंढ़ते हैं सियार का मल।

इस इलाके का सबसे बड़ा गुण्डा मात्र मरे हुओं से डरता है।
एक बार उसके दारू के बोतल में जिन्न घुस गया था
फिर ऐसी चढ़ी कि नहीं उतरी पार्टी-मीटिंग में भी
मन्त्री जी ले गए हवाई जहाज में बिठा ओझाई करवाने।

इधर कोई खैनी मलता है तो उसमें बिछुड़े हुओं का भी हिस्सा रखता है।
एक स्त्री देर रात फेंक आती है भुना चना घर के पिछवाड़े
पति गए पंजाब फिर लौटकर नहीं आए
भुना चना फांकते बहुत अच्छा गाते थे चैतावर ।

(3)
संयोगों की लकड़ी पर इधर पालिश नहीं चढ़ी है
किसी भी खरका से उलझकर टूट सकता है सूता ।
यह इधर की कथा है
इसमें मृत्यु के आगे पीछे कुछ भी तै नहीं है।
***

मनोज कुमार झा
जन्म - 07 सितम्बर 1976 ई0। बिहार के दरभंगा जिले के शंकरपुर-मांऊबेहट गांव में।
शिक्षा - विज्ञान में स्नातकोत्तर
विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं एवं आलेख प्रकाशित ।
चॉम्सकी, जेमसन, ईगलटन, फूको, जिजेक इत्यादि के लेखों का अनुवाद प्रकाशित।
एजाज अहमद की किताब `रिफ्लेक्शन ऑन ऑवर टाइम्स´ का हिन्दी अनुवाद संवाद प्रकाशन से प्रकाशित।
सराय / सी. एस. डी. एस. के लिए `विक्षिप्तों की दिखन´ पर शोध ।
संप्रति - गांव में रहकर स्वतन्त्र लेखन, शोध एवं अनुवाद

Friday, April 9, 2010

कविता की काया को देखना- दूसरी किस्त /प्रस्तुति यादवेन्द्र

अब्बास कैरोस्तामी की ही एक और फिल्म है विंड विल कैरी अस, जो आधुनिक फारसी कविता की बेहद महत्वपूर्ण स्तम्भ फ़रोग फ़रोख्जाद की इसी शीर्षक की कविता से प्रभावित है.इस फिल्म में यूँ तो जीवन मृत्यु के सवाल को अपनी तरह से देखने का प्रयास किया गया है,पर फिल्म जिस वाक्य से शुरू होती है वह भी बहुत महत्वपूर्ण है: ये रास्ता न तो कहीं से आ रहा है, न ही कहीं ले जा रहा है....यानि जीवन मृत्यु के सवाल मानव जाति की शुरुआत से ही उसको उलझाये हुए हैं और सदियाँ बीत जाने के बाद भी उनका कोई सर्वमान्य समाधान नहीं खोजा जा सका है.इस फिल्म में तेहरान से तीन लोगों का एक दल सात सौ किलो मीटर दूर कुर्दिस्तान के एक ऐसे गाँव में जा कर अपना डेरा डंडा डालता है जहा सेल फ़ोन का सिग्नल तभी मिल पाता है जब ऊँचे टीले पर जा कर संपर्क साधने की कोशिश की जाये.इस छोटे से गाँव में सेल फ़ोन से आवाज आ तो कहीं भी जाती है पर अपनी आवाज भेजने के लिए संघर्ष करना पड़ता है.शहर से जो दल आता है गाँव के लोगों को उनके मकसद के बारे में बिलकुल नहीं मालूम...बस गाँव का ही एक छोटा सा बच्चा उनके और गाँव के लोगों के बीच सेतु का काम करता है.शहर से आए हुए लोग दर असल खबरों से जुड़े वो लोग हैं जिनके पास सूचना है कि इस गाँव में एक बूढी स्त्री मृत्यु शय्या पर है और उनको उसकी मृत्यु के बाद किये जाने वाले खास खास रस्मो रिवाज का फोटोग्राफिक दस्तावेजीकरण करना है.जैसे जैसे फिल्म आगे बढती जाती है इसके मृत्यु पक्ष धीमा पड़ता जाता है...कभी झूठ न बोलने वाला लड़का अन्दर की जानकारी इकठ्ठा कर के खबर देता रहता है कि बूढी स्त्री स्वास्थय लाभ करने लगी है...लगभग एक व्यावसायिक मज़बूरी और अनिच्छा(मृत्यु) से शुरू हुई ये यात्रा धीरे धीरे शहरी लोगों के सुदूर गाँव के रीति रिवाज और जीवन को गहरे जुडाव के साथ समझने की यात्रा में बदलने लगती है इसका आभास ही नहीं होता.बार बार गाँव के ऊँचे टीले पर खुदाई करते हुए एक व्यक्ति (चेहरा कभी नहीं दिखता,एक बार दिखता भी है तो नजदीक से पैर का तलवा) की उपस्थिति दिखाने की कोशिश की जाती है जो दर असल चोरी छुपे कब्रों को खोदने के अभियान में जुटा हुआ है...पूछने पर बोलता है कि communication के लिए खुदाई करता है.फिल्म में एक प्रसंग ऐसा भी आता है कि कब्र खोदते खोदते आस पास की ढेर सारी मिटटी उसके ऊपर गिर जाती है...दम घुटने से मृत्यु के करीब पहुँचता हुआ ये आदमी शहर से आए दल की चिंता का कारण तो बनता है, उसको ये लोग अपनी गाड़ी से डॉक्टर के पास ले चलते हैं पर बीच में ही किसी और मामूली काम में उलझ कर उसको उसके हाल पर ही छोड़ देते हैं...आधुनिक जीवन की विडम्बना देखिये कि जिसकी मृत्यु की प्रतीक्षा की जा रही थी वो जीवन की ओर लौट जाता है और जो बार बार प्रगति की राह पर चलने की जिजीविषा के साथ दिखाई पड़ता है,उसका दम घुटना कोई खास आकर्षण और दायित्व बोध नहीं पैदा करता.बूढी स्त्री की मृत्यु का दस्तावेज बनाने गए लोगों को उसकी वास्तविक मृत्यु में कोई खास रस नहीं मिलता...उस मृत्यु में रस्मी तौर पर जुटी कम उम्र की और जवान स्त्रियों की फोटो उनको ज्यादा मूल्यवान,लाभप्रद और जरुरी लगती है.फिल्म में कब्र खोदनेवाला बे-चेहरे वाला किरदार शहर से आए दल के मुखिया को चाय के लिए ताज़ा दूध दिलाने के लिए अपनी युवा प्रेमिका के घर ले जाता है...घुटन भरे अँधेरे तहखाने में रौशनी के छोटे छोटे वृत्तों में जीवन की बे-पनाह सुन्दरता से रु-ब-रु होने पर हमें फ़रोग फ़रोख्जाद की बेहद लोकप्रिय कविता...हवा बहा ले जाएगी हमें...का पाठ सुनने को मिलता है... बार बार...प्रकट रूप में मृत्यु की बात करने वाली जीवन की उत्तप्त स्मृतियों का आख्यान कहती हुई एक कालातीत कविता....

हवा बहा ले जाएगी हमें -फ़रोग फ़रोख्जाद

मेरी पल भर में उड़ जाने वाली रात ...काश
हवा को इसी अफरा तफरी में मिलना है पत्तियों से--
मेरी पल भर में उड़ जाने वाली रात
लबालब भरी हुई है विनाशकारी संताप से....
सुनो,क्या तुम तक
पहुँच पा रही है परछाइयों की फुसफुसाहटें ?
वहां- रात में- कुछ कुछ घट रहा है
रक्तिम और व्याकुल होता जा रहा है चन्द्रमा
देखो तो कैसे जा कर चिपक गया है छत से
और वहां से छूट कर कभी भी
फर्श पर गिर सकता है बरबस...
बादल जैसे हों स्यापा करती हुई औरतें
बाट जोह रहे हैं अब हो ही जाये बारिश
खिड़की के पीछे कुछ है
जो दिखता है पल भर
फिर सब कुछ पर छा गयी हो जैसे मौत
थर थर कांप रही है रात
और थम रहा है धरती का अपनी धुरी पर घूमते रहना...
इसी खिड़की के पीछे
ठिठक कर खड़ा है एक अजनबी
मेरी और तुम्हारी नेकी भरी चिंता में आकुल...
तुम अपने हरे भरे आँगन में
बढ़ा कर रख देते हो अपनी हथेलियाँ--
उत्तप्त स्मृतियों की मानिंद-
मेरी स्नेहिल हथेलियों के ऊपर कस कर..
अपनी जीवनदायी ऊष्मा से सराबोर होंठ
ले आते हो मेरे प्रेमासक्त होंठों के पास...
हवा बहा ले जाएगी हमें
अपने संग संग...
हवा बहा ही ले जाएगी हमें
अपने संग संग.........
***

Tuesday, April 6, 2010

कविता की काया को देखना - प्रस्तुति : यादवेन्द्र


अब्बास कैरोस्तोमी आधुनिक ईरानी सिनेमा के शिखर पुरुष माने जाते हैं,इतना ही नहीं सिनेमा विशेषज्ञ उन्हें आज दुनिया के दस सर्व श्रेष्ठ फिल्म निर्देशकों में गिनते हैं.उन्होंने साहित्य की गहरी समझ वाले सिनेमा की नयी भाषा गढ़ी है,जिसमे इरान के श्रेष्ठ कवियों की कविताओं का भरपूर इस्तेमाल किया गया है.कहा तो ये भी जाता है कि ईरानी समाज पर धार्मिक और राजनैतिक पाबंदियां थोपने वाले सत्ताधीशों को ठेंगा दिखने के लिए अब्बास ने कविताओं और बच्चों का सहारा अपनी फिल्म में बड़े सारगर्भित और सार्थक ढंग से लिया है.उनकी एक बेहद चर्चित और प्रशंसित फिल्म है where is the friends house .ये फिल्म प्रसिद्ध ईरानी कवि चित्रकार सोहराब सेफेरी की इसी शीर्षक की मशहूर कविता पर आधारित है...इस कविता की आत्मा पर इस संवेदनशील फ़िल्मकार ने जैसी काया की निर्मिति की है उसकी तुलना शायद ही आज की किसी और फिल्म से की जा सकेगी.यहाँ प्रस्तुत है सोहराब सेफेरी की वह चर्चित कविता,जिसको पढ़ के पाठक अपने मन में जो चित्र बनाता है देखना है कि कल्पना शील अब्बास कैरोस्तोमी की फिल्म उस पर किस तरह की इमारत खड़ी करती है।

आधुनिक फारसी नयी कविता के पुरोधाओं में से एक सोहराब सेफेरी (१९२८-१९८०) जितने बड़े कवि थे उतने ही बड़े चित्रकार.पारंपरिक ईरानी परम्पराओं की गहरी जानकारी रखने वाले सेफेरी बौद्ध दर्शन से जितने प्रभावित थे उतनी ही पकड़ उनकी आधुनिक पश्चिमी विचारों पर भी थी.इसीलिए उनकी रचनाओं में दुनिया के तमाम विचारों का सम्मिश्रण देखा जा सकता है..आलोचक उनकी कविताओं की इस प्रकृति को आधुनिक फारसी साहित्य में अद्वितीय मानते हैं.अंग्रेजी के अतिरिक्त उनकी रचनाओं के अनुवाद फ्रेंच,स्पनिश,रुसी,इतालियन और स्वेदिश भाषाओँ में भी हुए हैं.

पता ठिकाना - सोहराब सेफेरी

कहाँ है दोस्त का घर?
साँझ के झुटपुटे में घुड़सवार ने पूछा
और इस पर चुप्पी साध गया आसमान
बगल से गुजरता राहगीर
मुट्ठी भर रेत और रौशनी की एक हरीभरी टहनी
उसके हाथ में थमाता है
और चिनार के पेड़ की ओर इशारा करते हुए बोलता है:
पेड़ तक पहुंचाने वाला रास्ता ये है
इसके बीचोबीच आयेगा एक घना बगीचा
इस बगीचे के बीच में दिखेगी एक खूबसूरत सी पगडण्डी..
ईश्वर की नींद से भी ज्यादा हरी भरी
जिसके अन्दर झांकोगे तो दिखेगा नीलवर्णी प्रेम
बिलकुल सच्चाई के मखमली पंख सरीखा
तरुणाई तक पहुँचते पहुँचते
पगडण्डी ओझल हो जाएगी...
फिर इसके बाद दिखाई देगा
एकांत का लुभावना कमल
पर उसकी ओर खिंचे चले मत जाना..
कमल जहाँ से दिखेगा
उस से दो कदम पहले ही
नजर में आयेगा पृथ्वी के कालातीत मिथकीय आख्यान का उदगम..
थके होगे सो ले लेना वहां थोड़ा सा विराम..
इस जगह तुम्हे महसूस होगी ऐसी दहशत पगी नीरवता
सब कुछ खालिस नंगा दिखाई देता है
जिसके आर पार
दम साध के हवा की तरल मासूमियत में सुनोगे
तो लगेगा
पास से आ रही है जैसे कुछ सरसराने की आहट...
आस पास जब दौड़ेंगी तुम्हारी निगाहें
तो दिखेगा एक फुर्तीला सतर्क बालक
देवदार के वृक्ष पर चढ़ के दुबका हुआ
जिसकी ऑंखें गडी हुई हैं
रौशनी के घोंसले के अन्दर
कि वहां से पकड़ लाये
एक पंख फडफडाता परिंदा....
जब तुम वहां पहुँच जाओगे
तो उस बालक से ही से पूछना:
कहाँ है दोस्त का घर????

( http://www.blogger.com/www.perlit.sailorsite.net%20/mahvash%20/sohrab%20_neshani%20.html/mahvash /sohrab _neshani .html पर प्रस्तुत महवश शाहेघ के अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित पुनर्पाठ)
***
अपनी बहुचर्चित फिल्म में अब्बास एक आठ साल के मामूली से बच्चे की अपने दोस्त को तलाश करने की जिस जद्दो जहद का ताना बाना बुनते हैं उसमे जीवन की तमाम बे रौनक बे रंगीनी के बीच से मानवीयता और निर्दोष संवेदना की खुशबू उठती हुई दिखाई देती है.एक दिन शाम को स्कूल से घर लौट कर आने पर ये बच्चा अपने बस्ते में एक नयी कॉपी देखता है...उसकी बगल की सीट पर बैठने वाले सह पाठी की कॉपी गलती से उसके साथ साथ चली आयी है.उसको देख के वो इस आशंका से सिहर जाता है कि अगले दिन कठोर दंड देने वाला निर्मम मास्टर अपनी कॉपी में होम वर्क न करने के कारण पीट पीट कर उस लड़के का भुरता ही बना डालेगा.अपनी नौकरी और जीवन से घनघोर रूप में असंतुष्ट मास्टर को होम वर्क कर के न आना उतना उत्तेजित नहीं करता जितना ये कि कोई विद्यार्थी अपनी कॉपी में ऐसा न करे.घर पहुँचते ही बच्चे की थकी माँदी माँ को काम में हाथ बंटाने वाला एक सहारा दिखता है तो अपाहिज दादा को उनका काम कर देने वाला...इन सबकी अपनी अपनी उम्मीदें और फरमाईशें हैं...हर रोज़ ये बच्चा इन सबको पूरा किया भी करता था,पर आज वो इन सबकी कोई परवाह नहीं करता--उसके सामने तो बस एक ही लक्ष्य है कि जल्द से जल्द उस सहपाठी की कॉपी उसके पास तक पहुँचा दी जाए ....पर उसका घर कहाँ है ये तो मालूम ही नहीं, सिवा इसके कि पहाड़ी के उस पार से वो आता - जाता है.पूरी फिल्म अपने दोस्त के घर की तलाश की बेचैन कर देने वाली कहानी है. घर के लोगों की बातें अनसुनी कर के बच्चा कॉपी ले के पहाड़ी के उस पार निकल जाता है ...पर घर नहीं मिलता.थोड़ी देर बाद ये सोच कर सांझ के झुटपुटे में वो वापस अपने घर की ओर लौट पड़ता है कि हो सकता है दोस्त अपने पिता को ले के उसके घर की ओर चला आया हो ..रास्ते में उसको अपने ज़माने में कलाकारी वाले सुन्दर दरवाजे बनाने के लिए मशहूर बढई मिलता है जिसकी कला की अब कोई कीमत नहीं रही...वो बच्चे को एक सूखा हुआ हुआ फूल देता है.आने जाने में ही रात घिर आती है...अंत में थक हार कर बच्चा घर लौट कर अपना होम वर्क पूरा करता है,साथ साथ अपने दोस्त की कॉपी में भी होम वर्क करता है.सुबह सुबह जब वो स्कूल पहुँचता है तो दोस्त की कॉपी खो जाने की बदहवासी उसके चेहरे पर साफ़ साफ़ दिखाई देती है.बच्चा दोस्त को उसकी कॉपी थमाता है...जल्दी जल्दी वो अपनी कॉपी खोलता है...उसके अन्दर उसको बूढ़े बढई का दिया हुआ सूखा हुआ फूल दिखाई देता है,साथ साथ सुन्दर अक्षरों में किया हुआ होम वर्क भी.तब टक मास्टर बेंत लेकर वहां पहुँच जाता है...जैसे ही उसको कॉपी में होम वर्क किया हुआ दिखता है और उनके बीच अपनी छटा बिखेरता फूल दिखता है,दोस्त की पीठ पर हाथ रखते हुए वो बोलता है...शाबाश....और आगे बढ़ जाता है....संतोष की मुस्कराहट लिए बच्चे के चेहरे पर पहुँच कर फ़िल्मकार का केमरा ठहर जाता है।

विडंबना ये है कि अब्बास कैरोस्तोमी की फिल्मों को शानो शौकत से तेहरान के एक संग्रहालय में प्रदर्शित करने वाला ईरानी सत्ता तंत्र उनकी फिल्मों को सार्वजनिक तौर पर इरान में दिखने की इजाजत नहीं देता...अनेक प्रसिद्ध ईरानी फिल्मकारों की तरह उन्होंने इरान से बाहर जा कर बस जाने के विचार को सिरे से ख़ारिज कर दिया।

अब्बास कैरोस्तोमी एक जाने माने कवि भी हैं,उनकी कवितायेँ जल्दी ही अनुनाद के पाठकों को पढने को मिलेंगी.उनका एक कविता संकलन अभी कुछ समय पहले ही छप कर आया है.अपने छाया चित्रों के लिए भी अब्बास को दुनिया भर में जाना जाता है,दुनिया के अनेक प्रमुख शहरों में उनकी फोटो प्रदर्शनियां लग चुकी हैं।
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