Friday, March 19, 2010

बख्तियार वहाब्ज़ादे : अनुवाद एवं प्रस्तुति- यादवेन्द्र

१९२५ में जन्मे बख्तियार वहाब्ज़ादे अजरबैजान के सबसे प्रसिद्द कवियों में शुमार किये जाते हैं.अजरबैजान की आज़ादी के लिए सोविएत संघ से अलग होने की लड़ाई में उनका सक्रिय योगदान रहा है...खास तौर पर अज़र भाषा को ले कर वे खासे संवेदनशील रहे हैं. अपनी भाषा के बारे में उनकी ये उक्ति बहुत चर्चित है: यदि तुम कह नहीं सकते कि आजाद हो तुम...एकदम मुक्त...अपनी मातृभाषा में..तब आखिर किसको होगा यकीन...कि तुम सचमुच आज़ाद हो..जीविका के लिए उन्होंने विश्वविद्यालय में दर्शन शतर का अध्यापन किया.उनकी कविताओं के अनेक संकलन प्रकाशित हुए...विश्व की अनेक भाषाओँ में उनके अनुवाद किये गए...अज़री भाषा में उन्होंने खूब लोकप्रिय गीत भी लिखे जिन्हें संगीतबद्ध किया गया.कविताओं के अलावां उन्होंने कहानी,उपन्यास और नाटक भी लिखे.२००९ में पकी उमर में उनका निधन हुआ.

यहाँ प्रस्तुत है उनकी एक लोकप्रिय कविता:

उम्र से शिकायत


जब मैं था १५-२० साल का
तो सोचा करता था कि ४० साल कि उम्र में तो
बूढ़ा हो जाता है आदमी...
अब मैं ५० साल को छूने जा रहा हूँ
तब भी बचपन की ख्वाहिशें जिन्दा हैं
मेरे मन के अन्दर हिलोरें लेती हुई...

ऐसा लगता है जैसे कल की ही तो बात है
कि मैं स्कूल के रास्ते में होऊं
रोंदता जाता सूरजमुखी के सड़क पर फैलाये बीज
और कंधे पर भारी भरकम बस्ता उठाये हुए...
ऐसा लगता है जैसे कल की ही तो बात है
कि मैं सवारी कर रहा होऊं
सरकंडों से निर्मित घोड़ों की पीठ पर...

क्या करूँ... मुझे एहसास नहीं हो पा रहा
अपनी सही उम्र का..
दिल तो अब भी वही दिल है
ख्वाहिशें तो अब भी वही ख्वाहिशें हैं...
दिल को देखो तो कभी पहाड़ की चोटी पर
तो पलक झपकते सागर की अतल गहराईयों में..
जाने क्यूँ उमड़ते घुमड़ते रहते हैं
ऐसे अनगिनत एहसास मेरे अन्दर?

कभी कभी तो लगता है
जैसे मैं संतान हूँ बीते हुए कल का
इन मचलनों पर तो मुझे खुद भी हंसी आ जाती है..
पर खुद को क्यों कोसना
वक्त इतना तंग था
कि ज्यों दिखा आकाश में
अगले पल छू मंतर हो गया..

जैसे जैसे हम गंवाते जाते हैं अपनी जवानी
जीवन को चार हाथों से थामने की कोशिश करते हैं
पेड़ की मानिंद हमारी जड़ें बेधती जाती हैं
धरती को अन्दर..और अन्दर..
और हम फलों की तरह पकने लगते हैं..
देखो तो..वहां पिछवाड़े में शोर शराबा कैसा है
बच्चे भाग रहे हैं इधर उधर
और चहारदीवारों को लाँघ रहे हैं..
जाता हूँ अभी और उनको देता हूँ खेलने के लिए सामान कुछ
गुत्थम गुत्था करके खेलूँगा मैं भी उनके संग
और पहुँच जाऊंगा अपने बचपन में
पलक झपकते ही...

आँख मिचौली खेलने को आतुर हो रहा है मेरा मन
इन खेत खलिहानों में
इतनी सफाई से छुप जाना चाहता हूँ इस बार मैं
कि चाहे कितना भी जोर लगा ले
मुझे ढूंढ़ न पाए
बुढापा...

पर उम्र का अपना निराला ही ढंग है
इसके मन के तहखाने में जाने कितनी तो छुपी हुई हैं धडकनें.. ..
सड़क पर चलते चलते
जब होने लगती है सांस लेने में मुश्किल
मैं कोसने लगता हूँ सड़क पर बिखरे कंकड़ पत्थरों को
या फिर इस नामुराद बेहिसाब चढ़ाई को..

अपने ही बाल बच्चों के साथ चलते चलते
जब पीछे छूट जाता हूँ
जानता हूँ नहीं कोई वाजिब वजह
कंकड़ पत्थर या चढ़ाई को कोसने की..
पर सामने जब पड़ जाये बला की खूबसूरती
तो एहसास होता है मैं भी उसको ऐसे ही निहारे जा रहा हूँ
जैसे टकटकी लगाये देख रहा है मेरा बेटा...
***
( जाला गरिबोवा के अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित प्रस्तुति)

1 comment:

  1. इसे ही कहते हैं उम्र एस परे चले जाना .....

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