Thursday, February 4, 2010

एक छूटा हुआ मकान - विजय कुमार

अग्रज कवि विजय कुमार का नाम समकालीन कविता और कवितालोचना में एक विशिष्ट, महत्वपूर्ण और ज़रूरी नाम है। विजय कुमार जी ने अपने सतत् अनुवादकर्म से विदेशी कविता और समालोचना को जानने-पहचानने की समझ भी हमें दी है। उनकी कविताएं हमारे भग्नावशेष समय में एक समूची और मुकम्मिल बात कहने का धीरज धरती हैं, जिसके लिए पाठक के मन में एक अनिवार्य सम्मान तुरत जागता है। प्रस्तुत कविता पहली बार विपाशा के 89 वें अंक में छपी और अब यहां.... अनुनाद पर विजय जी पहली बार छप रहे हैं, अनुनाद परिवार आभार ज्ञापित करते हुए उनका स्वागत करता है।



एक छूटा हुआ मकान

नए-नए बसते मोहल्ले में
वह एक उम्रदराज़ मकान है छोटा-सा
बन्द
अपनी अन्तिम सांसे गिनता हुआ
क्यों इसे घूरती रहती हैं
आसपास खड़ी ये गगनचुम्बी इमारतें ?

मैं प्रतिदिन गुज़रता हूँ इस राह
प्रतिदिन बुलाती है एक पुरानी दुनिया
बुलाते हैं
दालान, खम्भे, दरवाज़े, खिड़की का एक पल्ला
कब्ज़े से लटका हुआ
अब गिरा अब गिरा
काठ की एक झुकी हुई शहतीर
टूटे हुए जंगले
और एक शालीन ख़ामोशी

एक गिलहरी
इस मकान की पलस्तर उखड़ी दीवारों पर
वहां उस ओर ज़ख़्म की तरह झांकती हुई ईंटें
कौन कब आया पिछली बार यहां
ये उसके जूतों के निशान
दहलीज़ की धूल पर अब भी
दरवाज़े के सूराखों में
उसकी आहट बसी हुई है

नीम अंधेरे में
कौन टोह लेता हुआ
रोशनदान के मैले शीशे से
यह पाइप पर चढ़ी हरे-हरे पत्तोंवाली एक नटखट बेल
या उन बैंगनी फूलों का धीरज
या एक चिड़िया की छोटी-सी उदास देह
कमरे में थोड़ा-सा शोर मचा लेती हुई

ज़ंग खाया यह पुराना ताला
यह अभी भूला नहीं है खुलना
यह अभी भी एक चाबी के इन्तज़ार में
यह आरामकुर्सी यहां मरियल-सी
इसकी चरमराहट में
अटकी हुई है किसी की एक आख़िरी हिचकी
एक बन्द घड़ी दीवार पर
प्रार्थना में हाथ जोड़े हुए पलंग के पैताने
और दीवार पर यह शीशा
किसी बीते समय से कानाबाती करता हुआ
यह गुसलख़ाने का नल
यह जो सूख गया बरसों पहले
फ़र्श पर इसके बूँद -बूँद टपकने का
अलौकिक धीरज अब भी

छत की सीढ़ियों से
चांदनी रात
यह क्यों उतरती है यहां
एक शर्मीली लड़की-सी दबे पांव
क्या अब भी
दादी-मां की कहानियां सुनते-सुनते
आंख मूँद लेती है ?

जो लोग रहे यहां
उनकी छांव यहां
दुनिया के शोर से घिरी हुई
स्वप्न में एक चित्र-सी रची हुई
शामिल होने मुझे बुलाती है हर रोज़

नहीं बीता कुछ भी नहीं
बीतेगा कुछ भी नहीं
सिर्फ़ हम बीत जायेंगे
वहां अब भी बचे रहने की
कोई जुगत
भीतर तमाम धड़कनें
अनटूटे स्वप्न
सारे मौसम
अच्छे-बुरे की अनगिन स्मृतियां
बहस मुबाहिसे
कुछ फ़ैसले जो हुए या नहीं हुए
कुछ समाधान जो मिले या नहीं मिले
भीतर अब भी थोड़ा-सा प्रेम
जो उलझता रहा क़दमों से
कुछ इच्छाएं
जो ख़त्म नहीं हुईं कभी भी

यहां से गुज़रते
मैं किसी दिन आऊंगा यहां
मैं आऊंगा
लेकिन आगन्तुक-सा नहीं
किसी हड़बड़ी में नहीं
मैं आऊंगा
और दरवाज़ा खुलेगा
और उम्मीद है
कौन है? कौन है? कौन है? का शोर उठेगा नहीं भीतर से।
***

6 comments:

  1. शानदार ........पढ़कर जाने क्यों गुलज़ार की नज़्म "कचहरी" याद आ गयी

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  2. विजय जी की कविता पढ़वाने के लिये शुक्रिया

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  3. अहा !!!!! कविता ने मुझे मेरे गाँव पहुंचा दिया ..........पिता का घर ,जो छूट गया बहुत पहले .

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  4. इस घर को किसी शहर में मैंने भी देखा है. और मैं इस् घर में दाखिल होने की हिम्मत नहीं जुटा सका...... आज तक. यह कविता लिखने के लिए बधाई विजय जी को. और प्रस्तुति के लिए शिरीश का आभार.

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  5. शिरीष भाई
    विजय कुमारजी हमारे समय के महत्‍वपूर्ण कवि है और मेरे चंद पसंदीदा कवियों में हैं. उन्‍हें अनुनाद पर देखकर खुशी हुई. मेरी ओर से बधाई स्‍वीकारें.
    - प्रदीप जिलवाने, खरगोन

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  6. badhiya kavita...Vijayji ka mail id bheje plz.

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