Wednesday, March 17, 2010

आभा बोधिसत्व की एक कविता



तुम्हारे साथ वन-वन भटकूँगी
कंद मूल खाऊँगी
सहूँगी वर्षा आतप सुख-दुख
तुम्हारी कहाऊँगी
पर सीता नहीं मैं
धरती में नहीं समाऊँगी।

तुम्हारे सब दुख सुख बाटूँगी
अपना बटाऊँगी
चलूँगी तेरे साथ पर
तेरे पदचिन्हों से राह नहीं बनाऊँगी
भटकूँगी तो क्या हुआ
अपनी राह खुद पाऊँगी
मैं सीता नहीं हूँ
मैं धरती में नहीं समाऊँगी।

हाँ.....सीता नहीं मैं
मैं धरती में नहीं समाऊँगी
तुम्हारे हर ना को ना नहीं कहूँगी
न तुम्हारी हर हाँ में हाँ मिलाऊँगी
मैं सीता नहीं हूँ
मैं धरती में नहीं समाऊँगी।

मैं जन्मीं नहीं भूमि से
मैं भी जन्मी हूँ तुम्हारी ही तरह माँ की
कोख से
मेरे जनक को मैं यूँ ही नहीं मिल गई थी कहीं
किसी खेत या वन में
किसी मंजूषा या घड़े में।

बंद थी मैं भी नौ महीने
माँ ने मुझे जना घर के भीतर
नहीं गूँजी थाली बजने की आवाज
न सोहर
तो क्या हुआ
मेरी किलकारियाँ गूँजती रहीं
इन सबके ऊपर
मैं कहीं से ऐसे ही नहीं आ गई धरा पर
नहीं मैं बनाई गई काट कर पत्थर।

मैं अपने पिता की दुलारी
मैं माँ कि धिया
जितना नहीं झुलसी थी मैं
अग्नि परीक्षा की आँच से
उससे ज्यादा राख हुई हूँ मैं
तुम्हारे अग्नि परीक्षा की इच्छा से
मुझे सती सिद्ध करने की तुम्हारी सदिच्छा।

मैं पूछती हूँ तुमसे आज
नाक क्यों काटी शूर्पणखा की
वह चाहती ही तो थी तुम्हारा प्यार
उसे क्यों भेजा लक्ष्मण के पास
उसका उपहास किया क्यों
वह राक्षसी थी तो क्या
उसकी कोई मर्यादा न थी
क्या उसका मान रखने की तुम्हारी कोई मर्यादा न थी
तुम तो पुरुषोत्तम थे
नाक काट कर किसी स्त्री की
तुम रावण से कहाँ कम थे।
तुमने किया एक का अपमान
तो रावण ने किया मेरा
उसने हरण किया बल से मेरा
मैं नहीं गई थी लंका
हँसते खिलखिलाते
बल्कि मैं गई थी रोते बिलबिलाते
अपने राघव को पुकारते चिल्लाते
राह में अपने सब गहने गिराते
फिर मुझसे सवाल क्यों
तुम ने न की मेरी रक्षा
तो मेरी परीक्षा क्यों

बाटे मैंने तुम्हारे सब दुख सुख
पर तुमने नहीं बाँटा मेरा एक दुख
मेरा दुख तुम तो जान सकते पेड़ पौधों से
पशु पंछिओं
तुम तो अन्तर्यामी थे
मन की बात समझते थे
फिर क्यों नहीं सुनी
मेरी पुकार।

मुझे धकेला दुत्कारा पूरी मर्यादा से
मुझे घर से बाहर किया पूरी मर्यादा से
यदि जाती वन में रोते-रोते
तो तुम कैसे मर्यादा पुरुषोत्तम होते

मेरे कितने प्रश्नों का तुम क्या दोगे उत्तर
पर हुआ सो हुआ चुप यही सोच कर
अब सीता नहीं मैं
सिर्फ तुम्हारी दिखाई दुनिया नहीं है मेरे आगे
अपना सुख दुख मैं अकेले उठाऊँगी
याद करूँगी हर पल हर दिन तुम्हें
पर धरती में नहीं समाऊँगी।
सीता नहीं मैं
मैं आँसू नहीं बहाऊँगी।
सीता नहीं मैं
धरती में मुँह नहीं छिपाऊँगी
धरती में नहीं समाऊँगी।
***

10 comments:

  1. सीता का यह रूप पहली बार सामने आया है। बहुत बढ़िया आभाजी।

    अंत में "सकते थे से रही"
    यह वाक्य कुछ पल्ले नहीं पड़ा। शायद कुछ गड़बड़ है।

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  2. यह आभा जी के ब्लॉग पर पढ़ी थी..पुनः पढ़कर आनन्द आया.

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  3. सुन्दर! बेहद मौजू और दमदार कन्टेन्ट …बस कहीं-कहीं दुहराव और तुकान्त की आत्यंतिक तलाश खटकती है

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  4. अजित जी ,अंत में -सकते थे ते रही कविता की लाइन नहीं बल्कि मेरी कट पेस्ट की गलती है , क्षमा करें,आभार..

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  5. शिरीष, आप का बहुत बहुत आभार .....

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  6. अच्छी कविता है!
    आप की कविता से मुझे अपनी माँ की कविता की याद हो आई - 'पद चिह्नो पर नहीं चलूँगी'
    http://vimlatiwari.blogspot.com/2008/02/blog-post.html
    हालांकि आप की कविता का मौज़ू अलग है।

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  7. अरे वाह! !आश्चर्य मिश्रित हर्ष हुआ आपको अनुनाद पर देखकर . आपकी कविता बहुत सुन्दर है सीता के बहाने आपने सबकी बात कह दी सुन्दर रचना केलिए . आपको बहुत बहुत बधाई

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  8. जो सीताएं बची हैं उनको भी समझाना है, सीता नहीं वो

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  9. आभा जी को इस अच्छी कविता के लिए बधाई! उम्मीद है कि उनकी कवितायें अब निरंतर पढ़ने को मिलेंगी.

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