Sunday, March 14, 2010

नवनीता देवसेन की कवितायेँ


नवनीता देवसेन राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भाषा और साहित्य के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित और आदरणीय नाम है. यह उनकी जबर्दस्त बहुआयामी प्रतिभा ही है कि उन्होंने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में स्तरीय लेखन किया जो बहुत पसंद किया गया. बारह वर्ष की उम्र में भारतवर्ष पत्रिका में पहली कविता के प्रकाशन के साथ उनकी जिस रचनायात्रा की शुरुआत हुई थी. वह आज भी बदस्तूर जारी है। नवनीता जी का जन्म एक बहुत ही प्रतिष्ठित साहित्यिक परिवार में हुआ. आपके पिता श्री नरेन्द्र देव और मां राधा रानी देवी दोनों की बंगला के प्रख्यात कवि थे. उनकी इन कविताओं का अनुवाद किया है उत्पल बनर्जी ने. ये कविताएं हाल ही में प्रकाशित संग्रह और एक आकाश से संग्रहित हैं.

पहाड़

कोई कहे, न कहे
तुम सब कुछ जानते हो,
फिर भी कहीं पर पहाड़ है
छोटी बातें, बड़ी बातें, छोटे दुख, बड़ी वेदनाएं
सब कुछ के पार
एक बड़ा सा पहाड़ है खिलखिलाहट का
एक दिन
उस पहाड़ पर तुम्हारे ही संग बसाऊंगी घर
लोग कहें न कहें,
तुम्हें तो सब पता ही है.
***

आदि अंत
मेरे अलावा और कौन है तुम्हारा?
उसने कहा-नीला आसमान.
आसमान के अलावा और कौन है तुम्हारा?
उसने कहा-हरियाले धान,
धान के अलावा और कौन है?
गेरूई नदी.
नदी के बाद?
...पंचवटी.
पंचवटी के अलावा?
...सुनहले हिरण,
हिरणों के बाद?
...तूफान.
तूफान के अलावा
...अशोक कानन.
...अशोक कानन.
अशोक कानन के अलावा और कौन है तुम्हारा?
...काली मिट्टी
काली मिट्टी के बाद?
...तुम हो ना!
***

मकान
इस मकान
इस बरामदे, उस बरामदे
इस कमरे से उस कमरे में
मैं सिर्फ भागती रहती हूं.
एक ही तो मकान है और गिने-चुने कमरे
इसलिए घूम-घूम कर
जहां से शुरू, वहीं थक कर लौट आती हूं.
दीवार की तस्वीर कितनी लीलामयी हंसी-हंसती है
फर्श की परछाई जताती है उसका विरोध,
कितनी ऊंची आवाज में
चीख-पुकार होती रहती है इस मकान में
कांच चूर-चूर...
तहस-नहस बर्तन.
जबर्दस्त कलह में व्यस्त इस मकान के दरवाजे
खिड़कियां...छतें...दीवारें और बरामदे.
मैं भागती-भागती
एकदम थककर
आंचल बिछाकर इस पागल फर्श पर लेट जाती हूं.
***

छुट्टी
मेरे प्रिय
तुम्हारे लिए मैं क्या नहीं कर सकती?
मेरा जो कुछ भी है
सजा हुआ है तुम्हारे लिए.
मेरे प्रिय,
तुम्हें खुश देखने के लिए
मैं क्या नहीं कर सकती!
तुमने कहा था...
तुम्हें सहन नहीं होती बकुल फूलों की गंध
मेरे आंगन में लगे परदादा वाले बकुल के पेड़ को
मैंने इसीलिए काट दिया
कि तुम्हें खुश देख सकूं,
रत्न पाकर शायद तुम्हें अच्छा लगे सोचकर
देखो मैं अपने बच्चे का ह्दय
गोद से कैसे उखाड़ लाई हूं तुम्हारे रत्नकोश के लिए,
(इससे कीमती रत्न मुझे और कहां मिलता)
कि तुम्हें खुश देख सकूं.
लेकिन कमाल है प्रिय,
इंसान के मन का खेल!
फिर भी तुमने छुट्टी दे दी मुझे!
***

मुलाकात


भले न हुई हो मुलाकात
इससे भला क्या नुकसान है
मन के भीतर तो
दिन रात मुलाकात होती रहती है
सीने के भीतर बह रही है एक नदी
अकेली-अकेली
शर्मीली सरस्वती...
लहरों पर लहरें टूट रही हैं घाट पर
मन के भीतर चांद का पेड़ बढ़ता घटता है.
अजिर में झर जाते हैं चांदनी के फूल
चांदनी के फूलों से हवा के टकराने पर
फटते हैं दुखफल
अंगरखा पहने बीज दूर तक बिखर जाते हैं
भले न हुई हो मुलाकात
इससे भला क्या नुकसान है
इसी तरह दिन-रात मरना और बचना होता है
भस्म में से धार के विपरीत उभर आते हैं मायावी कामदेव
अवाक जल से भर उठती है सीने की झारी
सीने के भीतर निरवधि बह रही है एक नदी
मन के भीतर होती रहती है अंतरहीन मुलाकात।
***

4 comments:

  1. एक साथ इतनी कवितायें...?

    अभी फिलहाल "पहाड़" और "आदि अंत" पढ़ा है...

    अच्छी लगीं! अशोक कानन के बहाने आदि से अंत...वाह।

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  2. बहुत सराहनीय. पहाड़ पर कुछ भी लिखा जाये अपनी और खींच लेता है.. !इस प्रस्तुतीकरण के लिए धन्यवाद्.

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  3. बड़ी सुंदर कविताएं, दिल भर आया।

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